“हमारी दुनिया में, जहाँ बंदूकों की होड़ लगी हुई है, बम-बारूदों की बहसें जारी हैं, और इस उन्माद को पोसता हुआ विश्वास फैला है कि सिर्फ हमारा पक्ष, हमारा धर्म, हमारी राजनीति ही सही है, दुनिया युद्ध की ओर एक घातक अंश पर झुक गई है। ईश्वर जानता है कि किसी भी समय के मुकाबले हमें कविता की जरूरत आज कहीं ज्यादा है। कविता हमारे भीतर एक अंतरसंवाद पैदा करती है। यह हमारे अपने सत्य के प्रति एक निजी यात्रा का प्रस्थान होती है।“

-‘बेन ओकरी’

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प्रत्येक व्यक्ति जीवन के एक अंश में कविता रचता है। इसके बावजूद कविता की किताबें कम छपती हैं और उससे भी कम पढ़ी जाती हैं। लेकिन ऊपर लिखे हुए बेन ओकरी के कथन के पश्चात् यह बात साफ़ है कि कविताएँ हमारे वर्तमान की अनिवार्य जरुरत बन गयी हैं क्योंकि हमें अपनी आत्मा की आवाज सुननी ही होगी… मानवता के साझे सपने से लिए, अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए, अपने बच्चों के लिए, एक बेहतर भविष्य के लिए।

यहाँ आप सबके लिए हिंदी की 33 महत्वपूर्ण कविता पुस्तकों का चयन किया गया है जो कविता के विविध रूपों और विषयों को जानने में सहायक हो सकती हैं। लेकिन यहाँ चयन में एक बात ध्यान में रखी गयी है कि सूची में वही पुस्तकें शामिल हों जो अकादमिक सीमाओं से हटकर कविता की आज़ाद दुनिया का आनंद दे सकें। यहाँ प्रेम भी है और बेबसी भी… यहाँ भूख भी है और विद्रोह भी। इन पुस्तकों को पढ़िए, अपने पास रखिये… यह याद दिलाती रहेंगी कि हम इंसान हैं।

1. आँगन के पार द्वार- अज्ञेय

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

अज्ञेय भारतीय कविता में बसी हुई विश्व चेतना के कवि हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित उनकी यह कृति भारतीय और वैश्विक चेतना के अन्त:संबधों को प्रदर्शित करती है। काव्य-संग्रह तीन भागों में विभाजित है- अन्तःसलिला, चक्रान्तशिला और असाध्य वीणा। असाध्य वीणा हिंदी की प्रमुख लम्बी कविताओं में एक है।

अज्ञेय की कविता में प्रेम, प्रकृति, जीवन और संघर्ष सब कुछ है। इस संग्रह में शब्दों के माधयम से मौन में प्रवेश करने की कोशिश भी की गयी है। अज्ञेय ने कविता को एक सहज बौध्दिक परिष्कार दिया है।

2. टूटी हुई बिखरी हुई- शमशेर बहादुर सिंह

(प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन)

शमशेर बहादुर सिंह को हिंदी-उर्दू के दोआब का कवि कहा जाता है। उनकी कविताएँ सहज जीवन की कविताएँ हैं। वहाँ शोर नहीं, संगीत है। टूट जाने की लय पर गढ़े जाने का संगीत। पढ़ने के बाद वह आपके अस्तित्व पर पसर जाती है। आप को एहसास भी नहीं होता और वह आपके वजूद का हिस्सा बन जाती हैं।

टूटी हुई बिखरी हुई उनका एक प्रमुख काव्य संग्रह है। इसकी कविताएँ शमशेर की कवि कर्म के विस्तार को दिखाती हैं। जहाँ विषय अनेक हैं पर केंद्र में मनुष्य है। विजयदेव नारायण साही कहते हैं- हिंदी मे विशुद्ध सौन्दर्य का कवि यदि कोई हुआ है तो वह शमशेर हैं।

3. सारे सुखन हमारे- फैज़ अहमद फैज़

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

फैज़ साहब की शायरी, इश्क़ और इंकलाब की शायरी है। इनकी नज़्में ज़मीरों को आवाज देती हैं और महबूब को भी। फैज़ पाकिस्तान में रहते थे लेकिन वे सही अर्थों में विश्व नागरिक थे। उनकी रचनाएँ मानवतावाद की वकालत करते हुए राष्ट्र की सीमाएँ तोड़ देती हैं। सारे सुखन हमारे फ़ैज़ की तमाम ग़ज़लों, नज़्मों, गीतों और क़तआ’त का संग्रह है। इसमें शामिल रचनायें प्रेम और सियासत दोनों से रूबरू कराती हैं। पाकिस्तान में वामपंथ की आवाज बनकर खड़े रहने वाले फैज़ को अनेक बार राजनीतिक परेशानियों का सामना करना पड़ा लेकिन इन्होने उनकी लेखनी को और भी धारदार बनाया।

