मेरे गुरू जी कहते हैं कि कभी भी सिनेमा की समीक्षा उसके तकनीकी पहलुओं पर नहीं करनी चाहिये. सिनेमा एक आर्ट फॉर्म है, जिसमें प्रभावोत्पादकता होती है. फिल्म रिव्यू साधारण दर्शक के लिये लिखे जाते हैं इसलिये फिल्मों की भी साहित्य और संगीत की तरह आलोचना होनी चाहिये, उनकी प्रभावोत्पादकता के लिये. इस भूमिका की आवश्यकता क्यों पड़ी इसका अंदाजा आगे के लेख में आपको हो जायेगा.

अनुराग कश्यप ने एक डायरेक्टर के रूप में मुक्काबाज में सबसे कम मेहनत की है

अनुराग कश्यप को इसलिये सराहा जाता है क्योंकि वह जगहों को रीक्रियेट कर लेते हैं. बनारस, पूर्वांचल और झारखंड अपनी पूरी उज्ड्डढता के साथ उनके सिनेमा में झांकता दिखता है. यही वजह है कि उत्तर भारतीय दर्शक उन्हें सिर-आंखों पर बैठाते रहे हैं. पर बेहद दु:ख के साथ कहना पड़ रहा है कि वो मुक्काबाज में रुहेलखंड नहीं क्रिएट कर पाते. और यह अक्ष्म्य है. क्योंकि जोया और विनीत कुमार को उन्होंने रगड़ दिया है. सालों विनीत मुक्केबाजी सीखे, जोया साइन लैंग्वेज. पर जब अनुराग सर की उतनी ही मेहनत करने की बारी आई तो वो असकिता(ढीला पड़ना) गये. अनुराग कश्यप खुद भी कहते रहे कि जोया को फिल्म बनने के दौरान हर बात से चिढ़ होती थी, शायद वो जोया को अपनी मेहनत के साथ होते अन्याय को देखने का नतीज़ा थी.

अब अनुराग कश्यप की हालत सीजेआई जैसी है, जिसे आत्मावलोकन की जरूरत है क्योंकि उनके प्रोजेक्ट में उनसे ऊपर कोई नहीं. वे बखूबी समझते हैं कि पोस्टर, बैनर पर लिखे होने से रुहेलखंड नहीं पैदा होगा, जबकि बोली और अंदाज न ला सकें. जब अनुराग कश्यप ने खुशबू राज को खोजा और उनसे ‘वुमनिया’ गवाया था तो मेरा दिल उनके सम्मान और खोज के सटीक प्रयोग के लिये बिछ गया था. पर जब उसी अनुराग कश्यप ने खुशबू राज को ‘साढ़े तीन बजे रानी जरूर मिलना’ की भोजपुरी लिरिक्स, रुहेलखंड में बेस्ड एक परिवार के लिये गाने के लिये प्रयोग किया तो मुझे कोफ्त हुई. यह सीधा सा उदाहरण है कि वह चुक गये हैं या मेहनत नहीं करना चाहते. उन्होंने न ही रुहेलखंड में गायी जाने वाली ‘गाली’ ढूंढी, न ही उस टच को लाने वाली गायिका. वो अपने कंफर्ट जोन में खेल गये. मैं मानता हूं ऐसे प्रयोग होते रहे हैं पर पहली बात यह कि ऐसे प्रयोग अनुराग कश्यप से अपेक्षित नहीं और दूसरा यह कि मुझे ये प्रयोग वैसा ही लगा जैसा ‘मुन्नी बदनाम’ गाने के बाद ममता शर्मा को स्टीरियोटाइप कर देना.

यहां तक कि बोले जा रहे डायलॉग्स पर किसी भी समझदार उत्तर भारतीय को लगातार कनपुरिया का प्रभाव उलझाने लगता है. और यह बिल्कुल छोटी बात नहीं है. यह दिखाता है कि अनुराग कश्यप ने फॉर्मूला फिल्म मेकिंग से हटकर इस फिल्म में कुछ नया नहीं किया है. जबकि उनसे गहराई अपेक्षित थी आखिर अनुराग कश्यप वह निर्देशक नहीं हैं न जो जाट लड़के की प्रेम कहानी को लखनऊ में बेस्ड दिखा दें. इस फिल्म में सलमान खान की फिल्म जैसे पहले की फिल्मों की छाया भी रिपीट होती रहती है.

कार्य-कारण संबंध से लगभग रहित फिल्म

अनुराग कश्यप ने इस फिल्म में मीडिया, पुलिस और कानून सबके रोल को लगभग-लगभग अनदेखा करने की कोशिश की है. जो इसे पिछले सदी के नौवें और आखिरी दशक की फिल्म का टच देने में कोई कसर नहीं छोड़ते. फिल्म में कहीं पता नहीं चलता कि जहां बंधक बनाकर भगवान मिश्रा सुनयना के परिवार को रखे थे उस घर के बाहर मोबाइल किसने गाड़ा, कहां से आया?

