सुशांत कुमार शर्मा जेएनयू से हिंदी साहित्य में स्नातक करने के बाद, दिल्ली विश्वविद्यालय से एमफिल पूरी करके वर्तमान में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे हैं। उत्तर भारत के तीन प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालयों में अध्ययन कर चुके रसिकमन सुशांत कुमार शर्मा की साहित्य, समाज और संस्कृति में गहरी रुचि है।

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उपन्यासकार संजीव अपने उपन्यास ‘सूत्रधार’ में एक जगह भिखारी ठाकुर और उनकी पत्नी की बातचीत का दृश्य बुना है. इस जगह भिखारी ठाकुर की पत्नी उनसे आशंका जाहिर करती हुई कहती हैं, ‘लोग कहते हैं, औरत का पाट करते-करते मर्द भी औरत हो जाता है!’ इसपर भिखारी जबाब देते हैं,

‘तुम्हें मुझसे कोई शिकायत है! मैं तो औरत नहीं हुआ पर जब भी औरत का पाट करता हूँ मेरी जंघा कस जाती है, ‘चूतर’ भारी हो जाता है और देह भारी हो उठती है.’

यह संवाद हू-ब-हू नहीं है लेकिन इससे निकलने वाली असीम व्यंजनायें बड़ी ही सच्ची जान पड़ती हैं. आज भिखारी ठाकुर किसी परिचय के मोहताज़ नहीं. उनपर हो रहे शोध एवं उनके लिखे गीतों, नाटकों ने एक मानक रचा है जिससे सभी परिचित हैं. परन्तु एक सवाल यह उठता है कि भिखारी प्रासंगिक क्यों हैं? इस लेख में भिखारी के व्यक्तित्व के एक ऐसे आयाम को देखने की कोशिश रहेगी जो सबसे ज्यादा प्रत्यक्ष होकर भी कभी कहीं सुना नहीं जाता. इसे कहने-सुनने में भिखारी का कुछ नहीं जाता लेकिन भिखारी को लेकर अपनी मठाधीशी करने वालों को हेठी महसूस होती है.

भिखारी ठाकुर के नचनिया पक्ष को दबाये जाने की योजनाबद्ध कोशिश रही है

मेरे लिए भिखारी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा आयाम है उनका “नचनिया’’ होना. बिहार और उत्तरप्रदेश में नचनिया शब्द क्या अर्थ देता है, इसकी सामाजिक हैसियत क्या होती है, यह छुपी हुई बात नहीं है. मेरी अल्प जानकारी में भिखारी पर होने वाले शोधों में उनके अन्य व्यक्तित्वों को उभारने के साथ-साथ नचनिया होने वाले पक्ष को उसी अनुपात में दबाया जाता रहा है.

भिखारी ठाकुर के नाटक बिदेसिया पर बनी फिल्म का पोस्टर और भिखारी ठाकुर

इस मानसिकता के पीछे वही बिहार, उत्तरप्रदेश की नचनिया शब्द से उत्पन्न होने वाला घृणास्पद भाव है. शोधकर्ताओं को लगता है कि भिखारी को महान बनाने के लिए उनके “नचनियापन’’ को खुरच-खुरच कर उनमें से निकाल देना होगा. इसके ठीक विपरीत कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने यह कहकर भिखारी की तारीफ़ की कि वे एक नचनिया होने के बाद भी इतने बड़े युगपुरुष हुए. ये दोनों दृष्टियाँ गलत हैं. भिखारी का नचनिया होना उतना ही स्वभाविक है जितना एक नचनिये का महान कवि युगपुरुष होना.

हाल ही में एक शोध रिपोर्ट पढ़ने को मिली थी जिसमें इस बात का खुलासा किया गया था कि भिखारी स्वयं नाचते नहीं थे. इस तथ्य की पुष्टि इस मानसिकता के तर्कों से की गई थी गोया भिखारी को नचनिया कहने वालों ने षड्यंत्र के तहत ऐसा किया हो. पढ़कर एक अजीब सी बेचैनी पैदा हुई थी.

