साल 1998. इस साल एक फिल्म आई थी “दिल से.” फिल्म के निर्देशक थे मणिरत्नम और इसके लिए गीत लिखे थे गुलजार ने. फिल्म कई दिनों तक सिनेमाघरों की सिल्वर स्क्रीन पर चढ़ी रही. फिल्म के गाने भी बहुत पसंद किए गए. किए भी क्यों न जाते? गानों का म्यूजिक दिया था एक साल पहले ‘मां तुझे सलाम, वंदे… मा.तरम्…’ गाना रचकर भारत में ‘देशभक्ति 2.0’ जगाने वाले ए आर रहमान ने. रहमान इस फिल्म से हिंदी गानों के कंपोजर्स में शिखर पर पहुंच गए. खैर फिर से फिल्म की ओर लौटते हैं. दिल से, अलगाववाद के मुद्दे पर बनी फिल्म थी. ऐसे ही विडंबनापूर्ण मुद्दों पर फिल्म बनाने वाले मणिरत्नम ने तीन साल पहले एक और फिल्म बनाई थी बाम्बे. ये फिल्म दिसंबर, 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद से भारतीयों में पल रहे सांप्रदायिक दानव का पर्दाफाश थी. बड़े स्तर पर सांप्रदायिकता और अलगाववाद का सामना कर रहे 20वीं सदी के इस आखिरी दशक में 1998 एक महत्वपूर्ण साल था. क्योंकि इसी साल देश एक और भयानक घटना की 50वीं बरसी मना रहा था. एक ऐसी घटना जिसमें सिर्फ तीन गोलियां चली थीं. पर एक आदमी में जा धंसी उन तीन गोलियों ने निर्धारित कर दिया था कि 50 साल बाद हमें “दिल से” और “बॉम्बे” जैसी फिल्म देखने को मिलेंगी. ये घटना थी महात्मा गांधी की हत्या. उसी सामाजिक खाई और सांप्रदायिकता का परिणाम, जिसका परिणाम ये फिल्में थीं.

खैर गांधी की मौत से जुड़े तमाम पहलुओं से हम इस लेख में जूझेंगें पर पहले जानना चाहिए कि क्या था इस महात्मा में, जिसकी यादें न 1998 में पचास साल बाद पीछा नहीं छोड़ रही थीं और न आज छोड़ती हैं. इसी फिल्म में लिखे गुलजार के गीत ‘तू ही तू सतरंगी रे…’ से बोल उधार लें तो कह सकते हैं कि इस महात्मा गांधी की जुबां पर भले ही मरते वक्त “हे राम” रहा हो पर मनोभाव इस गीत के तई रहे होंगे, ‘मुझे मौत की गोद में सोने दे, तेरी रूह में जिस्म डबोने दे…’ और निसंदेह इस महात्मा को भारत के मिजाज की अद्वितीय समझ थी. शायद इसीलिए तब का उसका भारत की रूह में अपने सभी सनातन हथियार जैसे की सत्य,अहिंसा आदि के साथ डुबोया विराट जिस्म आज भी वैसा ही सुरक्षित और आभावान है. आखिर तभी तो कभी नोट पर. कभी स्वच्छता अभियान के विज्ञापनों पर. और कभी मनरेगा जैसे तमाम कार्यक्रमों के जरिए रह-रह कर चेहरे, चश्में, लाठी और चरखे के रुप में वो उभरता रहता है. या इसे यूं भी देखा जा सकता है कि शायद बाजार और मुनाफे की अंधी दौड़ में हमें गांधी की आत्मा की जरूरत नहीं रह गई थी, हमें बस उनका नाम और चेहरा चाहिए था.

