प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया, साहित्य और सिनेमा पर भी आप गहरी समझ रखते हैं.
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मलयालम साहित्य में मॉडर्निज़्म के सशक्त हस्ताक्षर के सच्चिदानंदन को केरल सरकार के शीर्ष साहित्यिक सम्मान Ezhuthachan Purasakaram से नवाज़ा जायेगा. वे कवि होने के साथ आलोचक और निबंधकार भी हैं. लोकतांत्रिक मूल्यों के पक्षधर सच्चिदानंदन सम-सामयिक मुद्दों पर लगातार बोलते और लिखते रहे हैं. उनके 30 काव्य-संग्रह, 25 लेख-संग्रह और देशी-विदेशी कवियों की रचनाओं के अनुवाद के 20 संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी अपनी रचनाएं अनेक भाषाओं में अनुदित हो चुकी हैं. इस पुरस्कार के लिए के सच्चिदानंदन को बधाई देते हुए प्रस्तुत हैं लेखक-पत्रकार प्रकाश के रे द्वारा अंग्रेज़ी से अनुदित उनकी दो कविताएं…

तेरह बरस की लड़की
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तेरह बरस की लड़की
तेरह बरस का लड़का नहीं होती
वह मर गयी है दुःस्वप्नों में डूब कर
भूल चूकी है अब तक अपनी तितलियाँ
वह लोरियों को पीछे छोड़
अँधेरे की कंदराओं से गुज़र चुकी है

तेरह बरस की लड़की तैंतालिस बरस की है
वह ठीक और ग़लत स्पर्श में भेद कर सकती है
वह जानती है कि बचे रहने के लिए
झूठ बोलने में बुराई नहीं है
वह जानती है युद्ध लड़ना
अपने दाँतों से या अपने गीतों से
तुम केवल गुलाब देखते हो उसके बदन पर
जबकि वह काँटों से भरा हुआ है

तेरह बरस की लड़की उड़ सकती है
वह सूरज को और किताबों को
सिर्फ़ पुरुषों के लिए नहीं छोड़ना चाहती
उसका झूला चाँद की परिक्रमा करता है
और उदासी से पागलपन तक जाता है
वह राजकुमार के सपने नहीं देखती
जैसा कि तुम शायद सोचते हो

तेरह बरस की लड़की के पाँव पाताल में हैं
और वह इंद्रधनुष को छूती है
एक दिन वह हाथ में तलवार लिये
सफ़ेद घोड़े पर सवार आयेगी

खुरों की आवाज़ को बादलों में गूँजते
सुनते हुए तुम जानोगे कि
दसवें अवतार की पुराणों की भविष्यवाणी
एक स्त्री है.

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हकलाहट
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हकलाहट कमज़ोरी नहीं है.
बात करने का एक अंदाज़ है.

हकलाहट वह चुप्पी है
जो लफ़्ज़ और मानी के बीच आती है,
जैसे कि लैगड़ापन
लफ़्ज़ और अमल के बीच की चुप्पी है.

हकलाहट ज़ुबान से पहले आयी
या फिर बाद में?
क्या यह महज़ एक बोली है
या फिर अपने आप में पूरी ज़ुबान?
इन सवालों पर हकलाने लगते हैं
ज़ुबानों के आलिम.

हर बार जब हम हकलाते हैं
मानी के ख़ुदा को
कुर्बानी चढ़ाते हैं.

जब एक पूरी क़ौम हकलाती है
हकलाना उसकी मादरी ज़ुबान बन जाती हैः
जैसा कि अभी यह हमारी मादरी ज़ुबान है.

जब उसने आदमी को बनाया होगा
हकलाया होगा ज़रूर ख़ुदा भी.
इसीलिए तो आदमी के सब लफ़्ज़ों के
मानी अलग-अलग होते हैं.

इसीलिए तो जब भी बोलता है
दुआ करने से लेकर हुक्म देने तक
वह हकलाता है,
शायरी की तरह.

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