महात्मा गांधी के नाम एक वामपंथी का पत्र

 

मैं खांटी वामपंथी हूँ बापू, लेकिन न मालूम क्यों सालों से हर रोज तुम्हें महसूस करता हूँ… कम्युनिस्ट हो जाने के बाद और शिद्दत से… और हिन्द स्वराज के कुछ हिस्सों में उतर जाने के बाद मिशनरी तरीके से मैं तुम्हारे बारे में जिद करता हूँ…. मैं सोचता हूँ कि तुम होते तो आज एफडीआई को लेकर क्या कहते… मैं पूछना हूँ कि क्या तुम दोबारा गुजरात में ही पैदा होना चाहते… क्या तुम नरोडा में जाकर उपवास करने लगते…

लेकिन बापू वो तुमको बताते हैं मजबूरी का नाम, क्या मजबूरी थी तुम्हारी बापू, जो मोहनदास नाम होने के बावजूद तुम बैठ गए थे जाकर जलते हुए नोआखली में… तब जब पूरा मुल्क तुम्हारा दिल्ली में इंतज़ार करता था। बापू जब तुम्हारी वो पार्टी, जिसे तुमने भांग कर देने की सिफारिश की थी, दिल्ली में आजादी का जश्न मना रही थी… तुम उपवास कर रहे थे कि नोआखली में दंगे रुक जाएँ, लोग अपना ही खून बहाना बंद करें… कभी तुम्हारे जिस रास्ते में फूल फेंके जाते थे, वहां काँच की बोतले फेंकी जा रही थीं और तुम बता रहे थे कि महात्मा होना दरअसल क्या होता है… तुम भी चाहते तो जा सकते दिल्ली, लेकिन किस मजबूरी के तहत तुम वहां जान जोखिम में डालकर बैठे रहे… तुम दिल्ली नहीं लौटे… लौटे तो शांति स्थापित करवाकर… इंसान से दरिंदे बने वो लोग फिर से इंसान बन गए थे… हम वामपंथी ईश्वर को नहीं मानते, लेकिन इस करिश्मे को करिश्मा जरूर मानते हैं… बापू शायद तुम्हारे राम कोई और थे, वो कहानियों वाले राम तो नहीं थे…

कहानी वाले राम से बापू बड़ा डर लगता है… लेकिन बापू जो तुमने चंपारण में किया… नोआखली में किया… हम वामपंथी न तो सिंगूर और न ही नंदीग्राम में कर पाए… और न ही कर पाए गुजरात में, ये तो हमारा ही काम था दरअसल… और मालूम है, जिन्होंने तुमको मारा था, उन्होंने ही इस बार भी तुमको मारा, फिर से क़त्ल कर दिया… फ़र्क़  बस ये था कि इस बार वो हे राम के नारे लगा रहे थे… लेकिन हम सोचते हैं कि तुम होते तो क्या करते बापू… क्या तुम नरसंहार के दोषियों के हाथों अपने आश्रम का जीर्णोद्धार करवाते… क्या तुम अभी भी कांग्रेस को राजनीति में बने रहने देते… बापू क्या कहते तुम गुवाहाटी में जो हुआ उस पर… क्या तुम चाहते कि लोग टोपियों पर तुम्हारा नाम लिख उसे उछालते रहते… बापू हमारा काम तुमने किया… हम अपना काम करना अभी तक सीख नहीं पाए हैं…

बापू तुम्हारी बहुत याद आती है, जब इंसानियत को मजहब में बंटता देखता हूँ… मैं तुम्हारी तरह राम को नहीं मानता, लेकिन ये जरूर मानता हूँ कि उसके नाम पर क़त्ल भी नहीं होने चाहिए… मैं भी चाहता हूँ कि तुम होते तो शायद आज भी गरीबों के… किसानों के साथ खड़े होते… भले ही अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ा होना पड़ता… तुम्हारा पहला आंदोलन भी किसानों के लिए ही था न, वो चंपारण वाला… तुम कहते थे न कि मशीनों को इंसानों का रोजगार छीनने की छूट नहीं होनी चाहिए, बापू अगर कुछ बदल सकते हो तो आ जाओ… और नहीं बदल सकते… तो मेरे जेहन में भी आना छोड़ दो…