गांधी की मौत पर कभी पाठ्य पुस्तकों में बड़े स्तर पर चर्चा नहीं होती. इसका एक कारण हो सकता है कि उस वक्त गांधी की मौत भारत के माथे पर एक काला दाग बनी क्योंकि गांधी न ही किसी अंग्रेज के हाथों मारे गए, न ही किसी अंग्रेजी कार्रवाई में मरे बल्कि उनकी हत्या आजाद भारत में और उनके द्वारा स्वीकृत सरकार के काल में हुई. यह एक शर्मिंदगी का भाव हो सकता है कि गांधी की मौत की चर्चा से इतिहासकार कटे रहे. इसीलिए दो से चार लाइनों में पाठ्यपुस्तकों में यह प्रसंग निपटा दिया जाता है. पर जैसी परिस्थितियां हो चली थीं इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि यह अनदेखी एक सोची-समझी साजिश भी हो सकती है. दरअसल गांधी के कथनानुसार अगर माना जाए कि उनका जीवन ही उनका संदेश था तो उनकी मौत को भी इससे कतई अलग नहीं किया जा सकता है, वो भी स्वयं में संदेश है. पर फिर उनकी मौत की अनदेखी क्यों?

गांधी की मौत से जुड़ी कई गलत अवधारणाओं के जवाब में अपनी किताब ‘लेट्स किल गांधी’ में उनके पौत्र तुषार गांधी खुद भी ये आरोप लगाते हैं कि गांधी की मौत को बड़े स्तर पर नजरअंदाज किया गया. जांच से भी वो संतुष्ट नहीं दीखते और साथ ही उनकी मौत पर कांग्रेसियों की चुप्पी पर उन्हें कोफ्त होती है. वो ये भी मानते हैं ऐसे वक्त में जब सरकार के काम में गांधी तमाम तरह की नसीहतें दे रहे थे, सरकार को ये नसीहतें अड़ंगा लगने लगी थीं. सरकार और उसके मंत्री जिंदा गांधी से बेहतर मुर्दा गांधी को मानने लगे थे. इसके लिए वो ये तर्क देते हैं कि जबकि गांधी की प्रार्थना सभा में 20 जनवरी को ही मदनलाल पाहवा नामक एक शरणार्थी बम फेंक चुका था, इसके बावजूद भी गांधी की सुरक्षा के प्रबंध अच्छे नहीं किए गये. गांधी ने अपनी प्रार्थना सभा में सभी को आने देने को कहा था. फिर भी पुलिस को बमकांड के बाद चेत जाना चाहिए था पर पुलिस सतर्क नहीं हुई. परिणामवश गांधी की हत्या हुई और पुलिस गांधी की कही ‘किसी को न रोकने’ की बात को लगातार बचाव के लिए प्रयोग करती रही.

गांधी जी की मौत के बाद नाथूराम गोडसे ने जो बयान दिया उसमें बड़े स्तर पर यह आरोप लगाया गया था कि गांधी पाकिस्तान और मुस्लिम समर्थक थे. कारण, गांधी ने विभाजन के बाद पाकिस्तान के हिस्से में आए 55 करोड़ रुपये पाकिस्तान को देने की सिफारिश की थी. लेकिन तुषार कहते हैं नाथूराम का यह आरोप कितना कम मायने रखता है क्योंकि यह गांधी की हत्या के लिये हुआ कोई पहला प्रयास नहीं था. इससे पहले भी उनकी हत्या के चार प्रयास हो चुके थे. और पहला प्रयास जो कि 1934 में हुआ था, तब तक पाकिस्तान का विचार मुस्लिम लीग के एजेंडे में भी नहीं था. और न ही तब गांधी ने 55 करोड़ पाकिस्तान को देने की मांग की थी. ऐसे में नाथूराम के लिए रेडीमेड तर्क कहीं और ही गढ़े जा रहे थे. तर्क गढ़ने वाले इसके लिए सीधे तौर पर वी डी सावरकर को जिम्मेदार ठहराते हैं और कहते हैं कि 1968 में बॉम्बे हाइकोर्ट ने नाथूराम के जिस हत्या के बाद दिए गए भाषण से प्रतिबंध हटाया है उससे सावरकर स्कूल ऑफ राइटिंग की बू आती है. सावरकर को नाथूराम से मिलने की छूट भी थी. इसलिए तुषार मानते हैं कि यह कोई मुश्किल काम नहीं कि नाथूराम के शब्दों के पीछे मास्टरमाइंड कोई और ही रहा हो.

