जिस गांधी को 50 सालों में अंग्रेज सरकार मार नहीं सकी, उसे हम आज़ाद भारत में 6 महीने भी ज़िंदा नहीं रख पाये। यह एक ऐसा सच है जिसकी लपट में आज भी भारत की आत्मा जल रही है। आज देशभक्ति के नाम पर हत्याएँ हो रही हैं। केरल में हिन्दू मरता है या उत्तर प्रदेश में मुसलमान और हम अपने पड़ोसी का घर फूंकने निकल पड़ते हैं। यह मात्र उस चिंगारी का विस्फोट है जो गाँधी के चिता में हमने लगायी थी। हिंसा के सभी सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हमें खुद से यह पूछना होगा कि गाँधी को गोडसे ने क्यों मारा? गाँधी को हमने क्यों मारा? क्या गोडसे ही हमारा नायक है? क्या हिंसा ही वह रास्ता है जिससे हमारी असहमतियॉं समाप्त की जा सकती हैं?

गोडसे ने गाँधी को ‘हिन्दू धर्म’ बचाने के लिए मार दिया। उस धर्म के लिए जिसके बारे में गाँधी कहा करते थे कि ‘मैं जितने धर्मों को जानता हूँ उन सब में हिंदू धर्म सबसे अधिक सहिष्णु है। इसमें कट्टरता का जो अभाव है वह मुझे बहुत पसंद आता है, क्योंकि इससे उसके अनुयायों को आत्माभिव्यक्ति के लिए अधिक-से-अधिक अवसर मिलता है।’ अगर गोडसे ने हिंसा का रास्ता चुना तो यह साफ़ है कि वह अच्छा हिन्दू नहीं था। उसी तरह अगर आज भी कोई अगर धर्म के लिए हिंसा का रास्ता चुनता है तो वह कत्तई धार्मिक नहीं।

दिल्ली में एक पार्टी सत्ता में आती है और गोडसे पूजकों की फ़ौज खड़ी हो जाती है। सरकार कुछ नहीं बोलती। हत्यारों और दंगाइयों को गोडसे पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है। तो क्या यह मान लिया जाए कि गोडसे ही हमारा नायक है? क्या अब एक माँ अपने बच्चे को यह सिखाएगी कि जिससे भी असहमत होना, उसे गोली मार देना? क्या अब प्रधानमंत्री विदेशी नेताओं को गोडसे की जीवनी उपहार में देंगे? क्या अब स्कूलों में गोडसे का महान चरित्र पढ़ाया जायेगा? अगर हाँ तो कुछ भी कहना व्यर्थ है और अगर नहीं तो हमें निरंतर लड़ना है। आज हमे उस नफ़रत से लड़ना होगा जिसे गोडसे ने धर्म के नाम पे बोया था। हमे अपने बच्चों को बताना होगा कि अगर धर्म और इंसान में चुनना हो तो इंसान चुन लेना। तुम स्वयं ज़िंदा धर्म बन जाओगे।

1948 में आज के दिन गाँधी जी की हत्या हुई थी और आज भी गांधी रोज मारे जा रहे हैं। एक निष्पक्ष पत्रकार के रूप में, एक साहसी लेखक के रूप में, एक मासूम इंसान के रूप में; गौरी लंकेश, कलबुर्गी, पानसरे, दाभोलकर, अख़लाक और चन्दन के रूप में। आज हम सर्वपल्ली राधाकृष्णनन की के उस सवाल को दोहराना चाहते हैं कि यह दुनियां संतों के लिए कब सुरक्षित होगी? समस्त दुनियां को यह सीखना है कि अगर हम हिंसा, क्रूरता और अराजकता की खाई में गिरने से बचना चाहते हैं तो हमे वही रास्ता चुनना होगा जिसके लिए महात्मा गांधी जिये और मरे।

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इसे पीयूष रंजन परमार ने लिखा है.

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