आजकल यूट्यूब और वाट्सएप्प पर एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है. इसे ‘सोनिया गांधी का काला सच’ और ‘सोनिया की डार्क मिस्ट्री’ जैसे नाम दे कर फैलाया जा रहा है. इस वीडियो में सोनिया गांधी के बारे में जो बातें कहीं गयी हैं वह दक्षिणपंथी मिजाज की न्यूज वेबसाइट ‘पोस्टकार्ड न्यूज’ ने इसी साल 22 जुलाई को एक खबर के तौर पर प्रकाशित की थीं. इस खबर में सोनिया गांधी को केजीबी द्वारा भेजा गया जासूस बताया गया हैं और कहा गया है कि एक रिटायर इंडियन पुलिस सर्विस ऑफिसर मलय कृष्ण धर के द्वारा लिखित किताब ‘ओपन सीक्रेट’ में इस बात का खुलासा किया है.

पोस्ट कार्ड न्यूज की खबर यहाँ पढ़ें-

Sonia Gandhi is a spy planted by either KJB or Pope: Intelligence Bureau officer, M.K. Dhar

पोस्ट कार्ड की खबर का हिंदी अनुवाद करते हुए ‘सैफरन स्वस्तिक’, ‘अच्छी खबर’, पोलिटिकल खबर’ और ‘विश्व हिन्दू राष्ट्र’ नाम की करीब दर्जन भर वेबसाइटों ने भी इसे छापा है. पोस्टकार्ड की वेबसाइट पर छपी इस खबर को वहां से अब तक 22 हजार से ज्यादा लोग शेयर कर चुके हैं.

खबर की पड़ताल –

जब मैंने इस खबर की पड़ताल शुरू की तो मेरा ध्यान न्यूज सोर्स की तरफ गया. यह सारी खबरें मलय कृष्ण धर द्वारा लिखित किताब ‘ओपन सीक्रेट’ को आधार बना कर लिखी गयी हैं. गूगल पर जब इस किताब के बारे में सर्च किया तो पता चला कि 30 सालों तक इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करने वाले एम के धर की ‘Open Secrets: India’s Intelligence Unveiled नाम की यह किताब सन 2005 में प्रकाशित हुई थी. इस किताब का विमोचन जम्मू कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने किया था.

गूगल पर और भी सर्च करने पर पता चला कि किताब के पब्लिश होने के बाद टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडिया टुडे और आउट लुक ने भी इस पर स्टोरी की थी. इन लेखों के मुताबिक किताब में यह आरोप लगाया गया है कि भारत में कैसे ख़ुफ़िया एजेंसियों को राजनीतिक प्रतिष्ठानों द्वारा व्यक्तिगत राजनीतिक एजेंडा पूरा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. Quora पर भी यह सवाल (क्या सोनिया गांधी धर की किताब के मुताबिक रशियन जासूस हैं ?) पूछा गया है जिसका जवाबों द्वारा खंडन भी किया गया है. (लिंक http://bit.ly/2hQc5Hz )

गूगल बुक्स वेबसाइट में इस किताब का परिचय दिया गया है कि-  

“यह किताब  सत्तारूढ़ वर्गों द्वारा भारतीय खुफिया, सुरक्षा और जांच एजेंसियों के निर्दयी और क्रूर दुरुपयोग की दुर्भावनापूर्ण कहानियों को प्रभावी तरीके से उजागर करती है. ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारियों को राजनीतिज्ञों की राजनीतिक रूप से और अक्सर निजीकृत मांगों द्वारा सशक्त किया जाता है. इंटेलिजेंस एजेंसियों को अक्सर राजनीतिक दलों के संकीर्ण हितों और नेताओं के अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए मजबूर किया जाता है.”

इंटरनेट पर इस किताब के परिचय में लिखी गयी किसी भी न्यूज़ में कहीं भी सोनिया गांधी का जिक्र तक नजर नहीं आया. मुझे मामला थोड़ा संदिग्ध लगा. मैंने किताब का जायजा स्वयं लेना उचित समझा और जो मिला वो हैरान कर देने वाला था.

566 पेज की इस किताब में 22 बार सोनिया गांधी का जिक्र आया है. जो तस्वीर ‘पोस्टकार्ड’ ने अपनी खबर में सोनिया गांधी की दिखाई है, उसका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. इसके उलट इसमें सोनिया गांधी को एक अलग ही छवि के रूप में पेश किया गया है.



