पिछले 6 महीने में झारखंड में आधे दर्जन से अधिक लोग पब्लिक डिस्ट्रब्यूशन सिस्टम के जरिये अनाज न मिलने की वजह से मर गए। आधार लिंक्ड बायोमेट्रिक पहचान-पत्र न होने की वजह से उन्हें पब्लिक डिस्ट्रिब्यूसन सिस्टम के जरिये अनाज लेने से रोका गया . जिसका परिणाम यह हुआ कि भूख की वजह से उन्होंने अपनी जान गवां दी.

आधार आधारित बॉयोमेट्रिक पहचान पत्र न होने के कारण राज्य सरकार ने तकरीबन 12 लाख लोगों को पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम से बाहर कर दिया है। जाहिर है कि यहां इस आंकड़ें के रखने का मतलब यह नहीं है कि सभी 12 लाख लोग, आने वाले दिनों में भूख से मर जाएंगे। बल्कि यह है कि तकनीक जब राज्य द्वारा पैदा की गयी अपंगता का सहारा बनती है तब आधारभूत सुविधाओं से मजलूम हो चुके लोग बड़ी बेरहमी से स्वतः बेसहारा बन जाते हैं।

आधार लिंक्ड पहचान के मुद्दे पर तीन किस्म के लोगों के तर्क हैं .जबकि खास बात यह है कि तीनों अपनी जगह जायज़ होते हुए भी नाज़ायज़ लगते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनका हर जायज़ किस्म का तर्क समाज की ज़मीनी हकीकत से दूर जाकर पैदा हो रही पॉलिटिक्स से तय होता है .पहले किस्म के तर्क देने वाले कहते हैं कि तकनीक गुड गवर्नेंस में बहुत अधिक सहयोगी है. इसकी वजह से जरूरतमंद लोगों की पहचान करने में बहुत आसानी होती है। इसलिए इसका सहारा लिए बगैर बेसहारा लोगों की भलाई नहीं की जा सकती है. इस तर्क के काट में दूसरे किस्म के तर्क देने वाले कहते हैं कि आधार आधारित पहचान पत्र राज्य की साजिश है, राज्य व्यक्ति के निजी जीवन में घुसने की कोशिश कर रहा है और आने वाले समय का यह सबसे बड़ा संकट है, इसलिए आधार खारिज किया जाए।

इस तरह के खारीज-पत्र दायर करने में झारखंड में भूख की वजह से मरे रहे लोगों जैसी घटनाओं का खूब सहारा लिया जाता है । लेकिन इस काट-प्रतिकाट से इतर हटकर कहने वालों में एक तीसरा किस्म भी है जिसमें जिला कलक्टर जैसे समझौतावादी किस्म के लोग आते हैं। यह कहते हैं कि किसी भी तरह से काम करने में कुछ न कुछ परेशानियां तो जरूर होंगी, अगर परेशानियों की हिस्सेदारी कुल फायदे के मुकाबले बहुत कम है तो परेशानियों को सहन कर लेना चाहिए। कहने का मतलब यह है कि अगर किसी आधार लिंक्ड बायोमेट्रिक से 10-20 फीसदी लोगों को परेशानी हो रही है, तो यह पॉलिसी चलती रहनी चाहिए।

इन तीन तर्कों को अगर आप ध्यान से पढ़ेंगे तो पाएंगे कि भूख और गरीबी की ज़मीनी हकीकत, जमीन से कटकर हो रही पॉलटिक्स के भेंट चढ़ गयी है। कहने वाले यह नहीं कहते हैं कि रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और सेहत का अधिकार जन्म लेते ही मिल जाता है और अगर कोई समुदाय खुद को राज्य के सहारे नियंत्रित करता है तो राज्य की यह प्राथमिक जिम्मेदारी बनती है कि वह सबकी आधारभूत जरूरतें पूरा करने के लिए काम करे। एक ऐसे मॉडल के सहारे समाज को नियंत्रित करे जिसका पैमाना विकास और जीडीपी न हो, बल्कि यह हो कि क्या अमुक समुदाय में मौजूद सभी तरह के जीवन को न्यायसंगत हिस्सेदारी मिल पा रही है या नहीं? भूख से मरने वालों के लिए इस आधार पर रचा हुआ तर्क कहीं नहीं मिलेगा। क्योंकि बोलने वाले वह नहीं है जो भूख से मर रहे हैं, बल्कि वह हैं जो मरे हुए लोगों की लाश से ही अपनी जिंदगी चलाते हैं। इसमें वह तमाम तरह की संस्थाएं शामिल हैं जो विमर्श की लड़ाइयों में भागीदार बनती हैं. इनमें से किसी ने भूख से मरने वालों पर इस तरह से सवाल नहीं उठाया कि राज्य का मतलब ही है कि अपने समाज की मूलभूत जरूरतें पूरा करने के लिए किसी भी किस्म के नियंत्रण के बटन का दायरा तय करे।

