‘कठफोड़वा’ से हमारे साथी विनय आज इस रिपोर्ट के साथ जुड़ रहे हैं. विनय हमारे संस्थापक सदस्यों में से हैं और आज तक कठफोड़वा को प्रोत्साहन और नैतिक बल देते थे. विनय सामाजिक बदलावों के लिये जमकर मेहनत करते हैं पर उन्हें एक्टिविस्ट वाली बाइनरी से विशेष प्रेम नहीं, न ही पत्रकार वाली बाइनरी से. उन्होंने जो पढ़ा, समझा, सीखा, देखा उससे आपको आगे भी रूबरू कराते रहेंगे. फिलहाल विनय ‘गांधी फेलोशिप प्रोग्राम’ के फेलो हैं. और बाबरी के 25 साल पूरे होने पर मुंबई के पास बसे ‘मुम्ब्रा’ शहर की तस्वीर पेश कर रहे हैं, जो अयोध्या से हजारों किमी की दूरी पर बसा हुआ है. लेकिन जिस वैमनस्य का बीज 1992 में अयोध्या में बोया गया था, आज भी उसकी जहरीली फसल काट रहा है.

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पिछले साल जब पहली बार मैंने मुम्ब्रा जाने के लिए ऑटो लिया तो ऑटोवाले ने मुझे थोड़ी देर घूरा, फिर बिठा के अनमने ढंग से चल दिया। बातचीत में उसने मेरा नाम पूछा और जबाब सुनते ही पहला सवाल किया, “भैया छोटे पाकिस्तान जाने की कौन जरूरत पड़ गयी?” मैंने समझा कि उसने मजाकिया लहजे में कहा है, लेकिन उसके बाद भी मेरे कई मित्रों और सहयोगियों ने लगातार मुझसे ऐसा ही कहा है। पिछले डेढ़ साल में लगभग हर दिन मैंने मुंब्रा में गुजारा है और एक महीने के लिए एक बच्चे के घर में रहा भी हूँ।

मेरे तमाम अनुभव हैं जो एकदम अलग हकीकत बयां करते हैं। गांधी फेलोशिप में उर्दू स्कूलों में काम करते हुए और मुस्लिम कम्युनिटी में उठने-बैठने-समझने के बाद मुझे दो तरह के लोग मुम्ब्रा के बारे में राय बनाते नज़र आते हैं। पहले वे हैं जिन्होंने मुम्ब्रा के बारे में टीवी, अख़बार या साथियों से सुना-देखा-पढ़ा है और दूसरे वे जिन्होंने मुम्ब्रा को लम्बे समय तक देखा है, रहे हैं और काम किया है। इनमें पहले वाले लोगों की राय दूसरे वाले के लोगों से एकदम विपरीत है।

बाबरी घटनाचक्र का सबसे बड़ा शिकार है मुम्ब्रा

मुम्ब्रा देवी और मुम्बा देवी में अक्सर लोग गच्चा खा जाते हैं, ये दोनों देवी और उनके मन्दिरों का इतिहास है जिन्होंने दो शहर रचे, एक मुम्बई जिसका नाम मुम्बा देवी के नाम पर पड़ा और दूसरा मुम्ब्रा जिसका नाम मुंब्रा देवी के नाम पर रखा गया। इससे पहले इस छोटे से गांव का नाम उमरा था, जहां 17 वीं शताब्दी में मछुआरों की कोली और अगरी जनजातियां रहती थीं। 19 वीं सदी में 70 के दशक तक यहां की 80 फीसदी जमीन कृषि योग्य थी, जिसका बाद में शहरीकरण कर दिया गया।