4. चाँद का मुँह टेढ़ा है- मुक्तिबोध

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

मुक्तिबोध की कविताएँ लम्बी हैं, भाषा कठिन है लेकिन प्रवाह एकदम सरस और सहज। इसीलिए समय के साथ-साथ उनके पाठकों में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जा रही है। यह एक दुर्भाग्य ही है कि प्रगतिशील विचारधारा के प्रमुख प्रकाश-स्तम्भ मुक्तिबोध का पहला काव्य संग्रह ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ उनकी मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ था।

मुक्तिबोध राजनीतिक संघर्ष के दिनों में धीमे हुए अंतर्द्वंद के कवि थे। अभाव और संघर्ष से भरा हुआ उनका जीवन खुद में ही एक ट्रेजडी का आख्यान है जिसका सामना करते हुए आज भी हिंदी साहित्य जगत को लज्जित होना पड़ता है।

5. साये में धूप- दुष्यंत कुमार

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

ग़ज़ल को महबूब की जुल्फों की उलझन से बाहर निकालकर सड़क से संसद तक संघर्ष की आवाज़ बनाने वाले रचनाकार थे- दुष्यंत कुमार। उर्दू की ग़ज़ल को हिंदी की जमीन पर बोने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साये में धूप उनकी सबसे प्रसिद्ध ग़ज़लों का संग्रह है।

एक व्यक्ति के अंतर्द्वंद को अभिव्यक्ति देने से लेकर सत्ता के तानाशाही का विरोध करने तक यह गज़लें आम आदमी की आवाज बनती रही हैं। यह उसी समय को दर्ज़ करती हैं जब सिनेमा में एंग्री यंग मैन का उदय हो रहा था।

6. खूटियों पर टंगे लोग- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

जब-जब आन्दोलनों की आवाज बुलंद होती है, सर्वेश्वर की कविताएँ बौद्धिक हथियार बनकर लोगों की जबान पर चढ़ जाती हैं। यह सत्ता के सामने विकल्प का आईना रख उसे चुनौती देती हैं। दूसरी ओर, प्रेम के नाजुक क्षणों में यह कवितायें खुद को अभिव्यक्त करने में हमारी सहायता भी करती हैं। विषय की जितनी विविधता सर्वेश्वर के काव्य संसार में है, अन्यत्र कम ही देखने को मिलती है। अगर कविताएँ पढ़ने में रूचि न हो तो सर्वेश्वर की कविताएँ पढ़ने से शुरुआत कीजिए, बहुत जल्दी ही कविताएँ जीवन का हिस्सा लगने लगेंगी।

7. मगध- श्रीकांत वर्मा

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

गाँव से शहर पलायन की प्रक्रिया में एक अकेला आदमी बच गया था। वर्मा की कविताएँ उस अकेले आदमी के दुःख, उदासी, संताप और संघर्ष की भावनाएँ हैं जो उसके नियति का हिस्सा बन गयी। वर्मा आज के राजनीतिक बर्बरता और उसकी अमानवीय स्थिति को व्यक्त करने के लिए अतीत के नामों और सन्दर्भों का प्रतीक के तौर पर अपनी कविताओं में प्रयोग करते हैं। शहरों पर कविताएं लिखते हुए, वे प्रायः गंवईं शब्दों को शामिल करते हैं और यही उनका संसार को विकल्प है। हमारे वर्तमान के सभी उत्तर अतीत में हैं। श्रीकांत जी की ‘मगध’ राजनीति के भटक जाने की बात को बेहतरीन ढंग से सामने लाती है।

8. संसद से सड़क तक- धूमिल

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

धूमिल भारत के उस जमीन के कवि हैं जिसपर एक किसान अपने पसीने से धान बोता है। धूमिल उस कारखाने के कवि हैं जिसमे काम करते हुए एक मजदूर मर जाता है और अगले दिन का अख़बार चमड़ी को गोरा करने वाली क्रीम के विज्ञापन से भरा होता है।

