यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस के ऑपीनियन पेज पर छपे लेख ‘ब्रोकेन प्रॉमिसेज़’ की हिंदी में प्रस्तुति है. इस लेख को लिखने वाले सुखदेव थोरात, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर हैं.


भारतीय जनता पार्टी के आम चुनावों के लिए साल 2014 में जारी किया गया घोषणा पत्र पार्टी के सामाजिक न्याय और खुशहाली की प्रतिबद्धता का गवाही दे रहा था. इसमें यह दावा किया गया था कि सत्ता में आने के बाद पार्टी दलितों का शिक्षा, एंटरप्रिन्योरशिप और स्किल डेवलपमेंट के ज़रिए उत्थान करेगी. घोषणा पत्र में अनुसूचित जातियों पर हो रहे अत्याचारों को रोकने पर भी ज़ोर दिया गया था. सत्ता में आते ही भाजपा को इन लक्ष्यों को मिशन मोड में अपनाना था. लेकिन पिछले चार सालों में दलितों के प्रति नकारात्मक विकास की एक श्रंखला सी देखी जा सकती है. इसमें बहुत कुछ शामिल है. अभी हाल के ही उदहारण पर गौर किजिये. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में ढील दी गई है जिसने इस डर को जन्म दिया है कि दलित अब पहले से हासिल अधिकारों को भी खो रहे हैं.
दलितों का आर्थिक सशक्तिकरण सरकार द्वारा आबंटित किए गए स्पेशल कॉम्पोनेंट प्लान यानी कि एससीपी पर निर्भर करता है. 2014-15 के बजट में एससीपी के लिए 8.79 प्रतिशत था, 2015-16 में यह घटकर 6.63 प्रतिशत हो गया. 2016-17 के बजट में एक बार फिर इसे बढ़ाकर 7.06 प्रतिशत कर दिया गया, 2017-18 के बजट में 8.91 प्रतिशत किया गया और इस साल 2018-19 के बजट में यह 6.55 प्रतिशत कर दिया गया है, जो कि पिछले चार सालों में सबसे कम है. 2014 से लेकर 2018 तक एससीपी का औसत करीब 7.59 प्रतिशत रहा जो कि सरकार द्वारा रखे गए लक्ष्य 16.6 प्रतिशत से करीब 9 प्रतिशत कम था. इतना ही नहीं साल 2017-18 के बजट में एससीपी को ‘अनुसूचित जातियों के कल्याण’ के नाम से बदल दिया गया . यहां यह बात साफ कर दी जाए कि यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं है. सरकार के इस कदम का मतलब अनुसूचित जाति के लिए आवंटन के महत्व का अवमूल्यन करना है. एससीपी के किसी भी संदर्भ के अभाव में, विभिन्न मंत्रालयों/विभागों द्वारा किए गए आवंटन के मूल्यांकन के लिए पैरामीटर या मानदंडों को निर्धारित करने के पैमाने में अस्पष्टता आती है . हमें इस नाम के पीछे के उद्देश्य का पता नहीं है. लेकिन इसकी वजह से दलित सशक्तिकरण से ध्यान हट रहा है जबकि एसएसपी दलित सशक्तिकरण की पहचान थी.

एससीपी के आवंटन में आई गिरावट (और इसके नए नाम वाले अवतार) ने अनुसूचित जातियों के जारी कई योजनाओं को भी प्रभावित किया है. यहां हम सिर्फ दो के बारे में बात करेंगे- शिक्षा और उधमिता विकास. स्वतंत्रता के बाद से पोस्ट मैट्रिक स्कॉलरशिप स्कीम सामाजिक न्याय मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण योजना रही. वास्तव में यह योजना बीआर अम्बेडकर की पहल से शुरू हुई. लेकिन 2017-18 में इस मद के लिए आठ हज़ार करोड़ रुपयों की आवश्यकता थी जबकि सरकार ने इस स्कीम के लिए मात्र तीन हज़ार करोड़ रुपये आवंटित किए. फंडिग में किए गए इस घाटे के कारण पूरे देश में 5,10,000 से अधिक एससी छात्रों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. यही नहीं इस कमी के कारण बच्चों के स्कूल में बढ़ोत्तरी भी हो सकती है. इसके अलावा यूजीसी ने अनुसूचित जाति/जनजाति के स्कॉलर्स के लिए राष्ट्रीय पीएचडी फैलोशिप (जिसे पहले राजीव गांधी फैलोशिप के नाम से जाना जाता था) के तहत देरी से फंड रिलीज़ किया जिससे कई शोधकर्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ा.
