निर्मल वर्मा लिखते हैं – कभी-कभी मैं सोचता हूँ, कि किसी सूनी दुपहर में जब एक ब्याही लड़की का पति अपने कोर्ट, फ़र्म या दफ्तर में होता है और बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं — ये लड़कियां अवश्य खिड़की से बाहर झांकते हुए, या पलंग पर ऊंघते हुए या कोई पुराना गुरुदत्त की फ़िल्म का गाना सुनते हुए ( जो कहीं दूर ढाबे के रेडियो से उनके कमरे में चला आता है ) सोचती होंगी उन लड़कों के बारे में जो काफी कच्चे थे, काफी अनिश्चित और चुप्पे-से, दुर्भाग्यवश आत्मग्रस्त, जिन्हें कभी शादी से पहले उन्होंने किसी शाम के झिलमिले में चूमा था — जल्दी, घबराए-से होंठ, चेहरे पर आए नए उदास रोयों पर, और आँखें और साँसें और आँखें…

 वे सो जाती हैं। खिड़की बंद करके लौट आती हैं।

क्या वे उन्हें भूल सकती हैं ?

शायद नहीं। प्रेम को भूला नहीं जा सकता। वह हमारे स्मृतियों में बचा रहता है। एक उम्मीद की तरह। एक सपने की तरह जो सुबह नींद खुलते ही टूट जाता है लेकिन रात आती है और फिर…। गुनाहों का देवता, हमारी पीढ़ी के लिए वह उपन्यास रहा है जिसे पढ़कर हम जवान हुए हैं… हमने प्रेम करना सीखा है। चन्दर हमारा आदि-अनायक है और सुधा वह लड़की जिसे हम सब बचा लेना चाहते हैं। दरअसल हम उस प्रेम को बचा लेना चाहते हैं जिसे सुधा ने पाला-पोषा था। विवाह के बाद सुधा ने चन्दर को अनेक पत्र लिखे थे। एक पत्र आप सब के लिए … 

साभार – गूगल

 मेरे देवता, मेरे नयन, मेरे पंथ, मेरे प्रकाश !

आज कितने दिनों बाद तुम्हें खत लिखने का मौका मिल रहा है। सोचा था, बिनती के ब्याह के महीने भर पहले गाँव आ जाऊँगी तो एक दिन के लिए तुम्हें आकर देख जाऊँगी। लेकिन इरादे इरादे हैं और ज़िन्दगी-ज़िन्दगी। अब सुधा अपने जेठ और सास के लड़के की गुलाम है। ब्याह के दूसरे दिन ही चला जाना होगा। तुम्हें यहाँ बुला लेती, लेकिन यहाँ बंधन और परदा तो ससुराल से भी बदतर है।

मैंने बिनती से तुम्हारे बारे में बहुत पूछा। वह कुछ नहीं बतायी। पापा से इतना मालूम हुआ कि तुम्हारी थीसिस छपने गयी है। कन्वोकेशन नजदीक है। तुम्हें याद है, वायदा था कि तुम्हारा गाउन पहनकर मैं फोटो खिंचवाऊंगी। वह दिन याद करती हूँ तो जाने कैसा होने लगता है ! एक कन्वोकेशन की फोटो खिंचवाकर जरूर भेजना।

क्या तुमने बिनती को कोई दुःख दिया था ? बिनती हरदम तुम्हारी बात पर आँसू भर लाती है। मैंने तुम्हारे भरोसे बिनती को वहाँ छोड़ा था। मैं उससे दूर, माँ का सुख उसे मिला नहीं, पिता मर गये। क्या तुम उसे इतना भी प्यार नहीं दे सकते ? मैंने तुम्हें बार बार सहेज दिया था। मेरी तंदुरुस्ती अब कुछ कुछ ठीक है, लेकिन जाने कैसी है। कभी कभी सिर में दर्द होने लगता है। जी मिचलाने लगता है। आजकल वह बहुत ध्यान रखते हैं। लेकिन वे मुझको समझ नहीं पाये। सारे सुख और आजादी के बीच मैं कितनी असंतुष्ट हूँ। मैं कितनी परेशान हूँ। लगता है हजारों तूफान हमेशा नसों में घहराया करते हैं।

चन्दर, एक बात कहूँ अगर बुरा न मानो तो। आज शादी के छह महीने बाद भी मैं यहीं कहूँगी चन्दर कि तुमने अच्छा नहीं किया। मेरी आत्मा सिर्फ तुम्हारे लिए बनी थी, उसके रेशे में वे तत्व हैं जो तुम्हारी ही पूजा के लिए थे। तुमने मुझे दूर फेंक दिया, लेकिन इस दूरी के अँधेरे में भी जन्म जन्मांतर तक भटकती हुई सिर्फ तुम्हीं को ढूँढूँगी, इतना याद रखना और इस बार अगर तुम मिल गए तो ज़िन्दगी की कोई ताकत, कोई आदर्श, कोई सिद्धांत, कोई प्रवंचना मुझे तुमसे अलग नहीं कर सकेगी। लेकिन मालूम नहीं पुनर्जन्म सच है या झूठ ! अगर झूठ है तो सोचो चन्दर कि इस अनादिकाल के प्रवाह में सिर्फ एक बार … सिर्फ एक बार मैंने अपनी आत्मा का सत्य ढूँढ पाया था और अब अनन्तकाल के लिए उसे खो दिया। अगर पुनर्जन्म नहीं है तो बताओ मेरे देवता, क्या होगा ? करोड़ों सृष्टियाँ होंगी, प्रलय होंगे और मैं अतृप्त चिनगारी की तरह असीम आकाश में तड़पती हुई अँधेरे की हर परत से टकराती रहूँगी, न जाने कब तक के लिए।

ज्यों ज्यों दूरी बढ़ती जा रही है, त्यों त्यों पूजा की प्यास बढ़ती जा रही है ! काश मैं सितारों के फूल और सूरज की आरती से तुम्हारी पूजा कर पाती ! लेकिन जानते हो, मुझे क्या करना पड़ रहा है ? मेरे छोटे भतीजे नीलू ने पहाड़ी चूहे पाले हैं। उनके पिंजड़े के अंदर एक पहिया लगा है और ऊपर घंटियाँ लगी हैं। अगर कोई अभागा चूहा उस चक्र में उलझ जाता है तो ज्यों ज्यों छूटने के लिए वह पैर चलाता है त्यों त्यों चक्र घूमने लगता है ; घंटियाँ बजने लगता हैं। नीलू बहुत खुश होता है लेकिन चूहा थककर बेदम होकर नीचे गिर पड़ता है। कुछ ऐसे ही चक्र में फँस गयी हूँ, चन्दर ! संतोष सिर्फ इतना है कि घंटियाँ बजती हैं तो शायद तुम उन्हें पूजा के मंदिर की घंटियाँ समझते होगे। लेकिन खैर ! सिर्फ इतनी प्रार्थना है चन्दर ! कि अब थककर जल्दी ही गिर जाऊँ!

मेरे भाग्य! खत का जवाब जल्दी ही देना।

सुधा

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इस लेख को पीयूष रंजन परमार ने सम्पादित किया है

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