शिव विश्वनाथन भारत के उन चुनिंदा विद्वानों में से एक हैं जिन्हें विज्ञान और समाज के आपसी संबंधों की गंभीर समझ है। देश-विदेश की प्रमुख पत्रिकाओं में उनके आलेख समय-समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। उनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है – Theatres of Democracy. यह लेख इसी पुस्तक के लिया गया है. शिव वर्तमान में ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। शिक्षा को लेकर शिव क्रांतिकारी विचार रखते हैं और इसमें स्वतन्त्रता और सपनों को तरजीह देने की वकालत करते हैं।

________________________________________________________________________

जब भी मैं किसी स्कूल के बगल से गुजरता हूँ, ठिठक जाता हूं। मुझे लगता है कि स्कूल नामक ये संस्थाएं बचपन को बर्बाद करने के लिए बनायी गयी हैं। अपने बचपन के दिनों को याद करता हूँ जब मैं एक छोटे से शहर जमशेदपुर में रहता था। यह एक छोटा सा व्यवस्थित व्यावसायिक नगर था लेकिन यह हमारे मासूमियत को बचाये रखने और सपने देखने का मौका देता था। मुझे केवल कुछ छोटी छोटी बातें ही याद हैं। उनमें से एक है बारिश में स्कूल से घर लौटते वक्त रंग बिरंगे पतंगों (Red rain bugs) को पकड़ना। जब आप उन्हें छूते हैं तो वे अपने पैर समेट लेते हैं।

बचपन सपनों का समय था। यह घंटों उदासी से भरा होता था जब आप कुछ नहीं करते थे पर तब भी आपके साथ कुछ रचनात्मक हो रहा होता था।

शिक्षक कानून था और जब वह बोर्ड पर एक ही बात 500 बार लिखता ‘I will not talk in class’, आप पहली बार तानाशाही और अन्याय को महसूस करते हैं। यह अजीब ही है कि कैसे उन वर्षों को उन दंडात्मक तरकीबों ने भी लेखन के तरीके को सुधारने में कोई मदद नहीं की। मैं स्पोर्ट्स में घटिया था और पढाई में सामान्य। जो भी मैंने किया उनमें पेड़ों पर चढ़ने, अमरुद खाने और कच्चे आम ढूंढने के अलावा कुछ नहीं था। जिसकी जरूरत थी वे थे मेरा प्यारा कुत्ता, एक छोटी बहन, एक कहानी की किताब। यह ज़िन्दगी खुशियों से सम्पूर्ण और आज़ाद जान पड़ती थी। मैं किताबों के मामले में भुक्खड़ था और DC कॉमिक्स का दोस्त था। बग्स, बन्नी और मिकी माउस भी हेमलेट और मैकबेथ की ही तरह महत्वपूर्ण किरदार थे। सबसे खूबसूरत बात यह थी कि उनके बारे में एक सामान उत्साह से बातें की जा सकती थीं। गर्मी का मतलब आम था और उनसे लिपटा हुआ नमक। जाड़े में अमरुद आ जाते थे, गुलाबी रंग से भरे हुए।

मात्र एक मामले में मुझे महारथ हासिल थी; टेनिस बॉल से खेले जाने वाला गली क्रिकेट। मैं आश्चर्य करता हूँ कि उस खेल के उम्दा खिलाड़ी कहाँ चले गए जो कि स्कूल के बाकि फालतू लोगों के बीच मेरे हीरो थे- अराजकता के कवि की तरह।

मैं बढ़ने की उदासी महसूस कर सकता हूँ। मुझे याद है कि उनमें से एक से मैं बहुत सालों बाद मिला था। वह एक बैंक में काम करता है। वह मुझसे नज़र चुराकर बच निकलना चाहता था कि कहीं मैं उसे देख न लूँ। स्कूल के एक दोस्त से मिलने के उस क्षण में बहुत ही मार्मिकता और खालीपन होता है जब कहने को कुछ न हो। यादें किसी और ही दुनिया की परित्यक्त चीजें लगती हैं। भविष्य में बचपन मामूली सा ही बचता है। भारतीय में यह सच्चाई समय से पहले ही अपना अस्तित्व बना लेती है और प्रतियोगिता की स्थिति खेल और आनंद को ही नष्ट कर देती है। परीक्षा और पास-फेल का गणित बचपन पर कहर बन के टूट पड़ता है। अगर भारत में खेती मानसून और बारिश के साथ एक जुआ है तो शिक्षा एक दांव। मैं सोचता हूँ कि बचपन एक सेंसोरियम(sensorium) है; खुशबू, आवाज, यादों, स्पर्श कहानियों का तोहफा जो सूचनाओं और आंकड़ों की खोज में खो जाता है। मुझे लगता है कि सूचनाएं ज्ञान को मार देती हैं। आप क्राफ्ट की कला, आज़ादी और मूर्ख बनने की जिज्ञासा खो देते हैं।

