दिसंबर की शुरुआत में महाराष्ट्र सरकार ने महाराष्ट्र के 1314 जिला परिषद् स्कूलों को बंद करने का निर्णय लिया. इसकी वजह थी कि इन स्कूलों में 10 या उससे कम छात्र पढ़ते हैं. सरकार केवल इतने छात्रों के लिये स्कूल का खर्च उठाने को तैयार नहीं है हालांकि कम छात्र संख्या के पीछे तर्क यह भी दिया जा रहा है कि इन स्कूलों में अच्छी पढ़ाई नहीं होती.

खैर, सरकार का कहना है उन्होंने यह फैसला सर्वे के बाद लिया है. और इन स्कूल के बच्चों और शिक्षकों को आस-पास के स्कूलों में स्थानान्तरित कर दिया जायेगा.

अकादमिक लोगों ने सरकार के इस कदम की जमकर आलोचना की है. किशोर डारेक, एक पुणे में बसे स्वतंत्र रिसर्चर हैं, जिन्होंने इस बाबत ‘द हिंदू’ अखबार से बातचीत में कहा, खराब शिक्षा का हवाला देते हुये 1,300 स्कूलों को बंद करने की योजना निरर्थक है. उन्होंने कहा कि इस तरह से स्कूल बंद करने के पीछे व्यवस्थित रूप से धीरे-धीरे राज्य के शिक्षा के अधिकार को तिलांजलि देने की योजना है.

इस घोषणा के बाद मैंने महाराष्ट्र के कुछ स्कूलों का जायजा माननीय शिक्षामंत्री के सामने रखने की बात तय की. इन स्कूलों को मैं काफी वक्त से देखता आ रहा हूं. मेरा शिक्षामंत्री को संबोधित यह खत इसी प्रयास का नतीजा है. माननीय शिक्षामंत्री जी से मेरा सीधा सा सवाल है कि जब, मैं जिन स्कूलों की बात यहां करने जा रहा हूं, उनके लिये आप अतिरिक्त स्कूलों और उनमें ही अच्छे संसाधनों का प्रबंध नहीं कर सकते तो आपको शिक्षा के गिरते स्तर और स्टूडेंट्स की कम संख्या का हवाला देते हुये, उन्हें बंद करने का क्या अधिकार है?

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महाराष्ट्र सरकार के माननीय शिक्षामंत्री जी,

आपने हाल ही में कहा है कि राज्य में 1314 सरकारी स्कूल बन्द किए जाएंगे. इसका कारण आपने बताया कि वहां बच्चों की संख्या 10 से कम है. ऐसे में उन बंद किये स्कूलों के बच्चों को पास के स्कूल में दाखिला मिलेगा और अध्यापकों को दूसरे स्कूलों में शिफ्ट कर दिया जायेगा।

डियर सर, आपका डेटा इतना सॉलिड है कि मीडिया ने इस खतरनाक खबर को सस्ते में निपटा दिया। आप से नहीं पूछा कि बच्चों की संख्या तो आप बता रहे हैं जरा अध्यापकों की संख्या भी बता दीजिए और आर टी आई के मानदण्डों पर गुणवत्ता के डाटा पर भी एक नज़र डाल लीजिए. और जिन 1314 स्कूल के शिक्षकों को आप दूसरे स्कूलों में भेज रहे हैं तो क्या वहां शिक्षकों की जरूरत है या ये एडिशनल हो जायेंगे?

खैर.. ये सवाल महाराष्ट्र के कई शिक्षक संघटनों ने पूछे हैं पर उन्हें आपकी तरह मीडिया कवरेज नहीं मिला और वे सब गायब हो गए. आपने भी उनकी कोई बात नहीं सुनी.

शिक्षामंत्री जी, महाराष्ट्र के गांवों में जाने के लिए आपके पास समय नहीं होगा, लेकिन आइये आपको मुम्बई से सटे ठाणे की दो जगहों पर स्कूल विजिट पर ले चलते हैं. और उस दौरान शिक्षा व्यवस्था के हालात देखने की कोशिश करते हैं, समझने का तो साहस ही नहीं है मुझमें और आप समझना नहीं चाहते. (यह एक डिजिटल यात्रा है पर आप वाकई पधार सकें तो अतिउत्तम होगा.)