मुम्ब्रा की कहानी ने 1984 और 1992 के बाद एक नया मोड़ लिया जिसकी यात्रा आज मुम्ब्रा को एक भयावह भविष्य की ओर धकेल रही है। पहली बार 1984 में भिवंडी में हिंदू-मुस्लिम दंगे हुए और बड़ी संख्या में मुस्लिम मुम्ब्रा जैसे मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ों में शरण लेने के लिए भागे। उसके बाद 1992 के मुम्बई दंगो ने शुरुआत में ऐसी वृद्धि की कि आज मुम्ब्रा देश का सबसे बड़ा मुस्लिम घेटो बन चुका है। राज्य सरकार ने दंगों के बाद मुम्बई से मुम्ब्रा में पलायन करने वाले मुस्लिमों को 10 वर्ग मील जगह मुस्लिम राज्य वक़्फ़ बोर्ड की कस्टडी में पुनर्वास के लिए दी थी, लेकिन बाद में वक़्फ़ बोर्ड के वितरण में धांधली की बातें भी सामने आईं।

6 दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराने की घटना ने देशभर में उबाल पैदा किया, उसी के विरोध में मुम्बई के मुसलमानों ने अगले दिन विरोध प्रदर्शन किया जिसने जल्दी ही एक भयंकर हिंदू-मुस्लिम दंगे का रूप ले लिया और पीढ़ियों को अँधेरे में धकेल दिया। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक 900 लोग इसकी भेंट चढ़े जिनमे 575 मुस्लिम और 275 हिन्दू थे। मीडिया और दूसरे संगठन मरने वालों की संख्या और ज्यादा बताते हैं, लेकिन इसमें बेघर हुए लाखों लोग आजतक इस दंगे का दंश झेल रहे हैं। लेकिन आज भी मीडिया और लोग उसी बाबरी घटनाचक्र की व्याख्या और टीका में लगे हैं, जबकि ये वक्त मुम्ब्रा जैसे शहरों की ओर मुंह उठाकर देखने का है।

दंगों के दंश से बना शहर: 20 साल में 20 गुना बढ़ी जनसंख्या

मुम्ब्रा की जनसंख्या 1991 की जनगणना में 44000 के करीब थी जो 2011 की जनगणना में 9 लाख से ज्यादा हो गयी। 20 सालों में 20 गुना बढ़ी जनसंख्या भारत में सबसे ज्यादा शहरी जनसंख्या वृद्धि है। मुम्ब्रा की जनसंख्या बढ़ोतरी तीन पड़ावों से गुजरती है। पहला पड़ाव 1984 में भिवंडी में हुए दंगों के कारण मुस्लिम परिवारों का मुम्ब्रा जैसे मुस्लिम बाहुल्य इलाकों में पलायन, दूसरा 1992 में हुए मुम्बई दंगों के बाद मुस्लिम परिवारों ने मुम्ब्रा में आसरा ढूंढा और तीसरा पड़ाव जो मुम्बई की महंगाई से तंग मुस्लिम परिवारों ने मुंब्रा में पलायन कर लिया। इसके साथ ही एक और परंपरा बन गई है, जिसमें मुम्बई के बाहर से आने वाले ज्यादातर मुस्लिम मुम्ब्रा में रहना पसन्द करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वे वहां ज्यादा सस्ते में और सुरक्षित रह सकते हैं।

छोटा पाकिस्तान की इमेज से प्रताड़ना

मुम्ब्रा ने दंगे के दंश के साथ अपने माथे पर शक की इमेज को भी ढोया है। हमेशा ख़ुफ़िया पुलिस में निशाने पर रहने वाले मुम्ब्रा में पुलिस का खौफ खतरनाक है। गुजरात पुलिस एन्काउन्टर में मारी गयी इशरत जहाँ का घर मुम्ब्रा में ही है। जब भी कोई आतंकी अलर्ट जारी होता है तो शक की सुई सबसे पहले मुम्ब्रा जैसे इलाकों पर ही जाती है और मुम्बई पुलिस वहां से शक की बिनाह पर लोगों को पूछताछ के लिए गिरफ्तार कर लेती है। ‘द हिंदू’ में लिखी अपनी रिपोर्ट में जाने माने पत्रकार बशारत पीर ने एक घटना का जिक्र किया है।

