यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस  के द आइडियाज पेज  पर छपे लेख प्राइड एंड प्रेज्यूडिस  की हिंदी में प्रस्तुति है. इस लेख को लिखने वाले बद्रीनारायण, गोविंद बल्लभ पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, इलाहाबाद में प्रोफेसर हैं. आप कविताएं भी लिखते हैं.

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स्मृतियों की खुद की राजनीति होती है. जबकि वे एक सामाजिक समूह के गौरव को जन्म दे सकती हैं, दूसरे के लिये वे अपराध और शर्मिंदगी की वजह बन सकती हैं. इसलिये एक ही घटना की स्मृति दो अलग-अलग तरह के परिणाम पैदा कर सकती है. इसीलिये प्रसिद्ध इतिहासकार एरिक हॉब्सबॉम ने बार-बार हमें स्मृतियों पर आधारित राजनीति के बारे में चेताया है.

स्मृतियां अस्मिता की राजनीति का आधार होती हैं. सामाजिक समूहों की अस्मिता स्मृतियों के जरिए ही बनाई जाती है और उसका विरोध भी स्मृति के प्रयोग के जरिए ही होता है. जबकि अस्मिता की राजनीति किसी समूह या शाखा के लिये एक समर्थन का आधार तैयार करती है, यही राजनीति इन समूहों के लिये विरोध को भी बढ़ावा देती है. भारत में दलित राजनीति का स्वर और काल भी ऐसी ही अस्मिता की राजनीति के साथ सामाजिक-आर्थिक प्रश्न से भी जुड़ा हुआ है. लेकिन जबकि स्मृति आधारित राजनीति ने दलित समुदायों की साथ आने में सहायता की है, इसने उनके विरोधी समुदायों को भी साथ आने में सहायता दी है.

केवल कुछ घटनाएं स्मृतियों में बदलती हैं. ऐसी घटनाओं पर आधारित स्मृतियां यादगार बन जाती हैं. उनको आधार बनाकर सालाना कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है. याद करना एक साधारण मानवीय क्रिया है पर राजनीति किसी कारण विशेष के चलते स्मृतियों को जिंदा रखती है. किन्हीं घटनाओं के विरोधियों के पक्ष में जाने वाली स्मृतियों के लिये शहरों के नाम बदलना, औपनिवेशिक यादगारों को ध्वस्त करना या किसी सामाजिक समूह की मूर्तियों या धरोहरों को तोड़ना इन ढांचों को मात्र स्मृतियों का निर्माता नहीं रहने देते हैं. वह उन्हें राजनीतिक स्मृतियों के वाहक में बदल देता है.

उपन्यासकार मिलन कुंदेरा ने ठीक ही कहा है कि लोगों का राज्य के प्रति संघर्ष याद रखने का, भूलने के प्रति संघर्ष है. इस प्रक्रिया के जरिए, कई हाशिये पर खड़े सामाजिक समूहों ने खुद से संबंधित जाति, उसके नायकों और घटनाओं को यादगारों के रूप में बदल लिया है. आयोजन, जिनमें मेले और उत्सव शामिल हैं, इन यादगारों के साथ संबंधित हैं. उदाहरण के लिये उत्तर प्रदेश में बहुजन आंदोलन ने न केवल झलकारी बाई, उदा देवी और बिजली पासी जैसे कई नायकों को खोजा बल्कि इन नायकों के इर्द-गिर्द अस्मिता पर गौरव का इतिहास भी गढ़ा. अम्बेडकर भी ऐसे ही एक नायक बन गये हैं. जबकि एक ओर, एक उपेक्षित सामाजिक समूह इन स्मृतियों के साथ संबद्ध होता है, दूसरी ओर, दूसरे समूहों में इनके प्रति एक गुस्से का भाव पैदा होता है.

हाल ही में पुणे में भीमा-कोरेगांव के स्मारक और घटना की सालगिरह पर हिंसा हुई थी. 1 जनवरी, 1818 को ब्रिटिश सेना ने भीमा-कोरेगांव में पेशवा बाजीराव- II के 28,000 सैनिकों को हराया था. ब्रिटिश सेना के ज्यादातर सैनिक महार समुदाय के थे. इसलिये, दलित समुदाय ने महाराष्ट्र में, प्रमुख रूप से महारों ने, इस घटना को अपने समुदाय के गौरव से जोड़ लिया. वे इस जीत को अपनी मराठा राज्य से लड़ाई के हिस्से के रूप में देखने लगे. महाराष्ट्र का दलित समुदाय हर साल ब्रिटिश सेना की मराठा सैनिकों पर जीत के उपलक्ष्य में एक दिन शौर्य दिन का आयोजन करता है. कहा जाता है कि अम्बेडकर ने भी इस आयोजन का समर्थन किया था.

जबकि यह स्मारक दलितों के लिये एक अस्मिताई गौरव का प्रतीक है, यह मराठों के लिये एक शर्म का प्रतीक भी बन चुका है. कुछ मराठा समुदाय भीमा-कोरेगांव की हार से जुड़े इस किस्से से जुड़ी शर्म को मिटाना चाहते हैं. लेकिन हर साल इस घटना की दलितों द्वारा मनायी जाने वाली सालगिरह उन्हें ऐसा नहीं करने देती. मजबूत मराठा सामाजिक समुदाय भी इस घटना को अपने प्रभुत्व पर चुनौती के रूप में देखता है.

ये समुदाय दलितों के लिये आरक्षण और वंचित जातियों के लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिये सशक्तिकरण से खुश नहीं हैं. हमने पहले ही आरक्षण के खिलाफ मराठा लामबंदी और गुस्सा देखा है. इन समुदायों का भीमा-कोरेगांव की सालगिरह का विरोध उनकी इसी लंबी ईर्ष्या का उत्पाद है. ऐसे में मराठों का विरोध एक अचानक से हुई प्रतिक्रिया नहीं था. महाराष्ट्र में दलित कुल जनसंख्या के 10.2 फीसदी हैं, जिसमें से महार एक प्रभावशाली समुदाय है. वे राज्य की कुल दलित जनसंख्या का करीब 57 फीसदी हैं. समुदाय ने अपनी आवाज़ उठाने के लिये औपनिवेशिक काल से ही शक्ति जुटानी शुरू कर दी थी.

यह कहा जाता है कि राजनीति वर्तमान की और वर्तमान के साथ भविष्य को बनाने वाली होती है. अतीत कुछ ऐसा है जो बहुत पहले कभी घटित हुआ था. पर भारतीय समाज में, मिथकों, प्रतीकों और नायकों के रूप में मौजूद स्मृतियां अत्यधिक महत्व रखती हैं. कई मायनों में, अतीत वर्तमान से ज्यादा महत्व रखता है. फ्रांस को स्मारकों के देश के रूप में जाना जाता है. बड़े-बड़े स्मारक वहां देश के हर कोने में देखे जा सकते हैं पर यह केवल सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बनकर रह गये हैं. फ्रांस का वैभव, स्मारक और धरोहरें लोगों को बांधने और उत्तेजित करने की क्षमता के साथ ही विवाद खड़े करने की क्षमता भी खो चुके हैं. स्मारक और धरोहरों का वंचित समुदायों के लिये खास महत्व होता है, जो कि आत्मसम्मान और गौरव की भावना पैदा करने के लिये प्रयासरत होते हैं.

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इस लेख का अनुवाद अविनाश द्विवेदी ने किया है.

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