गुजरात ग से शुरू होता है, उत्तर प्रदेश में उ से. दोनों जगह के चुनाव में भी यही अंतर हुआ करता था. फिर दोनों को मिला दिया गया. गउ या गू, अपनी अपनी श्रद्धानुसार. दोनों ही जगहों पर जाति समीकरण टूटे. दोनों ही जगहों पर चुनावी नैतिकता के मायने टूटे. दीवाली-रमजान, हज-राम, यूपी का बेटा-गुजरात का बेटा, रोना-धोना सब हुआ.

सवाल ये है कि गुजरात की राजनीति क्या वाकई में यूपी की राजनीति से अलग थी? थी, पर भाजपा के लिए नहीं. सोमनाथ से निकली दंगा-यात्रा अयोध्या में ही तो खत्म हुई थी.

यूपी के चुनाव ने नरेंद्र मोदी के मैजिक को स्थापित किया था और गुजरात के चुनाव ने उसी पर फिर मुहर लगाई. दोनों ही राज्यों में हारना भाजपा के लिए बेइज्जती थी. दोनों में से कहीं पर भी हारना उनके 2019 के प्लान पर ग्रहण लगा सकता था.

पर कांग्रेस को क्या हासिल हुआ?

यूपी में दो लड़के थे, गुजरात में चार लड़के. यूपी में तो लड़कों से गलती हो ही गई थी. पहले सपा का विखंडन हुआ और फिर सपा के पास कुछ ऐसा था नहीं जिसपर वो वोटर्स को भरोसा दिलाते. कांग्रेस को हारना ही था. गुजरात में स्थिति अलग थी. यहां कांग्रेस जीतने वाली थी. 22 साल की इनकम्बेंसी थी. डिमॉनीटाइजेशन और जीएसटी जैसे मुद्दे थे.

सबसे बड़ा मुद्दा था अमित शाह के बेटे पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप. ये समझ नहीं आया कि कांग्रेस ये मुद्दा कैसे भूल गई. अमित शाह पूरे गुजरात कैंपेन में कहीं नहीं दिखे. वरना हर राज्य में वो हर जगह मौजूद रहते थे. हर जगह उनकी ही कार्यकुशलता के बारे में बात होती थी. पर गुजरात में ऐसा नहीं था. ये अंदाजा था कि सिर्फ अमित शाह के मुद्दे पर ही नरेंद्र मोदी को हर जगह घेरा जा सकता है. पर राहुल गांधी ने कहीं भी इसका जिक्र नहीं किया.

ये जरूर हुआ कि राहुल गांधी ने अपनी विनम्र छवि को बरकार रखते हुए उसमें इजाफा ही किया. प्यार की राजनीति, गाली नहीं दूंगा, चाहता हूं कि भाजपा भी रहे जैसी बातें कह के उन्होंने राजनीति में आशा ही पैदा की है. ये उनकी सबसे बड़ी जीत है. पर अमित शाह के मुद्दे को उछालना उनको सात-आठ सीटें दिला भी सकता था.

ये है कि सोहराबुद्दीन एनकाउंटर और जस्टिस लोया वाले मामले को उछालने से गुजरात में कांग्रेस को वोट कटते ही. क्योंकि लोग नाराज हो जाते. तो ये बुद्धिमानी रही.

लेकिन कांग्रेस के लिए ये जीता हुआ मैच था जो उन्होंने गंवा दिया. क्योंकि हर सीट पर जीतने के लिए आतुर नहीं थे. बहुत सारी सीटों पर भाजपा बहुत कम अंतर से जीती है. इन सीटों को कांग्रेस अपने पक्ष में कर सकती थी. ऐसा लग रहा है जैसे बूथ पर बहुत मेहनत नहीं की कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने.

यही चीज उनको भाजपा से सीखनी होगी. संघ की प्रणाली पर चलते हुए भाजपा अपने एक एक वोटर को बूथ तक ले जाती है. कांग्रेस का ये ऐतिहासिक एरोगेंस अब उनके लिए भारी पड़ रहा है.

हमारे लिए सबसे बड़ी बात है बदलती राजनीति. हमें इससे मतलब नहीं कि कौन सी विचारधारा के लोग जीत रहे हैं. हमें मतलब है कि जो भी जीते, जनता के काबू में रहे.

तो इस चुनाव में राहुल गांधी की तरफ से पॉजिटिव संकेत आये हैं कि राजनीति ऐसी भी हो सकती है. वहीं प्रधानमंत्री ने निराश किया. अब वो निम्नतम स्तर को छू रहे हैं, इतना कि अब कभी अच्छी बात बोलने की कोशिश करेंगे तो सबसे ज्यादा मीम उसी पर बनेंगे. भरोसा नहीं होगा.

कांग्रेस को उस दिन का इंतजार करना होगा. सबसे ज्यादा काम करना होगा उनको राहुल गांधी की बातों पर, उन बातों पर अमल करना होगा, ईमानदारी दिखानी होगी. ईमानदार राजनीति करनी होगी. नीचता में तो वो मुकाबला नहीं कर पायेंगे क्योंकि वो अपना पीक छू चुके हैं, दूसरे लोग अभी छूनेवाले हैं उनका दौर है. साथ ही कांग्रेस के लिये थोड़ी समझदारी भरी आक्रामकता भी जरूरी है क्योंकि प्रधानमंत्री रैली करके नियमों का उल्लंघन करते हैं और कांग्रेस की तरफ से जबरदस्त प्रतिरोध तक नहीं होता.

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