बस्तर (Bastar) का नाम सुनते ही मन मे ढेरों सवाल उठते हैं और भय और क्रोध की एक मिश्रित सी लहर धमनियों में दौड़ जाती है। हालाँकि इन सारे सवालों में नक्सली समस्या एक ऐसा सवाल था जिसे समझने के लिए पूरा देश बेचैन है ! पूरा देश जानना चाहता है कि आखिर क्यों इतने लंबे समय से देश के भीतर एक गृह युद्ध चल रहा है ! देश के अन्य हिस्सों में जब शांति रहती है तो क्यों इन क्षेत्रों से मौत की खबरें आती हैं? सवाल तो ये भी है कि जिन ग्रामीण आदिवासी के पास खाने के पैसे नहीं हैं और जीने के संसाधन नहीं हैं वो कब, क्यों अपने हाथों में एके-47 उठाये जंगल-जंगल, पहाड़ी-पहाड़ी मौत का खेल खेलते हैं? क्यों आख़िर गाँव का एक साधारण आदमी नक्सली बनकर अपनी दुनिया और दुनिया के हर नियमों को ताक पर रखकर अपनी एक नई सोच गढ़ लेता है और माओ-स्टालिन-लेनिन को पूजने लगता है और लोकतंत्र को झूठा-फ़र्ज़ी करार दे देता है? ये सारे सवाल ऐसे हैं जिनके बीच नक्सली जन्म लेते हैं और मरते हैं। यही सवाल हैं जिनके बीच समाज का एक मासूम हिस्सा पिस रहा है। यही वे सवाल हैं जिनसे अख़बारों और न्यूज़ चैनलों की सुर्खियां बनती हैं और सरकारों की अच्छी योजनाएं और ‘खतरनाक षणयंत्र’। आशुतोष सिंह की यह रिपोर्ट इन्हीं सवालों को केंद्र में बस्तर की जमीन टटोलने की कोशिश करती है। आशुतोष 25 दिन बस्तर में अनेक जनजातियों के बीच यायावर बनकर घूमते रहे हैं और उनके बीच से उनकी बातें लेकर सामने आये हैं। तू कहता है कागद की लेखी, हम कहत हैं आँखन देखी की तर्ज़ पर पढ़िए यह जमीनी रिपोर्ट।

दिसंबर का महीना है। धुंध भी है और रौशनी भी। बस सड़क पर सरपट दौड़ती जा रही है। आँखों के सामने पहाड़ियों की एक लंबी श्रृंखला दिख रही है जहाँ से धूप छनकर जंगलों को गीला कर रही है। मेरी आँखों में बस्तर एक खूबसूरत तस्वीर की तरह तैयार हो रहा है जिसमे ढेरों रंग हैं। हर एक रंग में छत्तीसगढ़ का लोक है जो सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और कलात्मक रूप से समृद्ध है। बस्तर तीनों ओर से पहाड़ियों से घिरा है… धूप, बारिश और सर्दी तीनों की सरकार यहाँ चलती है। बस्तर जंगल है, जंगल में गाँव हैं और जंगल हर गाँव में है। गाँव के पास ही अब आधुनिक उद्योग भी बन गए हैं। लोग अब जंगल कम जाते हैं, गाँव में रहकर जीविका कमाते हैं जो आसान भी है और सुरक्षित भी।

प्रकृति ने बस्तर को खुद संवारा है. इसके एक एक जंगल को खुद से सहेजा है। इसकी बोलियों, इसके गीतों को ज़िंदा रखा है। बस्तर में 70% जनसंख्या जनजातीय समाज की है…. जिसमें प्रमुखतः गोंड, मरिया, धुरबा, मुरिया, भतरा, हल्बा, और धुरवा प्रमुख हैं। ये जनजातियां प्रकृति नजदीक ही अपना इतिहास और अस्तित्व दोनों पाती हैं। मिथकों की कहानियाँ इनके बिना अधूरी हैं। रामायण में बस्तर को दण्डकारण्य बताया गया है जबकि महाभारत में कोशल साम्राज्य नाम से जाना गया है।

