हम असम को नहीं जानते. बस मानचित्रों, किताब के कुछ पन्नों और अख़बार की सुर्ख़ियों से असम का हल्का-फुल्का परिचय हासिल किया है. यह परिचय भी केवल नाम और राजधानी छोड़कर यादों के कोने में बहुत देर नहीं टिकता. लेकिन भारतीयता का एक जुड़ाव है, जो बिना जाने, सोचे-समझे असम से एक लगाव के रूप में हमेशा हमारी पहचान के साथ-साथ चलता रहता है. शायद इस अनूठे लगाव को ही राष्ट्र की खासियत कहते हैं. लेकिन लगाव भी बड़ा अजीब होता है, जैसे ही जीवनशैली, भाषा आदि के अलगाव के साथ जुड़ाव होता है खुद को बेहद कटा, अनज़ान पाने लगता है. असम की मौजूदा हालत और शेष भारत की उसकी प्रति बेखबरी राष्ट्र जैसे किसी लगाव पर भरोसा पैदा नहीं करने देती.

असम में शरणार्थियों की बीहड़ और भयावह समस्या को सुलझाने के लिए पिछले तीन सालों से सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में नया नेशनल नागरिक रजिस्टर बनाने की तैयारी चल रही थी. इससे पहले वाला सन 1951 में बना था. इस प्रक्रिया के सहारे ही असम के मूल नागरिकों की पहचान की जानी है. वर्ष 2017 के अंतिम दिन NRC ने पहला मसौदा आम जनता के बीच रखा. कुल 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता हासिल करने के लिए आवेदन किया था, जिसमें से केवल 1.9 करोड़ लोगों को ही पहले मसौदे में शामिल किया गया है. मतलब शामिल न होने वाले लोगों में नागरिक न बनने की बेचैनी पनपी हुई है. शेष भारत और बांग्लादेश से जुड़ा असम का दक्षिणी भाग अशांति की लहरों में तैर रहा है. अशांति के इन लहरों को वही समझ सकता है, जिसने बड़ी मेहनत से घर बनाया हो और आग की लपटों की वजह से गंवा भी दिया हो.

देशों की स्थलबद्ध सीमाओं पर मौजूद दुनिया के सारे क्षेत्र एक अजीब सी स्थिति में रहने के लिये बाध्य होते हैं. सीमाएं कृत्रिम होती हैं जो जीविका और बेहतर जीवन की चाहत में स्वाभाविक रूप से टूटती रहती हैं. लोगों का आवागमन तमाम बाधाओं के बाद भी होता रहता है. यह हालत देश के अन्दर हो तो सरकारों को कोई समस्या नहीं होती है. कहने का मतलब यह है की भले पूरा बिहार, दिल्ली या मुम्बई में बस जाए, इसका विरोध होने पर इसे क्षेत्रवाद की संकीर्ण मानसिकता बताकर नकार दिया जायेगा. लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं को ऐसी सहूलियत हासिल नहीं है. वह देश की होती है और अपना अधिकार कॉलर पकड़कर मांगने में यकीन रखती हैं.

आज़ादी के पहले और बाद में भी असम अपने आजू-बाजू के लोगों के लिए जीविका और अच्छे जीवन स्तर के लिए बेहतर जगह रहा. भारत में बंगाल, झारखंड, बिहार और छत्तीसगढ़ के प्रवासियों ने असम में रहकर जीना चुना तो बांग्लादेश की अशांत स्थितियां असम से सटे बांग्लादेशियों को हमेशा असम में धकेलती रहीं. लेकिन आवागमन के इस बहाव ने असम की मूल जनांकीय ढांचे को पूरी तरह ढाह दिया है. साल 1991 से 2001 के बीच असमिया बोलने वाले लोगों की संख्या 58 फीसदी से कम होकर 48 प्रतिशत रह गयी. बंगाली बोलने वाले लोगों की संख्या 21 फीसदी से बढ़कर 28 फीसदी हो गयी. साल 2011 के भाषाई आंकड़े अभी प्रकाशित नहीं हुए हैं लेकिन प्रवृत्तियों के लिहाज से कहा जा सकता है की असमिया भाषी वर्तमान में तकरीबन 40 फीसदी हैं और बंगाली भाषी तकरीबन एक तिहाई.