परीक्षा उत्पीड़न का उपकरण बन जाती है और कोचिंग संस्थानों में उनकी तैयारी में सालों खर्च हो जाते हैं। ये कोचिंग संस्थान ज्ञान को भ्रष्ट कर रहे हैं। पढ़ने को उत्सव की तरह देखने की नज़र खो गयी है।

शिक्षा को कभी भी खेल और फैंटसी के लिए आज़ाद नहीं किया जाता है। कोटा के बारे में सोचिये एक शहर जिसे केवल एक विशेष परीक्षा पास करने के लिए बाँध दिया गया है। मैं कई ऐसे विद्वानों से मिला हूँ जिनका एडमिशन मात्र 3 नंबर की कमी के कारण IIT में नहीं हो पाया।

मैं कई बार बेहतरीन छात्रों और इंजीनियरों से मिला हूँ जो कहते हैं कि उन्होंने वर्षों से कहानी की कोई किताब नहीं पढ़ी। एक ऐसा लड़का था जिसने कहा कि अब तो वो अख़बार भी नहीं पढ़ पाता है।

यह अर्थहीन प्रक्रिया है जिसमें हम बच्चों को आईडिया कॉपी करने वाला ज़ेरॉक्स मशीन बना रहे हैं और जो केवल सूचनाओं को डाउनलोड करने में लगे हुए हैं।

ये इतने मशीनी होते जा रहे हैं कि मुझे लगता है कि उसमें से कई तो पॉर्न भी इन्फार्मेशन के लिए डाउनलोड करते होंगे। इस दुनिया में देह का संसार खो गया है, उत्तेजना का सेन्स खो गया है जो कि ज्ञान का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। मैं कभी कभी महसूस करता हूँ कि क्या भारत तब ज्यादा बेहतर नहीं होगा जब हम IIT जैसे बंद दीवारों वाले संस्थान बंद करके बच्चों को ज्ञान का आनंद लेने के लिए आज़ाद छोड़ दें जैसे हम खाना, खेल, संगीत और दोस्ती के साथ आनंद पाते हैं। मैं सोचता हूँ कि हमारे समाज के अड्डे और चाय की दुकानें स्कूल से अधिक संस्कृति का पाठ हमें सीखा सकती हैं।

मैं एक शिक्षक हूँ और मुझे लगता है कि बचपन के आनंद ने ही मुझे शिक्षक बनाया। उस जरुरत ने कि मैं बाकि लोगों को बता सकूँ कि मैंने अपना बचपन कैसे जिया और सीखा। वर्तमान में यह खो रहा है। जब भी मैं किसी नई शिक्षा समिति या शिक्षा रिपोर्ट के बारे में सुनता हूँ तो डर जाता हूँ कि अब कौन सी मूर्खता ये हम पर थोपने वाले हैं। मुझे लगता है कि बचपन से युवावस्था में जाने की हमारी प्रक्रिया विचारोत्तेजक नहीं है। बच्चे वास्तव में बड़े नहीं हो रहे हैं। परीक्षाएं मनुष्य की दुनिया में प्रवेश करने का बेहतर रास्ता नहीं है। हमारी शिक्षा व्यावसायिकता के प्रति अपने एकांगी विस्तार के कारण विविधता नष्ट कर देती है। दो बहुत ही भयंकर स्थितियां हैं। पहला तो ये है कि बहुत सारे लोगों को उस क्षेत्र में काम करने के लिए जबरन धकेल दिया जाता है जहाँ वे कभी भी जाना नहीं चाहते थे। दूसरा कैरियर के स्ट्रेटजैकेट मॉडल (straitjacket model) (शिक्षा व्यवस्था जिसमें ज्ञान एक ढ़ांचे में कई बंधनों के साथ एक जैसा सबके लिये होता है।) कल्पनाशीलता को मार दिया है। मैं जानता हूँ कि मैं अप्रासंगिक लग सकता हूँ लेकिन मैं पुरजोर तरीके से कहना चाहता हूँ कि बचपन और सपनों को नष्ट करना किसी भी समाज का सबसे अधिक गंभीर अपराध है। हमें खुद से पूछना होगा कि हमने अपने बच्चों के साथ क्या किया है और क्या कर रहे हैं ? हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि वे उपभोक्तावाद और प्रतियोगिता से परे जाकर अपने सपनों को सुने। भारत को फ़िलहाल इसकी सबसे अधिक जरुरत है।

_______________________________________________________________________

Deccan Chronical में 10 जनवरी 2013 को प्रकाशित।
शिव विश्वनाथन की पुस्तक ‘Theatres of Democracy’ में संकलित। प्रकाशक–Harper Collins Publishers India.

SHARE
Next articleमध्यप्रदेश में गाय के चलते किसानों ने खेती छोड़ी. क्या शिवराज सरकार एक और मंदसौर के इंतजार में है?
कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here