यह पत्र देश के चुनिंदा वैज्ञानिकों ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह को कुछ दिन पहले उनके एक विवादित बयान के संदर्भ में लिखा है. इस बयान में सत्यपाल सिंह ने कहा था कि ़डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को वैज्ञानिक 30-35 साल पहले ही खारिज कर चुके हैं और इसे पाठ्य-पुस्तकों से हटा देना चाहिये. यह पत्र इंडियन एक्सप्रेस अखबार के ‘द आइडियाज पेज’ पर ‘डियर मिनिस्टर’ शीर्षक से छपा है.

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प्रिय मंत्रीजी,

शनिवार, 20 जनवरी, 2018 को कई खबरिया चैनलों ने आपके (केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह के) औरंगाबाद में दिये भाषण के बारे में खबरें दीं. आपकी इस बात को उद्धृत किया गया था, ‘डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत गलत है. कुछ 30-35 साल पहले ही वैज्ञानिकों ने इसे खारिज कर दिया है. यह कहना गलत है कि मनुष्यों का विकास बंदर से हुआ है और ऐसे संदर्भ विज्ञान और इतिहास की स्कूली पाठ्य-पुस्तकों से हटा दिये जाने चाहिये. समाचार में आपके कई और बयान छपे थे, जिनपर सवाल उठता है. हालांकि, इस पत्र के लिये हम अभी आपके इसी दावे पर ध्यान केंद्रित करते हैं.

हम वैज्ञानिक, वैज्ञानिक बात करने वाले और विज्ञान की ओर झुकाव रखने वाले जनता के लोग, आपके दावे से बहुत दु:खी हैं. यह कहना तथ्यात्मक रूप से गलत है कि विकासवादी सिद्धांत को वैज्ञानिक समुदाय ने खारिज कर दिया है. जबकि दूसरी तरफ, हर नई खोज डार्विन की दृष्टि का और समर्थन करती जा रही है. यह भी ख्याल रखना चाहिये कि केवल यही सिद्धांत अब तक जैविक विकास की क्रियाविधि नहीं है, बल्कि कई दूसरी ऐसी विकासवादी घटनाएं प्रकृति में देखी गई हैं. ऐसा कहना कि इंसान, बंदरों से बने/नहीं बने हैं विकास को बहुत ही साधारणीकृत और गलत ढंग से पेश किया जाना है. इस बात के पर्याप्त मात्रा में और न खारिज किये जा सकने वाले वैज्ञानिक सबूत मौजूद हैं कि मनुष्य और दूसरे बड़े कपि और बंदरों के पूर्वज एक ही थे.

जहां तक आपने यह भी दावा किया कि सभी प्रश्नों के उत्तर (दुनिया के) वेदों में निहित हैं. इस तरह कर बढ़ा-चढ़ाकर किये गये दावे उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध नहीं किये जा सकते, साथ ही यह भारतीय वैज्ञानिक परंपरा पर मौलिक शोध के कामों का अपमान भी है. वैदिक परंपरा, मीमांसा शास्त्र से हमें तार्किकता के जरिए वेदों को समझने का तरीका सिखाती है. आपका दावा उस परंपरा के हिसाब से भी विपरीत है, जिसकी वकालत आपने अपने दावे में की.

जब देश में मानव संसाधन विकास के लिये काम कर रहा एक मंत्री ऐसे दावे करता है, यह वैज्ञानिक समुदाय के आलोचनात्मक शिक्षा और आधुनिक वैज्ञानिक शोध के माध्यम से वैज्ञानिक विचारों और तार्किकता फैलाने के प्रयासों को नुकसान पहुंचाता है. साथ ही यह देश की छवि को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी धूमिल करता है और अंतरराष्ट्रीय ऐतिहासिक शोध समुदाय के भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा किये गये मौलिक शोध में उनके विश्वास को भी कम करता है.

इसलिए, हम आपसे प्रार्थना करते हैं कि आप अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में दिये गये अपने भाषण को तुरंत प्रभाव से वापस लें और इस मामले पर मंत्रालय की नीतियों के विकासवादी सिद्धांत को पढ़ाये जाने के संबंध में एक स्पष्टीकरण जारी करें.

-H.C. प्रधान, पूर्व केंद्रीय निदेशक, HBCSE (TIFR), मुंबई. नरेश दधीचि, पूर्व निदेशक, IUCAA, पुणे. गोविंद स्वरूप, पूर्व केंद्रीय निदेशक, NCRA (TIFR), पुणे. दीपक माथुर, पूर्व निदेशक, UM-DAE CEBS, मुंबई. डी. बालासुब्र्ह्मणयम्, पूर्व निदेशक, CCMB, हैदराबाद. श्रीकांत बाहुलकर, माननीय सचिव, भंडारकर ओरियंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट, पुणे. जयश्री रामदास, पूर्व केंद्रीय निदेशक, HBCSE (TIFR), मुंबई. और दूसरे…

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इस पत्र का अनुवाद अविनाश द्विवेदी ने किया है.

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