दैनिक जागरण भारत का एक प्रमुख हिंदी अख़बार है. इंडियन रीडरशिप सर्वे में इसकी रीडरशिप शीर्ष पर आती रही है. यह हिंदी लिखने-पढ़ने वालों की दुनिया में एक चर्चित अख़बार है. हमने गुजरात चुनाव के ठीक एक दिन बाद दैनिक जागरण में चुनाव परिणामों के कवरेज का वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया है. यह विश्लेषण दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण को आधार बना कर किया गया है.

हैरानी की बात यह है कि दैनिक जागरण में चुनाव से जुडी हुई कुल 33 ख़बरें छपी हैं, जिनमें से 21 ख़बरें केवल भाजपा पर केन्द्रित हैं. बाकी की बची 12 ख़बरों में 8 कांग्रेस से जुड़ी हैं और बाकी चार अलग एंगल से की गयी हैं.

ग्राफ के जरिए अंतर देखिये

एक बात और ध्यान खींचती है कि पृष्ठ एक से पृष्ठ पांच के बीच भाजपा केन्द्रित स्टोरीज सबसे ज्यादा हैं. पहले पेज पर चुनाव से जुडी हुई कुल 6 खबरें हैं ,जिनमें 5 खबरें सिर्फ भाजपा की हैं.

खबरों के प्लेसमेंट के आधार पर पार्टी से जुड़ी खबरों का ग्राफिकल प्रदर्शन

दैनिक जागरण के पहले पेज पर प्रशांत मिश्र की त्वरित टिप्पणी छपी है. प्रशांत दैनिक जागरण के राजनीतिक सम्पादक हैं. ’विश्वसनीयता और लोकप्रियता के एसिड टेस्ट में खरे उतरे मोदी’ शीर्षक के अंतर्गत इस लेख में लिखा गया है कि-

“जनता ने भाजपा को ही सिर-आंखों पर बिठाया. गुजरात मॉडल बरकरार रह गया. चेहरा, मुद्दा और प्रबंधन के मापदंड पर भाजपा अन्य दलों की तुलना में जहां खड़ी है उसमें यह आश्चर्य की बात भी नहीं है. फिर से स्थापित हो गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विश्वसनीयता और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के प्रबंधन की काट विपक्ष के पास नहीं है. पर सवाल यह खड़ा हो गया है कि विपक्षी पार्टियां और खासकर कांग्रेस क्या जनता और जमीन के मूड का आकलन करने में पूरी तरह अक्षम हो गई है? यह सच है कि कांग्रेस की कुछ सीटें बढ़ी हैं लेकिन क्या यह सचमुच में कांग्रेस के लिए संजीवनी है, खास तौर पर तब जबकि इसका श्रेय गुजरात के कुछ युवा तुर्कों को दिया जा रहा है।”

अखबार के सम्पादकीय उसकी अपनी मान्यताओं के स्पेस होते हैं. यह विषय पर अख़बार की अपनी राय मानी जाती है. ‘जनादेश का सन्देश’ शीर्षक के अंतर्गत अख़बार अपने सम्पादकीय में लिखता है कि-

“गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे भाजपा की राजनीतिक बढ़त पर मुहर लगाने के साथ ही यह भी साबित कर रहे हैं कि विपक्ष को आने वाले समय में भी उसे चुनौती देना पहले की ही तरह मुश्किल होगा. स्वाभाविक तौर पर गुजरात के चुनाव नतीजों पर ही अधिक जोर है, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि जहां अपने गढ़ में भाजपा 22 साल के सत्ता विरोधी रुझान पर पार पाने में सफल रही वहीं कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में पांच साल के सत्ता विरोधी रुझान का भी सामना नहीं कर सकी.”

