दिन बहुत साधारण था। हवाओं में स्वाभाविक सी ठंड थी और मन में उम्र प्रेरित हलकी सी बेचैनी लेकिन यह सूरत तब बदल गयी जब अचानक पता चला कि नागराज मंजुले आ रहे हैं और दिलो-दिमाग पर ख़ुशी और उत्साह की एक महीन सी चादर बिछ गयी।

शाम के 5 बजे एक आदमी सामने था, जिसने सफ़ेद शर्ट पहन रखी थी। वह बिलकुल हमारे जैसा था। हममें से कुछ उसके चेहरे में अपना अतीत ढूंढ रहे थे तो कुछ भविष्य। उसके एक एक कदम पे तालियों की अनुगूँज बढ़ती गयी और हमारे सामने खड़ा था- नागराज मंजुले।

‘फँड्री’ और ‘सैराट’ के निर्देशक जिनकी फिल्मों ने समानांतर और व्यावसायिक का विभाजन धूमिल करके आलोचकों और दर्शकों दोनों के दिलों में जगह बनायी। समाज में समस्याएँ हैं और उन समस्याओं के बीच प्रेम का अंकुर फूटता है। इसी अंकुर को दृश्यांकित करती हैं मंजुले की फिल्में। हमने फंड्री देखी और सवालों और जवाबों का सिलसिला शुरू हुआ। जिसे साक्षात्कार शैली में पेश किया जा रहा है –

कठफोड़वा- निर्देशन के अलावा आप अपनी प्रत्येक फिल्म में अभिनय भी करते हैं। क्या इसका कोई विशेष कारण है?

नागराज- जब हम सिनेमा के बारे में कुछ नहीं जानते थे कि अभिनेता के अतिरिक्त भी एक लम्बी-चौड़ी फ़ौज होती है जो फिल्म के लिए काम करती है तो अभिनेता ही था जो हमे फिल्मों से जोड़ता था। अमिताभ और मिथुन मेरे प्रिय अभिनेता थे। उन्हें देखकर हमेशा से एक्टिंग करने का मन करता था पर अभिनय की शुरुआत शौक से नहीं बल्कि मजबूरी से हुई।

फँड्री के एक सीन में नामराज मंजुले

‘पिस्तुलिया’ मेरी पहली शार्ट फिल्म थी जिसके लिए मेरे पास बहुत पैसे नहीं थे तो एक एक्टर का खर्च बचाने के लिए मैंने खुद ही उसमे अभिनय किया। फंड्री के चरित्र ‘चंक्या’ के लिए बहुत सारे ऑडिशन किये पर कोई मिल नहीं रहा था। मेरे प्रोडूसर भी परेशान थे कि अरे कब तक मिलेगा तुम्हारा मनमाफिक एक्टर। एक दिन प्रोडूसर ने मुझे किसी आदमी को वह रोल समझाते देखा। उन्होंने कहा कि जब तुम खुद ही इतने अच्छे से कर ले रहे हो तो खुद ही ये रोल क्यों नहीं कर लेते हो। यह बात सुन के बचपन से जमा हुई अभिनय की इच्छा कुलबुला उठी और मैंने हाँ कर दी। सिलसिला चल निकला…

कठफोड़वा- ‘फँड्री’ के उस दृश्य की बड़ी चर्चा होती है जहाँ जाब्या का परिवार सूअर पकड़ने की कोशिश कर रहा है और अचानक बगल के स्कूल में राष्ट्रगान बज उठता है और सूअर पकड़ने की जरुरत के बावजूद उन्हें राष्ट्रगान के सम्मान के लिए खड़े होने को बाध्य होना पड़ता है। क्या आप इस प्रतीकात्मक दृश्य से यह जाहिर करना चाहते थे कि राष्ट्रवाद की अवधारणा स्वतंत्रता की अवधारणा को दबा देती है?