आपकी विधानसभा से घण्टे भर की दूरी तय कर आप ठाणे स्टेशन के दो स्टेशन आगे वाले स्टेशन पर उतरेंगे – मुम्ब्रा! स्टेशन के वेस्ट में जाकर कौसा के लिए ऑटो लेंगे. अब मैं आपसे गुजारिश करूँगा कि आप अपना काला चश्मा लगा लें और मास्क पहन लें, क्योंकि रास्ते में अंधाधुंध धुएं और धुंध से आपको घुटन हो सकती है. और अभी मैं नहीं चाहता कि आपके मुम्ब्रा को देखने से पहले हमारा ध्यान भटक जाए.

कौसा की इस इमारत में 12 स्कूल चलते हैं

तो हम कौसा उतरते हैं, ये सामने पीली इमारत दिख रही है सर इसमें 12 स्कूल चलते हैं. जी हाँ! और बच्चों की संख्या जानेंगे तो हैरानी होगी. सर इस तीन मंजिला इमारत में 4,378 बच्चे पढ़ते हैं. सर आप बच्चे को एक से डेढ़ किलोमीटर के दायरे में स्कूल उपलब्ध कराने की बात करते हैं, सर ये बच्चे कितने दूर से आते हैं इसका अंदाज़ा आप स्कूलों और बच्चों की संख्या से ही लगा सकते हैं.

12 स्कूलों में 4,000 से ज्यादा बच्चों के लिए पीने का पानी नहीं है. हाँ सर, कोई नल/टँकी नहीं है न स्कूल में और न ही स्कूल के आसपास. बच्चे अपने घरों से पानी की बोतलें लाते हैं पर सारे बच्चों को यह सहूलियत नहीं है. सर बच्चे को अगर प्यास लगी है तो वो तड़पता रहता है, सुबह पीकर शाम को ही दुबारा पी सकता है या वाशरूम से जाकर पिये. आइये मैं आपको वाशरूम दिखा देता हूँ. सर टॉयलेट की हालात देखिए-

न नल, न फ्लश, न पानी
और गंदगी का अंबार

सर, मैं ज्यादा भावुक नहीं होना चाहता इसलिए आपके शिक्षा विभाग से सूचना के अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी आपके सामने रखता हूँ. ये जानकारी आपके अधिकारियों ने प्रयास फाउण्डेशन के अब्दुल मतीन शेखानी साहब की मांग पर दी है.

जिसमें उन्होंने ठाणे महानगरपालिका के स्कूलों की संख्या, बच्चों, हैड मास्टरों, शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या पूछी थी. आइये सर इसे गौर से देखते हैं.

सर ध्यान से देखिए इसमें 22 उर्दू स्कूल आपको दिख रहे हैं. सर ये पांच इमारतों में चलते हैं. इसमें से 100 नम्बर से 109 तक के 12 स्कूल इस एक बिल्डिंग में चलते हैं. इसमें इन स्कूल नम्बरों की छात्र संख्या जोड़िए और उसे टीचर्स की संख्या से तुलना करिए. इसमें क्लासरूमों की संख्या जो 7 या 8 है उसमें एक शिफ्ट में दो स्कूल बैठते हैं. मतलब वही 7 या 8 रूम दोनों स्कूल के नाम पर चढ़े हैं, जैसे स्कूल नम्बर 109 और 117 को लें तो आंकड़ों के मुताबिक 7 और 8 कमरे मिलाकर 15 क्लासरूम होने चाहिए पर ऐसा नहीं है, दोपहर की शिफ्ट में चलने वाले इन दोनों स्कूलों के पास कुल 8 रूम हैं. उन्हीं को दोनों अपने कागजों में दिखा देते हैं. दोनों स्कूलों के कई क्लास एक साथ बैठते हैं. ऐसा ही हर मंजिल पर दो स्कूलों के साथ होता है.