प्रार्थना सभा में बम फेंकने वाल मदनलाल पाहवा जो कि पंजाबी शरणार्थी था और पुलिस की पूछताछ में उसने स्वीकार किया था कि गांधी की हत्या की साजिश करने वाले ग्रुप का वो हिस्सा है. मदनलाल ने पुलिस को बताया भी था कि इस साजिश में शामिल सदस्यों में पूना का एक संगठन भी शामिल है. उनमें से एक मराठी पत्र-पत्रिकाओं ‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘अग्रणी’ का संपादक और प्रकाशक भी है. उस वक्त ये पत्र गोडसे और आप्टे ही निकाला करते थे. मदनलाल पुलिस को दिल्ली के मरीना होटल भी ले गया था. जहां पर रूम नं. 40 में 20 जनवरी के फेल हुए हमले से ठीक पहले संगठन के सदस्य छिपे हुए थे. यहां से पुलिस को कपड़े भी मिले थे जिस पर NVG लिखा था. ये नारायण विनायक गोडसे का शॉर्ट फॉर्म था. यहां पर पुलिस को दिल्ली हिंदू महासभा के महामंत्री का रिलीज न हुआ एक स्टेटमेंट भी मिला था.

मदनलाल पाहवा ने कई बार पूछताछ के दौरान उस ग्रुप के सदस्यों के बारे में कहा था कि वो इतने कट्टर हैं कि वो फिर आएंगे. पर जाने क्यों पुलिस इस मामले को बहुत ही हल्के में लेने वाली थी. तभी तो बाम्बे पुलिस का एक अधिकारी, जिसे गांधी की हत्या से जुड़े इस संजीदा मामले की रिपोर्ट सौंपकर जल्दी से जल्दी बाम्बे पहुंचाने को कहा गया उसने प्लेन से यात्रा करने के बजाए रेल मार्ग को चुना. वो भी सबसे लंबा मार्ग लिया. दिल्ली से इलाहाबाद जाकर उसने वहां से बाम्बे के लिए दूसरी ट्रेन पकड़ी. वो अधिकारी जब तक बाम्बे पहुंचा नाथूराम, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे अपने अगले मिशन पर दिल्ली के लिए रवाना हो चुके थे. और जब उस अधिकारी से इस देरी के लिए पूछताछ की गई और हवाई यात्रा न करने का कारण पूछा गया तो उसने कहा कि उसे हवाई यात्रा से डर लगता था. उसका ये तर्क अदालत ने मान भी लिया था. ये पुलिस की इस मामले में लापरवाही की सीमा थी.

इतना भी होता तो गनीमत थी. 20 जनवरी के फेल हुए अटैम्प्ट के बाद मोरारजी देसाई, जो कि बाम्बे प्रांत के गृह मंत्री थे, उन्हें प्रोफेसर जे सी जैन के हवाले से जानकारी मिली कि मदनलाल पाहवा ने उनसे गांधी को मारने वाले एक गैंग का हिस्सा होने की डींगें हांकी थीं. जे सी जैन बाम्बे के रुइया कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर थे. देसाई ने जैन की इस चेतावनी को अनदेखा किया. हां कुछ दिनों बाद एक मौके पर जब वो अहमदाबाद में सरदार पटेल से मिले तो सरदार से उन्होंने इसका जिक्र किया. लेकिन सरदार भी इस मुद्दे पर कोई गहरी छानबीन नहीं करवा सके. यानी कुल मिलाकर सभी इसे खासे हल्के में ले रहे थे. पटेल ने हत्या के बाद स्वीकारा था कि उन्हें षड्यंत्र के बारे में सूचना मिली थी पर प्रोफेसर जैन की सच्चाई पर यकीन करने उन्होंने से मना कर दिया था. यानी कुल मिलाकर वो गांधी की मौत के बाद अब उसकी तमाम खामियों से पीछा छुड़ाने में जुटे हुए थे.