2015 की मार्च में पुलिस के सैकड़ों जवानों ने मुम्ब्रा में आधी रात को रेड मारी, करीब डेढ़ घंटे तक धरपकड़ चलती रही और 80 लोगों को गिरफ्तार किया जिसमें युवा छात्र, कवि और वृद्ध शामिल थे। बशारत पीर लिखते हैं कि एक स्थानीय पत्रकार के रिकॉर्ड वीडियो में दिखता है कि अँधेरी गलियों में पुलिस लोगों को पकड़कर वैन में ठूंस कर घंटों मुम्ब्रा पुलिस स्टेशन में रखा गया। बाद में पुलिस ने बताया कि वो दो चैन खींचने वाले चोरों को ढूंढ रही थी। मुम्ब्रा में 80 फीसदी के करीब मुस्लिम परिवार रहते हैं बाकी अन्य धर्मों के लोग हैं जिनमें हिन्दू, बौद्ध, क्रिश्चियन आदि शामिल हैं। छोटे पाकिस्तान के नाम का तमगा पहने मुम्ब्रा में आजतक कोई सांप्रदायिक घटना नहीं घटी है।

अवैध इमारतों का बढ़ता जाल

मुम्ब्रा का विस्तार जनसंख्या वृद्धि के साथ कौसा तक हो गया और अब मुम्ब्रा-कौसा एक साथ हो गए हैं। यह क्षेत्र ठाणे महानगर पालिका के प्रशासनिक नियंत्रण में आता है। मुम्ब्रा ठाणे क्रीक से पारसिक पहाड़ियों तक फैला हुआ है। ये शहर जैसे जैसे बढ़ता गया वैसे-वैसे बढ़ोतरी ने तीन विभागों की जमीन पर कब्जा किया; पहली वन विभाग की जमीन, दूसरी समुद्र तट क्षेत्र की जमीन और तीसरी ठाणे महानगर पालिका की जमीन है। इन तीन विभागों के बीच फंसे कस्बे की तरक्की इस बात पर निर्भर है कि इन तीनों विभागों का आपस में तालमेल कितना प्रभावी हो सकता था। लेकिन इसी तालमेल की कमी की वजह से मुम्ब्रा में अवैध निर्माण एक बड़ी समस्या बनता गया। लोग आते गए और उनके लिए बिल्डिंगों का निर्माण होता रहा।

महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने 2014 में टाटा इंस्टिट्यूट फॉर सोशल साइंस की मदद से मुम्ब्रा पर रिसर्च रिपोर्ट तैयार करवाई जिसे रेनू सिंह ने लिखा है। उसमें रेनू सिंह कई ऐसे तथ्य उजागर करती हैं जो गम्भीर हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि अवैध इमारतें सरकारी नियमों की अनदेखी करती हैं और इसलिए पानी और बिजली सप्लाई के साथ सफाई व्यवस्था के लिए चुनौतियां पैदा करती हैं। इसके साथ ही अवैध इमारतें शहर के डेवलपमेंट प्लान को फॉलो नहीं करतीं तो पब्लिक प्रयोग के स्थानों के लिए सुनिश्चित जगह को भी अपने चपेट में ले लेती और पब्लिक पार्क, गार्डन, स्कूल, खेल के मैदान जैसी जगह नहीं नज़र आतीं। मुम्ब्रा में इमारतें एक दूसरे से टकराती हैं, बमुश्किल पार्क नज़र आते हैं, खेलने के लिए गार्डन या मैदान तो हैं ही नहीं।