कभी बस्तर केरल और बेल्जियम जैसे राज्यों से बड़ा था पर बेहतर प्रशासन के लिए इससे कांकेर और दंतेवाड़ा बनाया गया। 240 किमी लंबी माँ इंद्रावती नदी इस क्षेत्र की जीवनदायिनी नदी है. ओडिशा, तेलंगाना, झारखंड और मध्यप्रदेश इसकी सीमाओं से जुड़े हैं। ढेरों बोलियाँ हैं लेकिन हिंदी लिंक की तरह काम काम कर रही है। बस्तर में आज भी खेती बारिश पर निर्भर है। पारंपरिक खेती तकनीक अपनाए जाते हैं क्योंकि कुछ तो परम्परा को महत्त्व देने के भावुक तर्क हैं और कुछ सरकारी-आधुनिक योजनाओं और तकनीकी की जानकारी का अभाव।

नशा नाश की जड़ है भाई

समस्याएँ मात्र वो नहीं हैं जो अख़बारों में सुर्खियां बनती हैं। जीवन और समाज को बर्बाद करने वाले दीमक और भी हैं। बस्तर को नक्सली बर्बाद नही करेंगे, बस्तर को बर्बाद करेगा नशा। बस्तर नशे से पीड़ित है। चाय की दुकानों में चाय मिले ना मिले यहाँ आपको देसी दारू जरुर मिलेगी। बस्तर के ग्रामीण नशे से बीमार हो रहे हैं उनकी जीवन-क्षमता क्षीण होती जा रही है। घर-घर में सल्फी (झाड़ के पेड़ से निकाला हुआ एक प्रकार का मादक द्रव्य जिसे लोग बस्तर का बियर भी कहते हैं), अंगूर के रस से बनाई हुई शराब, महुआ के फल से बनी शराब बहुतायत में आम जनता के द्वारा उपयोग में लायी जाती है। नशा की जद में बूढ़े-जवान से लेकर महिलाएं तक प्रभावित है। बस्तर के इन गाँवों में बूढ़े-युवा-महिलाएं यूँही नशे के बाद लेटी-पड़ी रहती हैं। ऐसे दृश्य यहाँ के आमदृश्य है लेकिन सच्चाई यह है कि धीरे-धीरे नशा इन समाजों की खूबसूरती को नष्ट कर रहा है। नशा मुक्ति कार्यक्रम एक ऐसा कार्यक्रम है जिसे रमन सिंह की सरकार हर सप्ताह किसी ना किसी गाँव में करवा रही है लेकिन हालात नहीं बदल पा रहे। हेल्थ सेंटर पर बहुत सारी ऐसी महिलाएं आयीं हैं जो गर्भवती होने के बावजूद नशा करती हैं। बस्तर जिले के जगदलपुर ब्लॉक के चिलकुटी गाँव में स्वाति बघेल कहती हैं ‘शहर दूर है और शहर से किसी को कोई मतलब नही…. नशा यहाँ हर जगह बिकता है… लोग इसे अपने खाने की तरह घर मे सम्भाले रखते हैं… सरकारी प्रयासों के बावजूद भी कोई बदलाव देखने को नहीं मिलता है।’

वहीं जगदलपुर ब्लॉक के हल्बा-कचोड़ा के रोजगार सहायक ने हमें कहा ‘गाँव मे रोजगार ही रोजगार है लेकिन यहाँ कोई काम ही नही करना चाहता… कोई भी सरकारी काम करवाने के लिए हमें मज़दूर चहिये पर यहाँ मज़दूर सबसे बड़ी समस्या हैं… ट्रेनिंग मिलने के बावजूद भी लोग काम नहीं करते… अपने गाँव मे काम करने से लोग हिचकते हैं… और शहर जाना नहीं चाहते… इन सारी समस्याओं के जड़ में नशा है। युवा कम उम्र में नशे के आदी हो जा रहे और पढ़ाई छोड़कर कहीं मेहनत मजदूरी करने लग रहे हैं।’

