जॉन एलिया वजूद के हर एक इंच तक शायर थे

जिंदगी से रूठी हुई रचनाओं से मेरा बहुत करीब का वास्ता है. यह रचनाएँ, चाहें वह किसी भी प्रारूप में हों, मुझे अपनी ओर खींचती रही हैं. इस खिंचाव की वजह से ही कम दूरी की ही सही, पर एक साहित्यिक चहलकदमी मुमकिन हो सकी है, जिसने मुझे निर्मल वर्मा से ले कर जॉन एलिया के दरवाजे तक पहुंचाया है. जॉन एलिया शायरों की दुनिया में दुःख के ब्रांड माने जाते हैं. इनकी जो मशहूर शायरियां हैं, वह अफसानों के तौर पर जॉन की जिंदगी के जिक्र बिना अधूरी हैं. जॉन की शायरियों में न सिर्फ खुशियाँ नदारद है बल्कि उन्हें बयाँ करने का तरीके को ‘तकलीफ का मुशायरा’ तक कहा जा सकता है. हालंकि उन्हें गहराई से पढ़ने वाले जानते हैं कि उन्होंने केवल दुःख ही नहीं बल्कि दुनिया की तमाम बातों पर अपनी कलम चलाई है.

जॉन की ज़िंदगी भी किसी घटनाओं के मोड़ से भरे उपन्यास से कमतर नही है. ऐसी ज़िन्दगी आप को ‘कलाकर’ तो बना देती है पर अंततः आपको अपनी रचना प्रक्रिया में निरन्तर एक कीमत चुकानी होती है. कलाकार की हमेशा यह चाहत होती है कि जिन बयानों का इजहार करता है, लोगों को लगे कि यह उनके दिल की आवाज है. इस स्वाभाविक चाहत को जॉन एक स्तर ऊपर ले जाते हैं, जहां तकलीफ इतनी ‘गौरवान्वित’ हो जाती है कि सुनने वालों को दुख हो कि ‘उनकी ज़िंदगी बर्बाद क्यों नही है. काश ऐसी ज़िन्दगी हमारी भी होती’. यही बात जॉन को शायरों की दुनिया मे एक अलग मुकाम देती है.

जॉन का शायर बनना एक ज़िन्दगी की त्रासद तब्दीली है. यह शायर दस साल अच्छी नींद से मरहूम रहा. नशे में तरबतर रहा. उम्मीद की मौत पर मातम मनाता रहा, जीने की तमन्ना से इनकार करता रहा और अंततः शायर हो गया.

आपको अज्ञेय याद हैं. ‘जो यातना में है वह दृष्टा हो सकता है’. क्या इस उर्दू के अमीर अदीब की रचनाओं ने भी वही दृष्टि नहीं पाई थी जिसकी बात हिंदी के साहित्यकार अज्ञेय कह कर गए हैं. आज ही के दिन मरहूम जॉन इस दुनिया से कूच कर गये थे. सोशल मीडिया से ले कर तमाम वेबपोर्टलों पर उनके बारे में बहुत कुछ लिखा जा चुका है. मेरी तमन्ना थी कि आप को अपने प्रिय ‘जॉन के किसी ऐसे रूप से’ रूबरू कराऊं, जिसके बारे में कम चर्चा हुई है. इसलिए मैंने इस लेख का अनुवाद किया है. यह लेख ‘द न्यूज संडे‘ पाकिस्तानी वेबसाइट से जुड़े ‘शम्स’ ने 2014 लिखा था.’

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“मेरी प्यारी मीर जफ़र हसन, आप एक नसीब वाली शख्सियत हैं.”

“आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, जॉन साहिब?”

“आप एक असाधारण रूप से अच्छी कवियत्री हैं और साथ ही आप बेहद नसीबवाली हैं. आप मीर हैं, लेकिन आप ज़फर भी हो सकती हैं, और जब भी आपको जरूरत हो तो आप हसन भी हो सकती हैं. आप एक सुन्नी भी हो सकती हैं, और यदि आप चाहें तो शिया भी बन सकती हैं. लेकिन मैं, जॉन एलिया, एक अज्ञेयवादी होने के बावजूद, हमेशा एक सैयद ही रहूंगा. क्या यह दुख की बात नहीं है? “

जॉन एलिया, यकीनन 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध के सबसे बेहतरीन उर्दू शायर होने के साथ-साथ एक सुधारातीत संदेहवादी थे (हम इसे छंटे हुए नास्तिक भी कह सकते हैं). जॉन ने अपनी पढ़ाई-लिखाई की शुरुआत भारत में देवबंद पाठशाला से की थी. देवबंद संस्थाएं उस दौर में एक अलग नजरिये से देखी जातीं थीं. यह आज की तरह फतवा बनाने वाली फैक्ट्रियों के रूप में तब्दील नहीं हुईं थीं. 2002 में, कराची के फेडरल बी इलाके में अल्लामा अली करर के घर में जॉन का बगैर शोरगुल के इंतकाल हो गया, वरना मुझे यकीन है कि आज वह जीवित होते तो संभवतः कुछ कट्टर देवबंद अनुयायियों के द्वारा ही उनका खून कर दिया गया होता.

