कासगंज में कल एक लड़के की जान चली गई. एक सांप्रदायिक बताए जा रहे हंगामे के दौरान पथराव हुआ, गोलियां चलीं, आगजनी हुई और इसी सब के बीच एक चन्दन मर गया. यह सब उस दिन हुआ, जब हम विधिसम्मत व्यवस्था में शामिल होने की तारीख का जश्न मना रहे थे. मन दुखी हुआ. कई सवाल उठे.

किसी की मौत अमूमन सभी को भावुक कर देती है और यह तब और ज्यादा होता है जब मरने वाला एक भावुक अपील की गिरफ्त में मरा हो. इसलिए मैं भी दुखी हूं पर मेरे सवाल दूसरे हैं.

बहुत आसान है इस नतीजे पर पहुंचना कि यह एक साम्प्रदायिक घटना थी. एक कौम ने वार किया और दूसरी कौम का एक लड़का मर गया. फिर मैं भी कौमों को जिम्मेदार ठहराता हुआ क्यों न अपनी बात रखूं? पर क्या यह इतना आसान मामला है?

पिछले तमाम सालों में युवाओं की बड़ी संख्या बेवजह के आंदोलनों में आगजनी करती देखी गई है. जाट आंदोलन हो या करणी सेना का पद्मावती विरोध, रामपाल या रामरहीम, लड़के ढाल बन कर सामने आते देखे गए. कानून को हाथ में लेने वाले अधिकांश युवा थे. वही युवा जिनके नाम पर दुनिया भर में सर्वाधिक आबादी का डंका पीटा जा रहा है. देश के युवाओं में इतना असंतोष कहाँ से आ रहा है. युवा भारी संख्या में बेरोजगार हैं. हर साल 1 करोड़ नौकरियां भी पैदा करने के जुमलों की सच्चाई खुलकर आ गई है. क्या युवाओं ने पिछले एक दशक से बेरोज़गारी को ले कर कोई बड़ा आंदोलन किया है? जबकि सरकारे नौकरियां पैदा करने के वादे के बावजूद भी उनमें कटौती होती जा रही है.

यह बेरोजगार भीड़ दोनों कौमों के फिरकापरस्तों के लिए कच्चा माल है. इनकी ऊर्जा का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है. गोली चलाने वाले के भीतर इतनी नफरत किसने भरी होगी. ‘देश की अस्मिता खतरे में है’ कह कर उग्र हो जाना किसने सिखाया होगा. मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जहर फैलाने वाला मजे से अखबार पढ़ रहा होगा और इस घटना के राजनीतिक फायदे के बारे में सोच रहा होगा.

तिरंगे से किसे समस्या हो सकती है. यह तो शांति, बलिदान और त्याग का प्रतीक है. सारा दोष देश के प्रतीकों की उन व्याख्याओं का है जो मंदिरों और मदरसों के झूठे उपासक कोमल मनों में भर रहे हैं. ऐसी घटनाएं नेताओं को दु:ख नही देतीं, नेता बनने का मौका देती हैं. कल एक चिरकुट उपदेश राणा भी कासगंज का दौरा करने की बात कह रहा है.

युवकों, मेरे दोस्तों! तुम्हारा जम कर इस्तेमाल हो रहा है. तुम्हारी मौत किसी के नेता बनने का जरिया है बस. नफरत के खेल में कौन किसका सगा हुआ है? करणी सेना के एक सदस्य ने अपने ही साथी की गाड़ी जला दी, ढांचा गिरते समय कितने ही लोग गुम्बद में गिर कर मर गए. कोई नही जानता वह कौन थे? उनके मरने के बाद उनका परिवार कैसे पला? यह घटनाएं कोई भूल या दुर्घटना नही हैं बल्कि यही नफरत का मूल चरित्र होता है. हिन्दू हो या मुसलमान, यह जिसके भीतर पलती है, उसे ही बर्बाद और अकेला कर देती है.

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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