तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से करीब 600 किलोमीटर दूर तूतीकोरिन में वेदांता की स्टरलाईट प्लांट (vedanta sterlite plant) है. ये कंपनी यहां कॉपर गलाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा प्लांट चलाती है. यह प्लांट हर साल 4.38 लाख टन कॉपर पैदा करती है. प्रतिदिन के हिसाब से इसकी 1200 टन कॉपर की पैदा करने की क्षमता है. 24 मार्च, 2018 को हजारों थूथुकुडी निवासी शहर की सड़कों पर जमा होना शुरू हो गये. जिनकी मांग थी वेदांत स्टरलाइट प्लांट का संचालन तत्काल बंद करवाना. हालांकि विरोध की आग सौ दिन पहले से ही धधकना शुरू हो गयी थी.
दरअसल इसी प्लांट में 23 मार्च, 2013 को गैस लीक की दुर्घटना हुयी थी. जिसके बाद मद्रास हाईकोर्ट ने तत्काल प्रभाव से इस प्लांट को बंद करने का आदेश दिया था. हालांकि ये पहला मौका नहीं था जब 41,000 करोड़ के इस कंपनी के क्रियाकलापों पर सवालिया निशान लगे थे. 2008 में कम्युनिटी मेडिसिन विभाग, तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज ने स्टरलाइट इंडस्ट्रीज (इंडिया) लिमिटेड, थूथुकुडी के 5 किमी तक “स्वास्थ्य स्थिति और महामारी विज्ञान अध्ययन” नामक एक रिपोर्ट प्रस्तुत की. यह अध्ययन 80,725 लोगों की आबादी पर किया गया था. इस अध्ययन में स्टरलाइट से दूर रहने वाले लोगों की स्वास्थ्य की स्थिति की तुलना स्टरलाइट के आसपास के गांवों में औसत स्वास्थ्य स्थिति और दो अन्य स्थानों के साथ जिनके पास कोई प्रमुख उद्योग नहीं था.
अध्ययन के समय (2006 और 2007 में) स्टरलाइट सालाना 70,000 से 170,000 टन तांबा एनोड (टीपीए) के बीच कम उत्पादन क्षमता पर निर्माण कर रहा था. यह केवल 2005 में था कि इसे 300,000 टीपीए की विस्तारित क्षमता पर निर्माण करने की अनुमति थी.
2007 से स्टरलाइट 400,000 टीपीए स्मेल्टर का संचालन कर रहा है. जो 1996 में इसकी शुरुआत के वक्त से लगभग छह गुना ज्यादा है.

अध्ययन के निष्कर्ष से खुलासे :

1. चल रहे विरोधों की साइट कुमरदेयपुरम और थ्रुकु वीरपंदीपुरम में भूजल में लौह सामग्री पीने के पानी के लिए भारतीय मानक ब्यूरो से निर्धारित अनुमति प्राप्त स्तरों की तुलना में क्रमश: 17 और 20 गुना अधिक थी. और इस भूमिगत पानी को पीने के चलते लोगों को पुरानी थकान, जोड़ों में दर्द और पेट दर्द की समस्या होती थी.

 

2. कारखाने के आसपास 13.9% क्षेत्र में सांस की बीमारियां बहुत थीं और यह राज्य के औसत की तुलना में काफी अधिक था. अस्थमा के साथ ब्रोंकाइटिस की घटना 2.8% लोगों में पाई गई. जो राज्य औसत औसत 1.29% से अधिक है.
ब्रोंकाइटिस से तंबाकू, धुआं, धूल या रसायनों के चलते शरीर में श्वसन तंत्र में सूजन आ जाती है. अस्थमा एक ऐसी स्थिति है जहां श्वसन तंत्र के चारों ओर की मांसपेशियां तंग हो जाती हैं जिसके परिणामस्वरूप वायुमार्गों संकुचित हो जाता है. अस्थमा के साथ ब्रोंकाइटिस एक ऐसी स्थिति है जहां अस्थमा और ब्रोंकाइटिस एक साथ होते हैं.
रिपोर्ट में पाया गया है कि अस्थमा और श्वसन संक्रमण की बढ़ी हुई प्रसार दर के पीछे क्षेत्र के उद्योग और ऑटोमोबाइल प्रमुख कारण हैं.
3. अध्ययन में यह भी पाया गया कि कारखाने के पास कान, नाक, गले (ईएनटी) विकारों से पीड़ित अधिक लोग थे. ईएनटी रोगों में से, फेरींगिटिस और साइनस बहुत अधिक थे. रिपोर्ट में निष्कर्ष के रूप में पाया गया कि जलवायु की स्थिति और वायुमंडलीय प्रदूषण ईएनटी विकृति के प्रसार के कारण हो सकता है.
4. मायालगिया या सामान्य शरीर का दर्द, कारखाने के नजदीक अध्ययन क्षेत्र में व्यापक रूप से पाया गया.
5. क्षेत्र में महिलाओं में मासिक धर्म संबंधी विकार थे, जैसे मेनोरगैगिया और डिसमोनोरघिया. रिपोर्ट में कहा गया है कि इसे गहन अध्ययन की जरूरत है.
इस अध्ययन में प्राप्त निष्कर्ष काफी विचलित करने वाले थे क्योंकि 2007 में श्वसन रोगों की उच्च घटनाएं उस समय थीं जब स्टरलाइट अपने वर्तमान उत्पादन स्तर के आधे से भी कम समय में चल रहा था. श्वसन रोग वायु प्रदूषण का संकेतक है जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा “दुनिया का सबसे बड़ा एकल पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिम” के रूप में पहचाना गया है. WHO रिपोर्ट के मुताबिक 2012 में, लगभग 7 मिलियन लोग इससे मारे गए. आठ वैश्विक मौतों के कारणों में से एक वायु प्रदूषण एक है.