धूमिल अपनी कविताओं में संसद से लेकर संविधान तक को सड़क पर लाने की बात करते हैं क्योंकि देस का लोक सड़क पर है तो तंत्र बंद किताबों और कमरों में नहीं चल सकता। कविता के लिए धूमिल ने नयी भाषा और नैतिकता की नयी परिभाषा गढ़ी है। उनकी भाषा इतनी खुरदुरी है कि पढ़ते वक्त कई बार पाठक की जबान भी छिल जाती है।

9. आत्मजयी- कुँवर नारायण

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

मिथक में संचित अतीत हमारे भविष्य की पूँजी है। कुँवर नारायण की कविता इसी संचय को बटोरती चलती है। आत्मजयी हिंदी साहित्य का एक प्रमुख प्रबंध काव्य है जिसे कठोपनिषद की एक कथा को आधार बना कर लिखा गया है लेकिन कुँवर का कथा को दिया आधुनिक अर्थ इसे नितांत मौलिक बना देता है।

आत्मजयी मनुष्य की कार्य-क्षमता में आस्था रखने की काव्य प्रस्तुति है। यह विचार करने की चुनौतियों और विचारों के अंतर्द्वंद के बीच एक सार्थक उत्तर खोजने की प्रेरणा देती है। इसका नायक प्रश्न करता है, जीवन को बेहतर बनाने वाले विकल्पों से सम्बंधित प्रश्न। शायद इसीलिए इसे लोकतंत्र के विचार को पुष्ट करने वाला काव्य माना जाता है।

10. अकाल में सारस- केदारनाथ सिंह

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

भारतीय काव्य संसार में केदारनाथ सिंह ‘धन्यवाद’ के कवि हैं। उनके पास स्वीकार का बड़ा ह्रदय है जहाँ यथार्थ की जमीन पर परम्परा-आधुनिकता, सुख-दुःख, गाँव-शहर, खेत और बाजार एक साथ रहना चाहते हैं। केदार जी की कविताएँ जीवन की तमाम चुनौतियों में उम्मीद की खोज करती दिखाई पड़ती हैं।

यह उम्मीद मानवता के साहस, विश्वास और जिजीविषा की गवाही है। ‘अकाल में सारस’ ऐसी ही कविताओं का संग्रह है, जिसमें 1983-87 के मध्य रची गयी कविताएँ संकलित हैं। साहित्य अकादमी से पुरस्कृत यह संकलन कविता को भाषा और भाव दोनों ही स्तर पर ‘भारत’ की जमीन पर खड़ा करता है। ये कविताएँ पाठक के साथ संवाद करती हैं और कविता और मनुष्य के बीच के शाश्वत सम्बन्ध को व्यक्त करती हैं।

11. सम्पूर्ण कवितायें- पाश

(प्रकाशक- आधार प्रकाशन)

आजादी के सपनों और उम्मीदों के ध्वंस से असंतोष और विद्रोह की आवाज ने जन्म दिया। इस परिदृश्य में सबसे बुलंद आवाज थी पाश की जिसने सत्ता का सिंहासन हिला दिया। पहली बार समाज देख रहा था कि एक कवि की आवाज आग लगा सकती है।

पहली बार एक कवि ने कविता से प्रेम को विस्थापित कर क्रांति को जगह दी और संघर्ष के समय में अपनी प्राथमिकताएँ तय कीं। पहली बार एक कवि संविधान को एक मरी हुई किताब कह रहा था। पहली बार एक कवि की हत्या कर दी गयी क्योंकि उसने उन सबको डरा दिया जिन्होंने मानव की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया था।

12. सबकुछ होना बचा रहेगा- विनोद कुमार शुक्ल

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

विनोद कुमार शुक्ल, हिंदी के सबसे ‘आम’ कवि है। शायद इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति उन्हें पढ़ते हुए पाता है कि उनकी कविता, कहानी, उपन्यास का केंद्रीय पात्र वह खुद है। शुक्ल जी की भाषा और उनका शिल्प एकदम नवीन है। जीवन की अनछुई वस्तुएँ उनकी रचनाओं में स्थान पाती हैं।

उनकी रचनाओं में समाज का वह आदमी दिखाई देता है जो महंगे-विलासी वस्तुओं, डिस्काउंट, भीड़ और शोर से भरे हुए बाजार से जाकर रात के खाने के लिए 10 रूपये की आधा किलो भिंडी लेकर लौट आता है। उसकी नज़र अन्य वस्तुओं पर जाती ही नहीं। विनोद जी की कविताओं में हम अपने बाबूजी की बातें भी सुन सकते हैं और अपनी इच्छाएँ भी।

