सबसे पहले तो प्रिय पाठकों देरी के लिये हमें क्षमा करें. 19 दिसंबर को गोविंद निहलानी का जन्मदिन होता है और यह आलेख आपको आज पढ़ने को मिल रहा है.

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एक इंसान के सोचने का तरीका कैसा है! यही निर्धारत करता है कि उस व्यक्ति की समझ कैसी होगी. और उसकी अपने जीवन से क्या अपेक्षाएं होंगी? गोविंद निहलानी के बारे में इस बात को समझना है तो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD) में ओमपुरी के देहांत के बाद एक कार्यक्रम में ओमपुरी पर की गई उनकी इस टिप्पणी को पढ़ें-

‘एक अच्छा एक्टर एक रिस्ट वॉच जैसा होता है. उसे देखिए, उसमें एक खूबसूरत डायल होता है और इस डायल के नीचे एक पूरा मैकेनिज्म. ऊपर से यह मैकेनिज्म दिखाई नहीं देता. हम केवल समय देखते हैं, लेकिन इस समय को सामने लाने की पूरी तैयार अंडरग्राउंड रहती है. ओम भी एक ऐसा ही एक्टर था, जिसकी कोई तैयारी ऊपर से नजर नहीं आती थी और यह उसकी एक बड़ी विशेषता थी.’

ओमपुरी को तो हमने ऑनस्क्रीन एक शानदार घड़ी के रूप में काम करते, उनकी एक्टिंग के जरिए जाना था. लेकिन गोविंद निहलानी के सोचने का यह ढंग उनपर भी ओमपुरी जितना ही लागू होता है. गोविंद निहलानी स्वयं स्वीकारते हैं कि बंगलुरू के जिस आर्ट स्कूल में वह सिनेमैटोग्राफी की शिक्षा ले रहे थे, वहां उन्हें सिनेमा से जुड़े सारे हुनर सिखाये जाते थे. चाहे वह सिनेमाटोग्राफी, फोटोग्राफी, एडिटिंग रहे हों या डायरेक्शन. यानि की उनके सिनेमा में दिखने वाली परिपक्वता भी ऐसे ही एक अंडरग्राउंड मैकेनिज्म का कमाल है.

‘आक्रोश’, ‘अर्धसत्य’, ‘द्रोहकाल’ और ‘तमस’ जैसी फिल्में बना चुके गोविंद निहलानी एक दौर में बंगलौर से फिल्मकार बनने की पूरी ट्रेनिंग लेकर मुंबई आये थे. जहां वह मशहूर सिनेमैटोग्राफर-फोटोग्राफर वीके मूर्ति के असिस्टेंट के तौर पर काम करने लगे थे. वैसे यह जानना भी दिलचस्प है कि कैसे सिंध प्रांत की राजधानी कराची में पैदा हुआ यह बालक पढ़ने के लिये बैंगलोर जा पहुंचा?

विभाजन के बाद परिवार उदयपुर आकर बस गया था

गोविंद निहलानी का परिवार देश-विभाजन के बाद उदयपुर आकर बस गया था. यहीं पर अपने एक पेंटर पड़ोसी को देखते हुये कला में उनकी रुचि जागी और एक करीबी फोटोग्राफर ने इसे और बढ़ाया. जिसके बाद गोविंद निहलानी को इन दोनों के बीच के रास्ते सिनेमा के बारे में पता चला. जिसके जादू से प्रभावित हो उन्होंने एक कलाकार बनने की बात पूरी तरह से मन में ठान ली.

कम ही लोग जानते हैं कि गोविंद निहलानी मशहूर सिनेमैटोग्राफर-फोटोग्राफर ‘वीके मूर्ति’ को अपना गुरू भी मानते हैं. वीके मूर्ति अपने वक्त के सर्वश्रेष्ठ कैमरामैन थे. उन्होंने गुरुदत्त की लगभग सभी फिल्मों में सिनेमैटोग्राफी की थी. गोविंद निहलानी जब मुंबई आये तो उन्होंने काफी वक्त वीके मूर्ति के साथ असिस्टेंट के रूप में काम किया. गोविंद निहलानी ने उस दौर में कई मेनस्ट्रीम फिल्मों में भी असिस्टेंट के तौर पर काम किया.

गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल की स्वर्णिम जोड़ी बनी

गोविंद निहलानी अपनी सफलता का श्रेय भारत के मशहूर थियेटर निर्देशक रहे ‘सत्यदेव दुबे’ को भी देते हैं, जिन्होंने उन्हें बहुत प्रभावित किया था. मुंबई आने के बाद उनकी मुलाकात सत्यदेव दुबे से हुई थी. दोनों ने साथ मिलकर विजय तेंदुलकर के नाटक ‘खामोश अदालत जारी है’ पर एक फिल्म बनाई थी. जिसमें सत्यदेव दुबे निर्देशक थे और गोविंद निहलानी कैमरामैन.

बाद में गोविंद निहलानी की मुलाकात सत्यदेव दुबे ने ही ‘श्याम बेनेगल’ से करवाई थी. श्याम बेनेगल के साथ पहले गोविंद निहलानी ने विज्ञापनों के लिये एड फिल्में बनाईं, फिर डॉक्यूमेंट्री और फिर बनाईं वे फिल्में जिन्होंने दोनों की पहचान ही बदल दी. पहली फिल्म ‘अंकुर’ बनाते हुये श्याम बेनेगल ने गोविंद निहलानी को फोटोग्राफी की जिम्मेदारी दी थी. इसके बाद तो दोनों की जोड़ी ने भारतीय सिनेमा में ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘जुनून’ जैसी फिल्मों के रूप में कई झंडे गाड़े.

गोविंद निहलानी जान-बूझकर पैरलल सिनेमा की ओर नहीं बढ़े थे

निर्देशक के तौर पर गोविंद निहलानी की शुरुआत 1980 के दशक में आई फिल्म ‘आक्रोश’ से हुई. यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित थी. और इसकी पटकथा मशहूर नाटककार विजय तेंदुलकर ने लिखी थी. जिसके बाद 1983 में आई उनकी फिल्म ‘अर्धसत्य’. जिसको आज भी भारतीय पुलिस की स्थिति और उसकी समस्याएं दिखा पाने वाली सर्वश्रेष्ठ फिल्म कहा जाता है. कुछ सालों पहले गोविंद निहलानी ने अर्धसत्य-2 बनाने की बात भी कही थी पर उसके बाद से इसपर और कोई प्रगति सामने नहीं आई है.

अर्धसत्य ने अलग-अलग वर्गों में पांच ‘फिल्मफेयर पुरस्कार’ जीते थे. राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर बेहतरीन तरीके से फिल्में बनाने वाले गोविंद निहलानी ने पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी आंदोलन पर भी फिल्म बनाई. यह फिल्म महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘हजार चौरासी की मां’ पर आधारित थी और इसी नाम से बनाई गयी थी. फिल्म में जया भादुड़ी ने शानदार अभिनय किया था और इसे आलोचकों ने बहुत सराहा था. पर गोविंद निहलानी का कहना है कि उन्होंने पैरलल सिनेमा को जान-बूझकर नहीं चुना था. पर उनकी समझ, उनके साथियों ने उन्हें इसी तरह के सिनेमा में आगे बढ़ने को सही बताया.

हालांकि गोविंद निहलानी बताते हैं कि परिस्थितियों के चलते उन्हें बस आर्ट फिल्में (पैरलल सिनेमा की फिल्में) ही ज्यादा मिलीं. पर वे खुद भी यह बात स्वीकारते हैं कि केवल आर्ट फिल्में करने के उन्हें कुछ नुकसान भी हुये. गोविंद कहते हैं कि ऐसा होने से, ये तो आर्ट फिल्म वाले हैं, आर्ट फिल्म की फोटोग्राफी करते हैं का ठप्पा उनपर लग गया. कमर्शियल सिनेमा से ज्यादा ऑफर नहीं आये. पर आर्ट सिनेमा/ पैरलल सिनेमा में काफी काम मिला. हालांकि उन फिल्मों की इकॉनमी दूसरी होती है. पर वो गोविंद निहलानी ही हैं, जिन्हें रिचर्ड एटनबरो की फिल्म ‘गांधी’ में सिनेमैटोग्राफी का मौका मिला.

ओमपुरी से खास अलग नहीं हैं गोविंद निहलानी

गोविंद निहलानी ने एक बार ओम पुरी के बारे में कहा था कि ओमपुरी अपने स्टारडम को खुद पर हावी नहीं होने देते. माने खुद का एक अलहदा स्टाइल बनाकर हर फिल्म में कॉपी करने का सुरक्षित रास्ता अख्तियार करने से बचते हैं. यह बात गोविंद निहलानी पर भी वैसे ही लागू होती है, इसलिये उन्होंने अपनी संजीदगी बनाये रखी पर उनकी फिल्मों के विषय बदलते चले गये. आक्रोश, अर्धसत्य और तमस बनाने वाले निहलानी ने इसलिये अागे चलकर ‘देव’, ‘तक्षक’ और ‘देहम’ भी बनाईं.

