काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हुए अपने अभिनन्दन समारोह में भूतपूर्व कुलपति जी सी त्रिपाठी ने कहा कि ‘हाँ, मैंने मजबूरी में अयोग्यों की भी नियुक्ति की।’ यह एक वाक्य भारतीय शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा के कारणों को सामने ला देता है। यह मजबूरियाँ वैचारिक भी है और राजनीतिक भी। अगर भारत के विश्वविद्यालय विश्व के सर्वोत्तम विश्वविद्यालयों की सूची में स्थान नहीं बना पा रहे हैं या शोध के क्षेत्र में अगर हम लगातार पीछे जा रहे हैं तो इसके पीछे भी यही ‘आदर्श वाक्य’ है। लेकिन यह वक्त इसे नैतिक स्वीकरोक्ति मान कर चुप रह जाने का नहीं है बल्कि यह सवाल करने का समय है कि ऐसी कौन सी मजबूरियां हैं जिसके कारण हमारी शिक्षण संस्थाएँ अयोग्यों से भरी जा रही हैं ? क्या हमने स्वीकार कर लिया है कि हमारा भविष्य इन्हीं अयोग्यों द्वारा गढ़ा जायेगा ? क्या बीएचयू की बुनियाद रखने के पीछे महामना की यही सोच थी ?

पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालयों में बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप ने शिक्षा के भविष्य को लेकर अनेकानेक शंकाएं खड़ी कर दी हैं। स्वतंत्र वैचारिक विमर्श की संस्थाओं को दो ध्रुवीय समुदायों बांटने के अभियान चलाये जा रहे हैं। छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। स्कॉलरशिप और अनुदानों की कटौती की जा रही है। और ऐसे लोगों की नियुक्ति की जा रही है जिनके पास नियोक्ताओं को मजबूर बना देने की ताकत है। क्या अब बाहुबली हमारे अध्यापक-प्रोफेसर हैं ? राजनीति में भर्तियां क्या ख़त्म हो गयी हैं कि गुंडों की फ़ौज शिक्षा क्षेत्र में आ रही है?

यह विडम्बना है कि एक तरफ इवांका ट्रंप जिनके स्वागत सत्कार में हमारे प्रधानमंत्री व्यस्त थे, कहती हैं कि भारत के विकास के लिए शिक्षा क्षेत्र पर ध्यान देने की जरुरत है और वहीं हमारे विश्वविद्यालय का एक कुलपति कह रहा है कि उसने बच्चों का भविष्य अयोग्य हाथों में सौंप दिया।

सरकार को फ़ौरन जी सी त्रिपाठी के बयान का संज्ञान लेना चाहिए और अपनी इच्छाशक्ति को जाहिर करना चाहिए कि क्या वह ऐसी नियुक्तियों को रद्द करने के बारे में विचार करेगी या सरकार ने भी इसे अपनी कुंडली में लिखा अनिवार्य सत्य मानकर स्वीकार कर लिया है।
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यह संपादकीय हमारे सहयोगी पीयूष रंजन परमार ने लिखा है.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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  1. बहुत ही बढ़िया पहल है मित्रों…काठफोड़वा की पूरी टीम बहुत सारी बधाईयां और शुभकामनाएं छ-)

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