समझदारों ने समाज के लिए संविधान से विधान सीखने की कोशिश की ।अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर जमकर लड़ाइयां लड़ी। गरिमापूर्ण जीवन जीने के नाम पर कइयों ने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी. लेकिन इन सबके बीच एक बहुत मत्वपूर्ण बात छूटती जा रही है, वह यह है कि दुनिया में मौजूद सभी देशों के लोक-कल्याण के तरीके से क्या ऐसा आभास होता है कि सभी तरह के जीव गरिमापूर्ण जीवन हासिल कर पाएंगे। आर्थिक असमानता की खाई ने गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारों को बहुत पीछे धकेल दिया है। लोग आर्थिक असमानता और आधारभूत जरूरत का सही से आकलन नहीं लगा पा रहे हैं। राज्य और राज्य की संस्थाओं में काम करने वाले लोग आधारभूत जरूरत की बजाए जीडीपी की बढ़ोतरी को सरकारी लक्ष्य मानने लगे हैं. उनकी लोगों के प्रति पूरी ज़िम्मेदारी अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों पर निर्भर रहती है।

आँकड़ें अगर अच्छे हैं तो सरकारों को लगता है कि वह झारखण्ड में बसे गरीब की भूख मिटा देगी। जबकि दूसरी तरफ आर्थिक असमानता का नंगा नाच चलता रहता है, जिसपर कोई ध्यान नहीं देता। अगर किसी सरकार की पॉलिसी केवल तकनीक के दम पर साँस ले रही है तो हर दिन वह कइयों की धड़कन बंद भी करेगी। क्योंकि वेलफेयर स्टेट का काम तकनीक के सहारे टैक्टिस अपनाना नहीं है बल्कि कल्याण करना है. आधार लिंक्ड बॉयोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन की वजह से मरने वाले लोग सरकारी नीतियों की वजह से नहीं मर रहे हैं, बल्कि नियत की वजह से दम तोड़ रहे हैं जो अनियतांत्रित होती आर्थिक असमानता की खाई को पाटने की तनिक भी कोशिश नहीं कर रही हैं। ऐस दौर में पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम के लिए आधार लिंक्ड बायोमेट्रिक ऑथेंटिकेशन पर किसी भी का तरह विचार करना किसी भीखारी को दिए भीख की तरह लगता है, जिसे भीख देने के बाद भीख देने वाला यह सोचकर संतोष करता है कि उसने पूण्य का काम किया है.

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खांटी मानवतावादी अजय कुमार समाजविज्ञान और दर्शन की दुनिया से जूझते हुए जीवन बिताना चाहते हैं। कहने के लिए तो इन्होंने अपनी डिग्री bhu से हासिल की है लेकिन खुद की समझ के लिए चर अचर सबकी भूमिका स्वीकारते है। देखना, सीखना और अपना नज़रिया बनाना ही ज़िन्दगी बन जाए इसलिए पत्रकारिता का चुनाव किया। किसी भी विषय को गहराई से समझने-समझाने के समर्थक और घाट-घाट का पानी पीने वाले अजय कुमार राजनीति के जरिये सामाजिक बदलाव की बात में यकीन करते हैं। नो नॉनसेंस पर्सन अजय कुमार किसी साधू की तरह हरदम विचारों की धूनी रमाए रहते हैं.

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