लेकिन यहाँ एक पल के लिए रुकें, क्या हम उदारवादियों को अपनी सभी समस्याओं के लिए मौलवियों को शाप देने की आदत हो गयी है? मौलवी अफगान युद्ध की शुरुआत के पहले बहुत अलग तरह के लोग हुआ करते थे. वह आम तौर पर सीधे, संकोची और आम जरूरतों की चाहत रखने सामान्य आदमी थे, जब तक कि उनके मदरसों में लाखों डॉलर का दान दे कर और वैश्विक पूंजी पेट्रो डॉलर के जाल की तरफ खींच कर उन्हें भ्रष्ट नही कर दिया गया. लेकिन हम, उदारवादी, केवल ‘कठमुल्लों’ से नफरत करते हैं (यह शब्द पहली बार हीडलबर्ग-शिक्षित मुहम्मद इकबाल ने भारतीय मुसलमानों को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल किया था). हमने कभी इस प्रणाली का विश्लेषण करने के लिए परेशान नहीं हुए हैं, जो आम लोगों को पिशाच में बदल देती हैं. हम कहते हैं ‘तालिबान को खत्म करो. (पर दरअसल) हम रक्तस्राव को पसंद करने वाले लोग हैं.

(हम अपने चेहेते जॉन पर फिर से वापस आते हैं) जॉन खुद मौलवियों की देख–रेख में जवान हुए थे. वह जॉन के सीखने के दिन थे. वह मौलवी जॉन जैसे अज्ञेयवादी मिजाज के लडके से बहस किया करते थे. सुन्नी मौलवियों का शिया जकरियों के प्रति गहरा सम्मान था और (तब) कोई भी किसी को नास्तिक या काफिर नहीं कहता था. आज, अल्लामाओं और अयोत्तुल्लाहों की आवश्यकता नहीं है कि वे आपको एक विधर्मी घोषित करें बल्कि एक आम पाकिस्तानी खुद को विरोध करने के लिए पर्याप्त योग्य समझता है और वह आपको उसके विश्वास को नीचा दिखाने के लिए मार भी सकता है.

अगर जॉन खुद की मौत नहीं मरे होते तो उन्हें आज चरमपंथी उग्रवादियों की एक भीड़ के द्वारा गोली मार दी गयी होती. उनके हत्यारे में सुन्नी और शिया दोनों ही होते. पाकिस्तान में, एक सुन्नी और शिया, एक कट्टरपंथी और उदारवादी के बीच भेद करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है. फर्क धुंधले हो रहे हैं. जॉन हमारे समाज का एक ऐसा उत्पाद था जो तर्क में यकीन करता था. आज, पाकिस्तान में आप लोगों के साथ (धर्म के मसले पर) तर्क नहीं कर सकते.

मुझे आश्चर्य है कि जॉन एलिया अभी भी इस्लामिक गणराज्य पाकिस्तान में पढ़े जाते हैं और उनकी कविता दिन पर दिन लोकप्रिय हो रही है. ताज्जुब है कि हम इकबाल के बारे में बात नहीं कर रहे हैं जो सभी समूहों और लॉबी को प्रसन्न करते हैं; हम एक कवि पर चर्चा कर रहे हैं जो धर्म के बारे में जो ऐसी बातें कह गया हैं:

जॉन उन इस्लामियों से बहस न कर
तुंद हैं ये समूद वो आद बहुत

हम न खुदा को रद लिखा नफीं ब नफीं ला ब ला
हम ही गजींदां तुम पर गिरां गुज़र गये

[हम भगवान के अस्तित्व से इनकार करते हैं,
और आप हमें, पीड़ित,और गलत पा सकते हैं.]

कहां का दीन कैसा दीन क्या दीन
ये क्या गड़बड़ मचाई जा रही है

इसका मतलब है कि पाकिस्तान ने अभी तक सब कुछ नहीं खोया है. अभी भी आशा है. ऐसे लोग हैं जो जॉन , मीर और गालिब को समझते हैं और उनकी सराहना करते हैं.

जॉन केवल जॉन थे. वह अंततः एक शायर थे– वजूद के हर इंच तक शायर! वह अपनी पहचान नहीं बदल सकते कि जब भी लगे तो वह ज़फर या हसन बन जाए. जॉन पाखंडी नहीं थे, वह एक ईमानदार और मुखर आदमी थे. उन्होंने अंतिम सांस तक सच्चाई की बातें कीं, यहां तक कि दूसरों को अपमानित करने की कीमत पर भी.

इस्लामवादी जौन एलिया को नुकसान नहीं पहुंचा सकते, लेकिन जड़ता (अज्ञानता) पहुंचा सकती है. तालिबान पाकिस्तान को नष्ट नहीं कर सकता, लेकिन हमारा पाखंड यह काम जरुर कर देगा. आइए, हम पाकिस्तानी स्वीकार करें की हमारे अपराधों और विफलताओं के लिए हम सामूहिक रूप से जिम्मेदार हैं. हम इसके लिए केवल इस्लामवादियों को दोषी नहीं ठहरा सकते.

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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