सर मैं आपको ज्यादा टेंशन नहीं देना चाहता. इसमें सबसे लास्ट कॉलम पे जाइए, रिक्वायर्ड वाले सेक्शन में-

  • 22 उर्दू स्कूल में से 18 स्कूलों में हेडमास्टर नहीं हैं.
  • 22 स्कूलों में 109 ट्रेंड टीचर्स, 82 अपर प्राइमरी और 9 प्राइमरी टीचर को जरूरत है.
  • सर क्लासरूम का रिक्वायर्ड सेक्शन आपके अधिकारियों ने रखा ही नहीं है, नहीं तो कुछ और भी भयावह जानकारियां आपके सामने आई होतीं.

डियर सर, इसी के साथ मैं एक और पेज सूचना का दिखाना चाहता हूँ. इसमें चूँकि डेटा है तो आइये आपके ठाणे महानगर पालिका के बाक़ी स्कूलों की रिक्वार्मेंट भी देख लें-

  • मराठी स्कूलों में 25 हेडमास्टरों की जरूरत है और हिंदी में 6 स्कूलों में हैडमास्टर नहीं हैं.
  • सर कुल मिला के 49 हेडमास्टर, 256 अपर प्राइमरी टीचर्स, 334 ट्रेंड टीचर्स की जरूरत है.
  • और सर ये ठाणे के मात्र 128 स्कूलों की हालात है. अगर आप राज्य की संख्या निकालेंगे तो स्थिति ही कुछ और होगी.

अब हम लौटते हैं, क्योंकि अभी तक आपको यह एहसास हो गया होगा कि आप स्कूल खोल नहीं सकते सिर्फ बन्द कर सकते हैं.

आइये अब मुम्बई की ओर लौटते हैं, मुम्ब्रा स्टेशन से मुम्बई छत्रपति शिवाजी टर्मिनस की धीमी लोकल पकड़ते हैं, क्योंकि हमें अगले स्टेशन ही उतरना है- कलवा. इस बार हम ईस्ट में चलते हैं. बमुश्किल डेढ़ किलोमीटर दूर चलते ही आप नाक-मुंह दबाने लगेंगे.

भास्कर नगर स्लम जाने का मुख्य रास्ता

इसी रास्ते से यहां रहने वाले 50 हज़ार लोग दिन में कम से कम दो बार तो गुजरते ही हैं और हाँ अब उन्होंने नाक-मुंह दबाना बन्द कर दिया है. चलिए हम आगे बढ़ते हैं ये भास्कर नगर है. जैसा कि आप पहचान गए, हाँ ये स्लम एरिया है. इसके बाज़ार के रास्तों से गुजरते हुए बीचों बीच देखेंगे तो हम लोकल के फ़ास्ट ट्रैक के करीब पहुंच जाते हैं.

आप जब-जब एसी में बैठकर मुम्बई से अपने घर जाते हैं तो इसी ट्रैक से गुजरते हैं. वो ठाणे से आगे ट्रेन सुरंग में घुसती है, याद आया. वही सबसे लंबी सुरंग है यहां.

आप अगर किस्मत वाले होंगे तो तेज रेल एक गहरी सुरंग में घुसते हुए दिख जायेगी. अब जरा सा ऊपर नज़र करिए.. एक कूड़े का ढेर दिख रहा है न आपको..

थोड़ा और नज़रें उठाइये, इसके ऊपर एक छोटे से गेट में बच्चे घुस रहे हैं.

सर ये स्कूल है. चौंकिए नहीं, सचमुच ये स्कूल है और हाँ इसमें 10 या 20 नहीं 1200 से ज्यादा बच्चे पढ़ते हैं. सर चार कमरे हैं इसके, जिसमें हिंदी और इंग्लिश मीडियम स्कूल चलता है. स्कूल के सामने सड़ रहे इस कचरे को देखकर आपकी हिम्मत नहीं हो रही आगे बढ़ने की, सर अभी बच्चे भीतर घुस जायेंगे तो सूअर आएंगे और इस कूड़े को बिखेर कर इसमें ‘क’ ‘ख’ ‘ग’ ‘घ’ ढूंढेंगे.