13. कागज और कैनवास- अमृता प्रीतम

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

अमृता प्रीतम का रचना संसार प्रेम की उदात्त भावना से भरा हुआ है। निजता रचनाओं में इतनी रची बसी है कि सभी रचनाएँ ईमानदारी से सामने आती हैं। पीड़ा और प्रेम का अन्तःसम्बन्ध सत्य है इसीलिए वहाँ विषाद नहीं, आनंद है जिसे एक तपस्वी अपनी वर्षों की कठोर तपस्या से प्राप्त करता है।

पंजाबी भाषा में रची यह कविताएँ आज विश्व साहित्य की धरोहर बन गयी हैं। अमृता ने वही लिखा जो उनके हिस्से का था। उनके रचना संसार में कुछ भी आयातित नहीं है। वारिस शाह और मैं तुझे फिर मिलूंगी जैसी कविताएँ आज की पीढ़ी के दिलो दिमाग पर छायी हुई हैं।

14. आग हर चीज में बताई गयी थी- चंद्रकांत देवताले

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

वर्तमान के हिंसक समाज में कविता की भूमिका को रेखांकित करती है देवताले की यह कविता कृति। मनुष्य विरोधी सत्ता के खिलाफ कविता अभिव्यक्ति का अस्त्र बनती है। चंद्रकांत देवताले की कविताएँ हमारे आज की कविताएँ हैं जिसमे हम हैं, हमारे अतीत की स्मृतियाँ हैं और भविष्य के सपने हैं। पीड़ा से भरी हुई पंक्तियाँ उन कविताओं के लिए भूमिका बनाती हैं जो लड़ने और बढ़ने का उत्साह भरती हैं। देवताले के पास अपना मौलिक शिल्प है जिसमे भाव का सहज प्रवाह संभव हो पाता है।

15. दो पंक्तियों के बीच- राजेश जोशी

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

राजेश जोशी की कविता पढ़ते हुए आप धैर्य रखना सीखते हैं। यहाँ जीवन का वैविध्य रूप अपने सबसे प्रखर रूप में सामने आता है। इस संग्रह की कुछ रचनाएँ राजनीतिक हस्तक्षेप भी करती हैं। ये सवाल भी करती हैं और जवाब भी देती हैं। ‘दो पंक्तियों के बीच’ जीवन में छूट गए की महत्ता को दर्शाता है। यह जरुरी नहीं कि जो परित्यक्त है, वह अनुपयोगी हो। जो खाली छूट गया है, उसमे भरे जाने की सम्भावना भरी रहती है। राजेश जी की कविताएँ एक व्यक्ति का उसके परिवेश से संवाद की कविताएँ हैं।

16. तार सप्तक- अज्ञेय

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

आदर्शतः यहाँ तार सप्तक के साथ दूसरा सप्तक और तीसरा सप्तक को भी शामिल किया जाना चाहिए था। 21 रचनाकारों को तीन पुस्तकों में समेट कर अज्ञेय ने कविताओं का एक खूबसूरत गुलदस्ता बनाया। इसके कवि विचारों और भावनाओं की विविधता का इंद्रधनुष रचते हैं। अज्ञेय का यह संपादन कर्म एक मील का पत्थर है जिसे शायद अभी तक कोई पार नहीं कर पाया। यह हिंदी कविता में प्रयोगवाद का समय था। यह अलग बात है कि प्रयोगवाद को लेकर अज्ञेय और सप्तक के सभी कवियों की अलग अलग दृष्टि थी।

17. दुनिया रोज बनती है- आलोक धन्वा

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

आलोक धन्वा की कविताएँ एक किशोर के रोमांस की कविताएँ लगती है। वह प्रेम के सन्दर्भ में भी है और क्रांति के भी। जनता का आदमी और भागी हुई लड़कियाँ वो कविताएँ हैं जिन्होंने आलोक धन्वा को किताब में से निकालकर लोगों के जुबान पर ला दिया। आलोक जी अपनी कविताओं को एक ठहराव के साथ पढ़ते हैं जिसमे एक एक पल को जी लेने की इच्छा है। उनके यहाँ हिंसा भी है, प्रेम भी। क्रांति और बदलाव के दौर के कवि आलोक धन्वा जी ने कविताओं में प्रेम के लिए जगह ढूंढी है। ये ऐसी जगहें हैं जहाँ प्रेम एकांत पाता है। समाज से भागी हुई लड़कियां उनकी कविताओं में अपना सम्मान और अधिकार पाती हैं। आलोक जी अपनी कविताओं में चिरयुवा हैं।