पुलिस सारी जानकारी होने के बावजूद भी ढिलाई से काम करते हुए दस दिन के अंदर आरोपियों को पकड़ने की बात तो दूर, उनकी पहचान तक नहीं कर सकी थी. तभी तो बड़े आराम से दस दिन बाद नाथूराम गोडसे, नारायण आप्टे और विष्णु करकरे दिल्ली रेलवे स्टेशन के रिटायरिंग रूम में मिले और बिड़ला हाउस में पहुंच गए. कोई पुलिस नहीं, कोई खास सुरक्षा और चेकिंग नहीं. अगर पुलिस ने बिड़ला हाउस में बाम्बे, पूना या फिर अहमदनगर के पुलिस इंस्पेक्टर और कांस्टेबल तैनात किए होते तो शायद वो अपराधियों को पहचान लेते और ये दुर्घटना टल जाती. पर ऐसा हुआ नहीं और वो भीड़ में शामिल हो गए . 5 बजकर 17 मिनट पर जब गांधी प्रार्थना सभा में पहुंचे तो नाथूराम ने उनका रास्ता रोका और उन्हें तीन गोलियां मारकर चिरनिद्रा में सुला दिया. दो गोलियां तो शरीर में आर-पार हो गईं पर एक धंसी रह गई. ये तीन गोलियां 9 एमएम की बेरेटा पिस्तौल से चलाई गई थीं. गांधी ने जमीन पर गिरने से पहले कहा, ‘हे राम!’ और हत्या के बाद शोर मचा कि गांधी को मुसलमान ने मार दिया है. बड़ी मुश्किल से भीड़ को शांत कराया जा सका और हत्या के बाद नाथूराम को पहचानने वाले पहले आदमी कांग्रेस के पूना के ही एक पुराने नेता अन्ना गाडगिल थे. जिन्होंने उसकी पहचान एक चितपावन ब्राह्मण नाथूराम के रूप में जाहिर की और दंगे होते-होते बचे.

तुषार गांधी अपनी किताब में ये भी मानते हैं कि जिंदा गांधी सरकार और मंत्रियों के लिए कई मायनों में मुसीबत बने हुए थे. इसलिए कैबिनेट में कई लोग जिंदा गांधी की अपेक्षा मृत गांधी को कहीं काम का मानते थे. वे मानते थे कि उन्हें आगे की राजनीति के लिए गांधी के सुझावों की नहीं बल्कि अपनी और कांग्रेस की स्थिति मजबूत बनाए रखने के लिए गांधी की छवि की आवश्यकता थी. तुषार दावा करते हैं कि पटेल को सौंपी गई एक सीक्रेट रिपोर्ट में कई अधिकारियों, नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के नाम थे जो हिंदू महासभा या आरएसएस के मेंबर थे. खुलकर उसकी विचारधारा का समर्थन और प्रचार करते थे. तुषार यह दावा भी करते हैं कि अलवर जिले में गांधी की मौत से पांच घंटे पहले ही उनके मारे जाने के पर्चे बांटे जा चुके थे. साथ ही कई दूसरी जगहों पर गांधी की मौत से पहले ही इसके जश्न का इंतजाम कट्टर हिंदूवादी ताकतों ने कर रखा था. इसका मतलब ये था कि बड़ी संख्या में लोग 30 जनवरी को घटने वाली घटना से परिचित थे.

तुषार मानते हैं कि जिस तरह की कार्रवाई पुलिस ने 20 से 30 जनवरी, 1948 के बीच की वो गांधी को बचाने से ज्यादा इस बात का प्रयास था कि जिस तरह से चीजें साजिश में हैं वो अपने अंत तक सफलतापूर्वक पहुंचें. गांधी ने आजादी के बाद जो तस्वीर भारत की खींच रखी थी, उस ओर बढ़ना उनके उत्तराधिकारियों के लिए बहुत मुश्किल था. उन्होंने कांग्रेस को समाप्त कर देने की बात भी कही थी. वो कहते थे कि वो पाकिस्तान जाकर वहां से यहां से निकाले गए मुस्लिमों को ले आएंगे. हर संभव प्रयास करेंगे कि इस झूठे अलगाव को जनता नकार दे. इससे भी कहीं ज्यादा मुसीबत कांग्रेसियों को उनके ग्रामोद्योग के लक्ष्यों को लेकर हो रही थी. जब दिल्ली पहुंचे सिक्ख और हिंदू शरणार्थी लूट-पाट और मस्जिदों पर कब्जे में जुटे हुए थे तब गांधी मंत्रियों और जनसेवकों से अपील कर रहे थे कि वो अपने बंगले उन शरणार्थियों के लिए खाली कर दें . यहां तक कि उन्होंने वायसराय माउंटबेटन से वायसराय हाउस को खालीकर उसे शरणार्थियों के लिए अस्पताल बनाने की मांग की थी. तो ऐसे में गांधी तमाम लोगों के लिए असहनीय हो चुके थे.

