निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती को लेकर पूरे देश में बहस चल रही है. तमाम पहलुओं पर लोग विचार और टिप्पणियां कर रहे हैं. इस बीच इस लेख को पढ़ा जाये, जो न तो किसी समुदाय विशेष की भावना आहत करने के लिये नहीं लिखा गया, न ही कला की रक्षा की सतही गुहार करता है. लेखक की यह ईमानदार टिप्पणी समाज को फिल्म रिलीज के इस अवसर को क्रिएटिव तरीके से भुनाने का संदेश देती है. यह लेख ऋषभ ने लिखा है.

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पहली बार जब मैंने सुना कि फिल्म पद्मावती में घूमर डांस है, तो दिमाग में यही कौंधा कि ब्राजील के सांबा और कैरीबियन साल्सा डांस को टक्कर देते इस भारतीय डांस को एक बार फिर से विश्व पटल पर जगह मिलेगी. जगह मिलेगी कि नहीं, नहीं पता. पर ये पता जरूर है कि इस डांस के बहाने भंसाली ने किसी का हक मार लिया है. फिल्म के गाने में राजकुमारी पद्मिनी यानी कि दीपिका पादुकोण घूमर पर डांस करते दिख रही हैं. सोशल मीडिया पर कई लोगों ने खुशी जताई कि राजपूताना का असली गौरव ये डांस है. वहीं करणी सेना और उनके साथ के लोगों ने कहा कि राजकुमारी को घूमर डांस करते दिखाना राजपूताना का अपमान है.

ये डांस भील समुदाय का है. सदियों से बचा के रखा हुआ है उन लोगों ने. होली, दीवाली, शादी पर किया जाता है. वुमनहुड को सेलिब्रेट भी किया जाता है. नाचनेवाले बहुत घूम घूमकर नाचते हैं. इसीलिए नाम भी ऐसा है. कई तो क्लेम करते हैं कि वो घंटों घूमते रह जाते हैं नाचते हुए.

तो अगर फिल्म में ये दिखाया जाता कि भील समुदाय ये डांस कर रहा है, तो थोड़ा बहुत उनका हक अदा हो जाता. पर यहां तो राजकुमारी सारा गौरव ले गईं.

अब यहां बात आती है फिल्म में क्या दिखाया जाता. तो बात बस इतनी है कि फिल्म में वही दिखाया जाता जो बनाने वाले के दिमाग में था. मैं बनाता तो कुछ और बनाता. भंसाली ने बनाया है तो कुछ और बनाया होगा. तो मेरे मन मुताबिक अगर फिल्म नहीं बनाई भंसाली ने तो मैं क्या करूंगा. मैं सिनेमाहॉल से उठकर चला आऊंगा. नहीं देखूंगा. अगर मन किया झेलने का, दोस्तों ने कहा कि मत जा, तो बैठ के देख भी लूंगा. लेकिन मैं ये नहीं कहूंगा कि फिल्म प्रदर्शित ना हो.

मैं तो बचपन से हिंदू माइथॉल्जी पढ़ते आया हूं. इसमें यही सीखा है कि एक ही कहानी के कई पहलू होते हैं. एक ही कहानी हर युग में कही जाती है, अलग अलग लोगों के द्वारा. एक ही भगवान कई बार कई जगह कई तरीकों से पैदा होते हैं. परशुराम द्वारा अपनी मां के सिर काट लेने की घटना भी पढ़ी है, श्रवण कुमार की कहानी भी पढ़ी है. तो परशुराम की कहानी को बैन करने के लिए आंदोलन तो नहीं किया जा सकता. कहानी है.

परशुराम ने तो 21 बार धरती को क्षत्रियविहीन भी किया था कहानियों के मुताबिक. खिलजी, तैमूर, अकबर या कोई भी इस कत्लेआम के आस पास भी नहीं है. पर परशुराम की बात इतिहास नहीं है, कहानी है.

अब यहां बात आती है कि राजकुमारी पद्मिनी कहानी हैं या इतिहास हैं. थोड़ा गड्ड मड्ड हो गया है. जिन रचनाओं को इतिहास माना जाता है, उनमें पद्मिनी का जिक्र नहीं है. पर जो रचनाएं ऐतिहासिक हो गईं, उनमें पद्मिनी कहानी से कहीं कुछ ज्यादा हो गईं. सबसे बड़ी बात कि आम जनता के मन में ये कहानी इतिहास के रूप में बैठ गई है. चित्तौड़ में जौहर कुंड भी है. तो इस चीज को चित्तौड़ के लोगों के दिमाग से हटाने की कोशिश नहीं की जा सकती. बहुत खूबसूरत है किसी जगह के लोगों के मन में ऐसी कहानी का होना.

