सुभाष चन्द्र बोस आजादी की लड़ाई के सबसे मुखर और ओजस्वी नाम माने जाते हैं. उन्होंने न केवल देश में रहते हुए अपने विश्वासों के आधार पर आजादी की लड़ाई में योगदान दिया बल्कि विदेशी धरती पर रहकर भी भारत मुक्ति के प्रयासों में संलग्न रहे. पर अफसोस पिछले कुछ वर्षों में उनके जीवन का सबसे चर्चित पहलू उनकी मौत को बना दिया गया है जिसके बारे में जितनी मुंह उतनी बाते हैं. उनकी मौत से जुड़ी कई थ्योरी हैं. जिनमें से कुछ सही हैं. कुछ कई धारणाओं पर टिकीं है और कई राजनीतिक तौर पर फैलाई गई अफवाहें हैं. आइये जानते हैं क्या हैं ये थ्योरीज?

थ्योरी नम्बर 1: हवाई दुर्घटना में हुई थी मृत्यु

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की गुमशुदगी के मामले में यह अब तक का सबसे मजबूत तर्क यही माना जाता है. इसके मुताबिक 18 अगस्त 1945 को ताइवान के नजदीक हुई एक हवाई दुर्घटना में नेताजी की मौत हो गई थी. भारत सरकार तथा इतिहास की कुछ किताबें भी इसी हवाई दुर्घटना को नेता जी की मुत्यु का कारण बताती रही हैं. बताया जाता है नेता जी को अंतिम बार टोक्यो हवाई अड्डे पर ही देखा गया था और वे वहीं से उस विमान में बैठे थे.

नेता जी की बेटी अनीता बोस फाफ विमान दुर्घटना वाली बात से इत्तेफाक रखते हुए इसे ही उनकी मौत का कारण बताती हैं. जर्मनी में रहने वाली 74 वर्षीय अनीता, नेताजी की ऑस्ट्रियन पत्नी एमिली शेंकल से हुई उनकी इकलौती संतान हैं.

थ्योरी नम्बर 2: विमान दुर्घटना में उनकी मौत नहीं हुई थी

यह वो लोग हैं जिनके पास इससे जुड़े तथ्य नहीं हैं लेकिन वे थ्योरी नम्बर एक में यकीन नहीं रखते. यह लोग दावा करते हैं कि नेता जी की मृत्यु विमान दुर्घटना में नहीं हुई थी. इसके दो तर्क दिए जाते हैं-

पहला, नेता जी का शव कहीं से भी बरामद नहीं हुआ है और दूसरा यह कि कई लोगों के मुताबिक उस दिन ताइवान के आस-पास कोई हवाई दुर्घटना घटी ही नहीं थी. खुद ताइवान सरकार के दस्तावेजों में भी उस दिन हुई किसी हवाई दुर्घटना का जिक्र नहीं है. नेताजी के जीवन पर ‘मृत्यु से वापसी, नेताजी का रहस्य’ नाम की पुस्तक लिखने वाले अनुज धर भी यही मानते हैं कि उऩकी मौत 18 अगस्त 1945 को नहीं हुई थी.

थ्योरी नम्बर 3: कुछ लोग गुमनामी बाबा को सुभास चन्द्र बोस मानते हैं

फैजाबाद शहर के सिविल लाइन्स इलाके में स्थित ‘राम भवन’ में लंबे समय से साधु जैसे लगने वाले एक बुजुर्ग रहते थे जिनके बारे में स्थानीय निवासियों को कुछ खास जानकारी नहीं थी. जिस दिन उनकी मृत्यु हुई और अंतिम संस्कार के बाद उनके कमरे को खंगाला गया तो लोगों को कई ऐसी चीजें मिलीं जिनका ताल्लुक सीधे तौर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ता था. इनमें नेताजी की पारिवारिक तस्वीरों से लेकर आजाद हिंद फौज की वर्दी, जर्मन, जापानी तथा अंग्रेजी साहित्य की कई किताबें और नेताजी की मौत से जुड़े समाचार पत्रों की कतरनें शामिल होने की बात कही गयी. इसके अलावा वहां से और भी कई ऐसे दस्तावेज बरामद हुए जिनके आधार पर एक बड़े वर्ग ने दावा किया है कि वे कोई आम बुजुर्ग नहीं बल्कि खुद नेताजी सुभाष चंद्र बोस ही थे. हालांकि इस दावे को सही साबित नहीं किया जा सका.

थ्योरी नम्बर 4: सुब्रह्मण्यम स्वामी सहित कई भाजापाई बोस की मौत को एक राजनीतिक साजिश मानते हैं 

साल 2015 में सुभाष जयंती पर मेरठ के पीएल शर्मा स्मारक के कार्यक्रम में शिरकत करने पहुंचे सुब्रह्मण्यम स्वामी ने पत्रकारों से बातचीत में कई चौंकाने वाली बातें कहीं. उन्होंने कहा कि ‘देश की आजादी के लिए जीवन को समर्पित करने वाले सुभाष चंद्र बोस का निधन ताइवान के विमान हादसे में नहीं हुआ था बल्कि उनकी हत्या रूस के तत्कालीन सत्ता प्रमुख जोसेफ स्टालिन ने अपने ही देश में कराई थी’. उन्होंने बताया कि बोस की मौत की जांच के लिए कांग्रेस की ओर से गठित समितियां कभी ताइवान गई ही नहीं.