ऐसे में कई विद्वानों का मानना है कि गांधी ने अपनी मौत का इंतजाम खुद ही कर लिया था. हालांकि जिस तरह से गांधी के जीवन के हर भाग पर प्रचुर मात्रा में सामग्री मौजूद है, उसी तरह उनकी मौत पर भी प्रचुर साहित्य मिल जाता है. पर उस तक सभी की पहुंच सुलभ नहीं है. फिर जिस तरह से शुरुआती कुछ वर्षों में गांधी की मौत की घटना चर्चा से दूर रही उससे गांधी की मौत के बाद कट्टरपंथी हिंदू संगठनों को बहुत बड़े स्तर पर प्रोपेगेंडा फैलाने और गांधी की हत्या को औचित्यपूर्ण बताने में मदद ही मिली. प्रौपेगेंडा फैलाने वालों ने कहा कि गांधी की हत्या ही भारतमाता की रक्षा का एकमात्र उपाय था. हम सभी आज जानते हैं कि ये बातें सरासर झूठ हैं लेकिन फिर भी भारतीय युवा, खासकर बाबरी के बाद के अतिसांप्रदायिक माहौल में पैदा हुए युवा इन तर्कों में विश्वास करते हुए ही बड़े होते हैं. गांधीवादी अपूर्वानंद तो यह तर्क भी देते हैं कि गांधी से जुड़े स्थलों पर बच्चों को ले जाते हुए शिक्षक उन्हें राजघाट (गांधी जी के समाधि स्थल पर) ले जाते हैं पर गांधी शांति प्रतिष्ठान नहीं. जो गांधी की हत्या के वक्त बिड़ला हाउस था. और जहां प्रार्थना सभा के दौरान वो मारे गए थे. दरअसल हम खुद गांधी की मौत से पीछा छुड़ाना चाहते हैं.

पर हमें अच्छे से जानना चाहिए कि गांधी की मौत पर अच्छे से चर्चा न होने देना भी गांधी के सिद्धांतों के खिलाफ है. क्योंकि हत्या के बाद प्राप्त हुए साक्ष्यों से पता चलता है कि ये एक तरह की गलती थी और इसे चाहने पर रोका जा सकता था. लेकिन हमारा अहम यहां भी ऊंचा हो जाता है. हम भूल जाते हैं कि गांधी कहा करते थे, ये बहुत अच्छा है कि आप अपनी गलती को दुनिया को बड़ा करके दिखाएं, बजाए इसके कि लोग आपको अपकी गलती बताएं. यही अपील करते हुए गांधी मौत के वक्त में दिल्ली और उसके आस-पास के इलाकों में घूम रहे थे. लेकिन हमने अपनी गलती तो छिपाई ही गोडसे के भाषण को बैन करके झूठ के प्रसार को बढ़ावा भी दिया. ध्यान दें तो गांधी विभाजन के बाद से बहुत टूटा हुआ महसूस कर रहे थे शायद तभी उन्होंने जनता को भी आजादी के दिन आत्मावलोकन का सुझाव दिया था. इसके बाद अपने आखिरी जन्मदिन 2 अक्टूबर, 1947 को भी उन्होंने अपनी 125 साल जीने की इच्छा छोड़ने की बात की थी. दरअसल जब गांधी को भारत विभाजन और उसके बाद की त्रासदी के वक्त में लोग उनके जन्मदिन की बधाई देने पहुंचे. तो गांधी ने उनसे कहा, आज मैंने 125 बरस जीने की इच्छा छोड़ दी है. अब मैं और नहीं जीना चाहता. गांधी के इस जन्मदिन पर खिन्न नेहरू ने सम्बोधन में कहा था कि गांधी की जय का नारा और मुसलमानों का मारा जाना एक साथ नहीं चल सकते. धार्मिक हिंसा को देखकर गांधी को ऐसे वक्त में अपनी सारी सीखें कई बार व्यर्थ समझ आती है.

