प्रकाश के रे वरिष्ठ पत्रकार हैं. भारत मे अंतराष्ट्रीय मसलों के चुनिंदा जानकर लोगों में से एक हैं. विश्व राजनीति के साथ-साथ मीडिया, साहित्य और सिनेमा पर भी आप गहरी समझ रखते हैं.

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जनवरी से दिसंबर तक चले ‘पद्मावती’ विवाद तथा सेंसर बोर्ड के फैसलों पर उठे सवालों को छोड़ दें, तो 2017 के खाते में कई सिनेमाई उपलब्धियां हैं. इन उपलब्धियों की तुलना खेलों में अर्जित सफलता से ही की जा सकती है. साल के आखिरी दिनों में प्रदर्शित हुई सलमान खान अभिनीत ‘टाइगर जिंदा है’ की रिकॉर्डतोड़, लेकिन अपेक्षित, कमाई ने फिल्म उद्योग को खुश होने का एक और मौका दिया है. स्टारों और फॉर्मुला-आधारित फिल्मों को कोसनेवाले लोगों की अच्छे सिनेमा की चाहत भी इस साल खूब पूरी हुई.

पोस्टर- न्यूटन

अमित मसुरकर की ‘न्यूटन’ को इस साल की बेहतरीन फिल्म कहा जा सकता है. भारत की ओर से ऑस्कर पुरस्कारों के लिए नामित इस फिल्म में पंकज त्रिपाठी और राजकुमार राव ने अपने अभिनय से बड़ी ऊंचाई दी है. माओवाद-प्रभावित इलाके में चुनावी लोकतंत्र और स्थानीय वास्तविकताओं को जिस गहनता के साथ निर्देशक मसुरकर और सह-लेखक मयंक तिवारी ने बुना है, वह बेमिसाल है.


हिंदी सिनेमा को वैश्विक सिनेमा में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है, तो उसे कथानक, अभिनय और निर्देशन पर ध्यान केंद्रित करना होगा. कहने का मतलब यह नहीं है कि ‘बाहुबली’, ‘टाइगर जिंदा है’, ‘गोलमाल अगेन’ या ‘जुड़वा 2’ जैसी फिल्मों का महत्व नहीं है. फंतासी और फॉर्मुले से रची-बसी फिल्में एक बड़े तबके का मनोरंजन भी करती हैं, परंतु सिनेमा का कलात्मक और सामाजिक प्रयोजन भी है जो कि विषयों के वैविध्य, कथानकों की विभिन्नता तथा हर स्तर पर प्रयोगधर्मिता से ही साधा जा सकता है.


‘न्यूटन’ के अलावा विक्रमादित्य मोटवाने की ‘ट्रैप्ड’, अलंकृता श्रीवास्तव की ‘लिपस्टिक अंडर माई बुरका’, अश्विनी अय्यर तिवारी की ‘बरेली की बर्फी!’, मिलिंद धैमाड़े की ‘तू है मेरा संडे’, कोंकणा सेनशर्मा की ‘अ डेथ इन द गंज’, अद्वैत चंदन की ‘सेक्रेट सुपरस्टार’, विशाल भारद्वाज की ‘रंगून’, सुरेश त्रिवेणी की ‘तुम्हारी सुलु’, अनुराग बसु की ‘जग्गा जासूस’, और शुभाशीष भुटियानी की ‘मुक्ति भवन’ जैसी फिल्मों को देखकर आश्वस्त हुआ जा सकता है कि हिंदी सिनेमा बॉक्स ऑफिस और स्टार सिस्टम की मोह-माया से मुक्ति की ओर आत्मविश्वास से चल पड़ा है.

इस सूची में उन कुछ फिल्मों को भी रखा जाना चाहिए जिन्हें बहुत अधिक चर्चा नहीं मिली या किन्हीं कारणों से वे ज्यादा दर्शकों तक पहुंच नहीं सकी. अविनाश दास की ‘अनारकली ऑफ आरा’, राहुल बोस की ‘पूर्णा’, अक्षय रॉय की ‘मेरी प्यारी बिंदु’, तनूजा चंद्रा की ‘करीब करीब सिंगल’, और श्लोक शर्मा की ‘हरामखोर’ ऐसी ही कुछ फिल्में हैं. एकाध उदाहरणों को छोड़ दें, तो अक्सर कहा जाता रहा है कि विदेशी फिल्मों की कौन कहे, हिंदी फिल्में तो भारत की क्षेत्रीय फिल्मों की गुणवत्ता का ही मुकाबला नहीं कर सकती हैं. ये फिल्में इस अभाव को दूर करने की दिशा में उल्लेखनीय उपलब्धियां हैं.

