यह लेख मैंने अम्बर्तो के जन्मदिन पर 5 जनवरी को लिखा था, जो आप तक आज पहुंच रहा है। लेकिन ऐसी शख्सियत का आपसे रूबरू होना बहुत जरूरी है क्योंकि यह वक्त पोस्टट्रुथ के भ्रमजालों के बीच राह बनाते अम्बर्तो के विचार जानने का सबसे मुफीद वक्त है, इसलिये अभी बिल्कुल भी देर नहीं हुई है।

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अम्बर्तो इको, वर्तमान विश्व साहित्य जगत में उत्तर-आधुनिक विचारक्षेत्र के एक प्रमुख रचनाकार थे। जिजीविषा और आनंद को जीवन के केंद्र में रखने वाले इको का जन्म 5 जनवरी 1932 में इटली में हुआ था। उनका प्रसिद्ध उपन्यास ‘The Name of The Rose’ दुनिया की सर्वाधिक बिकने वाली पुस्तकों में से एक है जिसका विश्व की 40 से अधिक भाषाओँ में अनुवाद हो चुका है। इको के लेखन समय की एक केंद्रीय भूमिका है।

उनके उपन्यास लेखन से लेकर जीवन जीने की दृष्टि तक, सभी मामलों में वे समय को केंद्र में रखते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि अगर सम्पूर्ण ब्रम्हांड से समय को निकाल दिया जाए तो यह हमारी मुट्ठी में समा जायेगा।

वे प्रखर बौद्धिक थे जिन्होंने वर्त्तमान के हर पहलू पर विचार व्यक्त किया जो मानव जीवन और समाज को प्रभावित करते हैं। इको एक ऐसे रचनाकार रहे हैं जो कभी साक्षात्कार से पीछे नहीं हटते थे। शायद इसका कारण उत्तर-आधुनिकता का संवाद प्रिय होना है। आज उनके जन्मदिन पर उनकी स्मृति में ‘The Guardian’ को दिए गए एक साक्षात्कार के अंश का अनुवाद प्रस्तुत है:

1. “मैं एक दार्शनिक हूँ। मैं केवल सप्ताहांत में उपन्यास लिखता हूँ। एक दार्शनिक के रूप में, मेरी रूचि सत्य में है। चूंकि यह निर्धारित करना बहुत कठिन है कि क्या सत्य हैऔर क्या नहीं? मैंने पाया कि झूठ का विश्लेषण करके सत्य तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। मेरा यह मत है कि पचास प्रतिशत से अधिक जन-अवधारणाएँ झूठ से गढ़ी जाती हैं। हम उनके द्वारा ब्लैकमेल किये जाते हैं।“

वाकई ऐसी कई धारणाओं से हम अपने समाज में रोज़ रूबरू होते हैं। अम्बर्तो को पढ़ना हमें तार्किकता से ऐसे विचारों पर सोचने को मजबूर करेगा।

2. “मैं नहीं जानता कि पाठक क्या अपेक्षा रखते हैं। लेकिन मैं सोचता हूँ कि एक लेखक को वह लिखना चाहिए जिसकी पाठक ने अपेक्षा भी ना की हो। पाठक ने वैसा सोचा भी न हो। समस्या यह नहीं है कि उन्हें क्या चाहिए बल्कि चुनौती यह है कि उसे बदला कैसे जाए … वैसे पाठक कैसे तैयार किये जाएँ जिन्हें आप अपनी प्रत्येक कहानी के लिए जरुरी मानते हैं।“




3. “मैं इस बात से इंकार नहीं कर रहा हूँ कि षणयंत्र होते हैं, लेकिन असली षणयंत्र वह हैं जो सामने आ जाते हैं। जुलिअस सीजर की हत्या एक षणयंत्र थी – यह एक सफलता थी, यह प्रसिद्द भी है … गन पॉवडर एक षणयंत्र था। इसीलिए असली षणयंत्र हमेशा सामने आ जाते हैं और लोग उनके बारे में जानते हैं। सफल और शक्तिशाली षणयंत्र वह होते हैं जो होते ही नहीं है। आप यह समझा नहीं सकते हैं कि उनका कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसीलिए ये जनमानस के बीच प्रवाहित होते रहते हैं और मुर्ख लोगों का पोषण करते रहते हैं।“

4. “ज्ञान का आनंद पराजितों के लिए सुरक्षित है। यही साहित्य है। दॉस्तोएव्स्की पराजितों के बारे में लिख रहे थे। इलियड का मुख्य पात्र, हेक्टर एक हारा हुआ नायक है। विजयी लोगों के बारे में बात करना बहुत बोरिंग काम है। असली साहित्य हमेशा पराजितों के बारे में बात करता है। मैडम बोवारी एक पराजित है। जूलियन सोरेल एक पराजित था। मैं भी वही काम कर रहा हूँ। पराजित अधिक आकर्षक हैं। विजयी बेवकूफ होते हैं क्यों कि अक्सर वे बाई चांस जीत जाते हैं।“
5. “सच्चाई ज्यादा रोमांचक है क्योंकि यह कथा-गल्प से अधिक नवाचारी है।“

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कैमूर की पहाड़ियों के अंचल में पले-बढ़े पीयूष किशोरावस्था में पहुंच रहे थे कि बनारस आना पड़ा. जहां उनको पढ़ने के दौरान अपने से दोगुनी उम्र के काशी हिंदू विश्वविद्यालय के शोधछात्रों की सोहबत मिली. जाहिर है दिमाग दौड़ कर उम्र से आगे निकल गया. पीयूष रंजन परमार साहित्यिक गोष्ठियों और शैक्षणिक प्रतियोगिताओं में ध्रुवतारा हो गये. दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन लिया पर महानगर के कोलाहल को, शिक्षा-साधना के अनुकूल न पाकर उसी साल वापस काशी हिंदू विश्वविद्यालय लौट आये और यहां प्रवेश-परीक्षा के टॉपर के तौर पर राजनीति विज्ञान के छात्र बन गये. फिर चाहे पढ़ाई का मसला रहा हो या पाठ्येतर गतिविधियों का, तीन-साल-धुआंधार गुजारकर पीयूष पत्रकारिता की पढ़ाई करने भारतीय जनसंचार संस्थान वाया कानपुर पहुंच गये. गांधीवादी सिद्धांतों में अडिग विश्वास वाले पीयूष वर्तमान में मुंबई में रहते हैं और सोनी टीवी नेटवर्क में कार्यरत हैं. अभी तक वो 'पेशवा बाजीराव' और 'पहरेदार पिया की' धारावाहिकों की संकल्पना में शामिल रहे हैं.

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