‘भक्त’ आम तौर पर हिंदी भाषा में हिन्दू धर्म के अनुयायिओं के लिए प्रचलित एक शब्द है. यह अनुयायी बगैर किसी संदेह के किसी देव या विचार को आराध्य मान उस पर पूरा यकीन करते हैं. राजनीति में इस शब्द का चलन हुए अभी बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है. साथ ही राजनीति में इसका इस्तेमाल अब तक थोड़े से व्यंग्यात्मक लहजे में किसी अंधविश्वासी कार्यकर्ता को नीचा दिखाने के लिये किया गया. हुआ यों कि जब गुजरात के लोकप्रिय नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत से समर्थक उन पर बिना किसी संदेह के अंधा यकीन करने लगे. तब मोदी के कई विरोधियों ने भाजपा समर्थकों के इस तबके को ‘भक्त’ कहना शुरू किया. आज भी राजनीतिक चुहलबाजी में नरेंद्र मोदी पर मोहित समर्थकों को ‘भक्त’ कहा जाता है.

राजनीति में किसी का भक्त होने का मतलब क्या है?

हम सभी सिनेमाई जगत में प्रचलित ‘फैन’ शब्द से परिचित हैं. फैन किसी अभिनेता के प्रशंसकों का अमुक अभिनेता पर मोहित तबका होता है. यह तबका अपने पसंदीदा अभिनेता को भगवान की तरह मानता है और उनके लिए अपनी जान भी दे सकता है.

2011 में किडनी की कोई बीमारी हो जाने की वजह से रजनीकांत सिंगापुर में डायलिसिस ले रहे थे. उस दौरान उनके एक फैन ने नींद की गोलियों का ओवरडोज लेकर खुद की जान लेने की कोशिश की थी ताकि उसकी किडनी रजनी को दी जा सके. हालांकि इस व्यक्ति की जान बचा ली गई थी.

अपने प्रिय नेता के प्रति इसी तरह की दीवानगी राजनीति में भी देखी जा सकती है. दक्षिण भारत में जयललिता के जेल जाने के बाद कथित तौर पर 244 लोगों ने अपनी जान दे दी थी. इन दोनों घटनाओं में लोगों की अपने पसंद के नेता-अभिनेता के प्रति एक जैसी दीवानगी देखी गई. भक्त सुनने में भले ही ग्लैमरस न लगे, लेकिन यह ‘फैन’ का ही राजनीतिक संस्करण है.

मनोवैज्ञानिक इसे कैसा रोग मानता है?

सामाजिक मनोविज्ञान के जानकार राकेश कुमार बताते हैं, ‘सामान्य तौर पर किसी नेता को अतिरिक्त रूप से पसंद करना मानसिक रोग नहीं है. लेकिन मनोविज्ञान में हर भाव के स्तर के आधार पर उसका मूल्यांकन होता है. कोई भी भाव जब अपने अधिकतम स्तर पर आप में शामिल हो जाता है तो यह एक रोग का आकर ले लेता है.’

“आज के दौर में नेताओं के प्रति जिस तरह की अतार्किक भक्ति हम देख रहे हैं इसे मनोविज्ञान में ‘Induced Delusional Disorder’ कहते हैं. इसे सामाजिक तौर पर ‘Shared Delusional Disorder’ भी कहा जाता है. इसका शिकार तबका सामूहिक रूप से अतार्किक और आधारहीन मूल्यों और व्यक्तियों में यकीन करने लगता है.”

“हालांकि यह एक सामाजिक प्रवृत्ति है पर इसकी अधिकता व्यक्ति को निजी तौर पर भी मनोरोगी बना देती है. देखा गया है कि फासिस्ट विचारकों को अपना आदर्श मानने वाले लोग अपने घरों में भी फासिस्ट रवैये के होते हैं. यह रोग सबसे पहले निराशा और संदेह से घिरे लोगों को अपना शिकार बनाता है. इसकी एक ख़ास बात यह भी है जो भी आज भक्त है कल विचार बदलने पर अंधा विरोधी भी हो सकता है.”

इसका समाधान पूछने राकेश बताते हैं कि “इसके लिये समाज को सामूहिक रूप से तार्किकता को बढ़ावा देना होगा. नेताओं को भी अपने इस तरह के समर्थकों को अतार्किक लगाव से आगाह करना चाहिए. हालाँकि आज नेता इससे उलट करना पसंद करते हैं.”

