सुशांत कुमार शर्मा जेएनयू से हिंदी साहित्य में स्नातक करने के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल पूरी करके वर्तमान में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। उत्तर भारत के तीन प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर चुके रसिकमन सुशांत कुमार शर्मा की साहित्य, समाज और संस्कृति में गहरी रुचि है।

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बचपन में कभी उनकी तस्वीर देखी थी और देखता ही रह गया था। नाक में दोनों ओर हीरे की जगमगाती दो लौंग, करीने से संवार कर ऊपर की और जूड़े में बंधे हुए बाल, कांजीवरम सिल्क की चटख गुलाबी साड़ी हरी किनारी वाली, कान में सोने के बड़े-बड़े कनफूल हीरे जड़े हुए, अपेक्षाकृत चपटी और चौड़ी नाक, सीप की सी आँखें, पेशानी पर दक्षिण भारतीय ढंग का गोल बड़ा सा तिलक तथा उसके ठीक नीचे काली पट रेखा, विरल परंतु व्यवस्थित भौंहें, गले में लंबी लटकती हुई मटरमाला, साड़ी के आँचल के कंधे से आगे की ओर खींचकर गन्धर्व गरिमा के साथ मंच पर विराजमान एक दिव्य स्त्री मूर्ती।

होंठ कुछ मोटे और कुछ गहरे लिपस्टिक से और मोठे परंतु सुरम्य दिख रहे थे। अपना सारा सौन्दर्य बिखेरती हुई ऊपर की और उठी वे आँखे जिन्हें देखकर ऐसा लगता था सीधे ईश्वर से साक्षात्कार चल रहा हो। एक हाथ हवा में हल्का लहराता हुआ सा … यह मुखमूर्ति दिव्य संगीत साधिका श्रीमती विदुषी एम् एस सुब्बलक्ष्मी जी की ही हो सकती है। और तब आकर्षण, सम्मोहन की तरह काम करने लगा था जब एक रात रेडियो पर सुना था उनका गाया भजन, मेरे तो गिरिधर गोपाल…

खूब कोशिश की उस आवाज को और उस चेहरे को एक साथ रखकर सुनने की पर विफल रहा। न तो कर्णाटक और हिंदुस्तानी कंठ संगीत के बारे में कुछ आता था, न ही यह जनता था कि उत्तर और दक्षिण भारत की भाषाएँ और शैलियाँ ही नहीं बाकि टोन भी अलग-अलग होते हैं। अतः कह सकता हूँ कि सुब्बूल्लक्ष्मी जी की आवाज ने कर्णाटक कंठ संगीत से परिचय कराया मेरा। और जब संगीत को जानने, समझने लगा तो यह आवाज मन के एक ख़ास हिस्से पर अधिकृत सी होकर रह गई जिसे आज भी अपने भीतर ही भीतर महसूस करता हूँ।

सुब्बलक्ष्मी जी का गायन अद्वितीय है। प्रायः ऐसा देख जाता है कि उत्तर भारतीय या हिन्दुस्तानी शैली के गायकों में कर्णाटक पद्धति को लेकर कोई खास दिलचस्पी नहीं होती। मैंने ऐसे किसी उस्ताद का नाम या उतना बड़ा नाम नहीं सुना जो हिंदुस्तानी कंठ संगीत के साथ-साथ कर्नाटक पद्धति को भी जानता हो परंतु दक्षिण भारत के गायकों में हिंदुस्तानी को लेकर हमेशा लगाव रहा। शायद यही कारण है कि जितने बड़े हिंदुस्तानी पद्धति के गायक दक्षिण में पैदा हुए उतने उत्तर में नहीं। सुब्बलक्ष्मी भी इस उत्तर-दक्षिण की साझा गायकी में एक मिसाल हैं। उनकी आवाज में एक खास तेवर है। यह तेवर हमारे समय में बस विदुषी गिरिजा देवी की आवाज में पाया जाता रहा। पर इस साल अप्पा जी भी भारतीय संगीत को छोड़कर चली गईं।

सुब्बलक्ष्मी जी की याद में पुरस्कार समारोह में गिरिजा देवी और अन्य कलाकारों को सम्मानित किया गया था

वैसे दोनों में साम्य कुछ यूं है कि सुब्बलक्ष्मी की आवाज नादस्वरम और वीणा की आवाज कि तरह है। ठीक वैसे ही जैसे गिरिजा देवी कि आवाज शहनाई की जैसी टेर वाली है। इसका फायदा यह है कि गायक या गायिका को श्रोता को अपनी और खींचने के लिए विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता और श्रोता के भी बहुत ख़ास तवज्जो देकर सुनने का प्रयास नहीं करना पड़ता। बल्कि एक एक शब्द में इतनी ताकत और सफाई होती है कि वे खुद-ब-खुद कान से ह्रदय तह पहुँच जाते हैं। सुब्बलक्ष्मी जी की आवाज क्रिस्टल जैसी है और उसमें लगाई गई कर्णाटक शैली कि मुरकियाँ उस क्रिस्टल को तराश कर बनाये गए कोणों जैसी मालूम होती हैं।

