कुछ दिनों पहले जाने-माने पत्रकार रवीश कुमार ने देश में बेरोजगार युवाओं के मसले पर अपनी नई प्राइम टाइम सीरीज शुरू की है. यह बहुत ही सुखद है, ऐसे समय में जब कोई रोजगार और शिक्षा की बात नहीं कर रहा है. खासकर मुख्यधारा की मीडिया इन मुद्दों को कोई तवज्जो नहीं दे रही है. ये सिर्फ देश को झूठे आंकड़ों और बहसबाजी के जाल में फंसाये रखना चाहती है. एक युवा होने के नाते मैं यह कह सकता हूं कि मैं भी सभी की तरह बेरोजगारी से परेशान हूं लेकिन थोड़ा बहुत अन्य स्किल जान लेने की वजह से इसका असर मुझपर थोड़ा कम है. बेरोजगारी के मसले पर मेरे कुछ अनुभव हैं, जिसे मैं आप लोगों से साझा कर रहा हूं.
मेरा वास्ता बेरोजगारी की समस्या से पहली बार तब हुआ जब मैंने पांच साल पहले इलाहबाद में कदम रखा. यूं तो यह शहर कुंभनगरी और पूरब के ऑक्सफोर्ड यानी इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वजह से विख्यात है. लेकिन यहां आकर मेरा अनुभव कुछ अलग किस्म का रहा. हर ओर सिर्फ सरकारी नौकरी पाने का ही बोलबाला था. चौराहे पर लगे बैनर पोस्टर से लेकर लॉज में रहने वाले लड़कों के मुंह से हर वक्त सरकारी नौकरी की ही बातें सुनने को मिलतीं. कोई नई सरकारी भर्ती के विज्ञापन की बातें करता तो कोई अभी-अभी खुले नए कोचिंग सेंटर में दाखिले की, तो कुछ भर्ती की किताबों में ही सिर गड़ाये रहते थे. कुल मिलाकर यहां आकर मैंने सरकारी नौकरी की अहमियत को पहली बार जाना था.
रेलवे के ग्रुप डी यानी चतुर्थ श्रेणी की भर्ती से लेकर पीसीएस तक की परीक्षा में बैठने वाले कई लड़कों से मैं उस दौरान मिला था. इस बारे में पूछने पर उनका बिलकुल सीधा सा जवाब होता था, ‘हमारा मकसद सिर्फ सरकारी नौकरी पाना है. एक बार बस सिस्टम में घुस जाए, फिर धीरे-धीरे उच्च श्रेणी की नौकरी की तैयारी करते रहेंगे.’ यानी वे पहले किसी तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहते थे. इन प्रतियोगी छात्रों में ज्यादातर गांव से आये बच्चे होते जो इलाहाबाद के आसपास या फिर दूरदराज यहां तक की बिहार से भी कई लड़के मुझे तैयारी करते मिले. कुछ लड़के इंटरमीडिएट के बाद सीधे यहीं चले आये थे तो कुछ स्नातक पूरा करने के बाद आये थे.
जहां मैं रहता था वहां रहने वाले अधिकतर लोग बड़ी उम्र के थे यानी स्नातक या परास्नातक पूरा कर चुके थे. इन लोगों को यहां रहकर तैयारी करते कई साल हो गए थे, ऐसे में इनपर जल्द नौकरी पाने का दबाव अधिक था. अक्सर शाम को जब खाने के बाद मैं इनके साथ छत पर टहलता तो ये लोग अपने किसी साथी की चर्चा करते जिसको हाल-फिलहाल में सरकारी नौकरी लगी हो. कुछ अपनी कमियों की बात करके खुद को कोसते तो कई लोग उसकी मेहनत की तारीफ़ कर घंटे गिनाते की वो हर राज इतने घंटे पढ़ाई करता था. फिर क्या, एक नए टाइम टेबल और नयी वैकेन्सी के इंतज़ार में ये लोग फिर लग जाते.
उस दौरान मैं प्रोफेसनल कोर्स कर रहा था ऐसे में मेरी गिनती उनके बीच अलग तरीके से की जाती थी. कई लोग इसके लिए मेरी तारीफ भी किया करते थे. इसका मकसद सिर्फ इतना था कि मुझे आसानी से कोर्स करने के बाद नौकरी मिल जाएगी और इस तैयारी के झंझट से मेरा कोई वास्ता नहीं होगा. मैंने कई लोगों से बात की जो पिछले लंबे अरसे से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगे थे. उनका सिर्फ इतना कहना था कि किसी तरह इन किताबों से मुक्ति मिल जाए. यानी नौकरी लग जाए, इन किताबों को पढ़ना उनका शौक नहीं बल्कि एक तरह की मजबूरी थी. मगर नौकरी का कहीं कोई ठिकाना नहीं था.
