यह रिपोर्ट जुलाई,2017 में प्रकाशित होनी थी पर एक तथाकथित महान संपादक की अनदेखी के चलते ये ठंडे बस्ते में पड़ी रही. आप पढ़ें और विचार करें कि क्या इतनी समस्याओं के बाद भी खेती-किसानी कोई की जा सकती है? और ‘किसानों की आय दुगुनी’ करने की बात करने वाली पार्टी और उसकी सरकार को जब उनकी समस्यायें तक नहीं सुननी होतीं तो फालतू की लफ्फाजी क्यों की जाती है?  

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मध्यप्रदेश के मंदसौर में जून के महीने में फसलों की कीमतों को लेकर किसान आंदोलन हुआ. हिंसा भड़की, पुलिस ने गोलियां चलाईं और 6 किसानों की मौत हो गई. सीएम आए. विपक्ष ने भी राजनीति का प्रयास किया. आखिर में करोड़ों के मुआवजे के बाद बात आई-गई हो गई. तेजी से बदलती खबरों के बीच ये घटना गुजरी बात हो गई है लेकिन ये सवाल अनुत्तरित ही रह गया कि प्रशासन ने अगर थोड़ी और संवेदनशीलता दिखाई होती, तब भी क्या ये घटना घटती? पर अब मध्यप्रदेश के सोए शासन के चेत जाने का वक्त है क्योंकि ऐसी ही किसी घटना की नींव मध्यप्रदेश के नक्शे में मंदसौर से ठीक उल्टे (उत्तर-पूर्वी मध्यप्रदेश के) जिलों सीधी, सतना, रीवा और शहडोल में रखी जा चुकी है.

रीवा जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर टोंस नदी के किनारे बसा है गांव चिल्ला. गांव में घुसते ही दिखते हैं बीसियों मिट्टी के घर, घरों के बाहर सड़क पर पशुओं के साथ बैठे लोग, दलहन और धान की खेती के वक्त में खाली पड़े खेत और खेतों में चरते सैकड़ों की संख्या में आवारा पशु. मन में ख्याल आता है कहीं हम 19वीं शताब्दी में तो नहीं पर पास ही गुमटी में चल रही मोबाइल रिचार्ज की दुकान और गुजरती इक्का-दुक्का मोटरसाइकिलें ये भ्रम पनपते ही तोड़ देती हैं. मोटरसाइकिल सवार सड़क पर कतार बांधकर बैठे पशुओं को भगाने के लिए जोर-जोर से हॉर्न दे रहे हैं. इन पशुओं को यहां ‘ऐरा’ कहा जाता है. जिसका मतलब आवारा है. ये जानवर (जिनमें से ज्यादातर गायें या गोवंश है) ही यहां के खलनायक हैं, जिनके चलते किसानों ने लगभग खेती छोड़ दी है.
रीवा में खाली पड़े खेत और चरते ‘ऐरा’ (आवारा) मवेशी

‘ऐरा’ की समस्या का ऐतिहासिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रजनीश मिश्रा समझाते हैं, जो इसे खत्म करने के लिए काम कर रहे हैं, ‘आजादी से पहले यह इलाका रीवा रियासत में शामिल था. इसलिए यहां 1857 के बाद सीधे 1947 आया और फिर सरकारों की अनदेखी के चलते ये इलाका समय के उसी बिंदु पर खड़ा रह गया. हालांकि गर्मियों के कुछ महीनों (अप्रैल से जून) में पशुओं को चरने के लिए छोड़ने की प्रथा यहां हमेशा से थी. पर ट्रैक्टर-हार्वेस्टर से खेती शुरू हो जाने के चलते पशु खेती में किसी काम के नहीं रह गए और लोगों ने उन्हें हमेशा के लिए खुला छोड़ दिया. साथ ही चारागाहों की जमीनों पर लोगों ने कब्जा कर लिया. फिर देशी गाएं जो एक वक्त में 1 लीटर दूध भी मुश्किल से देती हैं, किसानों को उन्हें बांधकर खिलाना मंहगा पड़ने लगा. ऐसे में पशु बढ़ते गए और खेती घटती गई. इसी का फल है कि उड़द, मूंग, तिल, अरहर, ज्वार, बाजरा और सोयाबीन उगाने वाले ये खेत अब बंजर पड़े हैं.