राजनैतिक भक्ति की दो सबसे अहम बातें

भक्त होने के लिए दो बातें बेहद अहम है, पहला- आपका आराध्य यानी नेता, दूसरा- उस नेता पर बिना शक या शिकवे के आपका अँधा यकीन. वो जो कुछ भी करेगा ठीक ही करेगा. उसने बोला है तो सही ही बोला होगा. आदि-आदि. ऐसे में नेता की मंशा बहुत मायने रखती है कि वह क्या अपनी अंधश्रद्धा से प्रसन्न होता है या लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत हों इसके लिये प्रयास करता है?

भाजपा ही नहीं हर पार्टी में भक्त होते हैं

भक्त होना एक दल निरपेक्ष मान्यता है. यह किसी भी दल से जुड़े नेता और उनके किसी कार्यकर्ता के बीच हो सकता है. हालांकि एक पार्टी और उसकी गतिविधियों के तौर पर भाजपा की पहचान बाबाओं और धार्मिक मसलों में रूचि लेने वाले राजनैतिक समूह की रही है. लेकिन यह तथ्यात्मक नहीं है कि भक्त संस्कृति केवल भाजपा के भीतर से आई है या भक्त मिजाज के लोग सिर्फ भाजपा में होते हैं.

आज जिस राजनैतिक तबके को भक्त कह कर संबोधित किया जाता है, वैसा तबका लोकतंत्र में नेहरु के समय से ही देखा जा सकता है. हालाँकि उस दौरान भक्त एक राजनीतिक मिजाज का संस्थागत शब्द नहीं था. तब इन्हें विरोधियों द्वारा ‘चेले’ या ‘चाटुकार’ कह दिया जाता था. पर जैसा हमने पहले कहा कि इस प्रक्रिया में नेता कि मंशा भी बहुत मायने रखती है. नेहरू ने ऐसे लोगों को कई बार संबोधनों में हतोत्साहित किया पर मोदी स्टाइल ऑफ राजनीति उनमें दंभ ठूसने का प्रयास करती है.

सचिन तेंदुलकर के फैन सुधीर

वैसे तो मैंने यूपी में खाट सभाओं के दौरान कांग्रेस के एक ऐसे कार्यकर्ता को देखा था, जो तपती गर्मी में बगैर चप्पल, राहुल गाँधी को जिताने के लिए नंगे पाँव यात्रा कर रहा था. दक्षिण भारत की राजनीति में तो नेताओं से ‘इस तरह के न समझे जाने वाले जुड़ाव’ का खूब चलन है. फिर सचिन के फैन सुधीर जो उनके हर मैच में पूरी देह रंगकर उपस्थित रहते हैं और उनके लिये कुछ भी करने को तैयार हैं, ऐसे ही एक प्रतीक हैं, भले ही यह मसला राजनीतिक न हो.

द्वितीय विश्व युद्ध के समय हिटलर ने तमाम ऐसे नागरिकों का एक जत्था तैयार कर दिया था जो खुद की वैचारिकी से अपाहिज हो कर हिटलर की बातों पर किसी आराध्य की तरह यकीन करते थे. (इस पर विस्तार से आप आगामी लेखों में पढ़ेंगे. अभी हम पुनः भक्त और उसकी व्याखाओं पर वापस आते हैं.)

‘क्या आप भक्त हैं?’ खुद पता कीजिये

यदि आप किसी भी पार्टी या किसी ख़ास नेता के घोर समर्थक है, तो आप नीचे दिए हुए सवालों का जवाब खुद से पूछिये.

1- क्या आप अपने पसंदीदा नेता की कही गयी बातों को ही आखिरी सच मानते हैं?

उदाहरण यदि आपका नेता कोई बात तथ्यों से परे कहता है, तब आप क्या करते हैं? क्या आप उसकी बातों पर शक करके तथ्यों को खोजते हैं या उन्हीं बातों को खुद के लिए नया तथ्य मानने लगते हैं? यदि आपका नेता खुद की तुलना इंदिरा गांधी से करते हुए कहता है कि हम इंदिरा से ज्यादा राज्यों में सरकार चला रहे हैं तो क्या आप ये नहीं सोचते कि इंदिरा गाँधी के समय कुल कितने राज्य थे?

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2- क्या आप दो एक जैसी घटनाओं को अलग-अलग नजरियों से देखते हैं?

उदाहरण यदि अमित शाह को हत्या अपहरण और वसूली करने के आरोप में सबूत न होने के आधार पर बरी किया जाये तो आप कोर्ट के फैसले का बगैर शक स्वागत करते हैं. लेकिन जब 2 जी घोटाले के आरोपियों को सबूत न मिलने के आधार पर बरी किया जाये, तो आपको लगता है कहीं न कहीं कोई चूक हुई है. चूक कहीं भी हो सकती है पर आपको दूसरे वाले मामले में ज्यादा शक क्यों हैं कभी खुद से पूछा है?