स्टरलाइट ने 23 मार्च 2013 की घटना से कर दिया था इंकार

इस सब के बाद स्टरलाइट ने 23 मार्च 2013 की गैस रिसाव की घटना को भी अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध एक प्रेस वक्तव्य में खारिज कर दिया.
वक्तव्य में कहा गया कि संयंत्र 21 मार्च से 23 मार्च तक रखरखाव के लिए बंद कर दिया गया था. इसके अलावा उत्सर्जन सामान्य थे और निर्धारित सीमाओं के भीतर थे.
इसके अलावा बयान में कहा गया है कि सरकारी अधिकारियों की एक टीम ने 23 मार्च और 24 मार्च को तांबा संयंत्र का निरीक्षण किया था. गैस रिसाव के कारण जिला स्वास्थ्य अधिकारियों को बीमारी का कोई मामला नहीं मिला है.
हालांकि अधिकारियों  ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पाया है कि इकाई से उत्सर्जन ने बोर्ड द्वारा निर्धारित सीमाओं का उल्लंघन किया था. ऑनलाइन उपकरणों ने अतिरिक्त उत्सर्जन दर्ज किया था. 23 मार्च को जनता से शिकायतों के बाद अधिकारियों ने कारखाने का निरीक्षण किया था.
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इसपर कंपनी से एक स्पष्टीकरण भी मांगा था जिसने 27 मार्च को जवाब दिया था. लेकिन कंपनी की व्याख्या को बोर्ड ने असंतोषजनक पाया था.

कंपनी की हिस्ट्री क्या बताती है?

वेदांता ने 1979 में अनिल अग्रवाल के साथ एक तांबे की कंपनी की शुरुआत की थी. अब भारत, अफ्रीका, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया समेत दुनिया भर में कारोबार फैल गया है. यह 2003 में लंदन में सूचीबद्ध होने वाली पहली भारतीय कंपनी थी.
इसी के साथ वेदांता एक लंदन स्थित पर्यावरण समूह वेदांता की विफलता से लगातार इसके खिलाफ प्रदर्शन करता है. ये लंदन में वेदांता की वार्षिक बैठकों के बाहर प्रदर्शन आयोजित करता है.
विश्लेषकों का कहना है कि कंपनी के कुल परिचालन लाभ में तांबा लगभग 8 प्रतिशत योगदान देता है. मालिक अनिल अग्रवाल उन्होंने पहले ही एंग्लो अमेरिकन पीएलसी जैसी बड़ी खनन कंपनियों में हिस्सेदारी खरीदी है और कहा है कि वह अफ्रीका में निवेश पर कम से कम $ 1 बिलियन खर्च करने की योजना बना रहे हैं.