सरकार ने एससी के बीच उद्यमशीलता को विकसित करने के लिए योजनाओं पर बल दिया है. 4.90 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ एससी/एसटी हब नामक एक विशेष योजना पेश की गई थी. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) जिसे इस योजना को कार्यान्वित करने का काम सौंपा गया था ने अंतरराष्ट्रीय कंसलटेंसी कंपनी केपीएमजी को सेवाओं के लिए नियुक्त किया जिसे वह प्रति माह लगभग 46 लाख रुपये का भारी शुल्क दे रही है. अगले तीन वर्षों तक इस कंसलटेंसी सर्विस के लिए 15 से 18 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना है. मंत्रालय ने किसी भी भारतीय संगठन को इस बारे में सलाह देने के लिए उपयुक्त नहीं समझा. एससी/एसटी उद्यमियों को शिक्षित करने के लिए खर्च किया जाने वाला अधिकतर फंड निजी पार्टियों द्वारा आयोजित सम्मेलनों के आयोजन में लग रहा है. इसकी उपलब्धि के तौर पर एमएसएमई मंत्रालय को एससी/एसटी द्वारा संचालित उद्यमों से अपनी खरीद या यूं कहें कि अपने निवेश का 4 प्रतिशत लाभ लेना था लेकिन यह सिर्फ 0.39 प्रतिशत ही लाभ दे पा रहा है जो बेहद ही निराशाजनक है. अब इसको बेहतर बनाने के लिए मंत्रालय को बेहतर प्रदर्शन करना होगा, ताकि अनुसूचित जाति के 59.7 लाख उद्यमों को मजबूत किया जा सके, जिनके लिए योजना तैयार की गई थी.
सामाजिक जागरुकता का क्या? भाजपा के 2014 में आम चुनावों के घोषणा पत्र में कहा गया था: एससी/एसटी की सुरक्षा सुनिश्चित करने और खास कर उनके खिलाफ हो रहे अत्याचार रोकना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है. 2014 में दलितों के खिलाफ अत्याचार के 40,401 मामले थे, 2015 में यह घटकर 38,670 हो गए और 2016 में ये सबसे अधिक 40,801 हो गए. ऐसा लगता है कि दलितों के खिलाफ अत्याचारों को कम करने के लिए बीजेपी की वचनबद्धता के बावजूद हिंसा में कोई भी कमी नहीं आई है. दर्ज की गई मामलों की संख्या के मुताबिक प्रति एक लाख आबादी पर दलित अत्याचार दर, मध्यप्रदेश (43), राजस्थान (42), बिहार (34), गुजरात (32), आंध्र प्रदेश (27), केरल (26), ओडिशा (25) और यूपी में (25) है.जिसका स्तर बहुत ऊँचा है . यहां बता दें कि इन राज्यों में से पांच राज्यों में अनुसूचित जाति पर सबसे ज्यादा अत्याचार होते हैं और इन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं. हालांकि सभी राज्यों में दलितों के खिलाफ अत्याचार हो रहे हैं लेकिन भाजपा के 2014 के घोषणापत्र में किए गए दावों को देखते हुए हिंसा में कुछ कमी की उम्मीद जताई जा रही थी.
न्यायपालिका भी इसमें पीछे नहीं है. अत्याचार अधिनियम में हालिया संशोधन ही हाल में हो रहे बवालों का कारण बन रहा है. अदालत के संशोधन के मुताबिक अब इस एक्ट में किसी जन सेवक की गिरफ्तारी से पहले नियुक्त अधिकारी की मंज़ूरी लेनी होगी जबकि जो जन सेवक नहीं है उसकी गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की रज़ामंदी से ही होगी. अध्ययनों से पता चला है कि सरकारी अधिकारियों की जानबूझकर की गई उपेक्षा के कारण अत्याचार अधिनियम के तहत लोग निर्दोष साबित हो जाते हैं. नियमों में हुआ यह बदलाव इन नियमों को बाईपास करने के लिए और अधिक प्रोत्सहित करेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र पुलिस महानिरीक्षक की रिपोर्ट को नजरअंदाज किया है, जिसने अत्याचार अधिनियम के तहत झूठे मामलों की परिकल्पना को नकार दिया. इससे ये साफ ज़ाहिर होता है कि यहां इस तथ्य को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया है कि गांवों में अनुसूचित जाति और ऊंची जाति को लोगों के बीच किस तरह का आर्थिक असंतुलन बना हुआ है- अंबेडकर ने कहा भी था- उन दलितों के खिलाफ भी समन जारी होना चाहिए जो कि गलत केस फाइल करते हैं. हालांकि कहा ये भी जा रहा है कि इस मामले में सरकार हार भी सकती है क्योंकि अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने न्यायालय में पहले सभी प्रासंगिक तथ्य नहीं रखे.
दलितों के खिलाफ एक और निर्णय में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय के स्तर पर अनुसूचित जाति की फैकल्टी के लिए आरक्षण रद्द कर दिया है. इस मामले में केंद्र सरकार ने भी उच्चतम न्यायालय से अपील करने के बजाय हाईकोर्ट के निर्णय को अपना समर्थन दे दिया. विश्वविद्यालयों में आरक्षित संकाय पदों में होने वाली संभावित कमी पर बिना किसी राय मशविरा के ही यूजीसी ने हाईकोर्ट के फैसले को तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए एक आदेश जारी कर दिया है.
इन घटनाक्रमों से ये साफ संकेत मिलता है कि बीजेपी शासन के चार सालों के दौरान, दलित पहले से हासिल लाभों को भी खो रहे हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here