गोरक्षक और सरकारी नीतियां बनीं दुश्मन

 तभी हेतलाल दिखते हैं. जो काफी मशक्कत से बाड़े में घुसी एक गाय को भगाने में जुटे हैं. दलित समुदाय से आने वाले हेतलाल कृषि मजदूर हैं. स्थानीय भाषा में कहते हैं, ‘किसानों के खेत को खुला खजाना कहा जाता है और यही खजाना दिनभर ऐरा जानवर लूट रहे हैं. खेती जब जानवर खा ही जाएंगे तो खेती कोई क्यों करेगा! 4 फुट की लोहे की जाली लगी है. उसे भी जानवर फांद रहे हैं. कैसे फसल बचेगी!’ फिर हेतलाल कुछ दिन पहले किए अपने प्रयास के बारे में बताने लगते हैं. जब उन्होंने कुछ बछड़ों को पकड़कर किसी व्यापारी को बेचने की ठानी थी. पर उन्हें जानवर खरीदने वाला कोई भी व्यापारी नहीं मिला. हेतलाल बताते हैं, उन्हें नहीं पता कि वह व्यापारी उस बछड़े का क्या करता! पर इलाके में पशुओं की संख्या कम होती और खेती करना आसान होता. फिर उन्हें कुछ आमदनी भी हो जाती. हेतलाल कहते हैं, इसके लिए पिछले दो-तीन साल में बढ़े गौरक्षक जिम्मेदार हैं. कौन ऐसे में जान खतरे में डालकर पशुओं का धंधा करेगा!
गांव के ही बालगोविंद मिश्रा बताते हैं, कुछ साल पहले तक कई पशु व्यापारी, जिनमें कुछ छिपे हुए पशु दलाल भी शामिल होते थे, बछड़ों और भैंस के पाड़े को खरीदकर ले जाते थे. वो इन पशुओं को खेती का काम लेने वाले किसानों को बेच देते थे. बहुत से पशुओं की तस्करी भी होती थी. पर पिछले दो-तीन सालों में ये व्यापारी कम होते-होते अब बिल्कुल खत्म हो चुके हैं. बालगोविंद मिश्रा इसकी वजह केंद्र सरकार के नए फैसले, जिसमें ‘पशु मंडियों से बूचड़खाने के लिए पशु खरीदने पर रोक लगाई गई है’ को भी बताते हैं.
गांव से कुछ ही दूर रहने वाले वकील और एक स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाता कमलेश्वर सिंह दोनों की बातों पर मुहर लगाते हैं, ‘प्रशासन से सांठ-गांठ के जरिए लंबे वक्त तक पशु तस्कर बुधवार और शुक्रवार को हजारों की संख्या में चोरी से या दलालों के जरिए लाए गए पशुओं को जिले की सीमा के पार इलाहाबाद और जबलपुर में कटने के लिए भेजते थे. इन जिलों में बड़े बूचड़खानों में लगातार पशुओं की आवश्यकता बनी रहती थी. पर जबसे गौरक्षकों का उभार हुआ है तबसे ये व्यापारी पूरे तरह से गायब हो गए हैं क्योंकि गाय को लेकर गुंडागर्दी इस हद तक है कि ये चाहे व्यापारी भैंस या बकरी ही खरीदकर ले जा रहे हों उन्हें गौरक्षक पीटने लगते हैं. ऐसे में तेजी से पशु व्यापारी घटे हैं और पशु बढ़े हैं.’

दिन-रात खेती की रखवाली करनी पड़ती है

 ‘ऐरा प्रथा’ से बुरी तरह प्रभावित गांव चिल्ला में ही 35 साल की सविता रहती हैं. पिछले साल पड़ोसी के यहां गेंहूं थ्रेसिंग के दौरान आग लग जाने से उनकी भी सारी फसल जल गई थी. सविता बताती हैं, ‘मैं बहुत डरपोक हूं फिर भी पशुओं से बचाने के लिए दिसंबर और जनवरी की ठंड में 11-12 बजे तक खुद पशुओं को हांकती रहती थी. दिन में बच्चे ये काम करते थे. ऐसे में जब गेंहूं जल गया तो बहुत दुख हुआ.’ सविता की एक लड़की और एक लड़का है. जिनकी उम्र क्रमश: 14 साल और 10 साल है. अपने छोटे-छोटे बच्चों की खेती बचाने के लिए की गई मेहनत को याद करके सविता स्थानीय भाषा में कहती हैं, ‘असों कs दाना बहुत महंग रहा, सगल साल ताके रहेन.’ (इस साल अनाज बहुत कीमती था. सारे साल रखवाली की थी.)
तमाम सुरक्षा उपायों के बाद भी खेत में घुस आई गाय भगाते किसान

