समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई
कांग्रेस से आई हो जनता से आई
झंडा के बदली हो जाई…
समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई…

यह विशुद्ध भोजपुरी भाषी जिले देवरिया में 1945 को जन्मे गोरख पांडेय का जनगीत है। यह उस समय की आबोहवा में घुल रहे जयप्रकाश, लोहिया से लेकर राजनायण तक के गुलाल के गन्ध का गीत है। यह समाजवाद के आगमन का बसंती गान है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से दर्शन में स्नातक गोरख पोस्ट डॉक्टरल फेलोएशिप तक शिक्षा तक के अपने संक्षिप्त समय को बहुत ही लौकिक राग देने वाले जनकवि रहे हैं। एक विशुद्ध गंवई अंदाज में उनकी कविताएं और गीतों को जितना प्रतिरोध के लिए इस्तेमाल किया गया शायद ही मुख्यधारा किसी सेमिनरी कवि को कभी नसीब हो।

बर्तोल्त ब्रेख्त ने रंगमंच के लिए जो थ्योरी बनाई थी गोरख उसी सिद्धांत को कविता में साधते हैं। वह कविता को लोक में इस तरीके से प्रस्तुत करते हैं जिससे शब्द की सतह पर यथार्थ दिखने लगे। ताकि इससे प्राप्त आनंद से पाठक क्रांति के लिए प्रशिक्षित हो सके। गोरख अपने समय के मज़दूरों, किसानों और छात्रों के निराशा से छनी जांघों के जांगर के कवि है।उनके गीतों में क्रांति का बारूद भी है और खलिहान का भूसा भी।

हमरे जंगरवा से धरती फूलेले
फूलवा में खूशबू भरेला हो
हमके बनूकिया से कइले बेदखली
तोहरे मलिकई चलेला हो
धरतिया अब हम नाही गंवाइबो
बनूकिया हमरा के भावे ले..

जब देश में नक्सलबाड़ी का विद्रोह अलाप ले रहा था, गोरख उसे सुर दे रहे थे। हिंसा के लिए प्रतिहिंसा को खारिज करने वाले गाँधी और बुद्ध के इस देश मे गोरख अपनी बात रखते हुए हिंसा की अनिवार्यता पर बल देते हैं। भले ही इस देश के प्रबुद्ध वर्ग को यह बात खलती है।

गोरख अपने वर्तमान समाज को उसी की लय और तुक लौटने वाली चेतना के कवि हैं। इसके लिए उनकी कविताओं में एक अलग ही रोमांटिक नारे आपको मिलेंगे। एक सामान्य से ब्राह्मण परिवार में जन्मे गोरख पांडेय ने दिमागी बीमारी सिजोफ्रेनिया से परेशान होकर 29 जनवरी 1989 के दिन आत्महत्या करना एक सम्पूर्ण जनकवि के लिए जरूरी अर्हता हासिल करने वाले विद्यार्थी का मुकाम है। उनकी कविताओं और गीतों में उठने वाली आवाज़ शोषण के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल है। तभी तो वे कहते हैं कि

वे डरते हैं
किस चीज से डरते हैं वे
तमाम धन-दौलत
गोला-बारूद-पुलिस-फौज के बावजूद
वे डरते हैं
कि एक दिन निहत्थे और गरीब लोग
उनसे डरना बंद कर देंगे

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यह आर्य भारत ने लिखा है. आर्य भारत काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. इसके बाद इन्होंने भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. अपनी ओजपूर्ण शैली के लिये ख्यात आर्य वर्तमान में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं.

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