लाल सलाम की धूसर जमीन

नक्सल शब्द पश्चिम बंगाल के एक ज़िले नक्सलबाड़ी से निकला और भारत के पूरे नक़्शे पर छा गया। अकादमिक विमर्श से लेकर चाय के नुक्कड़ तक पर यह चर्चा का एक महत्वपूर्ण विषय है। जहाँ संवेदना से लेकर भाषणबाज़ी के रूप में विचार सामने आते रहते हैं। अखबारों में कभी ख़बर फौज़ के नाम होती है तो कभी नक्सलियों के नाम पर.

नक्सलियों का कोई ठिकाना नहीं है… जंगल ही उनका घर है… पहाड़ियों पर ही उनकी थकान मिटती है… ये जंगल की हवा हैं… और अपने जीने का स्थान खुद तय करते हैं। राजनीति और प्रशासन इनके सबसे बड़े दुश्मन हैं और अपनी दुनिया में इन दोनों का प्रवेश वर्जित है। बेहतर संवाद न हो पाना नक्सल समस्या के विकराल रूप का कारण बना है। नक्सली चाहते हैं कि अधिक से अधिक युवा उनके क्रांति के साथ जुड़ें और इसके लिए वे उन्हें शिक्षा और बाहरी दुनिया से दूरी बनाए रहने की हर संभव कोशिश करते हैं। सेना-वन-विभाग-पुलिस के बीच इनकी खूनी-झड़प यहाँ आम है। रात के आठ बजे तक अक्सर रोड सन्नाटे से भर जाते हैं जिसका कारण शायद ये भी हो कि यहाँ जन-घनत्व काफी कम है। यूँ कहें तो जंगल, पहाड़ और अँधेरा इनके सबसे अच्छे दोस्त हैं। इसी अंधेरे में ग्रामीणों को उठाया जाता है, बाहरी लोगों को धमकाया जाता है और सीआरपीएफ कैम्प के पास धमाके होते हैं, सड़कें उड़ाई जाती हैं।

हिचकते हुए कुछ ग्रामीणों ने बताया कि नक्सलियों ने एक बेहतरीन नेटवर्क तैयार कर रखा है और इनके इंटीलेजेंस हर जगह फैले हुए इन्हे गुप्त जानकारी उपलब्ध कराते हैं। राजनीति भी इनका कभी साथ देती है और पुलिस के लोगों से भी इनको सहयोग प्राप्त होता है। बहुत जगह सह-अस्तित्व का सिद्धांत लगाकर शांति लायी गयी है। ऐसा नहीं है कि बस्तर के नक्सलों को बाहरी राज्यों से कोई समस्या है… तेलंगाना और आंध्र के नक्सलियों का भरपूर सहयोग इन्हें प्राप्त है। वन-उत्पादों का तस्करी किया माल भी उन्हीं के माध्यम से देश के बाकी हिस्सों में पहुँचता है। बस्तर में सरकारी विकास कार्यों में तेज़ी आयी है… सड़कों का नेटवर्क तैयार किया गया है… शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार मुहैया कराए जा रहे हैं। लेकिन नक्सली अपने क्षेत्रों में अपनी गतिविधियों को अंजाम देने में फिर भी सफल होते रहे हैं। हक़ीक़त ये भी है कि कई बार सेना और पुलिस के बीच बेहतर तालमेल नहीं बन पाता है।

बस्तर के नक्सली समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या है कि ये कभी मालूम नहीं किया जा सकता है कि कौन एक आम ग्रामीण-आदिवासी है और कौन एक हिंसक नक्सली? कभी भी नक्सली बंदूक रखकर गाँवों में मिल जाता है और साधारण इंसान बन जाता है। इन्हीं कारणों से अखबारों में अक्सर हम फ़र्ज़ी मुठभेड़ के बारे में पढ़ते हैं। हमने ग्रामीणों से भी ये बात सुनी की नक्सलियों ने भी मासूम लोगों की नृशंस हत्या की है। कुछ बातें ऐसी भी थी जिसपर वहाँ के लोग सेना पर गंभीर फ़र्ज़ी मुठभेड़ के आरोप लगाते हैं।