ऐसे ही सवेरे 8 बजे कंधे पर टॉर्च लटकाए 45 वर्षीय भुवाले मिले. भुवाले कृषि मजदूर हैं. कंधे पर टॉर्च लटकाने की वजह उन्होंने बताई कि रात भर वो खेतों में डाले गए धान के बीज की सुरक्षा में लगे थे. अभी घर के लिए निकले हैं पर घर पहुंचे नहीं हैं. भुवाले अपने बैलों को भी याद करते हैं, जिन्हें ट्रैक्टर के दौर में कुछ साल पहले बेचना पड़ा. किसानों ने कंटीले तारों की बाड़ बोए खेतों में लगा रखी है पर फिर भी जानवर नहीं मानते. ऐसे में कई बार खुद को भी वो घायल भी कर लेते हैं. कुछ किसान तारों में करंट भी छोड़ देते हैं. हाल ही में करंट लगने के एक मामले में क्षेत्र में 5 भैसों की मौत हो गई थी.

दलित और आदिवासी हैं सबसे ज्यादा परेशान

80 साल के बुजुर्ग दीनमंद कहते हैं कि ऐरा (आवारा पशु) पहले भी हुआ करते थे पर ऐसी तबाही नहीं थी. लोग जुलाई से पहले अपने जानवर बांध लेते थे. बल्कि ऐरा पशु बांधने के लिए बाकयदा नगर और जनपद पंचायतें मुनादी करवाती थीं. इतने पशु नहीं थे तो इस पर भी जो लोग नहीं बांधते थे उनके पशुओं को बाड़े में बंद कर दिया जाता था. जिन्हें जुर्माना भरकर छुड़ाना पड़ता था. ऐसे में पशु और लोग दोनों ही नियंत्रित रहते थे. गांव-गांव से ‘सरमन’ नाम की जनजाति के लोग पड़वा और बूढ़ी भैंसें खरीदकर ले जाते थे. वो इनका व्यापार करते थ हालांकि गायें घर मे ही मरती थीं.
अनुसूचित जनजाति के कमल कोल 30 साल के कृषि मजदूर हैं. हाल में उन्होंने थोड़ा धान बोया हुआ है. ऐरा के चलते खेती में होने वाली कठिनाइयों के साथ वो याद करते हैं कि 2 साल पहले जब उन्होंने मूंग बोई थी तो भी बहुत प्रयास के बाद भी पशु उसे चरते ही रहे और अंत में वो बस डेढ़ क्विंटल के करीब मूंग ही बचा सके थे.
कंधे पर टॉर्च लटकाए ‘भुवाले’
80 साल के बृजलाल भूमिहीन कृषि मजदूर थे. और आज यही काम उनके बेटे करते हैं. पशु आधारित अर्थव्यवस्था उनके घर की रही है. ऐसे में इस बात वो 8 बकरे बेचना चाहते थे. पर इस बार कोई व्यापारी  उन्हें नहीं मिला. एक मुसलमान व्यापारी जब उनसे खरीदने आया तो उसने कहा कि पहले से आधे दामों पर ही बकरे खरीदे जा सकते हैं क्योंकि सरकार ने कत्लखानों पर रोक लगा दी है. इसके बाद बृजलाल ने उसे अपने बकरे इतने नुकसान पर नहीं बेचे और अब वो उनको चराने की बात कहते हैं हालांकि ब्रजलाल बखूबी जानते हैं कि अभी नहीं बिके तो वो बकरे किसी काम के नहीं रह जाएंगे क्योंकि मांस कड़ा हो जाने के बाद उन्हें कोई नहीं खरीदेगा.
सामान्य जातियों के लोगों के बच्चे जिले के बाहर जाकर रोजगार कर पाने में सक्षम हैं. पर दलित और अनुसूचित जातियों के लोग यूं ही कृषि पर निर्भर रहने और ऐरा के चलते भूखों मरने पर विवश हैं.