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अब इन बच्चों की सूंघने की क्षमता में विकृति आ गयी है. स्कूल में पीने का पानी नहीं है, टॉयलेट की तो बात ही मत करिए.

मुझे पता है कि आप उस कचरे से गुजर के स्कूल के भीतर हरगिज नहीं जायेंगे. मैं भी आपको कष्ट देना नहीं चाहता. बस जरा अपनी नज़रों को दाईं तरफ घुमाइए. हाँ, हाँ बस! जो इसी स्कूल से सटी एक और टीन पड़ी दिखाई दे रही है. सर ये भास्कर नगर का दूसरा स्कूल है, यहां 2 हज़ार से ज्यादा बच्चे रोज पढ़ने के नाम पर सज-संवर के आते हैं.

सर यहां पढ़ाने वाले शिक्षकों को हरदिन के 100 रुपए मिलते हैं. और रोज मजदूरी कर इन बच्चों के पिता हर महीने 150 रुपए इनकी फीस भरते हैं. सर इन बच्चों को ड्रेस सिलाने के लिए पिताजी से लड़ना होता है, किताबों के लिए पिताजी की दिहाड़ी मजदूरी देने वाले मालिक की मर्जी का इंतज़ार करना पड़ता है.

यहां के करीब 5 हज़ार बच्चों के लिए आपने एक भी सरकारी स्कूल नहीं खुलवाया. न प्राइमरी, न सेकेण्डरी और कॉलेज के तो सपने देखना भी गुनाह है इनके लिए. सर क्या यहां स्कूल नहीं होना चाहिए?

इस भास्कर नगर में उत्तर भारत से मजदूरी करने आए करीब 50 हज़ार लोग अपनी जीवनी के लिये खुद को राज्य की सड़कों पर धकियाते रहते हैं. उनके घरों में न पीने का शुद्ध पानी पहुंचता और न ही टॉयलेट है. एक सार्वजनिक टॉयलेट में बहुत लम्बी लाइन लगती है इसीलिए ये सब खुले में शौच जाते हैं और इनकी वजह से आपके मुख्यमंत्री महोदय को अपने ट्वीट पर आलोचना झेलनी पड़ती है.

मैं चाहूँगा कि अब हम लौटें और पैदल चलते हुए उसी कचरे और गन्दगी से गुजरते हुए कलवा स्टेशन आएं. यहां से आपके सरकारी स्कूल की ड्रेस पहने बच्चों के संग हम स्टेशन लौटेंगे. अब मैं आपको सीधे रोड से नहीं शॉर्टकट में जंगल से इन बच्चों के साथ लाऊंगा. सर इस जंगल में एक कम्पनी हुआ करती थी जिसे तोड़कर यहां मैदान बन गया, यहीं आपको पीएम साहब के दुश्मन खुले में शौच करते मिलेंगे उनके बीच से होते हुए हम घास और शौच से बचते-बचाते स्टेशन आएंगे.

माफ़ करिए सर यहां आपके पैर धुलने के लिए सार्वजनिक नल नहीं लगवाया ठाणे महानगर पालिका ने.. खैर हम जल्दी से स्टेशन पार कर वेस्ट में आएंगे और हम स्टेशन ओवर ब्रिज से नहीं बच्चों के संग, बच्चों की ही तरह पटरी से पार करेंगे इधर-उधर देखकर, कि कहीं ट्रेन न आ जाए.

स्टेशन के वेस्ट में आकर करीब डेढ़ किलोमीटर और चलेंगे तब हमें एक इमारत दिखाई देगी पीले रंग की. हाँ कौसा जैसी इमारत.. हाँ आप ठीक पहचाने सर, ये आपकी सरकारी शाला है. यहां इस इमारत में तीन सरकारी स्कूल हैं, जिनमें से एक उर्दू स्कूल है उसी में हमारे साथ आए बच्चे पढ़ने का सोना पाने आते हैं.