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3- क्या आप अपने नेता की चुनावी हार पर मानसिक रूप से झुंझलाहट और निजी जिंदगी में बेचैनी महसूस करते हैं?

यह तनाव कई बार राजनीतिक लोगों को आम तौर पर होता है. इसे सामान्य रूप से भी देखा जा सकता है. लेकिन निजी जिंदगी में इसका ज्यादा प्रभाव नहीं होना चाहिए. यदि आपको इस वजह नींद न आये, तब यह एक गम्भीर समस्या का इशारा है.

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4- क्या आप किसी नेता को उसकी पार्टी से ज्यादा पसंद करते हैं? फिर आप एक पार्टी को किसी ख़ास विचार के लिए पसंद करते हैं या किसी ख़ास नेता की वजह से?

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5- आप नेता को अपने विचारों का भौतिक प्रतिनिधि मानते हैं या आपका नेता ही धीरे-धीरे आपके विचार गढ़ने लगा है?

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6- क्या आप उस अखबार को नहीं खरीदना चाहते जिसमें आपके नेता की आलोचना की जाती है? क्या आपको ऐसा अख़बार पढना सुकून देता है जिसकी 80 फीसदी खबरें आपके नेता के इर्दगिर्द हों?

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7- क्या आप इस बात पर यकीन करने लगे हैं कि आपके नेता के पास दुनिया की सारी समस्याओं का समाधान है? मसलन अगर कर सका तो कश्मीर समस्या, चीन की दुश्मनी से लेकर गरीबी तक का इलाज वही कर सकता है?

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8- क्या कई बार आपका पत्नी से आपका झगड़ा इस बात को ले कर भी हो जाती है कि वह आपके नेता को पसंद नहीं करती ? क्या अपने प्रिय नेता पर यकीन के चलते आप निजी रिश्तों और दोस्ती में भी तल्ख हो गये हैं?

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9- क्या आप यह पसंद करेंगे कि पूरे देश और सभी राज्यों की विधान सभाओं में सिर्फ आपकी पार्टी की सत्ता हो? और यह समूची सत्ता आपके नेता के जरिये संचालित हों?

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10. क्या आप अपने आस-पास टूटी सड़कों, पानी की अव्यवस्था, खराब स्वास्थ्य सेवाओं आदि की हालत देखकर अपनी सरकार की आलोचना करते हैं. या यह सोचकर चुप रह जाते हैं कि सरकार आपने जिसे वोट दिया उस पार्टी की है. और अभी आपके नेता का ध्यान बड़े मुद्दों पर है, वक्त मिलते ही वह सब ठीक कर देगा.

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क्या इन सवालों में से कई के जवाब आपने ‘हाँ’ में दिये? अगर हाँ तो यह वक्त आपके लिये संभल जाने का है. राजनीति में किसी नेता का भक्त होना सिर्फ राजनीति के लिए बुरा नहीं है, बल्कि आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बुरा है.

कांग्रेस की खाट सभा का एक दृश्य, फाइल फोटो

राजनीतिक भक्त होना मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है

आध्यत्मिक तौर पर किसी न दिखने वाली सत्ता में इस तरह का यकीन मानसिक स्वास्थ्य के लिए और तमाम तरह के तनावों से बचने के लिए लाभदायक हो सकता है लेकिन राजनीति की सत्ताओं के लिए यह नजरिया सही नहीं है. ‘सत्ता होती ही सवाल करने के लिए है’ और यही लोकतंत्र की धुरी है. सत्ता पर काबिज आदमी कभी आराध्य नहीं हो सकता, बल्कि तीखे से तीखे सवालों की जवाबदेही के लिए ही वहां तक पहुंचाया जाता है. जनता उसे चुनती है, वाज़िब प्रगति न होने पर जनता को उससे प्रश्न करने का पूरा हक़ है.

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(आपको लेख के कौन से बिंदु अच्छे लगें हमें जरूर बतायें. यह भी कि कहां हमें और काम करने की जरूरत है? आपको अगर यह लेख पसंद आता है तो हम आगे ‘भक्त बनने की प्रक्रिया’, ‘भक्ति के प्रकार और उसकी तमाम स्टेज’ आदि पर भी मनोवैज्ञानिकों से बातचीत कर लिखने का प्रयास करेंगे.) आगे भी हमारे लेख और वीडियोज़ पाते रहने के लिये हमसे यहां जुड़ें-

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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