कविता क्या है
खेती है,
कवि के बेटा-बेटी है,
बाप का सूद है, मां की रोटी है

मैं तब तक कवितायें पढ़ा करता था जब तक मेरी मुलाकात विद्रोही से नहीं हुई थी; रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’। उनसे मिलने के बाद मैंने कविताओं को सुनना शुरू कर दिया। कविताओं की देह शब्दों में होती है और आत्मा सुर में। संभवतः इसीलिए विद्रोही ने अपनी कविताओं को किताबों के पन्नों में दफ़्न करने की बजाय भीड़ के बीच कहा-सुना। JNU आये अभी कुछ ही दिन हुए थे। विमर्श, संघर्ष और साहस से भरे विश्वविद्यालय के माहौल ने स्नातक के सपनों को आकाश दे दिया था। भीड़ और रैलियों में घूम-घूम कर ‘बर्तोल्त ब्रेख्त’ की एक पंक्ति जुबान पर चढ़ गयी थी-

क्या ज़ुल्मतों के दौर में भी गीत गाये जायेंगें
हाँ ज़ुल्मतों के दौर के ही गीत गाये जायेंगे

इन पंक्तियों के शब्दों में अर्थ भरने में थोड़ा समय लगा। इन पक्तियों का अर्थ तब सामने आया जब गंगा ढाबे पर विद्रोही जी से पहली मुलाकात में ही उन्होंने यह एहसास दिला दिया था कि कविताएँ संघर्ष का उपकरण होती हैं। उन्होंने तड़ातड़ बिजली की गति और शक्ति से चार-पाँच कविताएँ सुना दीं। उनकी कविताओं में अपने शब्द, अपनी मिट्टी और अपनी समस्याएँ सुनकर अंदर तक हिल गया। मैं कृतज्ञता से भर गया। पहली बार दिल्ली शहर में अपना गाँव महसूस हुआ, दादाजी की बातें याद आयीं जिसमे आज़ादी के सपने के ध्वंस की गाथाएँ थीं।

विद्रोही जी ‘भारत के अंतिम आदमी’ थे जिन्हें न हमारा राष्ट्र-राज्य स्वीकार कर पाया और न ही प्रशासनिक संस्थाएँ। उनके आँसू सूख गए थे और सत्ता ने गांधी-नेहरू को यह विश्वास दिला दिया था कि उनके आँसू पोंछ दिए गए हैं। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन दिल्ली शहर में बिता दिया पर उनके साथ वह गाँव लगातार चलता रहा जो आज भी भारत का सत्य है और वह अपने अस्तित्व और बेहतरी के लिए संघर्ष कर रहा है। जब विद्रोही अपनी कविता पढ़ते हुए कहते हैं-

‘अगर जमीन पर भगवान जम सकता है
तो आसमान में धान भी जम सकता है
और अब तो
दोनों में एक होकर रहेगा
या तो ज़मीन से भगवान उखड़ेगा
या आसमान में धान जमेगा’

मैं इसे धर्म और कर्म से अधिक दिल्ली और भारत के बीच के द्वन्द के रूप में देखता हूँ। दिल्ली वोट माँगने और टैक्स वसूलने हरेक गाँव तक चली गयी पर गाँवों के लिए ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ अभी भी एक सिनेमाई स्वप्न बन कर रह गया। पिछले सत्तर सालों की इस दूरी ने असंतोष इतना गहरा कर दिया है की अब एक आम आदमी किसी की परवाह नहीं करता। वहां आत्मघाती वृति ने जगह बना ली है। कविताएँ कहती हैं-

‘मैं भी मरूँगा
और भारत भाग्य विधाता भी मरेगा
मरना तो जन-गण-मन अधिनायक को भी पड़ेगा’

आज के ‘महाशक्ति भारत’ में रोज़ एक न एक किसान आत्महत्या कर लेता है और यह क्रम यूँ ही चलता रहा तो जन-गण-मन अधिनायक की जीवन रेखा भी छोटी होती जाएगी। यह एक घातक स्थिति है। इसके विस्तार के लिए धर्मवीर भारती के अँधा युग की पंक्तियाँ यहाँ रख रहा हूँ –

यह आत्महत्या होगी प्रतिध्वनित
इस पूरी संस्कृति में
दर्शन में, धर्म में, कलाओं में
शासन व्यवस्था में
आत्मघात होगा बस अंतिम लक्ष्य मानव का