कार्य-कारण संबंधों से रहित इस फिल्म में सिचुएशनल कॉमेडी का तड़का मारने के लिये दिखाया जाता है कि एक बॉक्सर, जो अपनी पत्नी के अपहरण से बुरी तरह परेशान है, साथ ही अपने घर वालों पर पड़ रहे दबंगों के दबाव को झेलते हुए मानसिक स्तर पर टूट रहा है वह भाषा पर बहस कर रहा है कि ‘ट्रेस’ क्यों बोल रहो हो? बरेली वाले स्वयं बतायें कि क्या वह नहीं जानते ‘कॉल ट्रेस’ करना क्या होता है? एनबीटी, दैनिक जागरण और हिंदुस्तान तो यही लिखते हैं.

कुछ भी नहीं चौंकाता, ब्रेक डांस और ड्रोन की कलाकारी के सिवाय

इससे प्रभावित होने की कोई जरूरत नहीं है कि विदेशों में फिल्म पर कैसी प्रतिक्रिया आई है? माना कि सिनेमैटोग्राफी धांसू है पर ट्विस्ट और टर्न से भरी एक कहानी के लिये जिसमें डायलॉग ही डायलॉग हों, उसमें सारी प्रभावोत्पादकता नयनाभिराम सीन के जरिये नहीं भरी जा सकती. ऐसे में बनारस का नद्दी के उस पार से लिया गया शॉट भले ही दांतों तले ऊँगली दबवा देता हो और फिर ब्रेकडांस मन मोह लेता हो पर पूरी फिल्म उसके साये में तो नहीं निकाली जा सकती न? वैसे भी आज ये मानी बात भी है कि ‘ड्रोन’ सिनेमा का टेस्ट बदल देगा,

एक बात जो सबसे ज्यादा दु:ख पहुंचाती है, वह यह है कि इस फिल्म में कहीं भी यह नहीं पता चलता कि यह मुक्केबाजी पर है. फिल्म भटक जाती है, जबकि सारा प्रचार और प्रमोशन इसी को आधार बनाकर किया गया था कि फिल्म बतायेगी इस देश में लोग मुक्केबाजी में क्यों आते हैं? फिल्म बताती है बल्कि कहना चाहिये दसियों बार यह डायलॉग बोलकर दोहराती है कि ‘नौकरी पाने’, ‘शादी करने’ पर क्या आपको अनुराग कश्यप से इतने ही सतही ट्रीटमेंट की उम्मीद थी? जो ‘पांच’ और ‘अग्ली’ जैसी जटिल फिल्में भी बना चुका है. फिर भारत में ‘मिलियन डॉलर बेबी’ देख चुके लोगों की संख्या भी अब कम नहीं है.

फिल्म में दशाधिक प्रयोग किया गया नारा ‘भारत माता की जय’ उसे एक फिल्म के ट्रैक से उतारकर एक राजनीतिक भाषण बना देता है. शायद एक बार ही धक्क से लगने वाला ‘भारत माता की जय’; घर, गाड़ी, डॉयलॉग सब पर छपे ‘भारत माता की जय’ से ज्यादा प्रभावशाली होता. अनुराग कश्यप को लौटकर ऋत्विक घटक की फिल्मों में पिरोये विभाजन को ध्यान से देखना चाहिये. अति नाटकीय होने के चलते उनका बार-बार ‘भारत माता की जय’ मात्र मसखरी बनकर रह जाता है.

मैंने फिल्म देखने के बाद कोफ्त में कह दिया था कि यह अनुराग कश्यप की आखिरी फिल्म भी साबित हो सकती है. पर इस बात को थोड़ा सुधारकर कहना चाहूंगा कि यह उस अनुराग कश्यप की आखिरी फिल्म जरूर साबित हो सकती है जो दर्शकों के टेस्ट को बदलना जानता था, न कि उनके टेस्ट के हिसाब से खुद बदल जाना. निस्संदेह अनुराग कश्यप इससे निराश ही करते हैं.

लेखक यह भी स्वीकारता है कि ऐसा रिव्यू कभी नहीं लिखा जाता, अगर यह आमिर खान या सलमान खान की फिल्म होती और कठफोड़वा के मेरे साथी इस असंतोष की अभिव्यक्ति के लिये मेरा गला न पकड़ लेते. आशा है अनुराग कश्यप के कान में कभी ये आलोचनाएं पड़ीं तो वह इनपर विचार जरूर करेंगे. न कि अधिकांश पीआर टाइप जो रिव्यू किये गये हैं, उनके मद में फूले बैठे रहेंगे.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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