हम उस विकसित सोच के दौर में पहुंच गये हैं जब ट्रांसजेंडर, समलैंगिकता, असमानता, स्त्री संबंधित विभिन्न मुद्दों आदि से सम्बंधित बहस चला रहे हैं उसी समाज में एक व्यक्ति के सहज व्यक्तित्व से उसके अहम् हिस्से को काटने की कोशिश क्यों कर रहे हैं?

क्या फर्क पड़ता है कि भिखारी नाचते भी रहे हों? क्या ही फर्क पड़ता है अगर वे जनाना किरदार भी निभाते हों नाच में? अगर फर्क पड़ता है तो भिखारी के नचनिया होने से पड़ता है, नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता. जो काम एक नचनिया होकर भिखारी कर सकते थे वह बिना नाचान्य हुए वे नहीं कर सकते थे.

मेरी प्रबल धारणा है कि भिखारी अगर नचनिया न होते तो कुछ भी न होते. अगर किसी को यह मानने में आपत्ति है तो उसे भिखारी से प्रेम तभी तक है जबतक वे नचनिया नहीं हैं. उसे नचनियों से प्रेम नहीं है क्योंकि वे सब के सब भिखारी ठाकुर नहीं. उन्हें समाज में वह मान्यता हासिल नहीं जिससे किसी व्यक्ति का नचनिया होना उसके व्यक्ति की गरिमा से नष्ट होना नहीं माना जाता हो.

भिखारी कवि तो बाद में बने, संवेदना के स्तर पर वह ‘नचनिया’ पहले थे

भिखारी ठाकुर को नचनिया कहने की बेअदबी पर बहुत संभव है कि भोजपुरिया अस्मितावादी स्वघोषित उन्नायकों को दुःख हो, नागवार गुज़रे पर मेरी यह धारणा है. अतः मुझे स्पष्ट कर देना चाहिए कि मेरे लिए भिखारी का ‘नचनिया’ होना कैसा है? उसके बाद नचनिया तत्व की प्रधानता को भिखारी के काव्य संसार में दिखा सकने में सहायता होगी.

मेरे लिए नचनिया वह प्राणी है जिसे जन्मजात स्त्री और पुरुष, अमीर और गरीब, अच्छे और बुरे सबकी आत्मा के सत्य का साक्षात्कार होता है. जिन भावनाओं के भंवर में हम जीवन भर नाचते हैं उन्हें वह अपने कुछ देर के नाच में दिखाता है. हमारे लिए जो जीवन है उसके लिए वह कला है! हमारे लिए जो पहचान है उसके लिए वह हर रोज बदलने वाला किरदार. नचनिया वह है जिसमें समाज का हर आदमी अपना चेहरा देख सकता है.

नचनिया समाज का आइना है क्योंकि वह जो दिखाता है सच दिखाता है. उसके लिए अपना अस्तित्व एक कच्चा पदार्थ है जिससे तरह-तरह के किरदार रचकर वह रोज हमें दिखाता है और रोज स्वयं उन्हें मिटा देता है. उसकी काया कच्ची है पर बातें सच्ची हैं. इसीलिए भिखारी भी कहते हैं, “नाच कांच हs, बात सांच हs’’

पर अभी यह सवाल बचता है कि नचनिया भिखारी ने ऐसी कौन सी विशेष बात कह दी जो एक गैर नचनिया भिखारी नहीं कह सकते हैं? मुझे लगता है कि भिखारी अपने सामान्य रूप में एक समय और समाज से आगे बढ़े हुए बड़े रचनाकार हैं पर उनकी रचनाओं में जो विशेषता है वह एक नचनिया भिखारी ही कर सकते थे.

