नवम्बर का महीना! फेसबुक की वर्चुअल वॉल को मैं अपने फ़ोन पर देख ही रहा था कि मेरी नज़र एक स्टेटस पर आकर जम गई। पोस्ट मेरे साथ आईआईएमसी में पढ़ी एक लड़की ने लिखी थी। पोस्ट अपने आप में एक आपबीती थी कि किस तरह उसके बगल में रहने वाले ‘दादू’ ने मात्र सात साल की उम्र में उसके प्राइवेट अंगों के साथ छेड़खानी (हालांकि बच्ची की उम्र के लिहाज से इसे बर्बरता लिखा जाना चाहिये) की थी।

एक ऐसा ही वाकया दस साल की उम्र में दोहराया गया जब उसके ट्यूटर ने पेंटिंग सिखाने के बहाने फ्रॉक के नीचे हाथ डाला। पोस्ट जितना अंदर तक धंसने वाली थी, उतनी ही हिम्मत बंधाने वाली भी। वो अपने अंदर की सालों की घुटन को निकाल पा रही थी। दरअसल, उसको ये हिम्मत पूरी दुनिया मे चल रहे #metoo आंदोलन की वजह से मिल रही थी। इस जैसी कितनी ही कहानियां इंटरनेट पर न सिर्फ कही और शेयर की जा रही थी बल्कि उनका प्रभाव भी अप्रत्याशित था।

कैसे हुई #metoo की शुरुआत

अक्टूबर की एक शाम हॉलीवुड अदाकारा एलीसा मिलानो को सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट ट्विटर पर एक मैसेज मिला। मैसेज में लिखा था कि अगर आपके साथ यौन उत्पीड़न की घटना या उसकी कोशिश हुई है तो आप इसके जवाब में #metoo ट्वीट करें। मिलानो 15 अक्टूबर की रात को ऐसा ही ट्वीट करने के बाद सो गई। वह जब सुबह उठी तो उन्होंने पाया कि उनका ट्वीट तीस हजार लोगों ने रिट्वीट किया था। यह लम्हा उनके लिए कई अहसासों से भरा हुआ था। दुनिया भर की कई औरतों ने उनके साथ अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की थी। metoo शब्द का प्रयोग पहली बार सामाजिक कार्यकर्ता तराना ब्रुक ने एक दशक पहले किया था । वे अब इस शब्द का इस्तेमाल यौन उत्पीड़न का शिकार हुई औरतों को एक साथ लाने के कर रही है।

हॉलीवुड अदाकारा एलीसा मिलानो, साभार- टाइम

मिलानो के ट्वीट से दस दिन पहले दूसरी हॉलीवुड अदाकारा एसली जूड ने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में मशहूर प्रोड्यूसर और मीरामैक्स स्टूडियो के चीफ हार्वी विन्स्टीन के खिलाफ यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। उनके इंटरव्यू ने पूरी फिल्मी दुनिया में सनसनी मचा दी। अदाकाराएं अपने साथ हुई घटनाओं के बारे में दबी जुबान में बोलती तो रही थी लेकिन किसी अभिनेत्री ने पहली बार खुलेआम किसी कथित आरोपी का नाम लिया था।

जूड ने अपने साक्षत्कार में ये खुलासा किया कि 1997 में विन्स्टीन ने लॉस एंजेल्स के होटल में उन पर दबाव बनाया था कि वो उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए। जूड आगे बताती है कि वह यह बात जानकर हैरान थी कि विन्स्टीन की इन गैरपेशेवर और आपराधिक गतिविधियों के बारे में पूरी इंडस्ट्री जानती थी लेकिन बोल कोई कुछ नही रहा था। परंपरा को तोड़ते हुए जूड ने अपनी लड़ाई जारी रखी और विन्स्टीन के इस व्यवहार के बारे में खुलकर बोलती रही।

हार्वी विंस्टीन

यह घटना दो वजहों से महत्वपूर्ण हो जाती है। एक, जूड के साथ यह व्यवहार काम देने के एवज़ में किया गया। यह मामला काम की जगह पर सांस्थानिक होते जा रहे यौन हिंसा/ उत्पीड़न से भी जुड़ा हुआ है।

जूड के इंटरव्यू ने न सिर्फ उनकी इंडस्ट्री की कई सहकर्मियों को हिम्मत बंधाई बल्कि ये भी बताया कि चुप रहना पीड़ितों को ही भारी पड़ रहा था। इस कड़ी में तीसरा नाम हॉलीवुड अदाकारा सलमा ब्लेयर का है। ब्लेयर ने हाल ही में टाइम मैगज़ीन को दिए इंटरव्यू में बताया कि वो 20 सालों तक इस डर में जीती रही कि उन पर यौन हमले का आरोपी उनकी हत्या कर सकता है।