कई भारतीय राज्यों में साबित हो चुकी है प्रकृति और इंसानों की दुश्मन

अकेले भारत में 1996 से शुरू होने के बाद संयंत्र के खिलाफ कई मामले दायर किए गए हैं. और 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणीय कानूनों को तोड़ने के लिए लगभग $18 मिलियन जुर्माना लगाया था.
वेदांता ओडिशा में नियमगिरी पहाड़ियों के एक जंगली इलाके में बॉक्साइट खनन के लिए एक लड़ाई हार गई थी. यहाँ पर रहने वाली दांग्रिया कोंध जनजाति उस जगह को पवित्र मानती है. इस अस्वीकृति ने कंपनी को एक ही राज्य में एल्यूमीनियम संयंत्र के लिए अलग से महंगे बॉक्साइट आयात करने के लिए मजबूर ही नहीं किया बल्कि इसके विस्तार में देरी भी हुयी.
इसके बाद कंपनी कोरबा (छत्तीसगढ़), गोवा और राजस्थान में भी कई बार नियमो के उल्लंघन की वजह से चर्चा में रही है. जहां एक तरफ गोवा और राजस्थान में खनन अधिकारों को लेकर कंपनी और राजनेताओं पर कोर्ट ने सवाल उठाया. वहीं दूसरी तरफ कोरबा, छत्तीसगढ़ में बाल्को (जिसमें वेदांता 51 फ़ीसदी की हिस्सेदारी रखती है) के निर्माणाधीन पावर प्लांट में चिमनी गिर जाने की घटना को आज भी भारत की बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में से एक माना जाता है.
इस दुर्घटना में तक़रीबन 50 मजदूरों की डूब कर मौत हो गयी थी एवं सैकड़ों घायल हो गये थे. कहा जाता है की कंपनी ने आनन-फानन में बुलडजोर से मलबे को शवों सहित समतल कर दिया ताकि निर्माण में किये गए उल्लंघन उजागर न हो सके. इस धारणा को इस बात से भी बल मिलता है कि अपने लचर त्वरित बयान में कंपनी ने कहा कि दुर्घटना के वक़्त भारी बारिश हो रही थी और तभी बिजली गिरने से यह चिमनी ध्वस्त हो गयी.
घटना के बाद, राज्य सरकार ने घटना की जांच के लिए रायपुर जिला न्यायाधीश संदीप बक्षी की अध्यक्षता में एक न्यायिक आयोग का गठन किया था. आयोग ने छह बिंदुओं पर तफ्तीश शुरू की:
1. घटना कब हुई?
2. घटना क्यों हुई?
3. चिमनी के गिरने के लिए जिम्मेदार कौन सा घटनाएं थीं?
4. चिमनी के कामों की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए उचित मानकीकरण किया गया था या नहीं?
5. और यदि हाँ तो इसके लिए कोई जिम्मेदार था या नहीं?
6. और भविष्य में ऐसी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है?
आयोग ने जांच के बाद कहा, “चिमनी के निर्माण से पहले, परियोजना के ढांचे, गुणवत्ता और सावधानी (सुरक्षा) पहलुओं से संबंधित मानदंडों का पूरी तरह पालन नहीं किया गया था.”
रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व निर्धारित सुरक्षा उपायों निर्धारित नियमों और विनियमों के अनुसार नहीं थे ताकि निर्माण के दौरान मजदूरों और अन्य लोगों की सुरक्षा  सुनिश्चित हो सके. और इसके लिए बाल्को, सेप्को और जीडीसीएल उत्तरदायी हैं.
रिपोर्ट तब जिले में तैनात स्थानीय अधिकारियों की भी आलोचना करती थी. नगरपालिका, शहर और देश नियोजन विभाग और कोरबा में श्रम विभाग के संबंधित अधिकारियों की भी गैर जिम्मेदारी की बात इसमें कही गई थी. इससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि कंपनी स्थानीय स्तर पर किस तरह संगठित अपराध और भ्रष्टाचार को अंजाम दे रही थी.

