आज बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर की पुण्यतिथि है। इस मौके पर अम्बेडकर को लेकर सोशल मीडिया पर खूब लिखा जा रहा है। कई पोस्ट्स को देखकर हैरानी हुयी कि अम्बेडकर से जुड़ी वह सभी झूठी बातें जो सवर्णवादी दुराग्रही समाज में अफवाह के तौर पर अभी तक जिंदा है उन्हें सोशल मीडिया के जरिये स्थापित तथ्य बनाया जाने का प्रयास किया जा रहा है। सबसे ख़ास बात यह दिखती है कि उनके काम को कमतर बताने के लिये संविधान का यह कहकर विरोध किया जाता है कि ‘इसे बाहर के देशो से चेंपा गया है। अम्बेडकर का इसमें कोई ख़ास योगदान नहीं था।’

संविधान को चेंपा गया कहना सिर्फ अम्बेडकर का अपमान नही है

हमने भी अपने बचपन में ऐसी कई बाते सुनी हैं। आप सब ने भी सुनी होंगी। हालांकि जब जानना चाहा तो पता चला कि सच्चाई इससे ठीक उलट है। संविधान को कापी पेस्ट आइटम या बाहर से चेंपा गया कहना सिर्फ अम्बेडकर का अपमान नहीं है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी, राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल और नेहरू सहित उन सभी लोगों का अपमान है जो संविधान के बनने की प्रक्रिया के सक्रिय स्टेक होल्डर थे। यह उस विरासत को नीचा दिखाना है जो हमारी आज़ादी की लड़ाई का आउटकम है।

हम जिसे चेपना कहते है वहां भी एक जबरदस्त समझदारी काम करती है

राजनीति के उदार मूल्यों को कौन सा राज्य नकार सकता है। सच है कि ऐसे ही मौलिक अधिकार अमेरिका के संविधान में भी है। इसमें ख़राबी क्या है। कानून के शासन का विचार हमने ब्रिटिश संविधान से लेकर कौन सी भूल कर दी है? दरअसल जिसे चेपना कहा जाता है वहां भी एक जबरदस्त समझदारी काम करती है। उस समयकाल में, जब संविधान का निर्माण हो रहा था, ‘अधिकारों’ पर सोचते हुए उन राज्य सत्ताओं के नियम भी लिए जा सकते थे, जहां पर गैर लोकतांत्रिक शक्तियां राज कर रही थीं। हम एक आजाद लोकतंत्र थे और हमने उन्ही राज्यों के संविधानों को तरजीह दी, जो नागरिकों के अधिकारों के मामले में उदात्त थे।

दो बातें और भी समझनी चाहिए कि यदि आप किसी विषय पर एक अच्छा पेपर लिखना चाहते हैं तो आप पहले बेहतर किताबों का अध्ययन कर उनसे नोट्स बनाते हैं और फिर उस विषय पर एक अच्छा पेपर लिख पाते हैं। इसी मायने में भारत का संविधान भी एक विलक्षण दस्तावेज है क्योंकि इसे तमाम लोकतांत्रिक राज्यों के संविधान को समझने के बाद बनाया गया और तभी इसमें इतना वक्त लगा।

दूसरी बात यह है कि यदि कोई भी वस्तु/विचार जीवन में सहूलियत लाकर उसे आसान बनाता है तो उसे अंगीकार करने में क्या बुराई हो सकती है! खुला हाफ पैंट अगर पैरों में आरामदायक महसूस कराता है तो उसे पहनने में क्या तकलीफ है? हाफ पैंट लम्बे समय तक संघ के गणवेश का हिस्सा भी रहा है। अपने आस–पास इस्तेमाल किये जाने वाले साधनों को देखिये। अगर इनमें बाहरी और देशी का विभाजन करेंगे तो गुजारा मुश्किल हो जायेगा.

संविधान का पहला काम यह है कि वह कुछ बुनियादी नियमो का ऐसा समुच्चय उपलब्ध करायें जिससे समाज के लोगों में न्यूनतम समन्वय और विश्वास बना रहे। लोकतांत्रिक समाजों ने दार्शनिकों द्वारा सुझाए गये राजनीतिक आदर्शों को अपने संविधान में शामिल किया है। भारत के संविधान की प्रस्तावना संविधान की आत्मा है या उसके भीतर के लिखे का निचोड़ है। प्रस्तावना में ऐसी कौन सी रुकावट है जो भारतीय समाज के लोगों के बीच में समन्वय और विश्वास बनाये रखने के बीच रोड़ा बन रही है। दरअसर बारीकी से समझा जाए तो यही वो आदर्श हैं जिस पर एक लोकतांत्रिक समाज को चलना चाहिए।

हर राज्य के साथ कुछ त्रासदियाँ जुड़ी होती हैं

हर राज्य के साथ कुछ त्रासदियाँ जुड़ी होती हैं। संविधान बनने के बाद से भारतीय समाज में जो भटकाव और दुर्घटनाएं (ज्यादातर धर्म और जाति से जुड़े मसलों पर) हमने देखी हैं उसकी वजह यह नहीं कि संविधान में कोई बुनियादी दोष है, बल्कि यह है कि हमने संविधान को अभी पूरी तरह स्वीकार ही नहीं किया है। इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि लोकप्रिय स्वर ने न्याय के सिद्धांत का तात्कालिक विरोध किया और बाद में उसे स्वीकार किया। जैसे सती प्रथा, बालविवाह और अस्पृश्यता का उन्मूलन, आरक्षण आदि के मसले पर जनवैधता न होने के बावजूद कानूनों द्वारा यह सुधारात्मक कदम उठाये गये। असली समस्या इसके इम्प्लीमेंटेशन की है।

अगर संविधान सचमुच भारतीय समाज की जड़ों तक उतर जाए तो यह स्वयं में एक खामोश क्रांति की काम करेगा। असली समस्या तो यह है कि हम संविधान बनने के इतने साल बाद भी इसे क्रियान्वयित नहीं कर पाए हैं। रही बदलाव की बात तो उससे कौन इनकार करता है। अम्बेडकर सहित संविधान सभा के सभी लोग इस बात के जबरदस्त हिमायती थे कि समय और जरूरत को देखते हुए संविधान में संशोधन होते रहने चाहिए। हो भी रहे हैं।

संविधान को उधारी का आईटम क्यों कहा जाता है?

