आजकल सुर्ख़ियों में बाबरी मस्ज़िद की ढहने की कहानी है। कुछ लोग उस दौर को याद कर अपने कारनामें पर शर्मिंदा हो रहे हैं तो कुछ अब भी उसे रामराज्य स्थापित करने की कोशिश में शानदार पड़ाव मानते हैं और कुछ उसे हिन्दू आतंकवाद की शुरुआत मानकर ‘हिन्दुत्व’ को गरियाने में लगे हैं। लेकिन मुझे अब भी लगता है की असलम की मस्जिद को तोड़ने लिए राम दौड़ते हुए आ रहे हैं।

कुछ दिन पहले की वह खबर जिसमें भारतीय विरासत को सजाने वाली सबसे पुरानी पार्टी ने अपना नेता चुना है। मुझे चुना शब्द लिखने में भी परेशानी हो रही है।

आखिरकार आप ही बताइये जहाँ से वंशवाद की सबसे भयंकर दुर्गन्ध आये, वहां लोकतंत्र का सबसे आधारभूत शब्द ‘चुनाव’ कैसे लिखा जाए?

मैं यह क्यों न मानूँ की वंशवाद के आवरण के अंदर वह सारी परिस्थितियां साथ-साथ चलती हैं जो एक दिन किसी मस्ज़िद को फिर से ढाहने के काम आएँगी, किसी मंदिर को जबरन बनाने की कोशिश करेंगी ताकि उन्हें वोट मिले और वह फिर से अपने वंश के लिए साम्राज्य बनाने में कामयाब रहें।

बाप की पूँजी को भुनाते हुए जो आसानी से नेता बन जाते हैं, उन नेताओं में बाप की गलतियों को सुधारने की हिम्मत होती होगी क्या? क्या आपको ऐसा नहीं लगता की ऐसे नेता अपने साथ चापलूसियत, दलाली और छत्र-छाया वाली संस्कृति पैदा करते चले हैं? क्या आपको लगता है की ऐसे नेताओं की फ़ौज़ एक दिन भी अपने फायदे और घाटे को ध्यान में रखकर मंदिर और मस्ज़िद की राजनीति से आगे बढ़ पाएगी? क्या ये नेता राजनीति की संस्कृति बदलने की कुव्व्वत रखते हैं? आपको बदलाव लाने वाली सारी सड़क यहां बंद होती नजर आएंगीं।

यकीन मानिये जब राजनीति की संस्कृति नहीं बदलती तब इतिहास जस का तस भविष्य के गर्भ में आसानी से आगे बढ़ता चला जाता है।

अगर अगुवाकर्ता के नाम पर पूरे देश में कुल मिलाकर 500 परिवार ही शासन करने लगें तो लोकतंत्र की बजाए हम एक घनघोर सामन्ती समाज की तरफ बढ़ते चले जाएंगे। और एक सामन्त हमेशा चाहता है की पहचान और बंटवारे के नाम पर वह अपना कुनबा बनाये रखे। ऐसे माहौल में मंदिर और मस्ज़िद ढाहने की कोशिश न की जाए यह असम्भव है। यह असम्भव है की कोई नेता पहचान की नाम की राजनीति छोड़ दे। तुष्टिकरण की घाघ नीतियों से अपना पीछा छुड़ा ले। ऐसा इसलिए है की क्योंकि वह केवल कहने को नेता होता है, वास्तव में उसके पास ऐसी कोई पूँजी नहीं होती जिसपर वह अपनी ज़मीन रच सके। अभी तक गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी के मंदिरों पर माथा रगड़ने और जनेऊ प्रकरण के दौरान यह बात साफ समझ आ गई होगी। फिर भी इस बात पर यकीन न आ रहा हो तो राहुल से गांधी और तेजस्वी से लालू हटाकर सोचिये वो दोनों कहीं कारसेवा करने वाली रैली में खड़े नज़र आएंगे।

अपने आस पास के लोगों की बहसों से कभी-कभार क्षुब्धता और कोफ़्त पैदा होती है। उनकी बहसों में जो छवि तेजस्वी यादव और वरुण गांधी जैसे लोग एक दिन में बनाकर चले जाते हैं वो छवि और हैसियत एक जुझारू समाजिक कार्यकर्ता अपनी पूरी ज़िन्दगी नहीं बना पाता। लोगों के जीवन में आम ईमानदार इंसानों की मेहनत से ज्यादा अच्छी छवि दो दिन के छोकरे की बनने लगती है।

ऐसे समाज में अगर परिवारों और स्कूलों में ये पढ़ाया जाए की ‘मेहनत का फल मीठा होता है’ तो क्या आप उसे पाखण्ड नहीं मानेंगे? थोड़ा और आगे बढ़ेंगे तो आप पायेंगे की ऐसे अवसररोधी समाज में दुनियादारी और व्यवहारिक बनने की नसीहत क्यों दी जाती है?