ब्लेयर ने बताया कि स्वतंत्र फिल्मकार जेम्स टोबैक से उनकी मुलाकात 1999 में एक रेस्त्रानुमा होटल में हुई। होटल में उन्हें बताया गया कि टोबैक ने उनको एक कमरे में बुलाया है। जब वो कमरे में गई तो टोबैक ने ब्लेयर को कहा कि उन्हें अपनी कला में बहुत कुछ सीखना होगा। बाद में, उन्हें कपड़े उतारने को कहा गया। टोबैक सिर्फ यही नही रुका। जब ब्लेयर ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने से मना कर दिया तो उन पर सेक्सुअल असॉल्ट भी किया।

सलमा ब्लेयर

जब शिकायत पहचान बन जाये

ब्लेयर इस घटना को एक बुरा हादसा समझ कर भूलने की कोशिश कर ही रही थी कि उनके साथ काम करने वालों ने बताया कि टोबैक उनका चरित्र हनन कर रहा था। इन घटनाओं ने उन्हें और डरा दिया था।

एक ऐसी ही घटना गायिका टेलर स्विफ्ट के साथ भी हुई। डेविड म्युलर नाम के रेडियो जॉकी ने उनकी स्कर्ट के नीचे हाथ डालकर उनसे बदसलूकी की। स्विफ्ट ने टाइम को दिए इंटरव्यू में कहा कि यदि ये व्यक्ति मेरे साथ ऐसा कर सकता है तो किसी उभरती हुई कलाकार के साथ क्या ही करेगा।

गौर देने लायक बात ये भी है म्युलर कोे रेडियो डेनवर ने उनके नौकरी से निकाल दिया। ये बात समझने की भी है म्युलर ने ना सिर्फ लाखों डॉलर के मुकदमे से डराने की कोशिश की बल्कि उनके वकील ने स्विफ्ट को जताना चाहा कि म्युलर की आर्थिक क्षति की जिम्मेदार भी वो ही है।

हालांकि, स्विफ्ट का साफगोई से दिया जवाब बताता है म्युलर की हरकतों की सज़ा का जिम्मेदार वो खुद ही है।

टेलर स्विफ्ट

यौन हिंसा के पीड़ितों की समस्या सिर्फ यह नही है वो शक्तिशाली लोगो का विरोध कर रहे है। एक बार पहचान जाहिर होने के बाद उन्हें ट्रबल मेकर्स के रूप में भी देखा जाने लगता है। दूसरे संस्थान भी उन्हें नौकरी देने अथवा सेवाएं लेने से झिझकते है।

अमेरिका जैसे बहु-आयामी समाज मे रंग और वर्ग अपने तौर अलग भूमिका निभाते है। सामाजिक कार्यकर्ता ये पाते है कि काले और हिस्पैनिक लोग नौकरी से बेदखल किए जाने के डर से इस तरह की घटनाओं के खिलाफ रिपोर्ट तक दर्ज़ नही कराते। परिणामस्वरूप, जेंडर जस्टिस की ये लड़ाई कमज़ोर पड़ती जाती है।

भारत में क्या हैं हालात?

काम की जगह पर यौन हिंसा के खिलाफ भारत के पास एक मजबूत कानून भले ही हो, लेकिन सवाल लागू करने वाली एजेंसियों पर भी उठते रहे है।

भारतीय न्यायपालिका न्याय पाने की अंतिम जगह मानी जाती है लेकिन यौन उत्पीड़न के खिलाफ बेबसी लोकतंत्र के इस खम्बे को भी घेरे हुए हौ। एक जिला कोर्ट में एक महिला जज को एक पुरुष वकील के खिलाफ फैसला सुनाना भारी पड़ गया। वकील साहब ने ना सिर्फ महिला जज को उनकी औकात याद दिलाने की कोशिश की बल्कि कथित तौर पर चीखते हुए कहा, ” मैं तेरी चड्डी फाड़ दूंगा।” सम्पादन कला की निपुणता का इस्तेमाल कर इस वाक्य को हटाया जा सकता है लेकिन ये शब्द एक नकारा आदमी की सफल महिला को देखते हुए झुंझलाहट और हिंसा के शब्द है। इस हिंसा को बेपर्दा करने के लिए इन शब्दों को रखना जरूरी है।