2013 में एक अवैध निर्मित इमारत के गिरने से 70 लोगों की मौत हो गयी थी। उसके दो महीने बाद फिर एक इमारत गिरी और 10 लोगों की जान चली गयी। इनमें घायलों की संख्या भी सैकड़ों में है। ऐसी इमारतों की बहुतायत है मुब्रा-कौसा में। ‘द हिन्दू’ में छपी रिपोर्ट में ‘बशारत पीर’ ने लिखा है कि मुम्ब्रा में अवैध इमारतें बढ़ने का कारण मुम्बई के दंगे जरूर रहे हैं लेकिन सस्ते दामों में इनकी उपलब्धता आज भी मुम्बई से मुस्लिमों को इधर खींच लाती है। 90 के दशक में अवैध इमारत में दो बैडरूम अपार्टमेंट 2 से 3 लाख रूपये में मिल जाता था और आज भी अवैध निर्मित तीन बैडरूम अपार्टमेंट 8 से दस लाख में मिल जाता है। इसीलिए मुम्ब्रा में अवैध रिहाइशी इमारतों की बाढ़ आ गयी है। और उन्हें खरीदने वाले भी लाइन लगाए खड़े हैं। इसीलिए हर जगह सिर्फ इमारतें दिखती हैं।

स्कूल तक के लिए जगह नहीं

मुंब्रा-कौसा में कुल 26 सरकारी विद्यालय हैं जिनमें से 21 प्राथमिक और 4 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं। कौसा की एक ही इमारत में 12 प्राथमिक विद्यालय हैं। जब मैं पहली बार स्कूल गया और हेडमास्टर से हैरानी से पूछा तो उन्होंने इससे भी बदतर दबे इतिहास को मेरे सामने रख दिया। उनका कहना था कि अभी कुछ सालों से ये इमारत बनकर तैयार हुई है, इससे पहले स्कूल टूटी हुई इमारत में चलते थे, जहां अँधेरे कमरों में बच्चों को ठूंसकर पढ़ाया जाता था।

इस तीन मंजिल इमारत में दो शिफ्ट में स्कूल चलते हैं। सुबह साढ़े सात से दोपहर साढ़े 12 और दोपहर साढ़े 12 से शाम साढ़े 5 बजे तक दूसरा स्कूल चलता है। कई स्कूलों के पास अपनी क्लासें बिठाने के लिए कमरे नहीं हैं तो कहीं दो स्कूल मिलकर समान कक्षाओं को एक साथ बिठाते हैं। यहां ज्यादातर स्कूलों में हैडमास्टर के पद सालों से खाली हैं, स्टाफ की भी भारी कमी है।

टॉयलेट को बना दिया है क्लासरूम

रेनू सिंह ने अपनी रिपोर्ट में एक स्कूल की कहानी लिखी है जिन्होंने अपने टॉयलेट को क्लासरूम बना लिया क्योंकि बच्चों को बिठाने की जगह नहीं थी। इस बिल्डिंग में आज भी बच्चों के पीने के पानी के लिए कोई इंतज़ाम नहीं है। टॉयलेट या तो हैं नहीं और अगर हैं भी तो इतने गन्दे कि बच्चे जाते ही नहीं हैं।

प्राइमरी स्कूल की हालात देखकर मैं सिर्फ तब तक परेशान होता रहा जबतक मुझे उच्च प्राथमिक विद्यालयों की तस्वीर देखने-समझने का मौका नहीं मिला। रेनू सिंह की सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक महज 4 उच्च प्राथमिक विद्यालय हैं, जो वर्ष 2000 के बाद अस्तित्व में आए। जिनमे से एक विद्यालय में मैंने अक्सर विजिट किया है, जो इन 12 स्कूलों वाली बिल्डिंग के ठीक बगल है। छोटे-छोटे कमरों के ऊपर टीन डालकर तैयार उच्च प्राथमिक विद्यालय के पास बच्चों के बिठाने की जगह नहीं है। वैसे भी आप अंदाजा लगाइए कि हर साल इन्हीं 12 स्कूलों के आठवीं कक्षाओं के बच्चे आगामी पढ़ाई के लिए सिर्फ एक स्कूल में कैसे आ सकते हैं? इसलिए बहुत से बच्चे आठवीं के बाद पढाई छोड़ देते हैं, ज्यादातर प्राइवेट में चले जाते हैं, जो बच जाते हैं वे यहां अपने बैठने के लिए जगह तलाशने का संघर्ष करते हैं, यहां भी आधारभूत सुविधाएँ नहीं हैं। मुम्ब्रा-कौसा की लाखों की जनसंख्या के लिए कोई सरकारी कॉलेज नहीं है। जहां छात्र 10वीं या 12वीं के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकें।