पोस्टर- हरामखोर

कलाकारों के हिसाब से देखें, तो पंकज त्रिपाठी, राजकुमार राव, स्वरा भास्कर, कंगना रानौत, संजय मिश्रा, विद्या बालान, आयुष्मान खुराना, जायरा वसीम और सबा कमर ने शानदार काम किया है. आधे दर्जन फिल्मों में अलग-अलग मिजाज के किरदार निभा कर पंकज त्रिपाठी ने धमाकेदार प्रदर्शन किया है. इनमें जो नये कलाकार हैं, उनसे आगे बहुत उम्मीदें बंधी हैं. कहानी और अभिनय के उम्दा होने के लिए फिल्म में उन कलाकारों का सर्वाधिक योगदान होता है, जिन्हें अमूमन ‘सहायक अभिनेता/अभिनेत्री’ या ‘चरित्र अभिनेता/अभिनेत्री’ की संज्ञा दी जाती है. वर्ष 2017 की फिल्मों को देखते हुए यह सवाल भी वाजिब है कि क्या ये संज्ञाएं उन कलाकारों के साथ न्याय कर पाती हैं. साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि स्टारों या बड़े नामों की तुलना में इन कलाकारों को कम मेहनताना क्यों मिलता है.

फीचर फिल्मों की चर्चा करते हुए हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इस साल कई बेहतरीन लघु फिल्में भी इंटरनेट के जरिये हम तक पहुंची. स्मार्टफोन और टैबलेट के हमारे युग में यूट्यूब, नेटफ्लिक्स, वीमियो, हॉटस्टार, आमेजन प्राइम आदि कई ऐसे मुकाम हैं जहां हम फिल्मों का रसास्वादन कर सकते हैं. तकनीकी औजारों तथा इंटरनेट की सुलभता ने नये फिल्मकारों को मौका दिया है कि वे बिना किसी बड़ी पूंजी के अपनी कहानी और प्रतिभा का प्रदर्शन कर सकते हैं.


अनुपम खेर, अनुराग कश्यप, तिषा चोपड़ा, सौरभ शुक्ला, मनोज वाजपेयी, गोविंद नामदेव, शेफाली शाह जैसे बड़े नाम भी लघु फिल्मों से जुड़ रहे हैं. इस वर्ष नीरज घेवन की ‘जूस’, मानसी जैन की ‘छुरी’, नवजोत गुलाटी की ‘जय माता दी’, हार्दिक मेहता की ‘द अफेयर’, सुजॉय घोष की ‘अनुकूल’, सोनम नायर की ‘खुजली’ आदि अनेक फिल्मों ने दर्शकों का ध्यान खींचा है. उनकी कामयाबी से उम्मीद बंधी है कि इन विषयों पर और इन निर्देशकों की बड़ी फिल्में भी हम तक जल्दी आयेंगी.

पोस्टर- द अनरिजर्व्ड

इसी क्रम में कुछ डाक्यूमेंट्री फिल्मों का जिक्र भी जरूरी है. कथेतर फिल्मों का महत्व इसलिए भी है कि वे जानकारी देने और मुद्दों के विभिन्न आयामों से परिचित कराने के साथ विषय और छवियों को संजो देती हैं. समर्थ महाजन ने देशभर में रेलगाड़ी के सामान्य डिब्बे के यात्रियों की सोच और उनके जीवन से ‘द अनरिजर्व्ड’ में परिचय कराया है, तो खुशबू रांका और विनय शुक्ला ने आम आदमी पार्टी के शुरुआती सालों की कथा ‘एन इनसिग्नीफिकेन्ट मैन’ में कही है. जेम्स एर्स्किन ने ‘सचिन’ में क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की यात्रा का भावपूर्ण चित्रण किया है.

फिल्मों की फेहरिस्त संतोषजनक है और जिस तरह से स्त्री-प्रधान और मध्यवर्गीय जीवन को खंगालती फिल्में आई हैं, यह अपेक्षा की जा सकती है कि 2018 में हिंदी सिनेमा की यात्रा और परवान चढ़ेगी तथा हमें स्वस्थ और अर्थपूर्ण मनोरंजन मिलता रहेगा.

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