18. नए युग में शत्रु- मंगलेश डबराल

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

भूमण्डलीकरण के बाद हमारा युग बदल गया है। दोस्त से लेकर दुश्मन तक सब बदल गए हैं। परिभाषाएँ बदली गयीं और शब्द भी… अनेक स्तरों पर व्याकरण बदलने की भी कोशिशे हुई हैं। मंगलेश डबराल इस कालावधि के एक सजग कवि हैं जिन्होंने इन सभी घटनाओं को बेहद संजीदगी से देखा समझा है। उनकी कविताएँ हमें इन नयी प्रवित्तियों के बारे में सजग करती हैं। यह एक साहित्यकार की राजनीतिक भूमिका के भी दस्तावेज हैं। इनकी कविताएँ बाजार की शोषणकारी भूमिका को सामने लाती हैं।

19. क्रूरता- कुमार अम्बुज

(प्रकाशक- राधाकृष्ण प्रकाशन)

कुमार अम्बुज को पढ़ते वक्त आप कई बात स्तब्ध हो सकते हैं क्योंकि राजनीति के वर्तमान हिंसक और भ्रष्ट चरित्र को लेकर कुमार की कविताएँ आपमें गुस्सा भरती हैं लेकिन ज्यों ही आप क्रूरता के किनारे पर पहुंच कर पशु में परिवर्तित होने लगते हैं, उनकी कविताएँ चीख-चीख कर आपको याद दिलाने लगती हैं कि प्रतिहिंसा, हिंसा का प्रत्युत्तर नहीं है। कुमार की कविताओं में जागरूक संयम है। इसीलिए कुमार के लेखन में पिता महत्पूर्ण रूप से सामने आते हैं। पिता हमें जागरूक करते हैं पर असयमित नहीं होने देते।

20. प्लूटो- गुलज़ार

(प्रकाशक- वाणी प्रकाशन)

गुलज़ार हमारे जीवन के सबसे खूबसूरत शायर हैं। उनकी कविताएँ ओस की बूंद की तरह हमारी पलकों पर ठंडक पहुंचाती हैं। मैं मानता हूं कि ‘यार जुलाहे’ उनकी प्रतिनिधि रचना है लेकिन प्लूटो को पढ़ना आप के लिए एक अलग अनुभव हो सकता है क्योंकि यहाँ गुलज़ार एक नए चेहरे के साथ सामने आते हैं जहाँ एक कवि के जीवन में प्रेम तो है पर उसकी कुछ सामाजिक- राजनीतिक भूमिकाएँ भी हैं।

प्लूटो की बहुत सारी कविताएँ हमारे देश, समाज की स्थिति पर बातें करती हैं। उनमे किसान भी है और जुम्मन चाचा भी। ‘प्लूटो’ को हाशिये पर ढकेला गया है लेकिन वह गुलज़ार की नजर से ओझल नहीं हुआ। इसीलिए यह कृति गुलज़ार को सम्पूर्णता से जानने के लिए पढ़ी जानी चाहिए।

21. कारवाँ गुजर गया- गोपाल दास नीरज

(प्रकाशक- हिन्द पॉकेट बुक्स)

नीरज को हिंदी गीत सम्राट कहा जाता है। मंच से लेकर मन तक उनकी कविताएँ और गीत हमारी स्मृतियों का हिस्सा हैं। उन्हें गा कर हमने अपनी प्रेम कहानियों की शुरुआत की थी। उन्हें पढ़कर गीतकारों को नयी फसल तैयार हुई है।

इनकी कविताओं में प्रेम देह से लेकर आत्मा तक फैला हुआ है। ‘कारवाँ गुज़र गया’ गीत अपने समय में इतना लोकप्रिय हुआ कि इसे फिल्म में शामिल कर लिया गया जिसे मोहम्मद रफ़ी ने गाया था। दर्द से उपजा विद्रोह उनकी कविताओं में बार-बार आता है।

22. तरकश – जावेद अख्तर

(प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन)

जावेद का होना, फिल्म की दुनिया में सिनेमा के बचे होने की गवाही है। एक शायर के अलावा उन्होंने एक सजग नागरिक और बुद्धिजीवी के रूप में सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर निरंतर संवाद किया है।

अपनी बेबाकी के कारण अनेक बार कट्टरपंथियों के निशाने पर भी आ चुके हैं। तरकश उनकी शायरी की पहली पुस्तकीय अभिव्यक्ति थी जिसमे उन्होंने प्रेम से लेकर बेबसी, उदासी, भूख, भीड़ और शहर तक को शामिल किया है। एक व्यापक दृष्टि की बेहतरीन अभिव्यक्ति तरकश में दिखाई देती है।