यह विषबेल सालों से बचपन को भी लील रही है

इस रिपोर्ट की एक बात और मुझे हैरान करती है कि मुम्ब्रा-कौसा के महज 3 प्रतिशत बच्चे ही मदरसों में पढाई करते हैं, बाकी 97 फीसदी बच्चे फॉर्मल सरकारी या निजी स्कूलों में जाते हैं। मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों में भी वे बच्चे शामिल हैं जो पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और आसानी से सरकारी स्कूलों में नहीं पहुंच सकते। इस रिपोर्ट के सर्वे में मदरसों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चों ने भी सरकारी स्कूलों में पढ़ने को इच्छा जाहिर की है। लेकिन स्कूल करीब न होने की वजह से इनकी इच्छा पूरी नहीं हो सकती। सरकारी व्यवस्था की कमी और असफलता से शिक्षा का व्यापारीकरण मुम्ब्रा-कौसा में लगातार बढ़ रहा है। निजी कोचिंग संस्थान बढ़ते जा रहे हैं।

पिछले वर्ष इन्ही स्कूलों में से एक स्कूल के बच्चों को ठाणे महानगर पालिका के सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए नाटक तैयार कराने के दौरान देखा कि बच्चे मुम्बई के करीब होने का अवसर भुनाना चाहते हैं, ये शहर देशभर के लोगों को सपने देता है लेकिन अपने पड़ोसी कस्बे के बच्चों को डराता है। उन्हें सपने देखने के दौरान मुम्ब्रा की छवि चेतावनी की तरह खटकती हैं। इनके साथ काम करते हुए लगा कि इन्हें मौके मिलें तो क्या नहीं कर सकते। महज दस दिन की तैयारी में इन बच्चों ने बेस्ट नाटक का अवार्ड हासिल किया था। उसके बाद से उनकी ललक और सीखने की इच्छा मुझे हर बार आकर्षित करती है।

93 फीसदी की महीने की कमाई 5 हज़ार से कम

मुम्ब्रा की इस सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक ही सिर्फ 1 फीसदी लोग ही हैं जो दस हज़ार से अधिक महीने में कमा लेते हैं। 99 फीसदी लोग दस हज़ार से कम कमाते हैं। उनमें भी 93 फीसदी लोग 5000 से कम कमा पाते हैं। मुम्ब्रा में रहने वाले ज्यादातर लोग स्थानीय करोबार में लगे हैं, जैसे ऑटो रिक्शा चलाना, रोजमर्रा की जरूरतों के सामान की दुकान और खाने-पीने की सुविधाएँ देने जैसे निजी कारोबार ज्यादा हैं। उसका एक कारण ये भी बताया जाता है कि मुम्बर्इ में लोगों को मुम्ब्रा के नाम पर काम कम मिलता है। 9 लाख से ज्यादा की जनसंख्या में महज 4 फीसदी लोगों के पास ही सरकारी नौकरी है।

इशरत जहाँ के परिवार से मुलाकात का जिक्र करते हुए बशारत पीर ने लिखा है कि इशरत की माँ इतनी डरी हुई है कि अपनी दूसरी बेटी को बाहर निकलने नहीं देना चाहतीं। इशरत के भाई को कई जगह नौकरी देने से मना कर दिया गया और बाद में ठाणे में एक बी पी ओ में काम मिला, पर वहां भी वो कॉल नहीं करता, बस डेटा एंट्री के लिए रखा है। मुम्ब्रा की छवि यहां के रहने वालों को कैद करती है, मैं कई लोगों से मिला हूँ जिन्हें बाहर काम नहीं मिलता या मिलता है तो भेदभाव झेलना पड़ता है।

