गणतंत्र दिवस के दिन कासगंज में हुई सांप्रदायिक झड़प में एक युवक की सीने पर गोली लगने से मौत हो गई. युवक का नाम चंदन गुप्ता उर्फ अभिषेक था. इसी झड़प में एक दूसरे युवक नौशाद को पैर में गोली लगी है और उसे पास के जिले अलीगढ़ के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

नवभारत टाइम्स की ख़बर के अनुसार ‘तिरंगा यात्रा’ नाम की यह रैली हिंदू महासभा, बजरंग दल और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् की संयुक्त रैली थी. इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एडीएम, कासगंज, राकेश कुमार ने बताया कि निकाली जा रही रैली के लिये प्रशासन से अनुमति नहीं ली गई थी.

अधिकारियों ने बताया कि बड्डू नगर के पास एक समुदाय ने मोटरसाइकिल पर सवार ‘तिरंगा यात्रा’ निकाल रहे युवकों के कुछ नारे लगाने का विरोध किया था जहां से इस झड़प की शुरुआत हुई.

झंडे की लड़ाई में शुरू हुआ बवाल

इसी बाबत एक व्यक्ति ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि जिस समय मोटरसाइकिल सवार युवकों की तिंरगा यात्रा बड्डू नगर पहुंची, वहां मुस्लिम समुदाय के लोग भी झंडारोहण की तैयारी कर रहे थे. प्रोग्राम का आयोजन सड़क पर था और वहां कुर्सियां पड़ी हुई थीं. यहीं पर बाइकें निकालने के लिए कुर्सियां हटाने और एक युवक से मारपीट में मामला गरमा गया. जिसके बाद पुलिस को इत्तला की गयी. 25 मिनट बाद आई पुलिस ने वहां मामला शांत कराया और दोनों गुटों को अलग कर दिया.

कासगंज के एएसपी पवित्र मोहन त्रिपाठी ने बताया कि इसके बाद ‘तिरंगा यात्रा’ निकाल रहे युवक वहां से चले गये लेकिन कुछ ही दूर जाकर वे फिर से इकट्ठे हो गये और वहां से तहसील रोड की ओर चल दिये. तहसील रोड भी एक मुस्लिम बहुल इलाका है. जहां पहले ही बड्डू नगर में हुई झड़प की ख़बर पहुंच गई थी और वहां स्थानीयों ने समझा कि ये युवक बड्डू नगर का बदला लेने आ रहे हैं. यहीं जो झड़प हुई उसी में गोली चली, जिसमें चंदन गुप्ता की मौत हो गई.

दाह संस्कार के वक्त फिर भड़की हिंसा, 10 दुकानें फूंकीं

इसके बाद अगले दिन शनिवार, 27 जनवरी को फिर भड़की हिंसा में 10 दुकानें, गाड़ियां और एक घर जला दिये गये. पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया कि यह हालिया हिंसा गुप्ता की मौत के बदले के रूप में सामने आई है. कारों और दुकानों सहित ज्यादातर संपत्ति जिसे नुकसान पहुंचा है, अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की थी.

इंडियन एक्सप्रेस से ही बातचीत में स्थानीय वकील मोहम्मद मुनज़ीर रफी ने आरोप लगाया, ‘लगता है कि हमारे समुदाय के लोगों की दुकानों और गाड़ियों पर जो हमले आज (शनिवार को) हुये हैं उनकी पहले से ही साजिश की गई थी.’

इससे पहले दिन में करीब 200 लोगों ने गुप्ता के अंतिम संस्कार में भाग लिया. गुप्ता के शरीर को तिरंगे में लपेट कर घर से करीब 2 किमी दूर दाह संस्कार के लिये ले जाया गया.

मौत पर सियासत जारी

सवेरे साढे आठ बजे जब स्थानीय बीजेपी एमपी राजवीर सिंह वहां पहुंचे तो उपस्थित भीड़ ने उनसे हर्जाने और पीड़ित परिवार के लिए एक सरकारी नौकरी की मांग की. उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह ने अपने समर्थन का भरोसा जताते हुये दावा किया कि उन्होंने शुक्रवार की शाम दो युवकों को पुलिस से छुड़ा लिया है. उन्होंने भीड़ से कहा, ‘पिछली शाम, मैं पुलिस स्टेशन गया और अपने दो युवकों को बाहर निकाल लाया, मैं आपके साथ हूं.’

आपको याद दिलाते चलें कि एक दिन पहले जब इंडियन एक्सप्रेस ने कासगंज जिले के बीजेपी प्रमुख पुष्पेंद्र प्रताप सिंह सोलंकी से इस मामले में बात की थी तो उन्होंने मामले से किसी भी तरह के संपर्क से साफ इंकार कर दिया था. उनका कहना था कि इस झड़प से उनकी पार्टी किसी भी तरह से नहीं जुड़ी हुई है.

वापस राजवीर सिंह की बात पर आयें तो कुछ ही मिनटों के बाद उनके पास एक फोन आया. उन्होंने बताया कि यह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का फोन था. राजवीर सिंह ने फोन अखिल भारतीय वैश्य एकता समाज के एक कार्यकर्ता प्रदीप चंद्र गुप्ता को थमा दिया, जो पीड़ित परिवार को जानते हैं.

प्रदीप चंद्र गुप्ता ने फोन पर कहा, ‘योगीजी आप इनको पचास लाख का हर्जाना, सरकारी नौकरी और शहीद का दर्जा देने की घोषणा करें… लड़ रहें हैं आपके लिये और लड़ते रहेंगे.’
बातचीत के बाद प्रदीप चंद्र गुप्ता ने बताया, ‘मुख्यमंत्री जी ने मामले को देखने का वादा किया है पर अभी किसी चीज का भरोसा नहीं दिया है.’