कंपनी लंबे समय से पूरी दुनिया में भी विरोध प्रदर्शन का सामना कर रही है

इतना ही नहीं कंपनी ने विदेशों में भी अपने पर्यावरण उल्लंघन के नुकसान को झेला है. इसका एक जीता-जागता उदाहरण ज़ाम्बिया है.
वेदांता, कोम्बोला कॉपर माइन्स पीएलसी (केसीएम) नामक एक जाम्बियन कंपनी की मालिक भी है. जो वहां नचंगा तांबे की खान का संचालन करती है. यह खान जाम्बिया के चिंगोला क्षेत्र में स्थित है. चिंगोला के लगभग 2000 निवासियों ने लंदन की अदालतों में वेदांता और केसीएम के खिलाफ नागरिक मामलों का दावा किया है और साथ ही यह भी दावा किया है कि कंपनी अपने संचालन में लापरवाह रही है. उनके दावों के अनुसार ज़ाम्बियन पर्यावरण कानूनों का भी कंपनी ने उल्लंघन किया गया है. नागरिकों के अनुसार खदान से निकलने वाले केमिकल कचरे ने स्थानीय जलमार्ग को प्रदूषित किया है और निजी संपत्ति को भी नुकसान पहुंचाया है.
इसके बाद वेदांता ने यह तर्क देने की कोशिश की थी कि अंग्रेजी अदालतें मामले को नहीं सुन सकती क्योंकि यह जाम्बिया से सम्बंधित है. लेकिन  न्यायालय ने इन दावों को खारिज कर दिया और 1,826 जाम्बियन ग्रामीणों के दावों को आगे बढ़ने की अनुमति दी. इसके अतिरिक्त लंदन की एक अदालत ने जाम्बिया की वेदांता इकाई, केसीएम को तांबे की कीमत से सम्बंधित दावे में राज्य खनन कंपनी को $ 13 9 मिलियन का भुगतान करने का आदेश दिया.
लंदन कानून फर्म लेघ डे ने तर्क दिया कि अंग्रेजी अदालतें ग्रामीणों के लिए एकमात्र रास्ता थीं, जिन्हें वे न्याय प्राप्त करने के लिए “नो-विन, नो-फीस” आधार पर प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जबकि वेदांता तब भी कहती रही कि जाम्बिया उचित क्षेत्राधिकार होना चाहिये था.
इसके अलावा लेघ डे, कंपनी के रॉयल डच शैल के खिलाफ नाइजर डेल्टा के निवासियों का प्रतिनिधित्व भी कर रही है. पर कंपनी ने इस साल की शुरुआत में उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील की है कि कंपनी को नाइजीरिया में तेल फैलाने पर लंदन में मुकदमा नहीं लगाया जा सकता था.
इन तथ्यों पर गौर करने के बाद सवाल यह उठता की आखिर कैसे एक कंपनी कई देशो में धड़ल्ले से एक के बाद एक उल्लंघनों के बाद भी अपना कारोबार बदस्तूर जारी रख पा रही है? और तो और कंपनी ने अपने कारोबार के चलते कई राज्य द्वारा संचालित उद्योगों को ठप होने की कगार पर पहुंचा दिया है.

कंपनी ने बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही जमकर फायदा पहुंचाया है

लम्बे समय से भारत में कारोबार कर रही इस कंपनी ने सत्ता के गलियारों में अपनी मजबूत पैठ बना रखी है. इस बात का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि देश के पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम कई वर्षों तक इस तांबा खनन कंपनी में निदेशक थे और 2004 में वित्तमंत्री बनने से पहले वेदांता की कानूनी टीम और उसके बोर्ड का हिस्सा भी थे.
आगे चलके चिदंबरम ने कंपनी पर अपनी दया दृष्टि बनाये रखी और कंपनी को लोहे के कारोबार से सम्बंधित खूब मुनाफा करवाया. हालांकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों वेदांता के स्टरलाइट कॉपर से मोटे तौर पर लाभान्वित हुए हैं और दोनों पक्षों ने कई बार कड़े विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत दंडनीय कार्रवाई से खुद को बचाने के लिए नए रास्ते अख्तियार किये है. 2013 में वेदांता समूह कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए सबसे बड़ा दाता समूह था.
मसलन 2013 में, भारत सरकार के पूर्व सचिव, ईएएस शर्मा और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने दिल्ली उच्च न्यायालय में  पीआईएल दायर किया और दावा किया कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने यूके स्थित वेदांत समूह से पीपुल्स एक्ट 1951, 1976 और 2010 के एफसीआर अधिनियम के उल्लंघन में दान स्वीकार कर लिया था.
साल 2014 में  दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और बीजेपी दोनों को को एफसीआरए का उल्लंघन करने का दोषी ठहराया और तत्कालीन यूपीए सरकार और चुनाव आयोग को दोनों के खिलाफ कार्रवाई करने का निर्देश दिया. इसके लिए छह महीने का वक़्त दिया गया था.
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कार्रवाई शुरू होने के साथ ही दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित छह महीने की समयसीमा सितंबर में किसी भी पार्टी के खिलाफ किसी भी कार्रवाई के बिना समाप्त हो गई.
दिलचस्प रूप से 2014 में होने वाले चुनाव अभियानों में न तो बीजेपी और न ही कांग्रेस ने वेदांता से राजनीतिक दान स्वीकार करने का मुद्दा उठाया. आगे चल के सत्ताधारी बीजेपी ने राजनीतिक चंदो सम्बंधित कई विधिक नियमनों में संशोधन किया जिसमें से एक पिछले वर्ष में लाया गया चुनावी बांड भी शामिल है.

पर ऐसी क्या परिस्थिति कि 13 लोगों को अपनी जान देनी पड़ी?

