यह एक ऐसा लेख है जिसकी भूमिका नहीं लिखी जा सकती। दरअसल, यह विदा के बारे में हैं। यह दुःख के बारे में है जो मौन कर देता हैं लेकिन यह लेख लिखा जाना इसलिए जरुरी था क्योंकि यह लेख जिनके बारे में हैं वो शब्दों के साधक थे। उन सबका मानना था कि शब्द ही ब्रम्ह है। वो चुप्पी और तटस्थता को चुनौती देने वाले लोग थे। साल 2017 में कला और साहित्य ने अपने सबसे सुनहरे सितारों को खो दिया है। यह उनके प्रति एक श्रद्धांजलि है।

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शशि कपूर

बचपन में एक हीरो को देखकर आत्मा जाग उठती थी- शशि कपूर। जिसके पास माँ थी। उसने कहा और हमने मान लिया कि गाड़ी, बंगला से अधिक कीमत रिश्तों की होती है। यह साल जाते-जाते उस आत्मा को अपने साथ ले गया। 79 साल की उम्र में 4 दिसंबर को फिल्म और रंगमंच के इस महान कलाकार ने संसार को विदा कह दिया। शशि मुगल-ए-आजम के अकबर ‘पृथ्वीराज कपूर’ के बेटे थे।

सिनेमा में सफलता पाने के बावजूद उन्होंने रंगमंच को नहीं छोड़ा। शशि के समर्पण ने मुंबई स्थित पृथ्वी थियेटर को रंगमंच के मक्का के रूप में तब्दील कर दिया। उनकी कुछ यादगार फ़िल्में हैं- ‘दीवार’, ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’, ‘नमक हलाल’ ‘सुहाग’ ‘त्रिशूल।’ शशि कपूर ने अपने फिल्मी करियर में कुल 160 फिल्में कीं। जिसमें उन्होंने 148 हिंदी फिल्में और बाकी 12 फिल्में अंग्रेजी भाषा में कीं।

मिहिर पांड्या एक जागरुक फिल्म समीक्षक हैं लेकिन व्यक्तिगत तौर पर मैं उन्हें सिनेमा प्रेमी के रूप में देखता-पढ़ता-सुनता आया हूँ। फ़िल्में उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। कॉलेज के दिनों से ही फिल्मों पर सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि के लिए वे मेरे पसंदीदा स्तम्भकार रहे हैं। पढ़िए शशि कपूर पर उनका एक आत्मिक लेख…

शशि कपूर : नायक जिसे मेरी माँ ने चाहा

विनोद खन्ना

विनोद खन्ना ने केवल एक्टिंग की होती तो निस्संदेह भारतीय सिनेमा में उनका कोई और ही मुकाम होता। पर उन्होंने वह किया जो उन्हें सीधा-सरल इंसान बनाता है। सारी मानवीय कमियों और अच्छाईयों से परिपूर्ण विनोद खन्ना निस्संदेह बेहतरीन इंसान थे। वह प्रभावित भी हुये और उन्होंने प्रभावित भी किया। जब लगा दुनिया फ़ानी है तो ओशो की शरण गये और जब लगा कि कर्म ही मोक्ष का मार्ग है तो फिर से नश्वर संसार में लौट आये। ग्रीक गॉड सा उनका तिलिस्म भुलाये नहीं भूलता।

विनोद खन्ना के मन जो भी बात आई, उन्होंने की। आध्यात्म से राजनीति तक का रास्ता चुना। विनोद खन्ना की जिंदगी के बहुत से अनछुये, अनकहे पहलू हैं. जिन्हें उनके देहांत के बाद मैंने संजोने का प्रयास किया था। पढ़िये इस लेख में उनके और अमिताभ बच्चन के बीच के कोल्डवॉर से लेकर उनकी जिंदगी और करियर के तमाम अनछुये पहलुओं के बारे में…

जिंदगी तो बेवफा है एक दिन ठुकराएगी, मौत महबूबा है अपने साथ लेकर जायेगी

टॉम आल्टर

टॉम सर को यूं तो दूरदर्शन के तमाम धारावाहिकों और फिल्मों में बचपन से देखते हुये बड़ा हुआ था। पर उनसे पहली मुलाकात बहुत रोचक है। मैं एफटीआईआई का इंटरव्यू देने के लिये पहुंचा हुआ था। यह बात मुझे पता था कि टॉम सर वहां फैकल्टी के रूप में जुड़े हैं और एक्टिंग के छात्रों की क्लास भी लेते हैं। इसलिये मेरे लिये वहां टॉम सर को पाना कोई बहुत चौंकाने वाली बात नहीं थी। फिर दिल्ली में ढाई साल पत्रकारिता की पढ़ाई और नौकरी के दौरान चर्चित हस्तियों को लेकर इतना सहज हो गया था कि चिंहुकता-चौंकता नहीं था। ऐसे में इंटरव्यू से दो दिन पहले ही एफटीआईआई पहुंच गया था ताकि इंटरव्यू में नर्वसनेस न घेरे।

पर वहां एकमोडेशन (ठहरने के प्रबंध) बेहद घटिया था। वहां के गेस्ट हाउस के ग्राउंड फ्लोर पर सारे अभ्यार्थियों को डॉरमेट्री के नाम पर एक-एक गद्दा दे दिया गया था। पर उससे भी ज्यादा परेशानी मेरे लिये यह थी कि फिर भी मुझे वहां रुकने नहीं दिया जा रहा था क्योंकि मैं दो दिन पहले आ गया था। मैं अभी गेट पर गॉर्ड से इस बाबत बतकही में उलझा ही था कि गेस्ट हाउस के बाहर एक सफेद रंग की कार आकर रुकी। जिससे एक-एक कर टॉम ऑल्टर और बेंजामिन जिलानी उतरे।