नागराज- देखिये, राष्ट्र आज के समय में सबसे संकुचित और निरर्थक चीज है। कुछ सीमाएं खींच दी गई हैं और उसी के लिए सब मरने-मारने को उतारू हैं। फिल्म के सन्दर्भ से यह जरूर कहूंगा कि ‘राष्ट्र’ (की अवधारणा) में दलितों और स्त्रियों के लिए कोई जगह नहीं है।

‘सेक्युलर’ जैसे शब्द भी केवल कागज पर सजावट की तरह पड़े हुए हैं। जो आदमी अपने काम में फंसा हुआ हो और उसे उस काम की जरुरत हो, उसे राष्ट्र के नाम पे रोकना राष्ट्र के ही विकास के लिए घातक सिद्ध होगा। मेरा मानना है कि हम सब ही राष्ट्र हैं और हमारे काम से ही हम आगे बढ़ते हैं।

कठफोड़वा- आपकी सभी फिल्मों का मुख्य विषय भारतीय समाज में दलितों की समस्याएँ रहा है। इस विषय को इतनी प्रमुखता से अपनी फिल्मों का केंद्र बनाने का कोई विशेष कारण?

नागराज- मैं सिनेमा का बहुत शौक़ीन था। मैं अक्सर अपना स्कूल छोड़कर फिल्में देखा करता था पर उन फिल्मों में खुद को देख नहीं पाता था। मेरी फिल्मों की कहानी मेरी कहानी है। जो आप हॉल के परदे पर देख रहे हैं, वो मैं पहले ही अपने जीवन के परदे पर देख चूका हूँ। मुझे फिल्म बनाने की जरुरत इस लिए ही महसूस हुई कि अगर ‘मैं’ अपनी कहानी नहीं कहूंगा तो कोई यह कहानी नहीं कहेगा।

दूसरों के पास कहने को बहुत सारी कहानियाँ हैं जिनमें कार की रेस करने से लेकर लन्दन घूमने तक का रोमांच देखने को मिलता है पर यह कहानी कोई नहीं कहेगा कि हमारे बीच रहने वाले कुछ लोगों को ‘फँड्री’ भी कहा जाता है जिसका मतलब सूअर होता है। हम दूसरों को जानवरों के नाम से सम्बोधित करते हुए कब स्वयं जानवर बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता।

कठफोड़वा- आप फिल्मों में बाबा साहेब आंबेडकर, सावित्री बाई फुले और शाहू महाराज जैसे समाज सुधारकों की छवियों का प्रयोग करते हैं जिन्होंने परिवर्तन के लिए अध्ययन का अहिंसक रास्ता चुना लेकिन ‘फँड्री’ का नायक ‘जाब्या’ फिल्म के अंत में शोषण से तंग आकर पत्थर उठा लेता है। क्या यह हिंसा की अनिवार्य उपस्थिति का प्रतीक है?

नागराज- दरअसल हिंसा की यह अजीब खूबी है कि जब तक वह अंदर घाव करती रहती है तब तक किसी का ध्यान नहीं जाता पर ज्यों ही वह बाहर निकलती है, वह अपराध बन जाती है। सदियों का वह शोषण जिसने हमारी आत्माओं के साथ हिंसक बर्ताव किया और हमारे जीने के सारे विकल्प छीन लिए तो ऐसी स्थिति में जाब्या के पास और कोई चारा नहीं था।

वह हिंसक नहीं है, पत्थर फेंकते वक्त उसके चेहरे पर एक ग्लानि का भी भाव है। उसकी आत्मा उसे ऐसा करने से रोकती है पर अपमान की अग्नि ने उसे पत्थर उठाने पर मजबूर कर दिया। वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी जिसके बिना फिल्म अधूरी होती।

कठफोड़वा- आप कविताएँ भी लिखते हैं। हमारी इच्छा है कि आप एक स्वरचित कविता भी सुनाएँ।

नागराज-

कविताएँ

घर में अक्सर नहीं होती

इश्तेहार में देने के लिए खोये हुए लोगों की

एक भी ढंग की तस्वीर

इश्तेहार में देने के लिए जिनकी ढंग की एक भी तस्वीर ना हो

ऐसे ही लोग अक्सर खो जाया करते हैं

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