साथियों, मैं इस लेख में जो कुछ लिखूँगा सच लिखूंगा सच के सिवा कुछ नहीं लिखूँगा। मैं सांप्रदायिक नहीं हूँ इसलिए फ़िल्मी फैज़ल की तरह गीता की, क़ुरआन की ,बाइबिल की, गुरु ग्रन्थ की, त्रिपिटक की सबकी कसम खा सकता...
बस्तर (Bastar) का नाम सुनते ही मन मे ढेरों सवाल उठते हैं और भय और क्रोध की एक मिश्रित सी लहर धमनियों में दौड़ जाती है। हालाँकि इन सारे सवालों में नक्सली समस्या एक ऐसा सवाल था जिसे समझने...
समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई कांग्रेस से आई हो जनता से आई झंडा के बदली हो जाई... समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई... यह विशुद्ध भोजपुरी भाषी जिले देवरिया में 1945 को जन्मे गोरख पांडेय का जनगीत है। यह उस समय की आबोहवा...
प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया, साहित्य और सिनेमा पर भी आप गहरी समझ रखते हैं. _________________________________________________________________________ कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा...
मेरे गुरू जी कहते हैं कि कभी भी सिनेमा की समीक्षा उसके तकनीकी पहलुओं पर नहीं करनी चाहिये. सिनेमा एक आर्ट फॉर्म है, जिसमें प्रभावोत्पादकता होती है. फिल्म रिव्यू साधारण दर्शक के लिये लिखे जाते हैं इसलिये फिल्मों की...
(adsbygoogle = window.adsbygoogle || ).push({}); यह लेख मैंने अम्बर्तो के जन्मदिन पर 5 जनवरी को लिखा था, जो आप तक आज पहुंच रहा है। लेकिन ऐसी शख्सियत का आपसे रूबरू होना बहुत जरूरी है क्योंकि यह वक्त पोस्टट्रुथ...
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“हमारी दुनिया में, जहाँ बंदूकों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर...
यह लेख चमन मिश्रा ने लिखकर हमें 6 जनवरी को कमलेश्वर की जयंती पर भेजा, जिसे हम एक दिन विलंब से प्रकाशित कर सके। वर्तमान में चमन एक पत्रकार हैं। लेखन में रुचि है। 'तान्या' नाम की किताब लिख...
विश्व पुस्तक मेले का दिल्ली के प्रगति मैदान में आज से आगाज़ हो रहा है. ऐसे में कई नई-पुरानी किताबों की चर्चा होगी. पर मैं थोड़ा ओल्ड स्कूल हूं और इस मामले में भारतीय चिंतन परंपरा की पारायण विधा...

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