अख़बार आगे भाजपा की कम सीटों को तर्क मुहैया कराते हुए लिखता है कि –

“नि:संदेह गुजरात में भाजपा को पिछली बार के मुकाबले कहीं कम सीटें मिलीं और वह सौ के आसपास ही सिमट गई, लेकिन एक तो लगातार छठी बार सत्ता हासिल करना कम उल्लेखनीय नहीं और दूसरे, इस तथ्य को भी ओझल नहीं किया जा सकता कि इस बार कांग्रेस को बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की गुजरात में अनुपस्थिति का लाभ मिलने के साथ ही तीन नए नेताओं अल्पेश, जिग्नेश और हार्दिक का समर्थन हासिल हुआ। इन नेताओं के समर्थन से लाभान्वित हुई कांग्रेस के दिग्गज नेता और यहां तक कि राज्य में पार्टी का चेहरा माने जाने वाले नेताओं को जिस तरह हार का सामना करना पड़ा उससे इस नतीजे पर पहुंचना मुश्किल हो रहा है कि गुजरात के नतीजों ने कांग्रेस को कोई बड़ी ताकत दी है.”

सम्पादकीय पृष्ठ पर ही दो लेख छपे हैं. इनमे से एक लेख राजनीतिक विशलेषक डॉक्टर एके शर्मा का है जो कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की बराबर बात करता है, जबकि दूसरा लेख भाजपा के राज्यसभा सांसद भूपेंद यादव का है, जिसमें भाजपा का जम कर गुणगान किया गया है. ’नये भारत के लिए जनादेश’ शीर्षक के अंतर्गत लिखे गये इस लेख की एक बानगी देखिये.

“परंपरागत भारतीय राजनीति में चुनाव जाति, वंश, संप्रदाय जैसे पहलुओं पर केंद्रित रहे हैं. तमाम चुनाव विश्लेषक भी इन्हीं आधार पर चुनावी भविष्यवाणी करते रहे हैं, परंतु भाजपा गुजरात चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में वंशवाद और जातिवाद के खिलाफ विकासवाद के नारे के साथ चुनावी रण में उतरी. कांग्रेस ने न केवल भाजपा की विकासवादी राजनीति का विरोध किया, बल्कि भ्रामक प्रचार के माध्यम से यह धारणा स्थापित करने का प्रयास भी किया कि गुजरात के विकास में सत्यता नहीं है. जहां कांग्रेस अपने इस प्रयास में सफल नहीं हो पाई वहीं भाजपा लगातार विकास के मुद्दे के साथ चुनाव में आगे बढ़ती रही”

पेज के आधार पर खबरों के शीर्षक और उनकी संख्या यहाँ देखी जा सकती है-

यहाँ इन खबरों के शीर्षकों पर ध्यान देने की जरूरत है, जो अख़बार का चरित्र बयाँ करती हैं-

1. मोदी सबसे बड़ा खेवैया

2. एसिड टेस्ट में खरे उतरे मोदी

3. फिर भी भाजपा का तिलिस्म नहीं तोड़ पाई कांग्रेस

4. तुरुप का इक्का नहीं बन सकी उधार की तिकड़ी

5. जीएसटी पर मोहर, चुभने वाले कदमों से दूर रहेगी भाजपा

6. भाजपा की जीत में बुलेट ट्रेन और भारत माला का योगदान

7. शाह की रणनीतिक चाल के आगे कांग्रेस चित्त

8. गुजरात में हज पर राम की जीत

9. गुजरात मॉडल पर मतदाताओं की मोहर

नीचे हिंदी के चार सबसे बड़े अख़बारों के स्क्रीनशॉट दिए गये हैं. दैनिक जागरण ने जहाँ कांग्रेस के ही सहयोगी अन्य तीन को अलग करते हुए कांग्रेस की सिर्फ 77 सीटें दिखाई हैं. वहीं दूसरे सभी अख़बारों ने इसके उलट किया है.

साभार दैनिक जागरण
साभार अमर उजाला
साभार दैनिक भास्कर
साभार हिंदुस्तान

प्रिय पाठक अब आप समझ सकते हैं कि अगर खबरों के लिये अगर आज भी आप केवल दैनिक जागरण पर निर्भर हैं तो आप दुनिया का केवल एक पक्ष देख रहे हैं. हो सकता है कि यह पक्ष आपको पसंद आता हो पर ऐसा भी हो सकता है कि आपकी पसंद की चीज पेश कर बड़े ही पेशेवर ढंग से आपको ठगा जा रहा हो. जो आपकी राजनीतिक समझ और प्रतिक्रिया दोनों के लिए ही बेहद खतरनाक हो सकता है.

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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