पुलिस आयेगी और मामले की जांच करेगी. यही भरोसा लोकतंत्र की रीढ़ है. ये भरोसा न होता तो चुनी हुई सरकार और लिखे हुए संविधान का कोई मतलब नहीं होता. ये भरोसा न होता तो एक बूढ़ा बाप ये नहीं कहता कि मुझे मौत का डर नहीं है, मुझे अपने बेटे के हत्यारों को पकड़वाना है.

इंडियन एक्सप्रेस को बधाई. पत्रकारिता को नया आयाम देने के लिए. अभी तक पत्रकार न्यूज चैनलों के स्टूडियो में बैठ के दिन भर गुंडों का रोल निभा रहे थे. जज का रोल तो बहुत पहले ही 9 बजे रात को निभाना शुरू कर दिया था. अब फील्ड में जाकर पत्रकारों ने पुलिस का रोल भी निभाना शुरू कर दिया है.

जस्टिस लोया की मौत के मामले में कैरेवैन की रिपोर्ट सही है कि नहीं, ये बताने का हक इंडियन एक्स्प्रेस को नहीं है. यहां ये मैटर नहीं करता कि कैरेवैन ने कितने सही तरीके से डॉक्यूमेंट्स देखे हैं. उनका काम है मामले को उठाना जो कि उन्होंने किया है.

यहां मैटर ये करता है कि जस्टिस लोया के परिवार वाले क्या कह रहे हैं. उनके पिताजी और उनकी बहन क्या कह रहे हैं. उनके बयानों के आधार पर मामले की जांच होनी चाहिए. अगर वो कहते हैं कि उनको धमकी मिली है, उनको शक है तो ये मैटर करता है. पुलिस को मामले की जांच करनी चाहिए. अदालत को संज्ञान लेना चाहिए.

हो सकता है कि वो लोग गलत हों, पर उनके संदेह को दूर करना ही तो पुलिस और न्याय प्रणाली का काम है. अगर अखबार ही एक दूसरे की बात काटकर मामले को रफा दफा कर दें तो ये तो तानाशाही की तरफ बढ़ता कदम हो जाएगा.

बड़ा आसान हो जाएगा. अगर चुनी हुई सरकारें धनपशुओं को इकट्ठा कर उनके मार्फत बड़े अखबार और बड़े चैनल खोल लें और हर मामले को वहीं पर निपटा दें, तो कैसा होगा लोकतंत्र?

गुंडा, जज, पुलिस, कॉर्पोरेट सबका रोल ले रहे पत्रकार अगर अब नेताओं से मिल जायें तो देश में अच्छे दिन आने से कोई रोक नहीं सकता.

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यह संपादकीय हमारे सहयोगी नचिकेता ने लिखा है. नचिकेता हमारे साथ हाल ही में जुड़े हैं और अब ये हमारी कोर टीम का हिस्सा हैं.

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