कट्टर हिंदुओं के गांधी के खिलाफ होने के बारे में एक और बात कही जाती है. दरअसल गांधी खुद में एक सनातनी हिंदू थे पर फिर भी वो शुद्धि और घरवापसी का समर्थन नहीं करते थे. न ही वो मंदिर जाते थे और न ही मंदिर जाने के प्रति उत्साही थे. बल्कि कई बार मंदिरों में फैली गंदगी और हो रहे भ्रष्टाचार की उन्होंने आलोचना ही की थी. न ही गांधी किसी संत, महात्मा से मिलने ही जाते थे बल्कि स्वयं लोग उन्हें महात्मा कहते थे और संत उनसे मिलने आते थे. ऐसे में किसी दूसरे हिंदू की अपेक्षा साधारण हिंदुओं पर अपने ‘रामराज्य’ के लक्ष्य को रखकर वो प्रभाव बनाने में सफल रहे थे. लेकिन वे ऐसे में छद्म हिंदुओं, जो कि धर्म का प्रयोग राजनीतिक उपकरण के रूप में करना चाहते थे, उनकी आंखों में खटक रहे थे. उन्होंने जिन्ना की कटु आलोचना की थी. उनकी पाकिस्तान की संकल्पना का आधार ही बनावटी ठहरा दिया था क्योंकि मानवता के विरुद्ध वो एक धर्म को लेकर अपना आधार विकसित कर सका था. इसी आधार पर भारतीयों को भी वो सीख दिया करते थे कि भारत केवल हिंदुओं का देश नहीं हो सकता. राजनीति में इन कट्टर हिंदुओं न कोई विशेष योगदान दिया नहीं था इसलिए वो गांधी के सामने (जो धार्मिक और राजनीतिक दोनों ही मोर्चों पर सफल थे) कहीं ठहरते नहीं थे. तो इन लोगों के सामने कोई और विकल्प गांधी को लेकर बचा नहीं था. इसलिए धर्म ही एक मुद्दा हो सकता था जिसे अतिवादी भुनाते. पर गांधी लगातार जनता से सीधा संवाद करते थे. उन दिनों गांधी साधारण जनता के दिमाग में ये बात बैठाने में जुटे हुए थे कि पाकिस्तान अगर हिंदुओं को वहां से भगा रहा है तो हम इसका जवाब मुसलमानों पर अत्याचार करके नहीं दे सकते. इसके पीछे गांधी का तर्क था कि एक की गलती को दूसरा दोहराकर उसे गलत नहीं बल्कि सही साबित कर देता है. यानी अभी भी गांधी का हिंदुओं पर अच्छा खासा प्रभाव था जो इन कट्टरपंथियों को नीचा दिखा रहा था. साथ ही ये अधिकांश ब्राह्मणों वाले समूह गांधी के छुआछूत जैसे कार्यक्रमों के भी खिलाफ थे.

इस घटना को प्रोफेसर अपूर्वानंद अपने एक भाषण गांधी का आखिरी महीना में एक अलग ढंग से देखते हैं. वो इसका संबंध आरएसएस और उससे संबंद्ध दूसरे संगठनों से जोड़ने का प्रयास करते हैं. अपूर्वानंद कहते हैं, एक ओर सावरकर ने पत्र लिखकर अंग्रेजों से माफी मांग ली थी. और साथ ही आगे से स्वतंत्रता आंदोलन की किसी भी कार्यवाही में शामिल न होने का वायदा भी किया था. पर इसके बाद भी बी एस मुंजे और वी डी सावरकर ने हिंदुओं को हथियार रखने की और उन्हें चलाने की ट्रेनिंग देने की छूट अंग्रेजों से मांगी थी और ये सब समानांतर चल रहा था. स्वतंत्रता संग्राम में इसका अर्थ ये है कि वे जान चुके थे अंग्रेज जब भारत को छोड़ देंगे तब तक हमें शासन के लिए तैयार रहना चाहिए. उस वक्त भारत पर कब्जा करके उसे हिंदु राष्ट्र बना दिया जाए. गांधी इसमें सबसे बड़े बाधक थे. क्योंकि उनके रहते धर्म का राजनीति के लिए दोहन कट्टर हिंदू ताकतों के लिए आसान नहीं था. युवक ह्रदय सम्राट नेहरू के रहते भी ये सपना सफल होने वाला नहीं था. ऐसे में वो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सफलता को हाईजैक कर लेना चाहते थे. और इसके लिए उनके पास एक ही औजार था इनकी हत्या करके हिंदुओं को धर्म के प्रभाव में लेना. इन सभी षड्यंत्रकारी दलों में पूना के ऊंची जाति के हिंदू शामिल थे. इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि नारायण आप्टे और गोडसे गैंग ने गांधी की हत्या करने में सफलता पा ही ली. गांधी पर हुए मारने को पांच प्रयासों में से तीन में आप्टे और गोडसे शामिल थे. वर्धा, सेवाग्राम में भी गांधी पर गोडसे चाकू लेकर दौड़ा था पर लोगों ने उसे पकड़ लिया था और एक उन्मादी युवक समझकर छोड़ दिया था.