दरअसल यह किताब सोनिया गांधी के बारे में नहीं है. इसलिए उनका जिक्र ही बहुत कम हुआ है .जहां हुआ भी है, वहां या तो मेनका से तुलना करते हुए हुआ है या नरसिम्हा राव के साथ उनके राजनितिक सम्बन्ध और राजीव की मौत के बाद पार्टी के अन्दर सत्ता संघर्ष को ले कर लिखे गये पैराग्राफों में किया गया है.

किताब के वह अंश यहाँ हूबहू प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जिनमें विशेष तौर पर सोनिया गांधी के बारे में बात की गयी है .

1 – प्रष्ठ संख्या -234

“संजय की मौत ने इंदिरा गांधी में बड़े बदलाव ला दिये. बड़ी बहू (सोनिया गांधी) सास (इंदिरा गांधी) की प्रिय बनती गयीं लेकिन किसी सोची समझी रणनीतिक वजह से नहीं था. मुझे सोनिया गांधी के बारे में यह राय बनाने में कोई दिक्कत नहीं है कि सोनिया गांधी ने खुद को गांधी परिवार की पहचान दी थी और वह एक ऐसी ईमानदार मां और पत्नी थीं, जिन्हें राजनीतिक गंदगी नापसंद थी, जिसको (राजनीतिक गंदगी को) संजय, प्रेम और आराधना से भी ज्यादा तवज्जो देते थे.”

2- प्रष्ठ संख्या – 213

“सोनिया गांधी पर इंदिरा का बढ़ता भरोसा साफ़ तौर पर समझा जा सकता था. सोनिया और उसके बच्चों की मुस्कुराती मौजूदगी उनके मानसिक तनाव को तुरंत ही कम कर देती थी. राजीव गांधी भी अपनी मां के साथ मजबूती से खड़े थे. मगर फिर भी उन्होंने गंदी राजनीति से एक ईमानदार दूरी बना रखी थी.”

3- प्रष्ठ संख्या – 217

“सोनिया गांधी ने एक एयरलाइन पायलट से शादी की और अपने जीवन को ख़ुशी से आगे बढाया. राजीव, जहां तक मैंने नोटिस किया, मसलों को हल करने के संजय के तरीकों से कभी सहमत नहीं थे, जैसे कि भारत को एक मोटरखाने की तरह अपनी छत्र छाया में रखकर उसके नटबोल्ट कसने का इन्तजार करना. सोनिया जीवन जीने की पाश्चात्य शैली वाले देश से आयी थीं लेकिन उन्होंने बिना किसी कठिनाई के भारतीय तौर तरीकों को आत्मसात कर लिया. वह जरूर दिल्ली की उस नयी पंजाबी संस्कृति के करीब नही थी जिसे सस्ते उपन्यासों में बेहतर तरीके से सो कॉल्ड फैशनेबल लाइफ स्टाइल बताया जाता है. बल्कि उन्होंने पूरी तरह से खुद को नेहरु–गांधी परिवार के मूल्यों में मिला दिया था.”

4 – प्रष्ठ संख्या -218

राजीव वास्तव में गैर राजनीतिक आदमी थे. लेकिन टोरिनो की लडकी सोनिया गैर राजनीतिक नहीं हो सकती थी क्यूंकि उनके परिवार ने पिडमांट क्षेत्र में राजनीती में हाथ आजमाया था. टोरिनो 1861 से 1865 के बीच इटली की राजधानी था. लेकिन टोरिनो की इस युवा लडकी को इस तथ्य का पता था कि संजय को उत्तराधिकारी चुना गया है. इसलिए उसने अपनी इच्छा से पारिवारिक (घरेलू) कामों की जिम्मेदारी स्वीकार कर ली थी और वह इस परिवार के लिए एक भारतीय बहू से कहीं ज्यादा भूमिका निभा रही थी. (जबकि ) मेनका, अपनी मां की तरह बाहर की दुनिया में व्यस्त थीं.