हाशिये पर पड़ी हुई आवाजों को सुना जाना जरुरी है। महिला, आदिवासी, अल्पसंख्यक, किसान और कामगार इन सभी की आवाजों को दिल्ली की बातों में जगह दिलानी होगी। इन्हीं आवाजों को लिए लिए एक बूढ़ा आदमी अपने जवान साहस को लिए दिल्ली के एक स्वप्न द्वीप पर जमा रहा। वह आने वाली नस्लों के खून में यह बात बोता रहा कि अपने हक़ की आवाज को बुलंद रखना क्यों कि ‘हमे इंतज़ार था जिसका ये वो सहर तो नहीं।’ विद्रोही मानवता के बुनियादी धरातल पर बातें करते हैं इसीलिए इस दुनियां में जो भी शोषित है, प्रताड़ित है, संघर्षरत है, उनसे विद्रोही का रिश्ता है-

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी
जिसे सबसे पहले जलाया गया
मैं नहीं जानता
लेकिन जो भी रही होगी
मेरी माँ रही होगी

अपनी संवेदना की व्यापकता के कारण ही विद्रोही की चेतना विश्वभर के नायकों और शोषितों के साथ जुड़ती हैं। उनकी कविताओं में अफ्रीका में संघर्ष करते साथियों के लिए साहस भी है और चे ग्वेरा के लिए अलविदा की बात भी।

धर्म और विद्रोही का बड़ा ही खुरदुरा रिश्ता रहा हैं। उन्होंने धर्म को मानव की गरिमा के ख़िलाफ़ एक षणयंत्र के रूप में देखा, समझा और कहा। मैं नास्तिक नहीं लेकिन क्या मैं उनकी बातों से असहमत हो सकता हूँ? नहीं क्यों कि वह जमीन की बात करते हैं। हम किताबें पढ़कर मंत्रों के अर्थों की खोज और उन पर बहस करते हैं और विद्रोही यह बता देते हैं कि जब आप अपने सजे हुए कमरे में यह बौद्धिक काम करने में व्यस्त होंगें, कोई ढोंगी उसी मन्त्र को पढ़कर एक गरीब की अठन्नी लूट चूका होगा। उसने अगले जनम और परलोक के लिए इस जनम को लूट लिया होगा। इसलिए जो हमारे लिए ‘धर्म’ है वह विद्रोही के लिए ‘धरम’ है। यही वह धरातल है जहाँ दिल्ली की भाषा भारत से अलग हो जाती है।

विद्रोही के जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए, उनकी कविताएँ याद आती हैं जो खुद संघर्ष करती हैं और हमें प्रेरित करती हैं कि हम मशीन ना बन जाएँ। यही वो कविताएँ हैं जो ज़ुल्मतों के दौर में हमारा परचम बनती रही हैं और बनती रहेंगी। पढ़िए उनकी कविताएँ –

 