दरअसल संविधान को कापी पेस्ट या उधारी कहा जाना सिर्फ जानकारी का अभाव वाली बात नहीं है। यह एक तरह की राजनीति का हिस्सा है जो कि संविधान बनने के बहुत समय पहले से ही जारी है। मूलतः इस राजनीति के दो चेहरे हैं। पहला आइडिया ऑफ़ इंडिया से जुडी बहस से जुड़ा विमर्श और दूसरा सवर्णवादी दुराग्रही मानसिकता की राजनीति। आजादी के बाद जब आइडिया ऑफ़ इंडिया पर चर्चा हुयी तो उस समय तमाम विचार रखे गये। दक्षिणपंथी जहां हिन्दू राष्ट्र के विचार का सपना देख रहे थे, वहीं वामपंथी इसे उस समय के सोवियत की तरह कम्युनिस्ट राज्य बनाना चाहते थे।

हालंकि लोकतांत्रिक तरीके से लम्बी बहस और मशवरे के बाद इन दोनों विचारों को खारिज कर दिया गया और फिर सभी विचारधाराओं की उदात्त और औचित्यपूर्ण मूल्यों को लेकर संविधान रचा गया। इसलिए आइडिया ऑफ़ इंडिया से जो शक्तियां असहमत भी थीं. उन्होंने भी भारतीय संविधान के अंतर्गत अपने राजनीतिक दल बनाये और राजनीति करने लगे। हालांकि आज भी संविधान में अंगीकार किये जा चुके ‘आइडिया ऑफ़ इंडिया’ से इन शक्तियों का खुला/छिपा विरोध जारी है जिसकी परिणति आप आजकल इस आम लाइन में सुन लेते हैं कि संविधान में तो अपना कुछ है ही नहीं। यह सारा कुछ कापी पेस्ट है।

दूसरी राजनीति सवर्णवादी मानसिकता से जुडी है। दरअसल संविधान निर्माण की पूरी प्रक्रिया अम्बेडकर की देख–रेख और अध्यक्षता में हुयी है। कई प्रगतिशील पहलुओं को अम्बेडकर ने संविधान में जोर देकर शामिल कराया है। यह बात ब्राम्हणवादी मानसिकता अब तक पचा नहीं पायी है कि हम ऐसे संविधान को क्यूँ माने जो एक दलित की अध्यक्षता में बनाया गया। इसलिए भी संविधान को ऐसे अनर्गल तरीकों से बदनाम किया जा रहा है। यह समय ऐसी अनर्गल टिप्पणियों को जवाब देकर अपनी लोकतांत्रिक विरासत के साथ खड़े होने का है।

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

2 COMMENTS

  1. पढ़कर कुछ टिप्पणी-
    आलेख ‘elephant in the room’ पर चुप है. दखिये अम्बेडकर के विरुद्ध ऐसे आरोपों का आजतक इसलिए बचाव करना पड़ता है क्योंकि अम्बेडकर को ही संविधान का सर्वेसर्वा कहकर प्रचारित किया गया है. पहले तो अम्बेडकर की सही भूमिका की विवेचना होनी चाहिए जो उन्होंने स्वयं 25 नवम्बर,1949 के अपने प्रसिद्ध अभिभाषण में किया था. अम्बेडकर ने समावेशी उर्जा और टीम वर्क को स्पष्टता से रेखांकित किया है. तो बस उन्हें प्रश्न के घेरे में रखने के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार वो लोग भी हैं जो अम्बेडकर की भूमिका के अलावा संविधान सभा में और कुछ देख नहीं पाते. इससे एक प्रतिक्रियावाद की राजनीति को इंधन मिलता है.

    दूसरी बात, जब चेपने और उधार लेने की बात आती है तो एक गंभीर विवेचना को अमरीकी, ब्रिटिश, आयरिश, कैनेडियन, ऑस्ट्रेलिया, जापानी, और फ्रेंच संविधान के साथ ‘भारत सरकार अधिनियम, 1935’ को सामने रखकर उदाहरण सहित देखना चाहिए. यह बताने का प्रयास करना चाहिए कि कैसे बाहरी सन्दर्भों को भारतीय अनुभवों, परिस्थितियों, और मजबूरियों के आधार पर भारतीय केन्द्रित बनाया गया. सारा खाका संविधान सभा की बहसों में दर्ज है. एक छोटे आलेख को यह सब करना संभव नहीं, लेकिन किसी एक मसले, जैसे मौलिक आधिकारों के साथ यह उदाहरण दे सकते हैं.

  2. विवेचना वाले लेख का थोडा इन्तजार कीजिये शान भाई. यह रिसर्च स्टोरी नहीं है. संविधान के उधारी बताने वालों के नजरिये पर एक त्वरित टिप्पड़ी है.

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