किताब में उपर्युक्त अंशों के अलावा कोई विस्त्रत पैराग्राफ सोनिया गांधी के बारे में नहीं है. सोनिया गांधी को केजीबी जासूस साबित करने वाली एक भी पंक्ति इस किताब में नही मिली. हालांकि जो भी आरोप इस खबर में लगाये गये हैं अगर वह किताब में भी हूबहू होते तब भी उनको स्वीकार नहीं किया जा सकता था, क्यूंकि इस खबर में कुछ तथ्यात्मक खामियां भी हैं-

  • खबर में लिखा गया है कि सोनिया गांधी ने हर कदम पर झूठ बोला. उन्होंने बताया कि वह राजीव गांधी के साथ एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ती थीं जबकि वहां सोनिया या उनके असली नाम से कोई दाखिला नहीं हुआ. सच्चाई ये है कि यह बात सोनिया गांधी ने कभी कही ही नहीं. जबकि कोई भी यह जानकारी विकीपीडिया या फिर उन पर लिखी गयी जीवनियों में पढ़ सकता है कि वह (सोनिया गांधी) कैम्ब्रिज शहर के बेल एजुकेशनल ट्रस्ट में अंग्रेजी की पढ़ाई कर रही थीं और कैब्रिज विश्विद्यालय में इंजीनियरिंग की पढाई करने वाले राजीव गांधी से उनकी मुलाक़ात वर्सिटी रेस्टोरेंट में हुई जहां वह पार्ट टाइम वेट्रेस का काम करती थीं. (जो कि वहां मेहनती विद्यार्थियों के लिए आय अर्जन का आम और सम्मानित निगाह से देखा जाने वाला काम है.) सोनिया गांधी के निजी जीवन की इन बातों को टाइम्स (लन्दन) ने भी इन्ही तथ्यों के साथ रिपोर्ट किया है.

  • एक और जगह खबर में लिखा गया है कि कैथोलिक रविवार को ख़ास मानते हैं इसलिए सोनिया गांधी के सभी संभावित खतरे रविवार के दिन ही मिटा दिए गये. उदाहरण के तौर पर इसमें सचिन पायलट, माधव सिंधिया और जितेन्द्र प्रसाद का जिक्र किया गया है. गौरतलब है कि पूर्व कांग्रेस उपाध्यक्ष रहे नेता जितेन्द्र प्रसाद की मौत ब्रेन स्ट्रोक से 16 जनवरी 2001 को दिल्ली में हुई थी. इस दिन रविवार नहीं मंगलवार था.

  • खबर में एक जगह पर कहा गया है राजीव गांधी को 21 मई, 1991 को तमिलनाडु में 24 वर्षीय धनु नामक रोमन कैथेलिक महिला, जिसका असली नाम क्लैबथि था, के द्वारा आत्मघाती बम द्वारा उड़ा दिया गया था. जबकि इंडिया टुडे के 1992 के एक लेख (http://bit.ly/2B7ZZBh )में बताया गया है कि राजीव की हत्या करने वाली आत्मघाती हमलावर धनु का असली नाम कलाईवती (Kalaivathi) था, जिसे चालाकी से क्लैबथि बताया गया है.

  • खबर में यह भी लिखा हुआ है कि कमलनाथ, जो कि कांग्रेस के युवा नेता थे, प्लेन क्रैश में बाल-बाल बच गये थे. सच्चाई ये है कि कमलनाथ का कोई प्लेन कभी क्रैश हुआ ही नहीं. गूगल पर सर्च करने पर ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली. द हिन्दू की 2 जनवरी 2001 की एक खबर जरूर मिली जिसमे कमलनाथ का नाम जरूर आया था पर जो हेलीकोप्टर क्लेश हुआ था उसमे कमलनाथ नहीं थे. और सबसे ख़ास बात यह है कि इस खबर की रोमन कथोलिक थ्योरी के उलट 2 जनवरी को रविवार नहीं मंगलवार था. (क्रैश की खबर का लिंक – http://bit.ly/2jiLgvL)

यह स्पष्ट हो गया है कि यह खबर पूरी तरह फेक है. सबसे पहले इसे पोस्टकार्ड ने धर की किताब के हवाले से अपनी वेबसाइट पर लगाया. इसके बाद हिंदी में सैफरन स्वस्तिक (http://bit.ly/2A6fqKT) अच्छी खबर (http://bit.ly/2zyNNgx), विराट हिन्दू राष्ट्र ने भी हुबहू इस खबर को अपने पोर्टलों पर पब्लिश किया. आजकल यह खबर यूट्यूब पर डार्क मिस्ट्री, टेक्नो स्पायर, सीक्रेट इंडियंस जैसे यूट्यूब चैनल पर खूब चल रही है. लाखों की संख्या में लोग इसे बिना जाने-परखे पढ़, सुन और देख रहे हैं.