खैर, महिला जज ने अचानक से हुए इस हमले के बाद वकील के खिलाफ केस दर्ज कराया।

दूसरे वकीलों और जजों ने उन्हें समझौता कर लेने को कहा। सवाल ये था कि आप मुकदमे के दौरान आपत्तिजनक सवालों का जवाब कैसे देंगी। दूसरों की कायराना राय के खिलाफ उन्होंने लड़ाई जारी रखी। दो साल बाद भी, केस में कुछ खास प्रगति नही हुई है।

दूसरा केस, सेवानिवृत जज ए के गांगुली से जुड़ा हुआ है। प्रैक्टिस के मुताबिक, कई वकील सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ इंटर्नशिप करते है। ऐसे ही, इंटर्नशिप करने वाली एक युवा वकील ने आरोप लगाए कि गांगुली ने 2012 में एक पांच सितारा होटल में यौन उत्पीड़न की कोशिश की। मामला सुप्रीम कोर्ट के जज से जुड़ा हुआ था इसलिए सब स्तब्ध थे। कई महीनों की जांच के बाद गांगुली दोषी पाए गए। नतीजतन, उन्हें पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के चेयरमैन पद से इस्तीफा देना पड़ा।

दो और मामले पूरे फेनॉमिना को मुकम्मल अंजाम तक पहुंचाने में मदद करेंगे

द वायरल फीवर अथवा टीवीएफ का मनोरंजन की दुनिया मे अलग मुकाम है। इसने भारतीयों के मनोरंजन को वैसे ही बदला है जैसे नेटफ्लिक्स ने एक जमाने में अमेरिकन मनोरंजन को प्रभावित किया था। इसके संस्थापक अरुणाभ कुमार पर टीवीएफ की महिला कर्मचारी ने एक ब्लॉग में शारीरिक शोषण के आरोप लगाए। कर्मचारी के प्रति संवेदनशील रुख अपनाने के बजाय टीवीएफ और अरुणाभ के साथी कलाकारों ने ऐसी किसी महिला को जानने से ही इंकार कर दिया। विवाद के तकरीबन तीन महीने बाद अरुणाभ ने 16 जून को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। कई रिपोर्टों के मुताबिक टीवीएफ में 25% की हिस्सेदारी रखने वाली फाइनेंस कंपनी टाइगर ग्लोबल ने पूरे प्रकरण के बाद कम्पनी की साख में गिरावट पाई। इसी कारणवश, अरुणाभ को बाहर का रास्ता दिखाया गया।

अरुणाभ कुमार

यह तभी सम्भव हो पाया जब पीड़िता अपने बयान पर अड़ी रही। पुलिस की कई दौर की पूछताछ के बावजूद मामला अभी भी लम्बित है।

इस कड़ी में, आखिरी नाम तहलका मैगज़ीन के पूर्व संपादक तरुण तेजपाल का है। तेजपाल सुर्खियों में तब आए जब उन्होंने रक्षा सौदों में दलाली को तहलका के जरिए जनता के सामने रखा।

2013 में, तहलका के सालाना कार्यक्रम ‘थिंक’ के दौरान तेजपाल का एक स्याह पक्ष दुनिया के सामने आया। उनके साथ काम करने वाली एक महिला सहयोगी ने उन पर आरोप लगाए कि तेजपाल ने एक पांच सितारा होटल की लिफ्ट में सेक्सुअल असॉल्ट किया। पत्रकारिता की दुनिया मे तेजपाल और तहलका की साख को जबर्दस्त बट्टा लगा।

तरुण तेजपाल

यह बात इसलिए भी गौर करने वाली है पीड़िता तेजपाल के दोस्त के बेटी थी और हरसंभव कोशिश की गई कि समझौते के जरिए मामले को दबा दिया जाए लेकिन पीड़िता के साहस के बाद ही इसी सितम्बर में गोआ की अदालत ने तेजपाल पर इंडियन पीनल कोड की 376 (2)F और 376(2) K के तहत बलात्कार और यौन उत्पीड़न का मुकदमा चलाने का आदेश दिया ।

सबूतों की प्रकृति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि तेजपाल को कम से दस सालों की सजा मिल सकती है।

ये सभी मामले बताते है कि महिलाएं काम की जगह पर हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज़ें उठा रही है, ये बता रही है लंबी और थका देनी वाली कानूनी प्रकियाएं उनकी हिम्मत को तोड़ नही सकती।

जाना है तारों से आगे, खड़े हैं कहां पर हम?