पर ये कहानी रोमांटिक नहीं है. मैं सिहर जाता हूं जब ये सोचता हूं कि किले से एक सुरंग बनाई गई होगी जौहर कुंड तक. एक तरफ सुल्तान जीतते हुए, लोगों को मारते हुए किले में घुस रहा होगा. दूसरी तरफ पद्मिनी और सोलह हजार औरतें सोलहों शृंगार करके सुरंग से निकल चिताओं की तरफ जा रही होंगी. सुल्तान गेट तक पहुंचा और चिताएं धधक उठीं. औरतें इंसान ही होती हैं. सबकी चीखें निकली होंगी. कुछ मजबूत होंगी जो नहीं चीखीं होंगी. उनके मन की चीख किसी को नहीं सुनाई दी होगी. कुछ से तो बर्दाश्त नहीं ही हुआ होगा. उन लोगों ने कैसे सहन किया होगा. भागने का मन नहीं किया होगा. जलती लाशें, जलता खून. वो महक दिनों तक नहीं गई होगी. वहां खड़ा रहना संभव नहीं होगा. जब सुल्तान जौहरकुंड तक पहुंचा होगा तो उसे क्या लगा होगा. क्या सुल्तान जिंदगी भर इस दृश्य को भूल पाया होगा. भूलने के लिए क्या किया होगा. अफीम खाता होगा. या फिर इस चीज को सपना मानता होगा. चित्तौड़ के लोग क्या सोचते होंगे. उस वक्त के बच्चों को नींद कैसे आती होगी. उन मांओं के बेटों को नींद कैसे आती होगी जो जल गई थीं.

कहानी हो या इतिहास हो, ये इतना ट्रैजिक है कि चित्तौड़ को पूरी दुनिया में औरतों पर हुए अत्याचार का प्रकाश स्तंभ बना देना चाहिए. वहां पर अखंड ज्योति जलनी चाहिए.  भारत में कहीं पर भी रेप हो, एसिड अटैक हो या दहेज हत्या हो, चित्तौड़ में एक दिया और जला देना चाहिए.

चीन आजतक द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के कारनामों से खफा है. युद्ध के दौरान जापान ने हजारों औरतों को सेक्स स्लेव बना लिया था. इसकी याद चीनी दिमाग से जाती नहीं. आज भी इराक में आईएसआईएस द्वारा औरतों को सेक्स स्लेव बना लेने की खबर आती रहती है.

यहां ये प्रश्न खड़ा होता है कि अगर पद्मिनी जौहर नहीं करती तो क्या करती. सेक्स स्लेव बन जाती. क्या अलाउद्दीन उससे प्रेम करता था? या फिर सेक्स स्लेव बनाना चाहता था. नहीं पता. उसी को पता होगा. पर इतना पता है कि एकतरफा प्रेम था और पागलपन की हद तक पहुंच चुका था, कहानी के मुताबिक.  जिससे बचने के लिए पद्मिनी ने आत्महत्या कर ली. यहां पर तकलीफ बस शब्दों के हेर फेर से है. एक लड़की ने आत्महत्या की और हमने उसे जौहर कहकर अपने राजपूताना की प्रतिष्ठा में जोड़ लिया. हमने शायद अपने मन में मान लिया कि रेप होने की स्थिति में औरतों को आत्महत्या कर लेनी चाहिए. हम इसे जौहर कह देंगे.

यहां पर दो धड़े खड़े होते हैं. एक धड़ा कहता है कि आत्महत्या करना भी एक चुनाव है. एक बहादुरी है. मैं दूसरे धड़े का हूं. मैं आत्महत्या को बहादुरी नहीं मानता. पर कल्पना करता हूं कि अगर युद्ध के दौरान बंदी बन जाऊं और सामने नाजी कंसंट्रेशन कैंप हो तो क्या करूंगा. चंद्रशेखर आजाद ने क्या किया था. भगत सिंह भी भाग सकते थे, लेकिन नहीं भागे. मैं नहीं जानता कि क्या करूंगा. उस वक्त जो समझ आये करूंगा. युद्ध अकेले ही लड़ा जाता है.

टॉल्सटॉय ने कहा है कि किसी सैनिक को लगातार जनरल से आदेश नहीं मिलते. एक बार मिल गया, उसके बाद वो अकेले ही लड़ता है. उसके अपने निर्णय होते हैं. हम किसी के निर्णय को गलत नहीं कह सकते. हम उससे सिंपैथी रख सकते हैं. पद्मिनी के निर्णय को सही-गलत नहीं कहा जा सकता. बस सुन के पीड़ा होती है. मन में यही आता है कि फिर ऐसा ना हो. पर राजस्थान में ही 1987 में रूप कुंवर मामले में सती कर दिया गया औरत को. अच्छी बात है कि अब ऐसी घटनायें सुनने में नहीं आतीं. पर दहेज के लिए जला देने की घटनायें आती रहती हैं मेरे गृहप्रदेश बिहार और पड़ोसी उत्तर प्रदेश से.

तो पद्मिनी, अलाउद्दीन खिलजी या रतन सिंह को जज नहीं किया जा सकता. बस उनकी कहानियों से सीखा जा सकता है कि हम अपने आस पास को कैसे बेहतर बना सकें. जायसी ने पद्मावत भी इसी लिहाज से लिखी है. मैंने कहीं पढ़ा था कि ये सारे पात्र इंसानी भावनाओं के मेटाफर हैं.

