फ्रांस में 1981 तक कैपिटल पनिशमेंट का चलन रहा. फ्रांस की क्रांति के दौरान किंग लुईस सोलह और मैरी एन्टोएनिटी के काल में किसी को भी सजा देने के लिए गिलोटिन प्रक्रिया का मुख्य रूप से इस्तेमाल किया जाता था. गिलोटिन एक बड़े और भारी ब्लेड को कहा जाता है जिस पर दोषी व्यक्ति के सिर को रखकर उसे धड़ से अलग कर दिया जाता था

अब अगर विधायी भाषा में बात करें तो संसद में बिना किसी चर्चा के किसी बिल को पास करवा लेना भी गिलोटिन की प्रक्रिया की तरह लगता है. लोक सभा में हद से बड़ा बहुमत अगर अपनी नैतिकता को दफना चुका है तो फाइनेंस बिल पास करते समय लोकतान्त्रिक मूल्यों की धज्जिया उड़ा सकता है. गिलोटिन की प्रक्रिया उस जमाने की बजाय इस जमाने की बात लग सकती है. संविधान में लिखा है कि बिना संसद की इज़ाज़त के भारत सरकार जनता से टैक्स नहीं वसूल सकती .इसलिए टैक्स संरचना में किसी भी तरह के बदलाव के लिए संसद के सामने फाइनेंस बिल रखा जाता है.

उदाहरण के तौर पर अगर इनकम टैक्स स्लैब, सर्विस टैक्स आदि में बदलाव करना है तो फाइनेंस बिल संसद के सामने रखा जाता है. चूँकि यह टैक्स से जुड़ा मसला है और बिना टैक्स की कमाई से देश चलाना मुश्किल है, इसलिए संविधान में फाइनेंस बिल के मामलें में राज्यसभा की असहमतियों को कमजोर किया गया है.यानी कि लोकसभा में पास होने के बाद फाइनेंस बिल को राज्यसभा में प्रस्तुत तो किया जाता है लेकिन 14 दिन के बाद इसे राज्यसभा से भी पारित मान लिया जाता है, भले ही राज्यसभा ने अपनी असहमति ही क्यों न दर्ज़ करायी हो? इसी प्रावाधना का फायदा उठाकर फाइनेंस बिल में पिछले साल सरकार ने एलेक्ट्रोल बांड, इनकम टैक्स रिटर्न पर आधार की अनिवार्यता जैसे कुछ प्रस्तावों को फाइनेंस बिल में शामिल कर लिया और इन्हें संसद से पास करवा लिया, जबकि इन बिलों की प्रकृति टैक्ससेसन से बिलकुल भी नहीं जुड़ी थी. ठीक ऐसा ही खेल इस साल भी खेला गया, केवल खेल खेलने का तरीका बदला हुआ था. और इतना बदला हुआ था जिससे लगा की हमारी मेहनत कमाई का सरकार कोई मोल नहीं समझ रही है .
अमूमन फाइनेंस बिल पर सप्ताह भर सदन में चर्चा की जाती है. लेकिन इस साल केवल 30 मिनट में फाइनेंस बिल पास करवा लिया गया .सरकार के खर्चों के प्रस्ताव पर और 50 मंत्रालयों से जुड़े अनुदानों के प्रस्ताव पर किसी भी तरह की चर्चा नहीं हुई. यानी कि जनता से वसूले गये कर, जिसे सरकार देश चलाने के लिए खर्च करतीं हैं उसके साथ न्याय करने के लिए गिलोटिन की प्रक्रिया को अपनाया गया. संसद के न्यायिक सर को धड़ से अलग कर दिया गया और हम चुपचाप देखते रह गये.

बजट पेश होने के बाद संसद में करीब तीन हफ्ते का अवकाश कर दिया है. कारण यह कि सरकार ने बजट के लिए जो एक बड़ा पुलिंदा तैयार किया होता है उसे संबंधित विभाग के लोग पढ़ते हैं. इस दौरान सदन की स्थायी समितियां विभिन्न मंत्रालयों के लिए मांगे गए अनुदान की जांच करती हैं और उसकी रिपोर्ट तैयार करती हैं. उदाहरण के तौर पर आपने अपने पापा से नए फोन के लिए 4000 रुपए मांगे लेकिन जब आपके पिता आपका फोन देखा तो मालूम हुआ कि आपको नए फोन की ज़रूरत ही नहीं है ऐसे में उन्होंने आपकी मांग को ठुकरा दिया. ऐसा ही कुछ यह समितियां भी करती हैं.

जब संसद दोबारा शुरू होती है तब बिज़नेस एडवायज़री कमेटी अनुदानों की मांग पर चर्चा के लिए समय निर्धारित करती है. दी गई समयसीमा में सदन के पास इतना वक्त नहीं होता है कि वह प्रत्येक मंत्रालय के खर्चों की मांग पर चर्चा कर सके, ऐसे में बिज़नेस एडवायज़री कमेटी कुछ ज़रूरी मंत्रालयों को चर्चा करने का मौका देती है. इसमें अनुदानों की मांग के लिए खासतौर पर गृह, रक्षा, विदेश, कृषि, ग्रामीण विकास और मानव एवं संसाधन मंत्रालय शामिल होते हैं. संसद के सदस्यों को इन मंत्रालयों के काम करने के तरीकों और उनकी नीतियों पर चर्चा करने का अवसर मिलता है.
एक बार जब सदन में ये बहसें पूरी हो जाती हैं तब स्पीकर “गिलोटिन ” लागू करता है और अनुदान की सभी बकाया मांगों को एक बार में ही मतदान के लिए रखा जाता है. आमतौर पर यह बजट पर चर्चा के लिए निर्धारित अंतिम दिन होता है. इसका इरादा वित्त विधेयक को समय पर रास्ता देना होता है जिससे बजट से जुड़ी सभी गतिविधियां समय से पूरी हो सकें.

इस साल लोकसभा में पंजाब नेशनल बैंक फ्रॉड, स्पेशल पैकेज के लिए आंध्र प्रदेश की डिमांड, कावेरी जल विवाद और तेलंगाना की कोटे की मांग बढ़ाने की याचिका को लेकर चल रहे हंगामे के कारण संसद में बजट और व्यापार से संबंधित कोई बहस हो ही नहीं पाई.

आखिरकार बुधवार को अनुदान के लिए सभी मांगें गिलोटिन हो गईं: इसमें फाइनेंस बिल, अनुमोदन बिल और पेश किया गया जिसमें 89.25 लाख करोड़ रुपए के खर्च की योजना को मतदान और ध्वनि मत से सिर्फ 30 मिनट के अंदर पास करा लिया गया. साथ में फोरेन कॉन्ट्रिब्यूशन रेगुलेशन बिल जैसे महत्वपूर्ण विषय को बिना चर्चा ही पास करवा लिया गया .
इसे सरकार का एक बेहद असामान्य कदम कहा जा सकता है क्योंकि बजट सत्र खत्म होने में अभी भी तीन हफ्ते बाकी हैं. हालांकि सरकार तकनीकी रूप से इसे फास्ट ट्रैक अधिकारों के तहत सदन की गतिविधियां पूरी करने का तरीका बता रही है. वहीं विपक्ष का मानना है कि यह लोकतंत्र की आवाज़ को दबाने की दमघोंटू प्रक्रिया है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here