इसका मतलब यह होता है की चोरी-चपारी, छीना-झपटी सीखिये, बिना इनके काम नहीं चलता है। इसी जीवन शैली को राजनीति की तरफ लेकर चलते हैं तो अंदर से बेहद घटिया और बाहर से साफ दिखने वाले लोग ये कहते मिल जाएंगे की राजनीति बहुत गन्दी चीज़ है। यहाँ आगे बढ़ने के लिए गंदे-गंदे तिकड़म की जरूरत होती है। राजनीति करने वाला और देखने वाला हर अबोध इंसान राजनीति को इन्हीं तिकड़मों के सहारे देखता है और सोचता है कि राजनीति में इससे सफलता और असफलता पायी जा सकती है। राजनीति में सफल होने की सबसे भयावह तिकड़म का नाम है ‘पहचान की राजनीति’ करना। पहचान की राजनीति अपने साथ साम्प्रदायिकता की रूह लेकर चलती है जिसकी अंतिम परिणिति यही है की कहीं मन्दिर ढाहे जाएंगे तो कहीं मस्ज़िद गिराई जायेगी।

राजनीति में वंशवाद के तर्क को काटने के लिए अक्सरहा यह तर्क दिया जाता है की वंशवाद हमारे समाज के सभी पेशे में हैं तो राजनीति में क्यों न हो? जब डॉक्टर की अगली पीढ़ी डॉक्टर तो नेता जी की अगली पीढ़ी नेता क्यों नहीं? इस तर्क का एक ही काट है की उलटकर कहा जाए की तब किसी कातिल का लड़का कातिल ही बने और किसी मोची का लड़का मोची। आप झुनझुना बजाइये और हम तलवार भाजेंगे। मानव सभ्यता ऐसे ही चलती है क्या? हम क्यों यह भूल जाते हैं मानव एक बौद्धिक प्राणी है जिसकी मूल खासियत यही है की वह तर्को के जरिये किसी निर्णय पर पहुंचता है। जब तर्क यह कहते है की किसी पद को पाने के लिए किसी खास किस्म की ट्रेनिंग की जरूरत होती है। और वह ट्रेनिंग हर मामले में अपने संदर्भो और मौजूदा हालातों के अनुसार बदलती रहती है और उस ट्रेनिंग को पास करने के बाद किसी को किसी पद के लायक समझा जाता है।

तब यह तर्क राजनीति में लागू क्यों नहीं किये जा सकते? राजनीति चूँकि जनता को साथ में लेकर चलने का नाम है, इसलिये यह ट्रेनिंग सड़कों की, आंदोलनों की, समझ की, निर्णय की, दृष्टि की, अंतर्दृष्टि की क्यों नहीं हो सकती?

हैरान करने वाली बात तो यह है की कल के छोकरे से जिसके जीवन का अनुभव गाँव के मंगरुआ (केवल इस संदर्भ में पढ़ें कि एक काल्पनिक नाम का प्रयोग किया गया है गांव से कभी बाहर न गये, अनुभवहीन व्यक्ति के लिये) से भी कम है मीडिया ऐसी आसान और वाहवाही वाले सवाल पूछती है जैसे कोई परंपरवादी सास अपने दामाद से पूछती है। मीडिया के माइक से कभी भी तथाकथित नेताओं के लिए यह सवाल नहीं होता है की भाई पैसा कहाँ आता है? कहाँ और किस तरह से पैसा लाकर चुनाव लड़ोगे? ऐसे किसी भी सवाल से मीडिया रूबरू नहीं होती? उसे बस यह दिखना चाहिए कि लालू यादव के बेटे तेजस्वी की बातें खखनाहट पैदा कर रही हैं या नहीं। और मन्दिर बनाने के नारे पर कोई धर्मनिरपेक्षता की हुंकार में दबंगई करता हुआ दिखता है या नहीं।

राजनीति में वंशवाद पर योगेन्द्र यादव कहते हैं कि राजनीति में सबसे बड़ी समस्या है- ‘इंट्री पॉइंट’. मतलब ये की हम राजनीति में घुसें कैसे? कैसे लोग यह समझने लगें कि एक आम इंसान भी राजनीति में अपनी दावेदारी रख सकता हैं? कैसे लोग मानें कि उनके चुनावी क्षेत्र में होने वाली भिड़ंत में एक आम इंसान नेता की योग्यता के लिहाज से किसी रसूखदार और बपौती के लाड साहब से कोसों आगे है? लोग किसी आम इंसान को तवज्जो देने के लिए तैयार नहीं होते हैं। इसी इंट्री पॉइंट के पहले राजनीति करने की इच्छा लिए हुए लगभग 99 प्रतिशत लोग ढह जाते हैं। जबकि यहीं परिवारवाद की दवाई काम कर जाती है। परिवारवाद अचानक से 99 प्रतिशत की बाधाओं को पार करवा देता है। हम नकार दिए जाते है और कोई राहुल गांधी नेता मान लिया जाता है।

ऐसे हवा हवाई नेता हवा हवाई बातों से ही राजनीति करते हैं। राजनीति में ज्यादातर हवा-हवाई बातें पहचान को भड़काने के नाम पर की जाती है। मतलब यह कि जब तक हवा-हवाई नेता हैं, तब तक पहचान की राजनीति है और जब तक इस तरह की राजनीति है तब तक मंदिरों का ढहना है और मस्ज़िदों का बनना जारी रहेगा।

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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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