23. अपनी केवल धार- अरुण कमल

(प्रकाशक- वाणी प्रकाशन)

अरुण कमल अंग्रेजी के अध्यापक हैं और हिंदी में कविताएँ लिखते हैं। अरुण जी का लिखा जितना उनका है, उतना ही संसार का। वहाँ एक प्रेमी, क्रांतिकारी से लेकर मजदूर तक अपनी आवाजों के साथ सामने आते हैं।

अशोक वाजपेयी ने उनके लिए लिखा है.. सूक्ष्म अंतर्दृष्टि, संयत कला अनुशासन और आत्मीयता। अरुण उनकी अन्य कविता संग्रह ‘नए इलाके में’ और ‘पुतली में संसार’ हैं। उनकी कविताओं में आपको सामान्य जीवन प्रसंग दिखाई देते हैं लेकिन एक नया सन्दर्भ लिए… एक नया अर्थ लिए। एक नयी दृष्टि से देखी गयी संसृति।

24. सुनो चारुशीला- नरेश सक्सेना

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

नरेश सक्सेना को पढ़कर ऐसा लगता है कि बाबूजी उन सभी बातों का गठ्ठर सौंप रहे हैं जो हम भागने के दौर में पीछे छोड़ आये जबकि वही हमारी सच्ची पूँजी थे। इनकी कविताओं में साझा संस्कृति और विकल्प के स्वीकार की इच्छाशक्ति अपने प्रौढ़ रूप में सामने आयी है। पेशे से इंजीनियर रहे, नरेश जी की भाषा उनके अतीत के साथ चलती है। इसीलिए बहुत ही सच्ची और खुरदुरी है। सुनो चारुशीला से पहले ‘समुद्र पर हो रही बारिश’ नामक उनकी काव्य पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी।

25. नगाड़े की तरह बजते शब्द- निर्मला पुतुल

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

निर्मला पुतुल का कविता संग्रह ‘नगाड़े की तरह बजते शब्द’ हिंदी कविता में स्त्री जमीन की अभिव्यक्ति है। इस संग्रह की कविताएँ आधी आबादी की दुनियाँ की एक स्वतंत्र पहचान के लिए आवाज देती है। यह हाशिये पर पड़ी आदिवासी संस्कृति की चिंताओं को भी सामने रखती हैं।

इन कविताओं की भाषा कड़ी भी है और कड़वी है जो सत्ता और सभ्यता के नंगेपन को उजागर भी कर देती हैं। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि निर्मला हिंदी कविता में स्त्री और आदिवासी संस्कृति की एक सशक्त आवाज हैं जिन्होंने सभी को सुनने के लिए मजबूर कर दिया है। निर्मला की कविताएँ विकास के वर्तमान मॉडल के व्याकरण पर ही प्रश्न खड़ा करती है। इसीलिए इनकी कविताएँ एक स्त्री के राजनीतिक हस्तक्षेप की कविताएँ हैं।

26. न्यूनतम मैं- गीत चतुर्वेदी

(प्रकाशक- राजकमल प्रकाशन)

गीत की कविताएँ उन्हें प्रिय कवि कहने को मजबूर करती हैं। ‘न्यूनतम मैं’ गीत की बेहतरीन कविताओं का अद्यतन संग्रह है। गीत की कविता की हर पंक्ति विशेष होती है। उनकी कविताएँ साँसों सी कोमल भाषा मे अपनी बात रखती है जो छुअन से बची हुई है। वे हमें जीवन जीने के लिए मुहावरे सिखाती हैं जिसे हम अपनी अगली पीढ़ी को सौंप सकें।

गीत को पढ़ते हुए आप विनम्र होते चले जाते हैं। गीत एक बहुत ही समर्थ पाठक भी है जिनके अध्ययन क्षेत्र में प्राचीन भारतीय ग्रंथों से लेकर समकालीन विश्व साहित्य तक शामिल है। अगर कविता में प्रयोग हो रही एकदम नयी भाषा और अनूठे रूपक और उपमान को महसूसना हो तो पढ़ें – न्यूनतम मैं।

27. बाघ और सुगना मुंडा की बेटी- अनुज लुगुन

(प्रकाशक- वाणी प्रकाशन)