एक औरत की जली हुई लाश

धरम

मेरे गांव में लोहा लगते ही
टनटना उठता है सदियों पुराने पीतल का घंट,
चुप हो जाते हैं जातों के गीत,
खामोश हो जाती हैं आंगन बुहारती चूड़ियां,
अभी नहीं बना होता है धान, चावल,
हाथों से फिसल जाते हैं मूसल
और बेटे से छिपाया घी,
उधार का गुड़,
मेहमानों का अरवा,
चढ़ जाता है शंकर जी के लिंग पर।
एक शंख बजता है और
औढरदानी का बूढ़ा गण
एक डिबिया सिंदूर में
बना देता है
विधवाओं से लेकर कुंवारियों तक को सुहागन।
नहीं खत्म होता लुटिया भर गंगाजल,
बेबाक हो जाते हैं फटे हुए आंचल,
और कई गांठों में कसी हुई चवन्नियां।
मैं उनकी बात नहीं करता जो
पीपलों पर घड़ियाल बजाते हैं
या बन जाते हैं नींव का पत्थर,
जिनकी हथेलियों पर टिका हुआ है
सदियों से ये लिंग,
ऐसे लिंग थापकों की माएं
खीर खाके बच्चे जनती हैं
और खड़ी कर देती है नरपुंगवों की पूरी ज़मात
मर्यादा पुरुषोत्तमों के वंशज
उजाड़ कर फेंक देते हैं शंबूकों का गांव
और जब नहीं चलता इससे भी काम
तो धर्म के मुताबिक
काट लेते हैं एकलव्यों का अंगूठा
और बना देते हैं उनके ही खिलाफ
तमाम झूठी दस्तखतें।
धर्म आखिर धर्म होता है
जो सूअरों को भगवान बना देता है,
चढ़ा देता है नागों के फन पर
गायों का थन,
धर्म की आज्ञा है कि लोग दबा रखें नाक
और महसूस करें कि भगवान गंदे में भी
गमकता है।
जिसने भी किया है संदेह
लग जाता है उसके पीछे जयंत वाला बाण,
और एक समझौते के तहत
हर अदालत बंद कर लेती है दरवाजा।
अदालतों के फैसले आदमी नहीं
पुरानी पोथियां करती हैं,
जिनमें दर्ज है पहले से ही
लंबे कुर्ते और छोटी-छोटी कमीजों
की दंड व्यवस्था।
तमाम छोटी-छोटी
थैलियों को उलटकर,
मेरे गांव में हर नवरात को
होता है महायज्ञ,
सुलग उठते हैं गोरु के गोबर से
निकाले दानों के साथ
तमाम हाथ,
नीम पर टांग दिया जाता है
लाल हिंडोल।
लेकिन भगवती को तो पसंद होती है
खाली तसलों की खनक,
बुझे हुए चूल्हे में ओढ़कर
फूटा हुआ तवा
मजे से सो रहती है,
खाली पतीलियों में डाल कर पांव
आंगन में सिसकती रहती हैं
टूटी चारपाइयां,
चौरे पे फूल आती हैं
लाल-लाल सोहारियां,
माया की माया,
दिखा देती है भरवाकर
बिना डोर के छलनी में पानी।
जिन्हें लाल सोहारियां नसीब हों
वे देवता होते हैं
और देवियां उनके घरों में पानी भरती हैं।
लग्न की रातों में
कुंआरियों के कंठ पर
चढ़ जाता है एक लाल पांव वाला
स्वर्णिम खड़ाऊं,
और एक मरा हुआ राजकुमार
बन जाता है सारे देश का दामाद
जिसको कानून के मुताबिक
दे दिया जाता है सीताओं की खरीद-फरोख़्त
का लाइसेंस।
सीताएं सफेद दाढ़ियों में बांध दी जाती हैं
और धरम की किताबों में
घासें गर्भवती हो जाती हैं।
धरम देश से बड़ा है।
उससे भी बड़ा है धरम का निर्माता
जिसके कमजोर बाजुओं की रक्षा में
तराशकर गिरा देते हैं
पुरानी पोथियों में लिखे हुए हथियार
तमाम चट्टान तोड़ती छोटी-छोटी बाहें,
क्योंकि बाम्हन का बेटा
बूढ़े चमार के बलिदान पर जीता है।
भूसुरों के गांव में सारे बाशिंदे
किराएदार होते हैं
ऊसरों की तोड़ती आत्माएं
नरक में ढकेल दी जाती हैं
टूटती जमीनें गदरा कर दक्षिणा बन जाती हैं,
क्योंकि
जिनकी माताओं ने कभी पिसुआ ही नहीं पिया
उनके नाम भूपत, महीपत, श्रीपत नहीं हो सकते,
उनके नाम
सिर्फ बीपत हो सकते हैं।
धरम के मुताबिक उनको मिल सकता है
वैतरणी का रिजर्वेशन,
बशर्ते कि संकल्प दें अपनी बूढ़ी गाय
और खोज लाएं सवा रुपया कर्ज़,
ताकि गाय को घोड़ी बनाया जा सके।
किसान की गाय
पुरोहित की घोड़ी होती है।
और सबेरे ही सबेरे
जब ग्वालिनों के माल पर
बोलियां लगती हैं,
तमाम काले-काले पत्थर
दूध की बाल्टियों में छपकोरियां मारते हैं,
और तब तक रात को ही भींगी
जांघिए की उमस से
आंखें को तरोताजा करते हुए चरवाहे
खोल देते हैं ढोरों की मुद्धियां।
एक बाणी गाय का एक लोंदा गोबर
गांव को हल्दीघाटी बना देता है,
जिस पर टूट जाती हैं जाने
कितनी टोकरियां,
कच्ची रह जाती हैं ढेर सारी रोटियां,
जाने कब से चला आ रहा है
रोज का ये नया महाभारत
असल में हर महाभारत एक
नए महाभारत की गुंजाइश पे रुकता है,
जहां पर अंधों की जगह अवैधों की
जय बोल दी जाती है।
फाड़कर फेंक दी जाती हैं उन सब की
अर्जियां
जो विधाता का मेड़ तोड़ते हैं।
सुनता हूं एक आदमी का कान फांदकर
निकला था,
जिसके एवज में इसके बाप ने इसको कुछ हथियार दिए थे,
ये आदमी जेल की कोठरी के साथ
तैर गया था दरिया,
घोड़ों की पूंछे झाड़ते-झाड़ते
तराशकर गिरा दिया था राजवंशों का गौरव।
धर्म की भीख, ईमान की गरदन होती है मेरे दोस्त!
जिसको काट कर पोख्ता किए गए थे
सिंहासनों के पाए,
सदियां बीत जाती हैं,
सिंहासन टूट जाते हैं,
लेकिन बाकी रह जाती है खून की शिनाख़्त,
गवाहियां बेमानी बन जाती हैं
और मेरा गांव सदियों की जोत से वंचित हो जाता है
क्योंकि कागजात बताते हैं कि
विवादित भूमि राम-जानकी की थी।

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कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

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