12 जनवरी, 1948 को गांधी मुसलमानों पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ अपने अंतिम उपवास पर गए. इसके बाद अपने बेटे देवदास गांधी से इस बारे में उनका संवाद भी हुआ . उन्होंने वहां भी देवदास को आश्वस्त किया कि ये उनका जल्दीबाजी में लिया गया फैसला न होकर पूरा सोच समझ कर लिया गया फैसला है. गांधी बनावटी नेता नहीं थे. याद रहे कि वो नोआखाली में पैदल घूमें. लोगों की झोपड़ियों में रात गुजारी. लोगों के गुस्से से बचते वो नहीं थे. कहा करते थे, आपने मुझे बुलाया नहीं और आपके कहने से मैं जाऊंगा भी नहीं. नोआखाली में हमलावर मुसलमानों को समझाना था. गांधी इसमें सफल हुए. दिल्ली में गांधी सफल नहीं हो रहे थे. गांधी का कहना था कि मैं तो यहां (दिल्ली में) इत्मीनान से चल सकता हूं पर मेरे मित्र जाकिर हुसैन नहीं चल सकते. यह दिल्ली मेरी दिल्ली नहीं है. जब तक वो अपने साथियों के साथ आराम से नहीं चल सकते. तब तक मैं चुप नहीं बैठूंगा. गांधी की जिंदगी समन्वय और समझौते की बेमिसाल मिसाल थी.

आखिरकार जब इस मुद्दे पर सारे नेता मिले और राजेंद्र प्रसाद के घर पर एक संकल्प पत्र तैयार करके गांधी के पास 18 तारीख को लेकर गए जिसमें शांति स्थापित करने की अपील थी. वहां गांधी को इस बात की दी गई कि अब हिंदू-मुस्लिमों में अब झगड़ा नहीं है. सारे दंगे खत्म हो गए हैं. इसके अलावा, मूर्तियां मस्जिदों से हटा ली गई. तब गांधी ने अपना उपवास खत्म किया. गांधी की प्रार्थना सभा भी मात्र कोई धार्मिक जुटान न होकर सामाजिक समरसता का प्रयोग स्थल था. उन्होंने सारे ही धर्मों के पवित्र ग्रंथों से अच्छी-अच्छी सूक्तियां निकालकर अपनी प्रार्थना बनाई थी. गांधी वहां केवल प्रार्थना नहीं करते थे. सार्वजनिक महत्व के प्रश्नों पर चर्चा वहां होती थी. गांधी की प्रार्थना सभा एक फोरम थी. जहां पर गांधी सारी बातों की चर्चा करते थे. वहां वो पाखाना बनाने से लेकर अपनी आलोचना के बारे में भी उत्तर देते थे. साधारण से साधारण विषय से लेकर भारत की विदेश नीति तक की चर्चा करते थे.

पर आजादी के बाद इस महान समन्वयवादी और हठी सत्य के प्रयोगकर्ता को उसके ही लोगों ने नकार दिया था. हत्या की परिस्थितियां, उसकी जांच और उसके बारे में कांग्रेसियों का रुख सब इस बात की गवाही देते हैं. ऐसे में वो महात्मा गांधी जीकर भी क्या करते? उनके मरने का वक्त हो चुका था. भारतीय राजनीति का वो दौर शुरू हो गया था जब हमें गांधी के विचारों की नहीं सिर्फ उसके नाम की जरूरत रह गई थी.

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