पिछले कुछ सालों में हिंदी की दुनिया में अनुज आदिवासी समाज और संस्कृति की समर्थ आवाज बन कर उभरे हैं। अनुज की सबसे अच्छी बात यह है कि उनके पास अपने विषय को लेकर एक समग्र दृष्टि है। वह आलोचना के साथ आत्मावलोकन भी करते चलते हैं। इसीलिए उनकी कविताएँ, आपको नारेबाजी नहीं बल्कि गीत लगती हैं जिनमे विरोध विनम्रता के मूल्य के साथ आता है।

‘अघोषित उलगुलान’ के लिए भारत भूषण पुरस्कार पाने वाले अनुज ने हिंदी कविता के पाठकों के लिए एक नयी दुनिया का रास्ता खोला है। अब यह हमारे ऊपर है कि जो हमारा ही हिस्सा है, उसे जानने-बचाने के लिए हम कितना तत्पर हैं।

28. प्रेम गिलहरी दिल अखरोट- बाबुषा कोहली

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

बाबुषा को पढ़ते हुए अपनी सांसे महसूस होती हैं। उस कमरे का एकांत महसूस होता है जिसे रचने में हमारा अस्तित्व रच जाता है। बाबुषा कोहली की कविताओं में प्रेम अपने सबसे नाजुक और समर्थ अर्थ में मौजूद है। वह एक स्त्री के अंतर्मन में अंकुरित होता है और हम सब पर छा जाता है।

युवा कविता की उम्मीद बाबुषा, हुए हम कविता की विधा को अपने पास देखते हैं। वहाँ हमारा जीवन है- दोस्त, प्रेमी, शहर, प्रकृति और हम स्वयं। उन्होंने एक नया पाठक वर्ग तैयार किया है जो अब कविता को जीवन का अनिवार्य और कोमल अंग मानता है। वह सूफ़ी और भक्ति संगीत जैसा वातावरण रचती हैं जहाँ खुद को खो देना ही खुद को पा लेना है।

29. सौ साल फ़िदा- गौरव सोलंकी

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

गौरव हमारे जीवन में शामिल शहर के कवि हैं। वे उस यात्रा के भी कवि हैं जहाँ रवीश इश्क़ में शहर हो जाते हैं। उनकी कविताओं में दृश्य बिम्बों की अधिकता है। शब्द सुनाई देने के साथ साथ अक्सर दिखाई भी देते हैं। गौरव युवा हैं, कवि हैं और शहरी हैं, शायद इसीलिए उनकी कविताएँ अभिव्यक्ति के लिए भाषा के बने बनाये व्याकरण के साथ छेड़छाड़ करती हैं। उन्होंने हमेशा बनी बनाई रस्मों को तोड़कर नया करने की कोशिश की है। परिवार से लेकर प्रेमी तक उनके करीब हैं। उनके बीच संवाद भी है और संघर्ष भी। लेकिन इसके मध्य एक युवा मन का स्वाभिमान हमेशा मौजूद रहा।

30. दिन बनने के क्रम में- अरुणाभ सौरभ

(प्रकाशक- भारतीय ज्ञानपीठ)

मैथिली की जमीन से निकलकर हिंदी की कविता करने वाले अरुणाभ हमारे वर्तमान समाज के सच के कवि हैं। एक सामान्य बिहारी की तरह पलायन उनके जीवन और कविता का केंद्रीय हिस्सा है। भूमण्डलीकरण के दौर में पलायन और शोषण से त्रस्त आम आदमी की पीड़ा उनके शब्दों में अभिव्यक्त होती है।

अरुणाभ के लिए जीवन में अंतहीन दुःख है लेकिन जिजीविषा भी अनंत है। ‘वो स्साला बिहारी’ और ‘भरतनाट्यम एक पोज नहीं है’ जैसी कविताएँ अब हमारी चेतना को आवाज देने वाली अभिव्यक्तियाँ हैं। अरुणाभ सही अर्थों में एक हमारे बीच एक युवा कवि हैं जिनमे वर्तमान को एक गुस्सा भी है और भविष्य को लेकर उम्मीद भी।

31. एक महीना नज़्मों का- इरशाद कामिल

(प्रकाशक- वाणी प्रकाशन)

इरशाद कामिल की किताब में संकलित तीस कविताएं, तीस मखमली तकिए हैं। जिन्हें महीने भर, हर रात इरशाद सिरहाने रखने को कहते हैं। इरशाद ने कविताओं के जरिये संवेदना का एक बड़ा सोता खोल रखा है। आप उसमें यूं बहते हैं कि किसी रोज़ तकिये को जोर से बांहों में भींचकर, आंखें मीचे एक गर्म बोसा उस मखमली तकिये पर रख देते हैं। तो कभी आप रात भर रोते हुये उसे आंसुओं से तर कर देते हैं और कभी खुशी में चिहुंक उठते हैं और उसे सीने से चिपका लेते हैं।

