पिछले तीन दिनों में बलात्कार की दो घटनाओं ने देश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया है. मुझे नहीं पता कि ‘आरोपी माननीय’ और ‘आरोपी सेवानिवृत्त राजस्व अधिकारी’ को सजा मिलेगी या नहीं. लेकिन दोनों घटनाओं में सरकार से जुड़े लोगों का ‘सहयोग’ न्याय की आस पर चोट तो करता ही है. सरकार न सही, न्यायालय की ओर से उठाये गए कदम अभी भी न्याय की उम्मीद जिन्दा रखे हुए हैं.
दोनों ही मामले नाबालिग लड़कियों के प्रति हुए अपराध के वीभत्स उदाहरण हैं जो अपने-अपने प्रकार में भयावहता की पराकाष्ठा दिखलाते हैं. सबसे ज्यादा शर्मनाक आरोपियों का उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करना है जो समाज में श्रेष्ठ, सम्माननीय, प्रतिष्ठित और पढ़े लिखे माने जाते हैं. इनके ऊपर समाज की दिशा निर्धारित करने की जिम्मेदारी है. ये समाज को कानून और न्याय के मार्ग पर चलाने के लिए जिम्मेदार हैं.
उन्नाव की घटना में जहाँ सरकारी एजेंसियों ने पहले तो अकर्मण्यता दिखाई वहीं बाद में उससे भी निकृष्ट स्तर की धूर्तता. ये स्वीकार्य तथ्य है कि समाज में एक व्यक्ति या एक संस्था अकेले अपराध रोकने में असमर्थ है. यदि ऐसा दावा कोई भी करता है तो निश्चित रूप से वह पूरे समाज को और उसके निवासियों को अव्वल दर्जे का मूर्ख समझता है. लेकिन फिर भी अपराध हो जाने पर भी, यदि अपराधियों को संरक्षण मिलता है तो यह अगले अपराध को जन्म देने जितना ही कुत्सित और निंदनीय है.
इसके लिए भी अकेले एक व्यक्ति की जवाबदेही तय करके आप अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते. इसके लिए सरकार और उसकी संस्थाओं के जितना ही दोषी वह लोग भी हैं, जो आज भी आरोपी को माननीय बना कर उसकी पूजा अर्चना कर रहे हैं. निष्पक्ष जांच की मांग करना अनुचित नहीं है, आरोपी को भी ऐसी मांग करने का पूरा अधिकार है. लेकिन सरकारी जांच एजेंसियों का निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी है.
नाबालिग लड़की के रेप का आरोपी बीजेपी एमएलए कुलदीप सिंह सेंगर
दूसरी तरफ कठुआ की घटना. ये नवरात्रि मनाने वाले, देवी के नाम पर कन्या पूजन करने वाले लोगों से भरा समाज है. उसी देवी के मंदिर में एक आठ साल की बच्ची को आठ दिन तक बंधक बनाये रखा जाता है. यहाँ सामूहिक बलात्कार का मुख्य आरोपी सेवानिवृत्त अधिकारी होता है, जो उसी मंदिर का संस्थापक पुजारी है. जिस नृशंस तरीके से इस दुष्कर्म को किया गया, उससे आरोपी कुछ भी हों कम से कम मनुष्य तो नहीं हो सकते. इतनी कड़वाहट, इतनी हवस किसके लिए? एक आठ साल की बच्ची के लिए. देवी के मंदिर में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म होता रहा. होश में ला ला कर, भूखा प्यासा रखकर, अंतिम सांस तक. उस पर भी आरोपियों में वो पुलिस वाले, जिनकी जिम्मेदारी उस लापता बच्ची को ढूंढने की थी.
अगर ये रक्षक हैं तो भक्षक क्या होते होंगे? ऐसी बेचैनी भर देने के बाद अगर समाज किसी व्यक्ति के हथियार उठा लेने या उसके आत्मदाह कर लेने को गलत ठहराए, तो कम से कम साथ में सही रास्ता भी बता दे. जिनसे न्याय की उम्मीद रखी जाए वही अन्याय के प्रवर्तक हों तो पीड़ित कहाँ से आस लगाये. इसके बाद भी अगर ईश्वर पर भरोसा है तो वाकई हम दुनिया के सबसे सहनशील समाजों में से एक हैं.
जो लोग कहते हैं मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करने से उसमें ईश्वर का अंश आ जाता है, वही हैं जो मंदिर मस्जिद के नाम पर भगवान के बनाये इंसानों को काट डालते हैं. कह दो कि मंदिर में बैठा भगवान अँधा है, आसमान से झांकता खुदा बहरा है. अगर ऐसा न होता तो आठ दिन तक एक बच्ची की इज्ज़त रौंदे जाते देख, ‘वो’ भी ज़मीन पर उतर आता. कहानियों में तो चीर हरण पर भी भगवान आ जाया करते थे. अब शायद वो भी भक्ति का आनंद लेने में व्यस्त हों.
मेरा यह सब लिखना भावातिरेक का परिणाम समझा जा सकता है. मैं स्वयं को भी उसी समाज का हिस्सा पाता हूँ. जो अपने हितों के हिसाब से आवाज उठाने और दबाने में यकीन रखता है. इस लिए मैं खुद भी उतना ही दोषी हूँ जितना और सब. मेरी भी वही गलती है जो इस समाज की और  इसके घटकों की है. मैं भी नारों और स्लोगनों पर यकीन कर लेने वाला मूर्ख हूँ. लेकिन शायद उतना भी मूर्ख नहीं, जितना वो लोग जो कभी जाति के नाम पर कभी धर्म के नाम पर, उन अपराधियों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं जिनका अगला शिकार वो खुद भी हो सकते हैं. कम से कम आज मैं खुद को मानुषिक समाज का निवासी कहाने में सकुचा रहा हूँ. आप की आप जाने. आखिर में आपको और सरकार के ‘मौनव्रतियों’ को ‘दिनकर’ जी के हवाले कर रहा हूँ –
“मखमल के पर्दों के बाहर, फूलों के उस पार
ज्यों का त्यों है खड़ा, आज भी मरघट सा संसार.
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध.”

 

कठफोड़वा के लिए यह लेख लिखा है अनुजदीप ने. अनुज दीप यादव किताबों के रसिया हैं. जीवन के समर का शांत योद्धा. आजकल बच्चों को ज़िन्दगी जीने का हुनर सिखाते हैं. यानि की पेशे से शिक्षक है.साथ ही साथ कलक्ट्री की तैयारी में भी लगे हुए हैं. जीवन में रूचि है इसलिए जब मन दुनिया की बेइमानियों से परेशान हो जाता है तो उनकी कलम चलने लगती है.

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