गत 24 मार्च (जब पुलिस की गोलियों से 13 लोग मारे गये) को प्रदर्शनकारियों की एक ही मांग थी तूतीकोरिन शहर के पश्चिम में एक उपनगरीय इलाके में स्थापित नए कारखाने और मौजूदा कारखाने को बंद करने के साथ थ्रुकु वीरपंदीपुरम में एक नया तांबा स्मेल्टर परिसर बनाने के चल रहे काम को तत्काल रोक दिया जाये.
वक़्त यह समझने का है कि लोग इतना गुस्सा क्यों हैं? इसके लिए स्टरलाइट के काले इतिहास और गंभीर प्रदूषक होने की छवि के साथ राज्य की जटिलता को भी देखने की आवश्यकता है. थूथुकुडी (तूतीकोरिन) के प्रदूषण के बारे में इस कहानी में, यहाँ सिर्फ स्टरलाइट खलनायक नहीं है. तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पर्यावरण और वन मंत्रालय की भूमिका भी सामने आती है. जिन्होंने लोगों को धोखा दिया और नियामकों के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाने में असफल रहे.
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के पलानीसामी ने आज हिंसा को “उत्तेजित करने” का प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों पर आरोप लगाया. पलानीसामी ने दावा किया कि कुछ सामाजविरोधी तत्वों ने एंटर-स्टरलाइट प्लांट प्रदर्शनकारियों को भड़काया और अप्रत्याशित हिंसा में घुसपैठ की. जबकि सामने आए एक वीडियो में दिख रहा है कि एक पुलिसकर्मी गाड़ी के ऊपर चढ़ा है और राइफल से प्रदर्शनकारियों पर निशाना साध रहा है. नीचे कुछ अन्य पुलिसकर्मी खड़े हैं. जिनमें से कुछ ने बुलेट प्रुफ जैकेट पहनी है तो कुछ खाकी वर्दी में हैं. बस के ऊपर चढ़ा पुलिसकर्मी सादे कपड़ों में है और वह रायफल से प्रदर्शनकारियों पर निशाना साध रहा है. इसी बीच एक आवाज आती है जो वीडियो रिकॉर्ड कर रहे कैमरे में कैद हो जाती है. कोई जोर से चिल्लाता है, ‘कम से कम एक तो मरना ही चाहिए.’ उसके बाद गाड़ी के ऊपर चढ़ा पुलिसकर्मी फायर कर देता है.
हमारे लिए तो यह एक विडम्बना ही है कि हमने एक ऐसा लोकतंत्र बनाया है कि जहाँ धर्मगुरु पर बलात्कार का आरोप साबित होने पर समर्थकों द्वारा हिंसा और आगजनी में कई लोगो की मौत पर हमारा तंत्र मूकदर्शक बना रहता है. वहीं दूसरी ओर अपने जीने का हक़ मांगने पर गोलियों का सामना पड़ता है. व्यवस्था का सच उजागर करने मीडिया भी खून से सने इन्हीं पैसों से बनी-बिगड़ी सत्ता की शपथ-ग्रहण में मशगूल रहता है.
घटना स्थल से महज कुछ सौ मील दूर देश के बड़े कर्ता-धर्ताओं का जमवाड़ा लगा था. जिनमें से कुछ ऐसे ही जनसंघर्षों, जैसे नंदीग्राम और सिंगूर से उठकर राष्ट्रीय स्तर पर पहचाने गए और कुछ ऐसे भी थे जो अगली सरकार में प्राइम मिनिस्टर बनकर लोगों की आवाज़ उठाने का दम्भ भरते रहते हैं. किन्तु दिल्ली से लेकर उस मंच के लोगों तक शायद खून के छींटे नहीं पहुंच पाए और जनतंत्र की लाश को प्रचलित जाँच की बात और हैशटैग की खानापूर्ति में दफ़न कर दिया गया.

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यह लेख सम्यक पांडेय ने लिखा है. सम्यक लिखने का शुरुआती काम ग्रिल मशीन की तरह करते हैं. छेदते हुये अंदर जाते हैं पर बाहर आते हैं तो पूरी सतह उखाड़े लिये चले आते हैं. मानते हैं छोटी ग्रिल मशीन हैं, बड़े होकर बड़ी बनना चाहते हैं. आपने लेख ढंग से पढ़ा होगा तो इन पंक्तियों का सही खुलासा आपपर होगा. इसके अलावा सम्यक पांडेय को घाट-घाट की खाक छानने का शौक है (काहे से घाट का पानी प्वाइजनस हो गया है तो ये पीते नहीं, खाक छानके ही चले आते हैं). माने जनम के पियासे हैं तो आजकल घाट से वापस आके पी रहे हैं.
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