एक ख़ास बात जो अक्सर मुझे इस शहर की आज भी याद दिलाती है, वो है दारागंज की कच्ची सड़क और बांध पर यूनिवर्सिटी के रास्ते जाने वाली सड़क पर अक्सर मिलने वाले एक भैया, जिनका मैं नाम नहीं जानता हूं. उन्होंने कभी मुझे अपना नाम नहीं बताया. वह अक्सर मैले कपड़े पहने हुए, अपने लंबे बालों के साथ मुझे मिल जाया करते थे. पूरे रास्ते इतिहास, भूगोल से लेकर लोक प्रशासन की अनेक थ्योरी सुनाते. मुझे आश्चर्य होता इन विषयों पर उनकी मजबूत पकड़ को जानकर. खासकर लोकप्रशासन के बारे में. इसकी कई थ्योरी को पहली बार मैंने उनसे ही सुना था. कई महीनों बाद उनके बारे में यह जानकर मुझे दुःख हुआ कि वे इलाहाबाद में सिविल सर्विसेस की तैयारी करते थे. नौकरी न मिलने की वजह से उनकी मानसिक स्थिति खराब हो गयी थी. लेकिन आज भी उनको अपना पढ़ा सब याद है और वो हर वक्त उसे ही दुहराते रहते थे.
दारागंज की कच्ची सड़क मुझे इसलिए भाती है क्योंकि यहां शाम को सब्जी लेने जाने पर अनायास ही दसियों प्रतियोगी लड़कों से हर रोज आपकी सलाम दुआ हो जायेगी, भले ही आप उन्हें ठीक से जानते हों या न हों, या एकाध बार शहर में कहीं मिले हो. यही वो जगह है जहां आसपास के लगभग सभी प्रतियोगी छात्र सब्जी लेने आते थे. पतली सड़क पर चारों ओर सब्जी के ठेले नजर आते तो कुछ जगहों पर चाट और समोसे जलेबी वाले बैठे रहते थे. सबकी नजर इन लड़कों पर ही होती यानी यही वहां के असंगठित बाजार के सबसे बड़े रीढ़ थे. इनके ही भरोसे कई लोग इस छोटे से शहर में अपना बाजार सजाये थे. क्योंकि यही उनके सामानों के सबसे बड़े खरीदार होते हैं. आसपास के स्थानीय परिवार वाले सब्जियां थोक से सब्जी मंडी से ले आते थे. लेकिन ये लड़के ही थे जो आधापाव और एक पाव के खरीदार बनकर सैकड़ों लोगों को रोजगार दिए हुए थे. भले ही उन लोगों को आज तक रोजगार नसीब नहीं हुआ है. इलाहाबाद के छोटे मुहल्लों की आर्थिक बाजार का सर्वे करना हो तो दिवाली और होली सही समय है. इस समय ये बाजार बंद रहते हैं. क्योंकि सभी प्रतियोगी अपने घर चले जाते हैं। और पूरा बाजार सूना हो जाता है.
इलाहाबाद शहर में ऐसे अनेक मुहल्ले हैं जहां प्रतियोगी छात्र घर से दूर रहकर सरकारी नौकरियों की तैयारी में जुटे रहते हैं. ये भी इनकी इनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी पर निर्भर करता है कि वे किस मुहल्ले में रहे. यानी कहीं कमरों का किराया अधिक होता है और कहीं कम. यहां इसका भी अपना एक गणित है. मकान मालिक कमरे का किराया कब बढ़ा कर लड़कों पर आर्थिक बोझ बढ़ा दे कुछ कहा नहीं जा सकता. सख्त पाबंदी और नियम कानून की घुट्टी अलग से मकान मालिक अक्सर इन लड़कों को पिलाते रहते हैं. जैसे रात में कब कमरे पर आना है, किस तरह के लड़कों को कमरे पर ला सकते हो, एक साथ कितने लोग रह सकते हो, नहाने धोने से लेकर अनगिनत बातें जो हर रोज इनको अपने जेहन में तरोताजा रखनी पड़ती थी. ये अलग बात है कि कमरे में पुराने होने पर ये बातें मकान मालिक से ख़ास संबंधों और व्यवहार की वजह से धूमिल हो जाएं लेकिन फिर भी डर हमेशा ही बना रहता है. इन सब जोखिमों के साथ रहते हुए हर दिन सरकारी नौकरी पाने की जद्दोजहद अलग ही अपना जगह बनाये रहती थी.