जबकि उस वर्ष 1945 में ताइवान में कहीं भी कोई हवाई दुर्घटना न तो दर्ज है और न ही बोस का नाम मृतकों की सूची में शामिल है.

स्वामी ने आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू के तत्कालीन स्टेनोग्राफर श्यामलाल जैन मेरठ के ही थे. उन्होंने खोसला कमीशन के सामने अपने बयान में बताया था कि स्टालिन ने संदेश भेजा था कि “सुभाष चंद्र बोस हमारे पास है, उनके साथ क्या करना है?” उन्होंने बताया था कि इस पत्र का जवाब प्रधानमंत्री नेहरू ने उनसे ही लिखवाया था. हालांकि कमीशन ने इस पर विश्वास न कर उनसे सबूत मांगा था.

कुछ लोग फिलहाल हुई जारी हुई फाइल्स से सामने आई आजादी के दो दशक बाद तक नेता जी के परिवार की जासूसी की बात को भी राजनीतिक साजिश वाली बात का उपयुक्त तर्क मानते हैं.

जांच समितियां क्या कहती हैं?

नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मौत का रहस्य सुलझाने के लिए भारत सरकार ने अब तक तीन आयोगों का गठन किया है. इनमें से दो आयोगों का मानना है कि नेता जी की मृत्यु विमान दुर्घटना में ही हुई थी.

1956 में शाहनवाज जांच आयोग- तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने शाहनवाज खान के नेतृत्व में एक जांच समिति का गठन किया था. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में विमान हादसे की बात को सच बताते हुए कहा कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ही हुई थी.हालांकि इस समिति में बतौर सदस्य शामिल रहे नेताजी के भाई सुरेश चंद्र बोस ने इस रिपोर्ट को नकारते हुए तब आरोप लगाया था कि सरकार कथित विमान हादसे को जानबूझकर सच बताना चाहती है.
1970 में बने खोसला जांच आयोग- 1970 में न्यायमूर्ति जीडी खोसला की अध्यक्षता में एक और आयोग बनाया गया. इस आयोग ने अपने पूर्ववर्ती आयोग की राह पर चलते हुए विमान दुर्घटना वाली बात पर ही अपनी मुहर लगाई.
1999 में बने मुखर्जी जांच आयोग- 1999 में उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश मनोज मुखर्जी की अध्यक्षता वाले एक सदस्यीय आयोग ने इन दोनों समितियों के उलट रिपोर्ट देते हुए विमान हादसे वाले तर्क को ही खारिज कर दिया. 2006 में सामने आई मुखर्जी आयोग की रिपोर्ट में नेताजी की मौत की पुष्टि तो की गई थी, लेकिन आयोग के मुताबिक इसका कारण कुछ और था, जिसकी अलग से जांच किए जाने की जरूरत है. मुखर्जी आयोग की इस रिपोर्ट को तत्कालीन केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया था. गौरतलब है कि उस दौरान गठबंधन नीत भाजपा सरकार सत्ता में थी.

फाइल्स सार्वजनिक हुई फिर भी रहस्य बना ही रहा

साल 2016 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 119वीं जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे जुड़ी करीब 100 फाइलों को सार्वजनिक की थीं. इन सभी फाइलों की डिजिटल कॉपी को राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है. पहली किस्त में 100 फाइलें सार्वजनिक की गईं. इसके बाद हर महीने 25-25 फाइलों को सार्वजनिक किया जा रहा है. पीएम मोदी ने नेताजी से जुड़े पत्रों पर एक पोर्टल भी लॉन्च किया है. कहा गया था कि जो गोपनीय फाइलें जारी हुई हैं उससे नेताजी की मौत और उनके जीवन पर से जुड़े विवाद को समझने में मदद मिलेगी. हालांकि उनकी मौत की गुत्थी आज भी जस की तस है.

ख़ास बात यह है कि इन फाइल्स में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह पता चले कि 1945 में नेताजी सोवियत संघ में ठहरे थे. यह खुलासा सुब्रह्मण्यम स्वामी की इस धारणा को चुनौती देता है कि नेताजी विमान से रूस गए थे और 1945 में ताइपेई में हुए एक विमान हादसे में नहीं मारे गए थे.

