प्रिय!

इस वैलेंटाइन तुमसे अलग होना किसी बुरे स्वप्न से कम नहीं है। इतने सालों से तुमने मुझे खुद में समेट कर रखा है। नाम, काम और दाम सब दिया है। मैं हमेशा तुम्हारी आलोचना करता रहा। तुममें कमियां निकालता रहा। तुम्हारे स्वभाव को लेकर सवाल खड़े करता रहा। तुमने कभी कुछ नहीं कहा। तुम्हें तो जैसे किसी देवी की तरह सब कुछ सहने का वरदान मिला हो।

जानती हो, आज से 6 साल पहले जब मैं तुमसे पहली बार मिला था, तब प्रदूषण कम था। बारिश ज्यादा होती थी। आंदोलन अपने चरम पर थे। तुमने ही मुझे प्रेम के सही मायने सिखाए थे। आंदोलन और प्रदर्शन के दौरान प्रेम। मुझे याद है राजीव चौक की भीड़ देखकर मैं तुम पर खीझने लगता था, तो मंडी हाउस पर तुम्हें आलिंगन में भर लेता था। मन करता था तुम्हारे साथ ही जिंदगी बिता दूं।
घंटों सीढ़ियों पर बैठकर तुम्हारी खूबसूरती को निहारता रहता था। मैं हर दिन प्यार करना सीख रहा था। तुम्हारी सबसे ख़राब बात मुझे यही लगी कि तुमने कभी मुझसे कुछ पूछा नहीं। जैसे- तुम कहां से हो ? तुम्हारा धर्म और जाति क्या है? तुमने हमेशा मुझे ऐसे स्वीकार किया जैसे मैं तुम्हारा ही अंश हूं। तुम्हारी यही बात मुझे हिलाकर रख देती है। इस दौर में कोई इतना प्रेम कैसे कर सकता है? जानती हो, जब भी मैं इंडिया गेट पर तुम्हारे साथ होता हूं तो खुद पर गर्व और तुमसे जलन होने लगती है। तुम्हारी महानता और अद्भूत सुंदरता देखकर मेरा तन मन खिल जाता है। और मेरा गर्व घमंड में बदलने लगता है।

जाते-जाते मैं तुमसे एक वादा करता हूं, मैं फिर आऊंगा। कनॉट प्लेस पर खड़े होकर अपने प्यार का इज़हार करुंगा। मैं जानता हूं प्रेम किसी भी भाषा के शब्दों में नहीं समा सकता। निजामुद्दीन पर आंख की कोरों से टपकते हुए आंसुओं से तुम समझ जाओगी कि मैं आ गया हूं। लक्ष्मीनगर के फुटओवर ब्रिज पर खड़ा होकर फिर से पोस्टर/बैनर देखूंगा। मुखर्जी नगर में बेइरादा भटकूंगा।

प्रिय! जानती हो, इतिहास के बदलाव ने हमे अंधा कर दिया है। कट्टरता और नफरत प्रेम पर हावी हो गयी है। धार्मिक तौर पर पहचान बनाता ये भारत कई सदी पीछे जाने के लिए व्याकुल है। लोग भरे बैठे हैं किसी को मारने और पीटने के लिए। सरकारें मौतों पर चुप रहती हैं। उनसे सवाल करने वाले मर चुके हैं। चमचे बचे हैं। ये सब तुम्हे इसलिए बता रहा हूं क्योंकि तुम्हारे सामने तो कई बार इतिहास बदला है। खुद को खुदा समझने वाले कई सत्ताधारी चल बसे। तुमसे इस तरह बात करना अच्छा लग रहा है। मुझे तुम्हें छोड़ते वक्त और वो भी तब जब प्रेमी जश्न में डूबे हैं, दुख हो रहा है। यकीं मानो दर्द हो रहा है। इसलिए आज एक जरुरी बात तुम्हें बताना चाहता हूं।