एक घटना मुझे आज भी याद है जब 2014 में उत्तर प्रदेश पुलिस भर्ती के लिए सैकड़ो लड़के सुबह -शाम परेड ग्राउंड में जमे रहते थे. अचानक से शहर की आबादी में बढ़ोतरी हो गयी थी. सभी खाली कमरे भर गए. कई जगह एक कमरे में दो लड़कों की जगह तीन लडके रहने लगे. दरअसल ये भीड़ एक तरह से मौसमी भीड़ थी, यानी इसमें अधिकतर लडके गांव देहात के थे जो ख़ास इस भर्ती के लिए कोचिंग करने शहर आये थे. इनकी पारिवारिक आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से ये लोग बारहों महीने कमरा किराये पर लेकर शहर में नहीं रह सकते थे. ऐसे में मौसमी बेरोजगारों की तरह ये भी नौकरी की चाह में शहर पलायन कर गए थे. बाद में यह भर्ती कई वजहों से विवादों में बनी रही. लेकिन कईयों की उम्मीदों को ढहाकर फिर इसी शहर में कुछ साल और तैयारी करने को छोड़ गयी.
मैं ऐसे कई बेरोजगार युवकों से मिला हूं जो अब निराश होकर इलाहाबाद छोड़ना चाहते हैं. लेकिन इनके सामने एक बड़ा संकट यहां से निकलना है. तैयारी बीच में छोड़ कर जाने पर इन्हें दोहरी चिंता सता रही है. पहली उन लोगों के सवालों से जूझना जिन्होंने कई साल तक पैसे देकर शहर में सरकारी नौकरी पाने को भेजा है दूसरा कहीं और जाकर प्राइवेट नौकरी की तलाश करना. इसकी बड़ी समस्या इन लोगों के पास किसी दूसरी स्किल का न होना है.
खुद हमारे प्रधानमंत्री भी जब 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार करने इलाहाबाद आये थे, तो उन्होंने भी इस शहर की नब्ज पकड़ ली थी. और यहां अपनी रैली में सिर्फ बेरोजगारी और शिक्षा को अपना मुद्दा बनाया था. जिसमें इलहाबाद विश्विद्यालय को उसकी पुरानी विरासत वापस दिलाने से लेकर नए रोजगार सृजन की बातें खूब जोरशोर से की थी. दुःख है कि आज भी उनका वो भाषण सुनने वाले कई प्रतियोगी पहले की तरह ही शहर में रोजगार की चाह में जमे हुए है.
अब सवाल पूछना बिलकुल जायज है. आखिर पिछले कुछ वर्षों से नए रोजगार पैदा क्यों नहीं हुए. खासकर सरकारी सेक्टर में. क्या जानबूझकर सरकार इन पदों पर रोक लगाए बैठी है. जैसा कि अधिकतर प्रतियोगी छात्र अपने पुराने अनुभवों से बताते हैं. वे लोग मानते हैं कि 2019 के चुनाव से पहले खूब भर्तियों के विज्ञापन आयेंगे. इसकी वजह सरकार का इन बेरोजगारों से राजनीतिक फायदा लेना है. आज भी बेरोजगारों को सरकार से रोजगार की उम्मीद है. लेकिन सरकार हर रोज नए-नए तर्क गढ़कर बेरोजगारी की समस्या से किनारा कर लेती है. हाल में प्रधानमंत्री का एक प्राइवेट टेलीविज़न को दिए गए इंटरव्यू में कुछ येसे ही संकेत दिखे. जिसमें उन्होंने पकौड़े तलने को भी रोजगार सृजन की संज्ञा दी. इसे वो स्वरोजगार कहते है.
इसी तरह सरकार अपने स्किल इंडिया का ढिंढोरा भी कई साल से खूब पीट रही है. लेकिन कायदे से एकाध लड़के को भी अगर इस योजना ने रोजगार पाने लायक बना दिया हो तो मैं इसे सफल मानूंगा. खुद सरकारी एजेंसियां भी इसकी हकीकत से वाकिफ हैं. स्किल इंडिया के साथ बड़ी समस्या यह है कि इसमें सिर्फ बेसिक ट्रेनिंग सिखाई जाती है. जैसे यहां आप कंप्यूटर में पेंट और एमएस वर्ड से ज्यादा शायद ही सीख पाओ. इसी तरह दूसरे वोकेशनल कोर्सों का भी यही हाल है.
स्टार्ट अप इंडिया को लेकर भी केंद्र सरकार ने खूब लम्बे वादे किए. इसे नए रोजगार और नए युवा उद्यमी पैदा करने वाली योजना कहा गया. मगर चार साल बाद भी मुझे एक भी येसा युवा उद्यमी नजर नहीं आया जो ये कहे की उसकी सफलता में स्टार्टअप इंडिया की भूमिका है.
सरकार से गुजारिश है कि अब वो बेरोजगारों को नई योजनाओं के जाल में न फंसाए. अगर कायदे से वो उनके लिए रोजगार कि व्यवस्था नहीं कर सकती है तो कम से कम पकौड़ा तलने को तो रोजगार न कहें.
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यह लेख सुशील कुमार ने लिखा है. सुशील ने इलाहाबद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में स्नातक किया है. भारतीय जनसंचार संस्थान से इन्होने विज्ञापन और जनसम्पर्क की पढ़ाई की है.

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