अभी तक क्या-क्या कार्रवाई हुई है?

यूपी के गृह सचिव अरविंद कुमार ने बताया कि इलाके में भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है और सीआरपीसी की धारा 144 लगा दी गई है. उत्तर प्रदेश सरकार ने पीड़ित के परिवार को 20 लाख के मुआवजे की घोषणा की है.

अभी तक 6 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और पुलिस ने दो मामले दर्ज किये हैं. पहली एफआईआर कोतवाली पुलिस स्टेशन के SHO की शिकायत पर दर्ज की गई है. जिसमें चार लोग नामजद हैं और 100-150 अज्ञात हैं. इनके खिलाफ दंगा भड़काने, मारपीट और शांतिभंग का मामला दर्ज किया गया है.

दूसरी एफआईआर 20 लोगों के खिलाफ पीड़ित के पिता की शिकायत पर दर्ज की गई है. इनके खिलाफ आईपीसी की धारा 302 (हत्या) और 124A(देशद्रोह) का मामला दंगे और मारपीट के अलावा राष्ट्रध्वज के अपमान के लिए दर्ज किया गया है.

गिरफ्तार किये गये लोगों के अलावा 40 अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया है. आईजी ध्रुव कांत ठाकुर ने बताया कि सभी लोग जो गिरफ्तार किये गये हैं, मुस्लिम हैं.

पिता के बयान पर किया जाना चाहिये गौर

इन सारी घटनाओं के बीच मृतक चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता ने कहा, ‘अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो हम आज चंदन का जन्मदिन मना रहे होते. अब सब चला गया. मैं अपना घर बेचकर यहां से जाने की सोच रहा हूं. सब पक्षपात कर रहे हैं!’

आखिर पिता सुशील गुप्ता किस पक्षपात की बात कर रहे हैं?

बिना अनुमति निकाली जा रही इस ‘तिरंगा यात्रा’ और उसके बाद भड़की हिंसा के बीच स्थानीय नागरिक लगातार इन सवालों के जवाब खोज रहे हैं-

1. कासगंज मुख्यत: ओबीसी बहुल इलाका है, जहां सबसे ज्यादा संख्या लोधी-राजपूतों की है. ऐसे में इस हिंसा पर पार्टी विशेष के नेताओं की सक्रियता और उनकी बातें और बॉडी लैंग्वेज क्या ध्रुवीकरण का प्रयास नहीं है? साथ ही मुस्लिम इलाके में शनिवार को उस वक्त हिंसा हुई जब पुलिस वहां से दाह संस्कार के स्थान पर पहुंची थी, क्या यह किसी पूर्व नियोजित साजिश की ओर इशारा नहीं करता है?

2. वैश्य समुदाय भी यहां अच्छी संख्या में है. ऐसे में लोग बता रहे हैं कि जिस चंदन गुप्ता उर्फ अभिषेक नाम के युवक की मौत हुई है, उसकी जाति को भी मामले में लाया जा रहा है. ऊपर जैसा बताया गया उसके करीबी और अखिल भारतीय वैश्य एकता समाज के एक कार्यकर्ता ने मुख्यमंत्री से बातचीत का दावा किया. बात यह भी है कि व्यापारी पिछले लंबे अर्से से सरकारी नीतियों से असंतुष्ट हैं. पहले नोटबंदी और बाद में जीएसटी के फैसलों के चलते उनमें असंतोष है. व्यापारियों के लिये क्या एक डर और ध्रुवीकरण की राजनीति की जा रही है?

3. मृत युवक चंदन गुप्ता के पिता प्रदीप यह क्यों कह रहे हैं कि सभी पक्षपात कर रहे हैं और वह घर बेचकर, जगह छोड़कर क्यों जाना चाहते हैं? अभी तक वह अपने बेटे के किसी भी राजनैतिक संगठन से जुड़े होने की बात से लगातार इंकार कर रहे हैं.

4. पिछले दिनों पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आलू की खेती में किसानों को भारी नुकसान हुआ है और लहसुन की खेती में भी उन्हें नुकसान झेलना पड़ा है. कुछ दिन पहले बड़ी मात्रा में फेंके गये आलू की तस्वीरें आगरा से सामने आई थीं. लखनऊ में भी आलू फेंका गया. माना जा रहा है कि इसके जरिये जनता के फोकस को इस मुद्दे से हटाने की राजनीति भी हो रही है.

5. भाजपा के सामने पिछले आम चुनावों की तरह इस बार भी 80 में 73 सीटों का प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है. ऐसे में लगातार राज्य में पिट रही सरकार से मदद न मिलने के चलते ऐसे मुद्दे भड़काने की राजनीति को औजार बनाया जा रहा है. इस घटना के बाद से उत्तरप्रदेश के अलग-अलग भागों से भी छिटपुट हिंसा की खबरें आ रही हैं. प्रदेश में कई और जगहों पर एबीवीपी, हिंदू जागरण मंच जैसे संगठन चंदन की तस्वीर के साथ प्रदर्शन और कैंडल मार्च जैसे कार्यक्रम शुरू कर चुके हैं. क्या यह किसी खास तरह के सांप्रदायिक डर और समाज में बंटवारे की नींव डालने का प्रयास नहीं है?

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यह रिपोर्ट, अन्य अखबारों की मीडिया रिपोर्ट्स, स्थानीय पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नागरिकों की बातों को आधार बनाकर लिखी गई है.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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