टॉम सर ने मेरी बहस सुनी नहीं थी। वह मेरी ओर बढ़े और मैं उनकी ओर। मैंने देखा वह एक फैन से बचने की जुगत में हैं तभी मैं उन्हें संबोधित कर शिकायत करने लगा, बताइये सर दो दिन पहले आ गया हूं तो मुझे ठहरने नहीं दे रहे हैं। टॉम आल्टर अपने लयात्मक अंदाज में, गेटकीपर से मुखातिब होकर मुझसे कही जा रही बात बोले, बरखुरदार हम तो बिल्कुल चाहेंगे कि आप यहीं पर रुक जायें। (गेटकीपर की ओर इशारा करते हुये) बाकि इनके हाथ में हैं। अब क्या है न कि हम तो पढ़ाने-लिखाने वाले लोग हैं, हमारे हाथ में यह काम है नहीं।

इतना कहकर टॉम सर आगे निकल गये। उनका कमरा गेस्ट हाउस में ही ऊपर था। इसके बाद गेटकीपर ने मुझे बुलाया और ठहरने का फॉर्म भरने को दिया। फिर बोला, भैया किसी को बताइयेगा नहीं। हालांकि प्रस्तुत लेख के लेखकों के लिये त्रासद ये है कि इस लेख के पहले हिस्से शशि कपूर पर कलम चलाने वाले पीयूष जब इस दिसंबर में एफटीआईआई पढ़ाई करने पहुंचे तब तक टॉम सर एफटीआईआई से ही नहीं दुनिया से भी रुखसत हो चुके थे।

बहरहाल, आप सुनें टॉम सर की राज्यसभा टीवी पर की गई मो. इरफान से यह खास बातचीत-

तारक मेहता

लेखक, व्यंग्यकार और स्तंभकार तारक मेहता का भी 2017 में एक मार्च को निधन हो गया. तारक मेहता सरल और शिक्षाप्रद हास्य के क्षेत्र में मील का पत्थर हैं. उन्होंने लेखन का सफर 1971 में गुजराती और मराठी में निकलने वाली साप्ताहिक पत्रिका चित्रलेखा में शुरू किया था. उन्होंने जीवन में कुल 80 किताबें लिखीं. ‘चित्रलेखा’ पत्रिका में वे ‘दुनिया ने ऊंधा चश्मा’ नाम से एक कॉलम लिखा करते थे. बाद में इन्हीं कॉलमों को किताब की शक्ल दे दी गई.

इसी किताब पर आधारित हिंदी धारावाहिक बना ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’. जो सब टीवी पर 2008 से प्रसारित हो रहा है. 26 दिसंबर, 199ृ29 को जन्में तारक कई गुजराती अखबारों के लिये लिखा करते थे. वह गुजराती साहित्य और थियेटर के क्षेत्र में प्रख्यात थे. उन्होंने की नाटकों का रूपांतरण भी किया, कई नाटक भी लिखे. यहां पढ़ें उनकी किताब पर आधारित धारावाहिक को शाहीन अहमद ने कैसे देखा है-

‘Tarak Mehta Ka Ooltah Chashmah’ is part social commentary, part social propaganda

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लेखों को पढ़ने के लिये, उनके नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें. शशि कपूर के बारे में पीयूष रंजन परमार ने लिखा है.

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पढ़ाई और प्रेम दोनों के लिए कुख्यात अविनाश दिल से भले आदमी है. अविनाश से जब भी पूछा जाता है कि आप क्या बनना चाहते हैं तो वे तुरंत जवाब देते हैं - विद्यार्थी. एक विद्यार्थी बने रहने की प्रवृति ने ही अविनाश को संघ से लेकर मार्क्स तक सबसे जोडे़ रखा. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में स्नातक करने से लेकर भारतीय जनसंचार संस्थान में अध्ययन तक उनका परिचय एक ही रहा - 'वो किताबों वाला लड़का' जिसकी विनम्रता ही उसकी पहचान रही है इसीलिए जब नौकरी के दौरान किताबें दूर जाने लगीं तो नौकरी छोड़ दी. विनम्रता के संस्कार के बावजूद उन्होंने सरोकार के कटु प्रश्न करने नहीं छोड़े. नौकरी छोड़कर भी लगातार स्वतंत्र लेखन में रमे हुए हैं. ग़ालिब और गुलज़ार दिल के बेहद करीब हैं इसीलिए पार्ट टाइम जॉब के रूप में अविनाश भी कविता करते हैं जिसमे श्रृंगार से लेकर सरोकार तक की बातें हैं लेकिन वो अब डायरियों से बाहर नहीं निकलती. अविनाश की सबसे ख़ास बात यह है कि कला हो या राजनीति , वह हमेशा मौलिक नजरिये की तलाश में रहते हैं. इसीलिए रिश्ते, किताबें, शहर और मौन सबकुछ से एक एक अंश चुनचुनकर उन्होंने कठफोड़वा का विचार बनाया. तटस्थता और निष्क्रियता के इस दौर में एक ज़िंदा नाम है.

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