इस स्कूल में 70 फीसदी बच्चे भास्कर नगर से ही आते हैं. इन बच्चों में पहली क्लास के छोटे बच्चे से लेकर आठवीं की बड़ी बच्चियां शामिल हैं जिन्हें शाम को 5 बजे स्कूल खत्म होने के बाद फिर से उतना ही चलकर जाना है.

मार्च 2017 में गीता गांधी ने अपने रिसर्च पेपर में DISE का डेटा प्रयोग करते हुए बताया है कि 2011 से 2017 के बीच सरकारी स्कूलों से 1 करोड़ 30 लाख बच्चे कम हुए हैं और निजी स्कूलों में 1 करोड़ 70 लाख बच्चे बढ़े हैं.

सर आप समझ ही रहे होंगे कि सरकारी स्कूलों में बच्चे क्यों घट रहे हैं? साथ ही यह भी जानते होंगे कि आने वाले वक़्त में वे और कम होने वाले हैं, इसलिये आप धीरे-धीरे सारे स्कूल बन्द कर देंगे. फिर भी सर यह तो डिजिटल यात्रा थी, मेरा ह्रदय परिवर्तन में यकीन है. इसलिये मेरी आपसे गुहार है अपने इस फैसले को इंप्लीमेंट करने से पहले एकबार मेरे साथ जरूर स्कूल विजिट करिए, मुझे उम्मीद है कि आप जरूर आएंगे.

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इससे पहले उत्तराखंड सरकार भी इसी साल अक्टूबर महीने के अंत में 1365 प्राइमरी स्कूलों को बंद करने की घोषणा कर चुकी है. सितंबर, 2017 में उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले से फंड न होने के चलते एक और स्कूल बंद करने की खबर आई थी. इस स्कूल में सिर्फ ‘बन राजी’ जनजाति के 50 बच्चे पढ़ते थे.

शिक्षा और उसके स्तर की अनदेखी सरकारों के लिये कोई बात नहीं है. ऐसे में इन मुद्दों की जानकारी ही एक ऐसा बचाव हो सकता है तो लोगों को जरूरी जानकारी देकर सरकारों पर दबाव बनाने में मदद कर सके. कठफोड़वा.कॉम ऐसी जानकारियां आगे भी आप तक लाता रहेगा और जरूरत पड़ी तो मैदान में भी आपके साथ खड़ा होगा. आप बस कठफोड़वा से जुड़े रहें. हमसे जुड़ने के लिये नीचे दिये हमारे फेसबुक और ट्विटर के बटनों पर क्लिक करें-

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विनय जीतोड़ मेहनत में विश्वास करते हैं. जीवन में कई पहाड़ उन्होंने इसी मेहनत के बल पर चकनाचूर किये हैं. एटा में जन्मे विनय ने 12वीं तक की पढ़ाई गांव से ही की. आगे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई के लिए दाखिला लिया पर एक साल में लगा कि दुनिया का विस्तार कानून के पार भी है तो अगले ही साल क़ानून की पढ़ाई छोड़कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मीडिया स्टडीज में स्नातक करने चले गये. फिर आईआईएमसी से विज्ञापन और जनसंचार में परास्नातक डिप्लोमा किया और अभी ठाणे में गांधी फेलो हैं. 'तब तक जुटना जब तक बदलाव न आ जाये,' उनका मूलमंत्र है. शायद इसीलिये इतनी सी उम्र में ढेरों सफल सामाजिक प्रयोगों का सेहरा उनके सिर बंध चुका है. खूब घूमना, फक्कड़पन, खुशमिजाज़ी विनय की पहचान हैं. विनय को जानने वाले अक्सर कहते हैं की जीवन और विनय एक-दूसरे के पर्याय हैं. फिर भी विनय आज भी यही कहते मिलते हैं- वो तमाम संघर्ष जो मैंने नहीं किये, मुझसे अपना हिसाब मांगते हैं.

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