वह सीखकर अभिनेता नहीं बने थे बल्कि जन्मना अभिनय का दायित्वबोध लेकर आये थे. और यही कलाबोध उन्हें ऐसे बीहड़ सन्दर्भों में भी कला के दर्शन करवा देता है जहाँ जाने में आज भी प्रगतिशीलों और आधुनिकों के हाथ पाँव फूलते हैं. उदहारण के लिए “गबरघिचोर’’ को देखें. जिसकी विषय-वस्तु आज भी बेहद संवेदनशील है तो भिखारी के युग में इसकी कल्पना ही की जा सकती है. लेकिन उतने सघन और बीहड़ सन्दर्भों में भिखारी कला के साथ प्रवेश करते हैं.

साधारण बातचीत और साधारण हंसोढ़ प्रतीकों से वे कितनी बड़ी बात कह जाते हैं. प्यारी सुंदरी विदेश गए पति के वर्णन में क्या नहीं कह जाती. चाहे वह कोई बातचीत हो भिखारी उसे एक विशेष भंगिमा से भर देते हैं. रासलीला के पद में जो गोपी और कृष्ण का संवाद है वहां देखने से उनकी नाटकीय क्षमता का पता सहज ही लगता है.

अब प्रश्न उठता है की इसमें नचनिया होना कहाँ से उत्तरदायी है? बिलकुल है. यह इसलिए कि एक अनपढ़ व्यक्ति जो बहुत बाद में लिखना-पढ़ना सीखता है उसके पास ऐसी सुलझी हुई दृष्टि आती कहाँ से है? और एक कवि के रूप में यह समझ लेना बड़ी बात नहीं, बड़ी बात है उसकी इतनी सफल नाटकीय प्रस्तुति. यह सबकुछ इतना सारा बिना किसी जन्मजात प्रतिभा के संभव नहीं. भिखारी का नचनिया होना उनकी प्रतिभा का एक अहम् हिस्सा है.

मिरदंग कहै धिक् है धिक् है, करताल कहै किनको किनको
तब हाथ नचाय कहै गनिका, इनको इनको इनको इनको

ख्याल की ऐसी बंदिश जिसमें सारा मंजर आँखों के सामने नाच उठे इसके लिए जरुरी है ह्रदय में एक थिरक भरी हो. देह और किरदार से वह जो भी हो ह्रदय से नचनिया होगा तभी ऐसी अभिव्यक्ति कर सकेगा.

भिखारी ठाकुर के स्त्री-पात्र उस दौर के अधिकतर साहित्यिकों की तरह सजावटी-दिखावटी-बनावटी नहीं थे

दूसरी और सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात जो भिखारी के व्यक्तित्व में है वह है स्त्री सन्दर्भों में उनकी गहरी रूचि और पूरी संवेदना के साथ उनकी अभिव्यक्ति. भिखारी से पहले हिंदी का रीतिकाल, जहाँ नायिका ही नायिका हैं पर स्त्री गायब है. भिखारी का समकालीन हिंदी समाज जो स्त्री के उन्नयन में लगा तो है पर स्त्री के उपर मान मर्यादा के पहरे अभी भी कसे हुए है.

भिखारी ठाकुर, साभार- योरस्टोरी हिंदी

जिस प्रकार रीतिकाल के कवियों ने नायिकाओं के श्रृंगार से लेकर रूचि-अरुचि तक सबका निर्धारण अपने पुरुषवादी मानदंडों के आधार पर कर दिया था ठीक वैसा ही काम सन्दर्भ बदल कर द्विवेदी युग में हो रहा था. यह काल स्त्री के कर्तव्यों के निर्धारण का काल था जिसे पुरुष भलीभांति कर रहे थे. यदि आज की शब्दावली में कहें तो यह काल स्त्री के लिए सहानुभूति का था.

आज का काल स्त्री सन्दर्भों में स्वानुभूति का काल है. भिखारी इस सहानुभूति और स्वानुभूति के मध्य में “समानानुभूति’’ के कवि एवं रचनाकार हैं. अगर स्त्री सम्बंधित साहित्य के विकास क्रम को देखा जाय तो भिखारी एक ऐतिहासिक आवश्यकता थे.