बापू तुम्हारी पार्टी और साथी एफडीआई के साथ होते, तो क्या तुम भी उनके साथ खड़े हो जाते… क्या तुम किसानों की जमीनें छीनकर विकास करने के सपने से सहमत हो जाते… जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के सत्याग्रह पर किसी भी वामपंथी से पहला हक़ क्या तुम्हारा नहीं होता बापू… बापू तुम्हारी कमी बेहद खलती है, खासकर तब, जब गाँधी के नाम से लेकर लेनिन और मार्क्स का नाम तक लेने वाले सब ये भूल गए हैं कि उनको दरअसल करना क्या है… बापू क्या तुम देखना चाहते थे ऐसा ही आज़ाद भारत, जो आगे बढ़ते-बढ़ते फिर से मध्य युग में पहुँच जाये…

तुम हिन्द स्वराज को लेकर नेहरू और पटेल सबसे बहस करते थे न बापू, लेकिन अब उस किताब पर कोई बहस नहीं होती… वो लाइब्रेरी के उदास कोनों में धूल खाती है… स्वराज एक उपेक्षित शब्द है… ठीक महात्मा की तरह… और हाँ तुम अब मजबूरी भी नहीं रहे… तुम्हें शायद पता न हो, लेकिन हाल ही में क्षेत्र और धर्म की राजनीति करने वाले एक शख़्स को इस देश का नया महापुरुष घोषित किया गया… बताया भी गया कि उनके देहांत पर बापू के देहांत से ज्यादा लोग जुटे… बापू हिंसा, अलगाव और सरकारी दमन इस देश का नया धर्म है… परम धर्म… अहिंसा, एक टूटा हुआ सपना है… जिसे हमारी सरकारों ने साबरमती आश्रम और डाक टिकटों में हिफाजत से सहेज दिया है…

आज भी एक साम्यवादी के तौर पर 100 में से 90 बार मेरी तुमसे मुठभेड़ होती है, और मैं चाहता हूँ कि झूठ बोल दूँ पर 80 बार तुम जीतते हो बापू… 80 बार… तुम्हारी ही बात को मैं अपने शब्दों में हर जगह कहता हूँ कि 100 में से 99 रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का… लेकिन वो आखिरी है… और दुनिया के 99 मसले पहले 99 रास्तों से हल हो सकते हैं…

बापू मैं तुम्हें अक्सर देख भी पाता हूँ… कभी दशरथ मांझी में तो कभी इरोम शर्मीला में… और अभी हाल ही में मैंने हरदा और खंडवा में 100 से भी ज्यादा गाँधी देखे थे… बापू तुमने सच कहा था… और मालूम है ये मैं ही नहीं मानता, भगत सिंह भी मानते थे…लेनिन भी… और बाकी सब भी…।

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कॉमरेड मयंक सक्सेना ने यह खत लिखा है. मयंक ने बदलाव के लिये लेखन और संघर्ष को हथियार बना रखा हैं. वह स्वतंत्र लेखन में रमे हुये हैं और अक्सर उनके लेख पत्र-पत्रिकाओं और वेबसाइट पर शाया होते रहते हैं. ऊपर प्रकाशित लेख ‘अहा जिंदगी’ पत्रिका के जनवरी, 2013 अंक में प्रकाशित हो चुका है.

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गांधी को लिखा यह पत्र आज के युवा चेतना की सबसे सहज अभिव्यक्ति है। भारत का युवा, हमेशा से ही खुद को मार्क्सवाद और गांधीवाद के बीच फँसा हुआ पाता रहा है। वह द्वन्द के बीच से एक बेहतर भविष्य का रास्ता ढूंढ रहा है। वह उस भविष्य का परिणाम नहीं बल्कि सक्रिय कर्ता बनना चाहता है। हम आगे बढ़ते जाते हैं लेकिन कठिन मोड़ पर हम गांधी की तरह देखते हैं क्यों कि हमे जो भी असंभव लगता है, गांधी उसे पहले ही संभव कर चुके हैं। मयंक सक्सेना का यह पत्र गांधी के प्रति एक विनम्र श्रद्धांजलि है। – पीयूष परमार

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