अमेरिका की ओर लौटे तो ये समझ मे आता है कि काम की जगह पर शोषण उनके समाज मे नया संवाद खड़ा कर रहा है। मशहूर टीवी एंकर मैट लौर की बर्खास्तगी के बाद महिलाओं के दबाव के कारण ही राजनीतिज्ञों को भी इसकी कीमत अदा करनी पड़ी है।

सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के दो सदस्यों को यौन उत्पीड़न के आरोपों के बाद उनकी कुर्सी से बेदखल हो पड़ा है।

अमेरिकी राज्य एरिज़ोना से सीनेटर ट्रेंट फ्रैंक्स ने अपनी महिला कर्मचारी को उनका बच्चा धारण के एवज में 5 मिलियन डॉलर की पेशकश की। जब कर्मचारी ने ऐसे किसी समझौते पर दस्तख़त करने से मना कर दिया तो उनके साथ ऑफिस में भेदभावपूर्ण व्यवहार कर उन्हें काम छोड़ने के लिए मजबूर किया गया। घटना के सामने आने बाद फ्रैंक्स ने 9 दिसंबर को अपना इस्तीफा दे दिया।

रॉय मूर

लेकिन सबसे बड़ी बानगी दूसरे रिपब्लिकन उम्मीदवार रॉय मूर के रूप में सामने आई। मूर को हाल ही हुए सीनेट चुनावों में लगभग विजयी माना जा रहा था। कारण भी स्पष्ट था। मूर रिपब्लिकन पार्टी के गढ़ कहे जाने वाले अलाबामा से चुनाव लड़ रहे थे। लेकिन चुनावी नतीजों ने सबको चौंका कर रख दिया।

डेमोक्रेटिक पार्टी के डाँग जोंस विजयी बनकर उभरे। जोंस की जीत यह दिखाती है कि अमेरीकी जनता यौन उत्पीड़न के आरोपी राजनीतिज्ञों को शासन करते नही देखना चाहती। लेकिन देश की जनता अभी भी न्यूयॉर्क के एक जज के फैसले के इंतज़ार में है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प टीवी की दुनिया के बड़े सितारे रह चुके है। लोकप्रिय रियल्टी शो अपरेंटिस में उन्होंने जज की भूमिका लम्बे अरसे तक निभाई थी। शो की ही पूर्व प्रतियोगी समर ज़ेर्वोस ने ट्रम्प पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। साथ ही, ज़ेर्वोस ने उनको झूठा कहने पर ट्रम्प पर मानहानि का मुकदमा भी ठोंका। ट्रम्प के कारनामों की एक बानगी राष्ट्रपति चुनावों के प्रचार देखने को मिल चुकी है।

एक देश का होने वाला राष्ट्रपति दूसरे राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार जेब बुश से यह कहता पाया गया कि महिलाएं अपने साथ शोषण होने देती है अगर दोषी लोकप्रिय और शक्तिशाली हो। कोर्ट को अभी फिलहाल तय करना है कि क्या राष्ट्रपति के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। फैसला चाहे जो भी हो, दुनिया भर की महिलाओं ने बताया है कि वे अपने सहकर्मी से लेकर दुनिया के सबसे शक्तिशाली इंसान के खिलाफ खड़ा होना जान गई है और यही उनकी जीत है।

साथी हाथ बढ़ाना; एक अकेला थक जायेगा, मिलकर बोझ उठाना

इस साल #metoo कैम्पेन को टाइम्स मैग्जीन ने पर्सन ऑफ द इयर चुना

तमाम सफलताओं के बाद कई पैरोकार काम के जगह पर शोषण के खिलाफ लड़ाई को महिलाओं की लड़ाई के रूप में देख रहे है। दरअसल, ये इस पूरी लड़ाई पर प्रश्न चिन्ह लगाने जैसा है।

इतिहास हमें बताता है कि न्याय की लड़ाइयां तभी सफल हो पाई है जब समाज के हर तबके ने इस लड़ाई में सहयोग दिया। स्लेवरी काले लोगों की लड़ाई जरूर थी, लेकिन इसे लड़ने वाला एक अंग्रेज राष्ट्रपति था जिसे दुनिया ने अब्राहम लिंकन के नाम से जाना।

LGBT समुदाय की लड़ाई दुनिया भर में सामान्य लोग भी लड़ रहे है। इसलिए इस पूरी लड़ाई को महिलाओं की लड़ाई वैचारिक बेईमानी से ज्यादा कुछ नही होगा।

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कठफोड़वा.कॉम के लिए यह स्टोरी रूथ प्रॉर ने की है. रूथ प्रॉर ने अपना बचपन तमाम दुश्वारियों के बीच गुज़ारा और अब अपनी जवानी में वह उन दुश्वारियों को आने वाली नस्लों के लिये खत्म करने में जुटे हुये हैं.

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