कांजीहाउस जैसी व्यवस्था राजनीति का जरिया बनकर रह गई

पास के ही डाढ़ा गांव के पूर्व सरपंच कुंदन तिवारी बताते हैं कि लोगों के सहयोग से उन्होंने 2004-05 में सरपंच रहते हुए बाड़ा की व्यवस्था की थी. इसमें स्थानीय जनपद पंचायत की सहायता देती थी. आवारा जानवर पकड़कर बंद कर दिये जाते थे. पकड़े गए जानवरों को छुड़ाने के लिए जुर्माना अदा करना पड़ता था. जुर्माना ना अदा कर पाने पर पशुओं को नीलाम कर दिया जाता था. पर चूंकि पशु किसानों के लिए अनुपयोगी हो चुके थे. इसलिए किसान भैसों को छोड़कर किसी पशु को नहीं छुड़ाते थे. जिसके चलते ये व्यवस्था असफल हो गई. करीब 50 फीसदी से ज्यादा सामान्य जातियों की आबादी वाले इस क्षेत्र में सरपंच यश की प्रतिद्वंदिता को इसका कारण बताते हैं. बताते हैं आज क्षेत्र में कोई भी बाड़ा/कांजीहाउस संचालित नहीं है और सारे पशु खुले घूम रहे हैं.
मंगल भवन (चिल्ला)- कभी गांव का बाड़ा हुआ करता था, आज यहां शादियां होती हैं

कुछ ऐसी ही बात पूर्व नगर पंचायत प्रमुख अनिल तिवारी भी कहते हैं. जिनके दफ्तर में आरएसएस संस्थापक केशव हेडगेवार की तस्वीर लगी है और उनका पहला वाक्य है, ‘भारत एक हिंदू देश है’. अनिल बताते हैं उनके कार्यकाल में नीलामी की रकम से पशुओं के चारे और भूसे का इंतजाम किया जाता था. ऐरा की राजनीति अलग से लोगों ने राजनीतिक फायदे के लिए की. आस-पास के ही गांवों में बाड़ा के लिए 4-5 जगह पक्के मकान बने थे. पर उसकी सारी व्यवस्था राजनीति की भेंट चढ़ी और पशुओं का सारा चारा इंसान खा गए!

एक स्वर में सभी जनसेवक और अधिकारी गौशाला को बताते हैं निदान

चाहे वो पूर्व नगर पंचायत प्रमुख अनिल तिवारी हों, डाढा नाम के गांव में गोशाला चलाने वाले रोहित तिवारी, रानीतालाब बाड़े में कुछ दिनों पहले करीब चार दर्जन गायों की मौत का खुलासा करने वाले समाज सेवक राजबहादुर सिंह पटेल या फिर मुख्य जनपद पंचायत अधिकारी शैलेंद्र सिंह, इस इलाके के पशुओं से निजात पाने का सभी को एक ही तरीका समझ आता है गोशाला.
भारत को हिंदू देश बताने वाले अनिल तिवारी कहते हैं, ‘भारत में पशु नहीं मारे जाते.’ रोहित तिवारी कहते हैं, ‘गाय एकमात्र पशु है जो सांस लेते हुए, 24 घंटे ऑक्सीजन लेती है और ऑक्सीजन ही छोड़ती है.’ राजबहादुर सिंह पटेल कहते हैं, ‘पशुओं का सम्मान होना चाहिए.’ (जिस बात पर पास ही बैठा गांव का एक नौजवान चुटकी लेता है, ‘इंसानों को भूखा मारकर’). शैलेंद्र सिंह कहते हैं, ‘हमें गोशालाओं के आर्थिक पक्ष की ओर देखना होगा. और दूध, गौमूत्र तथा गोबर से बने उत्पादों के लिए मार्केट तैयार कर उस ओर बढ़ना होगा.’ हालांकि उत्साह को जल्द ही दबाकर वो स्वीकार कर लेते हैं कि गौमूत्र और गोबर के ज्यादातर उत्पाद अभी प्रयोगशाला के स्तर पर ही हैं. और बड़े स्तर पर उनका उत्पादन नहीं हुआ है. हालांकि सुझाव के तौर पर वह कहते हैं कि सरकार को गायों की अनुत्पादक नस्ल को उत्पादक नस्ल के साथ क्रॉस कराना चाहिए. पर इतने अधिक पशुओं के साथ ये भी आसान काम नहीं.
गांव के लोगों ने आरोप लगाया कि रोहित तिवारी ने गौशाला में कई पशु दिखा रखे हैं पर वहां 4-6 ही रहते हैं. अनिल तिवारी ने भी अपने कार्यकाल में चिल्ला गांव के बाड़े को तुड़वाकर वहां पर मंगल भवन बनवा दिया है. जहां अब शादियां होती हैं. वो खुद ही बड़ी खुशी से बताते हैं कि कैसे एक बहुत बड़े नक्शे को बनवाकर उन्होंने अच्छा बजट पास करवाया और बाद में ज्यादा जमीन ना होने के चलते छोटा सा ही भवन मांगलिक कार्यक्रमों के लिए बनवा दिया.