 

गोविंद निहलानी इस बात को बखूबी जानते है बल्कि कहा जा सकता है कि उनके सिनेमा की शुरुआत ही इसी अवधारणा से होती है कि किसी फॉर्मूला को दोहराकर सुरक्षित रास्ता अख्तियार करने की कोशिश न की जाये. नहीं तो ऐसा सिनेमा बनाने की ज़हमत कौन उठायेगा, जिसमें मुख्य किरदार एक भी संवाद नहीं बोलता (आक्रोश), और जब बोलता है तो सिर्फ चिल्लाता है. यानि उसे अपनी सारी भावनाएं केवल अपने रिएक्शन से व्यक्त करनी हैं. फिर भी गोविंद निहलानी अपनी कला को लेकर इतने आश्वस्त थे कि उनमें यह क्षमता कूट-कूटकर भरी है कि वह भावों को कैमरे की पकड़ से बचने नहीं देंगे.

पर गोविंद निहलानी का पहलाज निहलानी से कोई रिश्ता नहीं है

6 बार नेशनल अवॉर्ड और पद्मश्री से नवाजे जा चुके गोविंद निहलानी का नाम एकाधिक बार विवादित पूर्व CBFC चीफ पहलाज निहलानी से जोड़ा गया है. खास बात यह है कि देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित न्यूज वेबसाइट ने उन्हें एक दौर में पहलाज निहलानी का भाई बताया था. यह गलती इसलिये हुई क्योंकि विकिपीडिया पर किसी ने लिख दिया था कि दोनों भाई हैं.

आपको अगर मेरी बात पर विश्वास न हो तो अपनी मनपसंद न्यूज वेबसाइट (हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में) पर ‘गोविंद-पहलाज-भाई-आपकी मनपसंद वेबसाइट का नाम’ की-वर्ड्स के साथ सर्च कर सकते हैं, आपके हाथ एक-आध लिंक तो आ ही जायेंगे जिसमें अमुक वेबसाइट ने दोनों को भाई बताया होगा. इसमें स्क्रॉल और कुछ वेबसाइट्स अपवाद हैं. वैसे अगर न ढूंढ पायें और कठफोड़वा के दावे पर शक हो तो हमें फेसबुक, ट्विटर या खबर के नीचे दिये हमारे मेल पर संपर्क कर सकते हैं, हम आपको उपलब्ध करा देंगे. स्क्रीनशॉट ही तो कलियुग का ब्रह्मास्त्र है.

बाद में आराम से खबरें खोजियेगा, पहले हम आपको बता दें कि कुछ न्यूज वेबसाइट्स ने इस भ्रम को बाद में तोड़ने का भी प्रयास किया पर यह झूठ इस स्तर पर प्रसारित हो चुका था कि इससे उबरना आज भी मुश्किल है. पर जरा सोचिये कि जब गोविंद निहलानी का पक्ष, पहलाज निहलानी से जुड़े हर विवाद पर जानने मीडियाकर्मी पहुंचते होंगे तो गोविंद निहलानी को कैसा लगता होगा? वह उन पत्रकारों की जानकारी पर गुस्साते होंगे, हंसते होंगे या इसमें भी फिल्म का कोई दृश्य ढूंढ़ने लगते होंगे!

बहरहाल इंसान गलतियों का पुतला और आज के तेज खबरों के दौर के चलते फैक्ट रीचेकिंग रह जाना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है. बस पत्रकार फिक्शन न रचने लगें. किसी जगह पहलाज को छोटा बताया गया है, किसी जगह गोविंद को. जबकि दोनों में भाई का संबंध तो क्या, दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं है.

अंतत: गोविंद निहलानी का इतना महत्व समझें कि उनकी फिल्में पैरलल सिनेमा की आदर्श फिल्में हैं. क्योंकि अधिकतर पैरलल सिनेमा की फिल्मों की तरह उनकी फिल्में थियेटर में या स्क्रीन पर ही खत्म नहीं हो जातीं बल्कि हमारी जिन्दगी ही उनकी स्क्रीन बन जाती है. ये फिल्में हमें संवेदनशील बनाती हैं, सोचने पर मजबूर करती हैं. और इस प्रक्रिया के जरिये हमें वह तमाम गलतियां करने से बचा लेती हैं, जो हम स्वभावत: या अपने पूर्वाग्रहों के वशीभूत होकर कर सकते थे.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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