इन दिनों मैं बहुत परेशान रहता हूं। अजीब-अजीब सी उलझनों में फंसा रहता हूं। सो जाता हूं तो सपने में कितनों को चीर डालता हूं। उठता हूं तो, अपनों को चीरने का पश्चाताप रोने पर मजबूर कर देता है। रोते-रोते जब सुबह होती है तो तमाम बेनामी रिश्ते मेरे सामने आकर खड़े हो जाते हैं। उन्हें क्या नाम दूं! हर रिश्ते को नाम देना जरुरी होता है क्या ? कोई पूछता है तो चुप हो जाता हूं। शाम होते ही मैं अपने मोबाइल से कितने ही मैसेज अनजान और जानने वाले लोगों को भेज देता हूं। जिनमें अश्लीलता की कोई कमी नहीं होती। पश्चाताप। घोर पश्चाताप।

पश्चाताप को लेकर शायद दॉस्तोएवस्की ने सबसे सुंदर कहानियां लिखीं हैं। कहते हैं दॉस्तोएवस्की ने किसी कच्ची उम्र की लड़की के साथ शारीरिक बदसलूकी था। और तभी से एक गिल्ट उसके भीतर घर कर गया। मेरे अंदर किसी भी वक्त टीस नहीं उठती। लेकिन एक लौ जलती रहती है, हर वक्त जिसके पीछे छिपा रहता है घनघोर अंधेरा और दोनों के बीच में पीसता हूं मैं।

जानती हो, नशीले पदार्थ मेरी जान लेने पर तुले हैं। डॉक्टर ने लिवर के सही होने की उम्मीद छोड़ दी है। कोई असाध्य रोग भीतर ही भीतर मुझे खत्म कर रहा है. डिमेंसिया इस कदर हावी है कि तुम्हारे लिए लिखे कई प्रेम पत्र दूसरी प्रेमिकाओं के पास चले गए। इस प्रेम के महान अवसर पर ऐसी बातें नहीं लिखनी चाहिए। लेकिन जाने से पहले इस अंतिम ख़त में मैं तुमसे कुछ छिपाना नहीं चाहता। सुनो! मैंने मौत को नहीं देखा। शायद, अब वक्त आ गया है कि देख लूं। मौत मेरे कमरे में मेरे साथ सोती है। किसी भी वक्त वो सपने में मुझे भी चीर सकती है। इसलिए तुम्हें छोड़कर जा रहा हूं।
तुम ख़ुश रहना। तुम्हें प्रेम करने वालों की कोई कमी नहीं है। कितने तो प्रेमी हैं तुम्हारे, फिर भी तुम बदचलन नहीं हो। देश के कोने-कोने से आकर लोग तुम्हें अपनाते हैं। तुमसे प्रेम करते हैं। तुम अपने को खत्म करती हुई उनका पालन-पोषण करती हो। फिर वो एक दिन अपनी पुरानी प्रेमिका के पास लौट जाते हैं। चुपचाप। बिना तुम्हें बताए।

तुम्हें तो अफसोस भी नहीं होता। तुम्हें तो शांत रहने की कठोर शब्दों में कहूं तो खुद का इस्तेमाल करवाते रहने की आदत जो पड़ गई है। ये एक कठिन समय है। लोगों के अंदर भयंकर डर भर दिया गया है। सभी चुप्प हैं। जैसे सबके ऊपर कफ़न पड़ा हो। लेकिन ये भविष्य के लिए खौलता हुआ खून है, जो एक दिन पोलिंग बूथ को गैस चेंबर में बदल देगा। मैं अब भी लिखते वक्त भटक जाता हूं। प्रेम पत्र की बजाय क्रांतिकारी भाषण देने लगता हूं। इस दौर में प्रेम लिखना कितना कठिन हो गया है। तुम्ही बताओ कैसे लिखें प्रेम जब चारो तरफ हिंसा, हत्या और मारकाट खुलेआम सड़कों पर हो रही है।
ओ पलायन की प्रेमिका दिल्ली ! मैं तुमसे अलविदा लेता हूं। तुम संभालना अपने दूसरे पलायनवादी प्रेमियों को। मैं भी झुलसूंगा किसी दूसरी प्रेमिका की लपटों में क्योंकि झुलसना ही जिंदा बचे रहने का एक मात्र उपाय है। मर जाना तो आजाद हो जाना है, और आजादी में वो मजा कहां, जो यातना में है।
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यह लेख हमारे लिए चमन मिश्रा ने लिखा है. वर्तमान में चमन एक पत्रकार हैं. लेखन में रूचि है. ‘तान्या’ नाम की किताब लिख चुके हैं.
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