(नोट- नक्सलियों के बारे में लिखी सारी बातें स्थानीयों से बातचीत पर आधारित हैं. इस इलाके में पिछले दशकों में मीडिया की पहुंच बहुत अधिक हो गई है. जिससे कई बार स्थानीय बनावटी बातें भी करते लगते हैं. कई बार वे जानबूझकर वही बातें बोलते हैं, जो मीडिया सुनना चाहती है.)

मेरी नज़र मेरा बस्तर

मुझे लगता है वो कोयला ज्यादा खूबसूरत होता है क्योंकि उसमें हीरा हो जाने की संभावना बनी रहती है। बस्तर वो ही कोयला है जो दाब-ताप से और संवरकर भविष्य के हीरे को जन्म देने वाला है। मुझे आज का यह बस्तर ज्यादा अच्छा लगता है जो तप रहा है और बेहतरीन वक़्त के रास्ते पर चलने की कोशिश कर रहा है। तमाम कठिनाईयों और चुनौतियों के बावजूद वहां आज भी पलाश फूल रहा है, ये बात दीगर है कि कुछ को वो फूल लगता है, कुछ को आग। मुझे लगता है दुनिया अक्सर हमें गलत और अधूरा इतिहास समझाती है। अगर हर एक का अपना पेरिस होता है तो हर एक का बस्तर भी होना चाहिए। बस्तर के बारे में हमने गलत इतिहास पढ़ा है। हमे काले पन्नों के नीचे दबा हुआ इंद्रधनुष निकालना होगा। वर्तमान में अभी भी अख़बारों की अशुभ खबरों से दूर बस्तर एक खूबसूरत जगह है। जहाँ लोग धीमे स्वर में बात करते हैं… जहाँ लोग आराम से रहते हैं… जहाँ लोग वैसे ही जीते हैं, जैसे हम जीते हैं।

अब दुनिया बदल गयी है… पुराने रंग से बाहर आना चाहिए… समझना चहिए की बस्तर का रंग नही है लाल… ढेरों रंग है इस जिले के। कबतक कोई हमें ऐसे दुख को सौंपता रहेगा जो हमारा सच कभी रहा ही नहीं। एक महीने की इस यायावरी यात्रा के बाद यह कह सकता हूँ कि यहाँ के लोग अब तैयार हैं एक नए वक़्त की ओर बढ़ जाने के लिये… नया वक़्त जो इस देश का भविष्य है। मैं मानता हूँ कि यहाँ लड़ाइयाँ आज भी है… आज भी हक़ की लड़ाई है… किसी आफिस या जंगल के कोने में प्लान तैयार होता है कि क्या अच्छा किया जा सकता है। कभी अखबार फौज़ के नाम होती है कभी क्रांतिकारियों के… पर इस दोनों के बीच मे एक सच है जो छिपा रह जाता है… वो है एक प्रगतिशील बस्तर… ये वो बस्तर है जो खुली हवाओं के साँस लेता है और उसके अपने सपने है और उसे लोकतंत्र पर भरोसा भी है।

धुंध छंट रही है… मैं वापस लौट रहा हूँ…

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यह लेखक के अपने विचार हैं.

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आशुतोष का नाम लेते ही बनारस याद आता है। ‘इश्क़ में लंका होना’ इनकी चर्चित फेसबुक सीरीज रही है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के छात्र हैं। बनारस का अख्खड़पन खून में घुल-मिल गया है। छात्र राजनीति पर भी बेबाकी से कलम चलाते हैं। इसी दिसंबर और जनवरी में बस्तर की यात्रा से लौटे आशुतोष के पास जमीन की बातें हैं जिनमे से कुछ यहां आप सब के लिए प्रस्तुत हैं।

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