बहुत शानदार कहानी है. किताब खरीदकर पढ़ें. बेहद शानदार.

आखिर में बात आती है समाज के आहत होने की

तो मित्रों, समाज कहीं आहत नहीं होता है. समाज के कुछ लोग आहत होते हैं. आहत होनेवालों में टॉप पर कुछ लोग हैं जिनकी महत्वाकांक्षायें हैं, जिनको फिल्म से कोई मतलब नहीं है. इनकी निगाह में आते हैं वो बेरोजगार लड़के, जिनका जीवन निरुद्देश्य होने की तरफ जा रहा होता है. तो उनकी ऊर्जा का इस्तेमाल अपने लिए कर लेते हैं महत्वाकांक्षी लोग. ऊर्जा बर्बाद नहीं होनी चाहिए. बड़ा आसान है. उसे उसकी बेरोजगारी और अशिक्षा के अहसास को किसी प्रिविलेज्ड व्यक्ति के काम से जोड़ देना. यहां पर प्रिविलेज्ड व्यक्ति हैं भंसाली जो कि बेरोजगार नहीं हैं.

लड़कों को लगने लगता है कि भंसाली के पास सबकुछ है और हमारे पास कुछ नहीं है. तो वो अब हमारी अस्मिता पर भी हमला कर रहा है. ये एक तरीके से कैपिटलिज्म और सोशलिज्म की लड़ाई में भी तब्दील हो जाता है. वर्ग संघर्ष. लड़ाई जीतने के लिए हर हथकंडे अपनाये जाते हैं. धर्मयुद्ध तो लड़ नहीं रहे कि गलत तरीकों का इस्तेमाल नहीं करेंगे. 

राजकुमारी पद्मिनी को माता बना लेते हैं. जबकि पद्मिनी नाम भारत के उस लिटरेचर से लिया गया है जहां पर औरतों की सेक्सुआलिटी में पद्मिनी होना उनको सबसे ज्याद डिजायरेबल बनाता है. तो विशेषज्ञों को इसमें ओडिपस कॉम्प्लेक्स, सेक्सुअल लिबरेशन, इनसेस्ट और पता नहीं क्या क्या नजर आ सकता है. जिसमें से कोई भी सच ना हो, ये भी हो सकता है. पर सोच पर तो कोई रोक नहीं लगा सकता. लगानी भी नहीं चाहिए. नहीं तो चांद पर भी कभी नहीं पहुंच पाते.

हालांकि हम ये भी कर सकते थे कि फिल्म देखने जाते और महसूस करते कि क्या बकवास बनाया है यार. या फिर ये कहते कि बहुत बढ़िया बनाया है. दिमाग घर पर छोड़कर जाओ और खूब मजे करो. या फिर ये कहते कि सेट बहुत अच्छा बनाया है. या फिर ये कहते कि राजस्थान की गरमी में फर का कोट पहनकर रणवीर ने बड़ी मेहनत की है एक्टिंग पर. या दीपिका ने बहुत अच्छा डांस किया है. मतलब जिसको जो पसंद आये. जैसे उमराव जान फिल्म में जे पी दत्ता ने यूपी सरकारका स्टील वाला चांपाकल भी दिखा दिया था. हमने हंसा और चले आये.

फिल्म के लिए और क्या कर सकते हैं. क्योंकि ऐसा कतई नहीं है कि फिल्म या किताब रचनेवाले लोग किसी दूसरी दुनिया के हैं और हमारी सभ्यता पर हमला कर रहे हैं. इसका उपाय तो यही है कि ना पसंद आये तो ना देखें, ना पढ़ें. या फिर पढ़ के उनसे अच्छा बना लें. दस करोड़ रुपये में एक जबर्दस्त वेब सीरीज भी बन सकती है पद्मावती पर जो कि ज्यादा चीजों को टच कर सकती है. हमारी सेंसिबिलिटी को जगा सकती है. तभी तो कोई इंदिरा गांधी और इमर्जेंसी, बाबरी मस्जिद और नारायणपुर जैसी फिल्में बना पायेगा. अच्छी होगी तो देखेंगे, नहीं होगी तो नहीं देखेंगे.

2 COMMENTS

  1. Aapka kahna hai.. Padmavati ko suicide nahi Karna tha..Ladna tha…Ya phir khud ko khilji k havale kar dena tha..Lad to wo sakte nahi the..Tabhi to suicide kiya…Aur unk liye ijjat ki jyada value thi na ki…Ye ki suicide paap hai…Aur inki values na aap jan sakte ho na hum..humare to kapde pahle se utre hue hai…To sharm to aani nahi hai…

  2. प्रिय मित्र, बहुत ही अच्छा लेख है. इतने सारे नाज़ुक बिन्दुओं को उतनी ही नज़ाकत से लिखा है कि पढ़ कर लगता है जैसे थोड़ा और सभ्य हो गए हों. आशा है आपका लेख और इसमे इतिहास और कहानियों को लेकर बरती गई संजीदगी अंधेरे कोनो को भी रोशन करे। आमीन।

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