यूट्यूब पर यह विडियो तमाम चैनलों पर मौजूद है.

सवाल उठना लाजिमी है की यह सब क्यों किया गया. इस तरह की फेक खबर क्यों चलाई गयी. दरअसल भारतीय जनता पार्टी 2009 की हार की निराशा से बौखलाई हुई थी. उसे अभी भी यह हजम नही होता है कि एक विदेश से आयी बहू को देश ने कैसे स्वीकार कर लिया. इसलिए सोनिया गांधी का चरित्र हनन सबसे आसान जरिया लगता हैं. चूंकि यह किताब भी ख़ुफ़िया एजेंसियों के बारे में थी और सोनिया गांधी का इसमें जिक्र भी था.



सोनिया पर बिना किसी पुख्ता सबूत के ऐसे आरोप पहले भी चर्चा में लाये जाते रहे हैं लेकिन 30 साल तक ख़ुफ़िया विभाग में गांधी परिवार के नजदीक रह कर काम करने वाले व्यक्ति की किताब सबसे जबर्दस्त सबूत हो सकती थी. इसलिए इस फर्जी खबर को गढने के लिए धर की किताब को निशाना बनाया गया. चूंकि मलय धर की खराब सेहत की वजह से 73 साल की उम्र में 19 मई 2012 को मौत हो गयी थी. जाहिर है, यदि मलय जीवित रहते, तो उनकी नजर से यह खबर जरूर गुजरती. उनके मरने के बाद यह खतरा नहीं था. उनकी मृत्यु के ठीक एक महीने बाद सुनियोजित तरीके से उनकी किताब को आधार बनाकर 22 जुलाई को यह झूठी खबर प्रकाशित की गयी और फिर तयशुदा तरीके से फैलाई गयी.

महेश विक्रम हेगड़े ने अपने ट्विटर अकाउंट पर 21 जुलाई को इसे साझा किया. महेश हेगड़े पोस्टकार्ड न्यूज के फाउंडर हैं (न्यूजलॉन्ड्री और ऑल्ट न्यूज दोनों ही इस बात की जानकारी दे चुके हैं). बीजेपी के केन्द्रीय मंत्री भी इस वेबसाइट की खबरों को अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा कर चुके हैं.

ट्विटर पर सोनिया गांधी को रशियन जासूस बताती इस खबर को 500 से ज्यादा लोगों ने रिट्वीट किया है. रिट्वीट करने वालों में से अधिकतर भाजपा से जुड़े दक्षिणपंथी मिजाज के लोग हैं. सबसे ख़ास बात यह है कि प्रधानमन्त्री खुद महेश विक्रम हेगड़े को फ़ॉलो करते हैं. तो क्या प्रधानमन्त्री एक ऐसे आदमी को फोलो करते हैं जो फेक खबरों को फ़ैलाने वाले पोर्टल का संस्थापक हो और फेक खबरें फैला रहा हो.

फेसबुक पर यह स्टोरी 21 जुलाई को ही पोस्टकार्ड और इंडिया अगेंस्ट पेड मीडिया पेज पर डाली गयी है है जिसे हजारों लोगों ने पसंद किया है और 500 से ज्यादा लोगों ने शेयर किया है. ट्विटर पर भी इस खबर को 500 से ज्यादा लोगों ने रिट्वीट किया है. व्हाट्सएप पर यह वीडियो फैलाया जा रहा है. यूट्यूब पर लाखों लोग इसे देख चुके हैं.



यह दर्शक/पाठक के लिए उनकी अब तक की भूमिकाओं से कहीं ज्यादा पड़ताल का समय है. कोई भी खबर, चाहें वह मेनस्ट्रीम मीडिया की ही हो, फेक हो सकती है. तथ्यों के सही होने के बावजूद कोई खबर लिखने के तरीके से फेक हो सकती है. हमे नागरिक के तौर पर सही सूचना की जरूरत है. फेक न्यूज के खिलाफ खड़े रहने की जरूरत है.



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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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