30 जनवरी 1948, दिन था शुक्रवार. बापू संध्याकालीन प्रार्थना के लिए जा रहे थे. रोज की तरह लोग जमा थे. प्रेमिल वातावरण था. तभी एक हलचल मचती है जैसे लहलहाते खेत में कोई उन्मादी सांड घुस गया हो जो खड़े पौधों को अपने पैरों तले रौंद देना चाहता हो. भीड़ को चीरकर नफरत का एक पुतला आता है और बापू पर तीन गोलियां दागता है. बापू का गोल ऐनक आंखों से उतर जाता है. धीरे-धीरे रोशनी मद्धिम होती जाती है और अब बापू का भारत उनकी नजरों से ओझल हो जाता है. सफेद वस्त्र रक्तिम हो जाता है और किसी के सामने न झुकने वाला शरीर अंतत: धरा में विलीन होने जाता है और यह संसार सदा के लिये उनके स्नेह से वंचित होने के लिये अभिशप्त हो जाता है. बापू के मुंह से अंतिम बार आवाज आती है -हे राम! अंतिम शब्द यही थे बापू के. शायद अंतिम संदेश भी. पूरे देश में शोक की लहर. लोग जहाँ थे वहीं से बिड़ला भवन की ओर दौड़े. बापू के अंतिम दर्शन से कौन वंचित होना चाहता था. मानो पूरा देश उस नफरती को उसी समय जबाव दे रहा हो कि हम बापू से इतना प्यार करते हैं कि तुमसे नफरत भी न कर पाएं. बापू के पुत्र देवदास लिखते हैं-” हमने रातभर जागरण किया. बापू का चेहरा इतना सौम्य था और शरीर को चारों ओर आवृत्त करनेवाला दैवी प्रकाश इतना कमनीय था कि शोक करना मानो उस पवित्रता को नष्ट करना था. ”

बापू का शरीर धू-धू कर जलता है जिसका ताप समूचे विश्व ने महसूस किया. तमाम संदेश आए. नेता, कलाकार, वैज्ञानिक सबके. उत्तर, दक्षिण, पूरब, पश्चिम सब जगह से. जिसने सुना वही मर्माहत हुआ. कुछ ही क्षणों में यह सिद्ध हो गया कि नफरत की लकीर बहुत छोटी है, घृणा का संसार बहुत तंग है. प्रेम की जो लकीर अनंत तक जाती है गांधी उसी से खींचे गए थे. करुणा की जिस मिट्टी से गांधी बने थे उसका घर पूरा संसार है. नफरती सांड भूल गया कि एक क्षण के लिये खड़ी फसल को वो गिरा सकता है लेकिन उर्वर भूमि का क्या? वहां फिर कोई फसल उग आएगा. गांधी वही उर्वर भूमि हैं. हां, नफरती सांड तब भी था अब भी है पर बापू अब नहीं. अक्सर लगता है कि बापू को होना था.

जब किसी ‘कासगंज’ को होते हुए देखता हूँ तो लगता है कि कोई मजबूत बूढ़ा ‘नोआखली’ से चला आ रहा है जिसे इस बात का भय नहीं कि कोई उन्मादी दंगाई उन्हें मार देगा. लगता है कि वो गाँव-गाँव घूमेगा और फट चुकी भारत की तस्वीर को सिलेगा. प्रेम के धागे और अहिंसा की सुई से. लगता है कोई चिराग आ रहा है जो विवेक त्याग चुकी दिये में कोई लौ जलाएगा. पर अफसोस कि ऐसा कोई नहीं आ रहा. बापू नहीं आ रहे. हां, शोक सभा में हंसते नेताओं के अश्लील चेहरे जरूर याद आ रहे. बापू इन अश्लील छवियों से दुख तो होता है पर नफरत नहीं होती. तब आप याद आते हैं और आपकी बात याद आती है- अपराधी से भी घृणा करना ठीक नहीं. बापू जिस भूमि को आपने समतल बनाया, जिस बाग में आपने पुष्प खिलाए उसी कृतघ्न भूमि से एक रक्तिम पुष्प आप पर अर्पित कर रहा हूँ. अब सफेद कुछ नहीं बचा या बचा है तो दिख नहीं रहा. एक बार और आइये न बापू! इसी देश में!

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यह लेख सन्नी कुमार ने लिखा है. सन्नी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और वर्तमान में एक प्रतिष्ठित पत्रिका के संपादन के साथ ही अध्यापन का कार्य करते हैं.

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