स्त्री जीवन की पीड़ा को अभिव्यक्त करने के लिए तथा उन बातों को कहने के लिए जिन्हें आम तौर पर एक स्त्री द्वारा कहना समाज के प्रति अपराध माना जाता था एक ऐसे कवि की आवश्यकता थी जो स्त्री और पुरुष दोनों की मनः स्थिति को बहुत करीब से महसूस कर जानता हो.

भिखारी के पास स्त्री जीवन की पीड़ा और उल्लास दोनों के सटीक चित्र मिल जाते हैं. “चलनी के चालल दुलहा’’ जैसे गीतों में उनके द्वारा स्त्रियों के मनोविज्ञान को बहुत करीब से व्यक्त किया गया है. आज भी विवाह आदि के अवसरों पर उनके लिखित गीतों का गाया जाना उनकी सामाजिक जुड़ाव को दिखाता है.

दूसरी ओर जब हम स्त्री सम्बंधित मार्मिक गीतों को देखते हैं तो उनमें भी एक खास बात यह दिखाई देती है कि वह सबकुछ भोग हुआ यथार्थ लगता है. यह भोगा हुआ यथार्थ क्या उन्हीं क्षणों में पाया गया है जब भिखारी स्त्री भूमिका में मंच पर रहे होंगे?

भिखारी की कविता एक प्रैक्टिकल कविता है क्योंकि उनका जीवन किरदारों की प्रयोगशाला है. कभी स्त्री कभी पुरुष, हर चरित्र को अपनी आत्मा की भट्ठी में तपा गलाकर भिखारी ने जो महसूस किया उसे ही व्यक्त किया. “बेटी विलाप’’ में जब वे लिखते हैं :

बर खोजे चलि गइलऽ, माल लेके घर में धइलऽ;
दादा लेखा खोजलऽ दुलहवा हो बाबूजी।
अइसन देखवलऽ दुख, सपना भइल सुख;
सोनवाँ में डललऽ सोहागावा हो बाबूजी।

यह उद्गार सुना-सुनाया और पढ़ा-पढ़ाया नहीं है बल्कि भोग कर व्यक्त किया गया है. सोलह आने खांटी संवेदनाएं बुद्धि में नहीं समा सकती हैं. इन्हें तभी व्यक्त किया जा सकता है जब इनको ह्रदय और काया दोनों जगह महसूस किया गया हो. भिखारी ने इसे व्यक्त किया क्योंकि उन्होंने इसे भोगा था और वे इसे भोग सके क्योंकि उन्होंने नचनिया का गुरुतर दायित्व निभाया था.

भिखारी का नचनिया होना उनकी विशालता है, उनके लिखे का सत्यापन है, उनके भावों की भट्ठी है

भिखारी की कविता हमसे पढ़े जाने और पुनर्पाठ के बाद महसूसे जाने की मांग करती है. वह समाज के उस तबके को भी समझने का अपील करती है जिसके लिए न तो कोई सामाजिक स्वीकृति है नाहीं कोई विमर्श.

भिखारी उस मनुष्य की महानता के प्रमाण हैं जिसे उसके पुरुषार्थ से चूका हुआ मान लिया जाता है. भिखारी को समझने के लिए आपकी दृष्टि में इतना स्वास्थ्य बचा होना चाहिए कि आप जिसे नचनिया कहकर त्याग देते हैं उसे भर नजर देखकर गले से लगा सकें. भिखारी मनुष्य की उस सीमा के कवि हैं जहाँ स्त्री और पुरुष का भेद मिट जाता है. भिखारी अर्धनारीश्वर की कल्पना के सदेह प्रमाण हैं. नचनिया का ही सामर्थ्य है कि वह नटराज हो जाय. वह नटराज जो सारी कलाओं की उत्पति के श्रोत हैं.

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