ब्रिटिश वेबसाइट का दावा किया कि बोस की मौत विमान दुर्घटना में ही हुई

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आखिरी दिनों का ब्यौरा जारी करने के लिए शुरू की गई एक ब्रिटिश वेबसाइट ने दावा किया है कि बोस की मौत ताइवान में विमान दुर्घटना में ही हुई थी. 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई उस विमान दुर्घटना के दिन के बारे में प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार यह दावा किया गया है. नए दस्तावेजों में उन कई लोगों का हवाला दिया गया है जो दुर्घटना से जुड़े मामले में शामिल थे. इसमें दो ब्रिटिश खुफिया रिपोर्टें भी शामिल हैं जो तथ्यों को स्थापित करने के लिए दुर्घटना स्थल का दौरा करने के बाद तैयार की गई थीं.

वेबसाइट ने उस पर भी प्रकाश डाला है जो स्वतंत्रता सेनानी के आखिरी शब्द रहे होंगे और वे भारत की आजादी के लक्ष्य के प्रति उनके समर्पण को जाहिर करते हैं. बोस फाइल्स डॉट इनफो द्वारा जारी एक बयान में कहा गया है कि 70 बरसों से यह संदेह रहा है कि क्या ऐसी कोई दुर्घटना हुई थी. चार अलग-अलग रिपोर्टों में एक दूसरे के उलट साक्ष्य हैं.

दस्तावेजों में कहा गया है कि 18 अगस्त 1945 की सुबह जापानी वायुसेना के एक बमवर्षक विमान ने वियतनाम के तूरान से बोस और 12-13 अन्य यात्रियों व चालक दल के सदस्यों के साथ उड़ान भरी। विमान में जापानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल टी. शीदेई भी सवार थे। विमान का मार्ग हेतो ताईपे डेरेन तोक्यो था। वेबसाइट ने पांच ऐसे लोगों द्वारा दिए गए सबूतों का उल्लेख वेबसाइट पोस्ट में किया है जो नेताजी के आखिरी वक्त में उनके साथ थे. इनमें नेताजी का इलाज करने वाले दो जापानी डॉक्टर और एक ताइवानी नर्स, नेताजी के निजी अनुवादक और अभिन्न सहयोगी कर्नल हबीबुर रहमान खान भी शामिल हैं.

स्क्रीनशॉट ये रहे-

यह सभी साक्ष्य बोस फाइल्स डॉट इन्फो से लिए गये हैं.

भाजपा सरकार भी मानती है कि बोस की मौत विमान दुर्घटना में हुई थी

मौजूदा केंद्र सरकार लिखित तौर पर यह स्वीकार कर चुकी है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु एक विमान दुर्घटना में 1945 में ताइवान में हुई थी. सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जवाब दिया है कि “शहनवाज कमेटी, जस्टिस जीडी खोसला कमीशन और जस्टिस मुखर्जी कमीशन की रिपोर्टें देखने के बाद सरकार इस नतीजे पर पहुंची है कि नेताजी 1945 में विमान दुर्घटना में मारे गए थे.”
गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा है, “मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट की पृष्ठ संख्या 114-122 पर गुमनामी बाबा और भगवानजी के बारे में जानकारी उपलब्ध है. मुखर्जी कमीशन के अनुसार गुमनामी बाबा या भगवानजी नेताजी सुभाषचंद्र बोस नहीं थे. गृह मंत्रालय ने नेताजी से जुड़ी 37 गोपनीय फाइलें सार्वजनिक कर दी हैं.”

भाजपा सरकार की यह खुली स्वीकार्यता हैरान करने वाली है क्योंकि भाजपा के बड़े नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी सहित तमाम मंझले और निचली पंक्ति के नेता बोस के विषय में एक ऐसा क्रोधित माहौल बनाते रहे हैं जिससे यह अवधारणा आम कर दी जाये कि बोस की मौत एक राजनितिक साजिश के तहत हुई थी. यह अवधारणा तर्कों की बजाय विशुद्ध चुनावी लाभ से जुड़ी हुई है क्योंकि कोई भी तथ्य अब तक इस दिशा में नहीं मिल सका है. महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या अब सरकार की स्वीकार्यता के बाद बोस की मौत पर राजनीति होती रहेगी?

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आधुनिक निर्मल वर्मा, आशुतोष का दिमाग इंसानी विसंगतियों से हमेशा मथा सा रहता है. आशुतोष इतने मानवीय हैं कि दूसरों का दर्द भी उन्हें अपना ही महसूस होता है. कोई भी ये दर्द उनकी लेखनी में महसूस कर सकता है. आशुतोष कानपुर से हैं और पत्रकारिता में अलग मुकाम रखने वाले कानपुर महानगर के महान पत्रकारों का आशीष जरूर इनके सिर पर होगा जो बेहद तार्किक होने के साथ ही आशुतोष की लेखनी को लालित्य और प्रवाह भी मिला हुआ है. तार्किकता के धनी आशुतोष ने बाद में भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की. इंसानी मनोविज्ञान का बेजोड़ नमूना 'यातना की वसीयत' नामक किताब लिख चुके आशुतोष को संपादक जल्द ढूंढ़ते फिरेंगे. आधुनिक आशुतोष सोशल मीडिया पर भी साहित्य लेखन से गुरेज नहीं करते और हर पल रचना प्रक्रिया में रमे रहते हैं.

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