हमारी कोई सरकार नहीं है!

लोकतंत्र में तमाम स्तर पर प्रशासन लोगों की जिम्मेदारी की बात कहता है. पर मध्यप्रदेश के इस हि्स्से के बारे में सरकार की अनदेखी इस हद तक है कि बस कई बार किसानों को यह प्रथा खत्म करने की शपथ दिलाई गई है. ना ही कोई सरकारी प्रयास हुआ है. ना इसके लिए अलग से किसी बजट का प्रावधान है.
फिर भी मध्य प्रदेश के इस भाग में स्थानीय सरकारें इन आवारा पशुओं पर रोक लगाने का काम कैसे कर रही है जानने पहुंचे, नगर पंचायत त्योंथर. नगर पंचायत त्योंथर में घुसते ही दोनों ओर पड़ी बेंचों पर लोग पसरे दिखे. तीन लोगों की बेंच पर 5-5 लोग बैठे थे. 2-1 खड़े भी थे. सभी एक आदमी को घेरे थे. लोगों से पूछने पर कि नगर पंचायत प्रमुख अमरबहादुर सिंह कौन हैं? लोगों ने गुटखा चबाते, बंडी और तौलिया लपेटे, उनके बीच कु्र्सी पर बैठे आदमी की तरफ इशारा किया, जो निरपेक्ष भाव से ताकते रहने के थोड़ी देर बाद बोले, ‘मेरा तो ट्रांसफर हो गया है.’
आगे पूछताछ करने पर उन्होंने बताया कि सरकार की तरफ से ऐरा के लिए कोई अलग मद नहीं आता. नगरपालिका खुद व्यवस्था करती रही है. पिछले 4 सालों में नगर पालिका हाउस की पुरानी बिल्डिंग में ही पकड़े गए पशु बंद करके रखे जाते थे. पर अब वो व्यवस्था भी बंद हो चुकी है. इन सारी बातचीत के बाद आस-पास बैठे लोगों ने बताया कि पिछले साल लोग इतने गुस्से में थे कि अपने पशुओं को खदेड़कर नगर पंचायत ऑफिस में घुसा गए थे. पर इससे भी सरकारी रवैये में कोई बदलाव नहीं आया.
नगर पंचायत की पुरानी बिल्डिंग जिसे बाड़ा(कांजी हाउस) के तौर पर प्रयोग किया जाता था
वहीं मुख्य जनपद अधिकारी, शैलेंद्र प्रसाद सिंह बाद में सारे ही प्रयासों की वैधता खारिज करते हुए कहते हैं, ‘सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता और अब एक पंचायत के बस की बात नहीं है. फिर फर्जी गौरक्षक और गौभागवतों की व्यवस्था आग में घी ड़ालने वाला काम करती है. हमने इसे जल्दी नियंत्रित करने को कोई कदम नहीं उठाया तो इस क्षेत्र में खेती ही नहीं खत्म होगी, लोगों के खाने के लाले पड़ जाएंगे, एक्सीडेंट जो पहले ही पशुओं के चलते बहुत हैं और बढ़ जाएंगे तब लोग गौभागवत करते ही रह जाएंगे.’
लोगों का गुस्सा केवल पशुओं को नगर पंचायत के ऑफिस में घुसा देने तक ही सीमित नहीं है. श्रीकांत मिश्रा जो गांव के पुरोहित और वैदिक कर्मकांडी हैं. वो भी ये स्वीकारने से नहीं चूकते कि ये समस्या पिछले दो-तीन सालों में भयावह रूप ले चुकी है. और वो सबसे बड़ा कारण सरकारी नीतियों, समस्या की लगातार अनदेखी और गोरक्षकों को मानते हैं. कहते हैं कि इससे पहले बहुत से पशुओं के व्यापारी पशुओं को खरीदकर ले जाते थे और कभी भी ये संख्या इतनी नहीं बढ़ने पाती थी कि किसान खेती करना ही बंद कर दें. श्रीकांत मिश्र कहते हैं, ‘गोशाला के नाम पर सभी राजनीति कर रहे हैं. ये गुस्सा किसी भी दिन सरकार के खिलाफ फूट सकता है.
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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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