हर अदाकारी इतनी स्पष्टता से दिख जाती है कि संगीत को वाचिक अभिनय कहना सार्थक सा लगने लगता है। एक एक श्रुति का बर्ताव इतनी साफगोई से होता है कि आवाज ही शब्द और शब्द ही आवाज हो जाते हैं। अर्थात शब्द और ध्वनि के उचित संयोग को उसके सर्वाधिक उपयुक्त ढंग से बरता जाता है। उदाहरण के लिए यदि आपने आदि शंकराचार्य विरचित ”भज गोविन्दम…” नामक प्रसिद्द मन्त्र सुब्बलक्ष्मी जी से सुना हो तो आप पाएंगे कि वहां आप भूल जाते हैं कि सिर्फ मन्त्र का पाठ हो रहा है या उसे गाया जा रहा है। आपको संगीत को और साहित्य को अलग-अलग कर के देखने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती। यह उनकी बेजोड़ गायकी और साधना के उच्च धरातल का सहज ही परिचायक है।

भारतीय परंपरा में स्वामी हरिदास से लेकर किशोरी अमोनकर तक ऐसे कई साधक हुए जिन्होंने अपनी संगीत साधना में अध्यात्म को बहुत महत्व दिया है। सुब्बलक्ष्मी जी कि गायकी में अध्यात्म एक आवश्यक तत्व सा जान पड़ता है। उनके गाये पदों में देखा जाए तो शंकराचार्य से मीराबाई तक के सैकड़ों संस्कृत और हिंदी कवियों के आध्यात्मिक पद मिल जायेंगे। भजन और मन्त्र से इतर भी उन्होंने जो रागों की बंदिशें गाई, उनमें भी अधिकांश शिव और दुर्गा आदि को समर्पित हैं। शिव पंचाक्षर स्तोत्र का गायन तो उन्होंने ऐसा गाया है कि समस्त दक्षिण भारतीय शैव साधना पद्धति मानो एकाकार हो गई हो। इस अध्यात्म ने उनकी गायकी को जहाँ एक और अध्यात्म कि भावभूमि प्रदान की वही दूसरी ओर उसे ऐसा निखार है कि आप चाहे जितनी देर सुने कभी ऊब नहीं सकते।

आम तौर पर जब संगीत को गाना बजाना समझ कर गाया जाता है तो उसकी शुद्धता के साथ-साथ उसकी भव्यता तथा डिग्निटी भी समाप्त होने लगती है। ऐसे में साज ज्यादा से ज्यादा तेज और ताल तथा लयकारी भी बढ़ गए होते हैं जिससे श्रोता झूम तो जाता है पर झूम कर ही रह जाता है। अर्थात संगीत का आनंद आत्मा की ओर न जाकर शरीर की ओर लौटने लगता है और हम शरीर के सतह पर संगीत का आनंद लेकर नाचने तो लगते हैं पर उसके हार्दिक आनंद से वंचित रह जाते हैं। इस बात को लोक गायकी में देखा जाता है, विशेषकर जब हम राजस्थान के मीरासी और मांगणियारों की गायकी देखते हैं तो वहां पाते हैं कि अपनी शास्त्रीयता से इतनी नजदीकी के बावजूद उनका संगीत ह्रदय का अनगित नहीं बन पाता। बुल्लेशाह और गेसूदराज से लेकर खुसरो के तमाम सूफी पद अपनी अर्थवत्ता को उस प्रकार व्यक्त नहीं कर पाते। हाँ जब आबिदा परवीन और नुसरत फ़तेह अली खान सदृश्य गायक उनका संस्कार करके गाते हैं तो जरूर वे चीजें ऊँचे धरातल पर दिखाई देती हैं। संगीत सुनने और सुनाने तक महदूद रह जाए तो संगीत किस बात का। संगीत महसूस करने और एहसास दिलाने की प्रक्रिया है।

युवावस्था की तस्वीर

मुझे अभी भी याद है जब यूट्यूब पर पहली बार पंडित जसराज के साथ सुब्बलक्ष्मी जी का वह वीडियो देखा था जिसमें वो तुलसी दास का पद ‘तू दयालु दीं हौं…’ गा रहीं थीं और जब यह पंक्ति आती है ‘हम प्रसिद्द पातकी तू पाप पुंज हारी…’ वहां तीन बार इसे दुहरा कर उन्होंने जो पातकी होने का भाव दिखाया है, दिव्य है। जहाँ-जहाँ उसमे ऐसे शब्द आएं हैं, जिनके अर्थ दुखी या पीड़ित से हैं, वहां-वहां उनके सुर ऐसे लगते हैं कि एक क्षण के लिए वह पीड़ा मानव मात्र की पीड़ा हो उठती है। इस लाजवाब गायकी की दूसरी मिसाल पेश करना शायद सम्भव नहीं है।

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