आज़ादी के समय असम में मुस्लिमों की आबादी में हिस्सेदारी तकरीबन 25 फीसदी थी जो 2011 में बढ़कर 34 फीसदी हो गयी है. प्रवास और उत्प्रवास ने मिलकर हर जगह के ढांचें में बदलाव किया है . लेकिन असम हर जगह नहीं हैं की इसे सहन कर लिया जाए. यह दो देशों के बीच मौजूद भूमि पर अपनी जिंदगी जीता है. इसलिए प्रवासियों को लेकर असम की राजनीति आज़ादी के बाद से लेकर अब तक उफान रही है . असम गण परिषद् की स्थापना में प्रवासी मुद्दे ने ही सबसे अधिक भूमिका निभाई थी. असम की राजनीति और समाज में साल 1985 का असम समझौता प्रवासियों से जुड़े एक प्रावधान के लिए मील का पथर है. इस समझौते के तहत 25 मार्च 1971 के बाद असम में आये शरणार्थियों को उनके देश वापस भेजे जाने का प्रावधान है. इसी प्रवधान के आधार पर नेशनल नागरिक रजिस्टर भी काम रहा है. असम के मूल नागरिक के तौर पर NRC उन्हें ही शामिल कर रही है जो साल 1971 से पहले असम से जुड़ी अपनी पहचान बताने में सफल हो पा रहे हैं.

यह तरीका सही भी है और बड़ा अज़ीब भी है. अगर व्यवाहरिकता के धरातल पर आकर सोचें तो यह साफ़ दिखता है कि प्रवासी, मूल नागरिकों की अर्थसत्ता पर सेंध लगा देते हैं. इससे सबसे अधिक परेशान प्रवासी स्थल का निचला तबका होता है जो दैनिक, पाक्षिक और मासिक मजदूरी पर अपनी जिंदगी गुजारता है. इसके मन में प्रवासियों को लेकर नफरत घर करने लगती है. प्रवासियों को लेकर एक चिढ़न हर धरतीपुत्र में होती है. और धरतीपुत्र राजनीति से यह अपेक्षा रखता है कि वह उसकी परेशानियों का समाधान करे. देश के भीतर तो यह राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पाता लेकिन देश की सीमायों पर मौजूद ऐसी स्थितियां राजनीति के लिए चुनौती और अवसर दोनों बनती हैं. इस तरह से कांग्रेस और भाजपा ने इस पर जमकर राजनीति की है. साम्प्रदायिकता के आधार पर राजनीति करने वालों के लिए तो यह उपजाऊ जमीन है. प्रवासी की समस्या के साथ अलगाव की राजनीति आसान हो जाती है.

नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन होने जा रहा है. इस संशोधन के एक प्रावधान का अर्थ यह कहना है कि हिन्दू, बौद्ध और जैन समुदाय से जुड़े लोगों को छोड़कर भारत के पड़ोसी देश से जुड़े किसी व्यक्ति को भारत की नागरिकता हासिल नहीं होगी. जिसका सीधा अर्थ यह हुआ की मुस्लिम समुदाय से जुड़े पडोसी देश के व्यक्ति भारत की नागरिकता के अधिकारी हो ही नहीं सकते. पहले मसौदे में न शामिल होने वाले लोगों की सबसे बड़ी चिंता यह संशोधन बिल बनकर उभरा है. एक बार वे नेशनल नागरिक रजिस्टर को मसौदा अथवा ड्राफ्ट मानकर भूलने की कोशिश कर भी रहे हैं तब तक नागरिकता अधिनियम में होने वाले बदलाव की बात उन्हें बेचैन कर दे रही है. भीतर ही भीतर दक्षिणी असम के एथनिक, भाषाई और धार्मिक ताने-बाने में टूटन के सारे हालात घर कर गये हैं. अब देखना यह होगा की राजनीति इसे संभाल पाती है या भीतर की टूटन और सुगबुगाहट किसी सुनामी को पैदा करती है.

_____________________________________________________________________

यह लेख आप कठफोड़वा.कॉम पर पढ़ रहे थे. आगे भी हमारे लेख और वीडियोज़ पाते रहने के लिये हमें फेसबुक और ट्विटर पर लाइक करें और यूट्यूब पर सब्सक्राइब करें-

कठफोड़वा फेसबुक

कठफोड़वा ट्विटर

कठफोड़वा यूट्यूब

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here