इरशाद कामिल वो कवि हैं जो भाषा से जादू करते हैं और उस जादू में आपके लिये एक अनोखी, पूरी तरह से आपकी दुनिया गढ़ दी जाती है। फिर भी कभी ऐसा नहीं होता कि उस दुनिया में एक इश्क का लाल रंग ही हो या सब काव्यात्मक हो, उसमें खुरदुरापन भी होता है और कई बार आप उस संसार में ऐसे औंधे गिरते हैं कि घुटने छिल जाते हैं। बहरहाल, अगर आप कविता पढ़ने की शुरुआत करने जा रहे हैं तो यह एक शानदार विकल्प होगा।

32. विदा लेना बाकी रहे- आशुतोष दुबे

(प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर)

जब जीवन का सबसे सहज रूप देखना हो तो आशुतोष दुबे की कविताओं की दुनिया में जाइये। वहाँ प्रेम है और रूठना भी। वहाँ दुःख है और आनंद भी। आशुतोष के पास आधुनिक विचार है लेकिन उनकी कविताओं में परंपरा का वह प्रवाह है जो शाश्वत है। उनकी कविताएँ पढ़ना खुद को सुकून देना है।

उनकी कविताएँ उम्मीद को ज़िंदा रखती हैं। लोग चले जाते हैं लेकिन उन्हें विदा कहना बाकी रह जाता है क्यों कि आशुतोष यह उम्मीद कभी नहीं छोड़ते की एक दिन वे सब लौट आयेंगें।

33. अज्ञातवास की कविताएँ- अविनाश मिश्र

(प्रकाशक- साहित्य अकादमी)

अविनाश सही मायने में हमारे बीच एक आधुनिक कवि हैं। उन्होंने कविता की गगरी पर भीतर से चोट कर उसे संवारा है, उसे आकार दिया है। उनकी कविताओं में एक 21वीं सदी का युवा बोलता है जिसकी चिंता में 22वीं सदी भी है। अविनाश ने कविता के अध्येता के तौर पर अपनी पहचान बनायी है। इसीलिए उनकी कविताओं का प्रवाह, इनके गद्य में भी दिखाई देता है। वे हमेशा कुछ मौलिक सवालों के साथ सामने आते हैं जिनके जवाब हम सभी को मिल के ढूंढने हैं। उनके कविता संग्रह का शीर्षक की वर्तमान युवा चेतना को अभिव्यक्त करने में सफल है।

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उम्मीद है कि 2019 के विश्व पुस्तक मेले तक यह सूची अभी और भी बढ़ेगी। हिंदी की काव्य भूमि निरंतर उर्वर हो रही है। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर बहुत सी नयी युवा प्रतिभाएँ उभर कर सामने आयी हैं। ये लोग बहुत अच्छा, नया और मौलिक रच रहे हैं। इन्होने कविता के लिए एक नया पाठक वर्ग तैयार किया है। अभी इनकी किताबें तो नहीं आयी हैं लेकिन इन्हें आप फेसबुक और इंटरनेट पर पढ़ सकते हैं। आप सब के सन्दर्भ के लिए कुछ नाम यहाँ दिए जा रहे हैं: अम्बर पांडेय, सुधांशु फिरदौस, लवली गोस्वामी, शायक आलोक, अच्युतानंद मिश्र, अदनान कफ़ील दरवेश, सुशांत कुमार शर्मा, विहाग वैभव, वीरू सोनकर।

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प्रस्तुत सूची में स्वेच्छा से जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, मैथिलिशरण गुप्त, केदारनाथ अग्रवाल और रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र और मिर्ज़ा ग़ालिब को नहीं शामिल किया गया है। इसके पीछे की दृष्टि यह है कि यह लेखक भारतीय जनमानस में बसे हुए हैं और लगभग सभी प्रदेशों की पाठ्यपुस्तकों में भी शामिल हैं। यह रचनाकार परिचय के मुहताज़ नहीं। हिंदी पढ़ने वालों ने कविता शब्द ही इन्हीं सब से जाना होगा। इसीलिए इन्हें इस सूची में न शामिलकर सर्वोच्च कवि श्रेणी में पढ़ने के लिए अनिवार्य माना गया है।

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पाठकों के प्रति- कवियों का क्रम किसी भी तरह की रैंकिग को प्रदर्शित नहीं करता है। यह लेखक के निजी विचार हैं।

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कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

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