विशेष पहचान गढ़कर नागरिक अधिकार खारिज किये जाने की साजिश

मुम्ब्रा में कोई भी पब्लिक हॉस्पिटल नहीं है, जहां एडमिट होकर बीमारी का इलाज हो सके। 9 लाख की आबादी के लिए एक मेटरनिटी हॉस्पिटल के साथ महज तीन अर्बन हेल्थ सेंटर हैं। अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट बताती है कि इनकी हालात खस्ता है और इनके इलाज और जाँच का खर्च निजी अस्पतालों के खर्च के बराबर है। स्टाफ की कमी के साथ-साथ मरीजों को संख्या ज्यादा होने से लम्बी लाइनें लगती हैं। जिससे मरीज पूरे दिन इंतज़ार के बाद भी दवा नहीं ले पाता। उससे उसकी दिनभर की कमाई का नुकसान भी होता है। यहां के लोगों को गम्भीर बीमारी के इलाज के लिए कलवा के शिवाजी हॉस्पिटल या ठाणे के जिला हॉस्पिटल जाना होता है।

मुम्ब्रा में सरकारी परिवहन की स्थिति जानकर होश उड़ जायेंगे। 9 लाख से ज्यादा लोगों के लिए मुम्ब्रा में अपना बस स्टेंड नहीं है जहां से बसें शुरू हों या आएं। ठाणे से गुजरती बसें ही मुम्ब्रा में रूकती हैं जिनकी आने-जाने की फ्रीक्वेंसी भी कम है। मुम्ब्रा में ट्रांसपोर्ट ऑटो के जरिए होता है जिससे दिनभर धुएं और ट्रैफिक जाम में फंसे रहना पड़ता है। मुम्ब्रा के लोग सालों से आंदोलन से लेकर गुजारिश कर रहे हैं कि मुम्ब्रा स्टेशन से भी एक फ़ास्ट ट्रेन चलाई जाए पर अभी तक न तो कोई सुनवाई हुई और न ही कोई उम्मीद।

मुम्बई से तकरीबन एक घण्टे की दूरी पर बसा यह शहर मुम्बई का ही बसाया हुआ है। इसमें मुम्बई के दंगे भी शामिल हैं और तेजी से बढ़ती महंगाई ने भी बड़ी भूमिका निभाई है। सरकार की अनदेखी ने इसे कभी बढ़ने नहीं दिया। मुम्ब्रा की छवि भी उससे उबरने की सम्भावनाएं छीन रही है। हमें यह समझना होगा कि मुम्ब्रा को एक छवि में रंगकर उसकी असल समस्यायों से मुंह नहीं मोड़ सकते। अगर मुम्ब्रा को समझना है तो हर पहलू से समझना होगा। ठाणे जिले की जनसंख्या 19 लाख के करीब है जिसमें से 9 लाख से ज्यादा सिर्फ मुम्ब्रा में रहती है। आप इस 9 लाख और बाकी 10 लाख के प्रति सरकारी रवैये को देख लेंगे तो आपको मुम्ब्रा को समझ आएगा।

ऐसे में भले ही बाबरी विध्वंस की घटना मुब्रा से हजारों किमी दूर अयोध्या में घट रही हो, वह मुब्रा जैसे कई बस्तियों, कस्बों और शहरों की प्रस्तावना बन रही थी. जहां तक मुसलमानों को सीमित कर आसानी से उनके नागरिक अधिकारों का दमन किया जा सके. ऐसे में अयोध्याकांड के राजनीतिक प्रभाव तक ही सीमित रहने वाले नेता क्या जवाब देंगे, कब तक मुम्ब्रा जैसे शहरों में उनका तथाकथित विकास घुस पायेगा? और कम से कम जीवन की मूलभूत सुविधाएं उस जनसंख्या को मिल सकेंगीं जो भारत की आर्थिक राजधानी की पड़ोसी होने के बाद भी जबरदस्त राजनैतिक अनदेखी का शिकार रही है.

____________________________________________________________________लेख में प्रयुक्त सारी तस्वीरें विनय ने खुद करीब डेढ़ साल के अपने मुम्ब्रा प्रवास के दौरान खींची हैं.

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