एक तस्वीर दिल्ली की हवाओं की है और दूसरी प्रधानमंत्री के फिटनेस चैलेन्ज की . एक तस्वीर दिल्ली की अंधड़ बनती सड़कों की है और दूसरी उस हरी घास के मैदान की ,जहां प्रधानमंत्री अपनी सुबह की शुरुआत को सुंदर बना रहे हैं. एक तस्वीर उन झुग्गियों की है जहाँ कदम रखने भर की जगह नहीं होती और दूसरी उस विशाल मैदान की है जो प्रधानमन्त्री द्वारा योगा के लिए इस्तेमाल की जाती है. एक तस्वीर गरीबी और अमीरी के बीच बढ़ती हुई असमानता की खाई की है और दूसरी उस खाई से निकले पत्थरों की है जिसपर लेटकर प्रधानमंत्री योगा कर रहे हैं. एक तस्वीर आम जनता के यथार्थ की है और दूसरी यथार्थ में मौजूद अश्लीलता की, जिसका प्रधानमन्त्री बड़ी खूबसूरती के साथ प्रतिनिधत्व कर रहे हैं. अगर आपकी नजरें पारखी हैं तो आप समझ पायेंगे कि जिस पत्थर पर प्रधानमन्त्री लेटे हुए हैं, उस पत्थर की कीमत तकरीबन 1034 करोड़ रूपये है, जिसके चुनावी खर्च पर भाजपा का मनमोहक नेता तैयार किया जाता है.

आप यह सोच रहे हैं होंगे कि मैं प्रधानमंत्री के फिटनेस प्रदर्शन के माहौल को अश्लीलता क्यों कह रहा हूँ? आप शायद यह भी सोच रहे होंगे कि प्रधानमंत्री के प्रति मैं अपनी खुन्नस निकाल रहा हूँ. तो आपकी इस सोच के लिए मेरे पास दो जवाब हैं – पहला है भावुक कारण कि जिस दिन प्रधानमंत्री का फिटनेस वीडिओ वायरल हुआ, उस दिन दिल्ली की हवाएं इतनी अनफिट महसूस हुई कि ऐसा लगा कि मेरे गरिमापूर्ण जीवन जीने के मूल अधिकार पर हवाओं की चुभन बड़ा तीखा हमला कर रही है और सरकारें एवं हर किस्म की जिम्मेदार संस्थाएं इससे बिल्कुल बेखबर अपनी जिंदगी हरे घास के बड़े से मैदान में मनमोहक अंदाज़ में बिताते हुए फिटनेस चैलेंज के नाम पर उसका प्रदर्शन भी कर रही हैं. दूसरा है तार्किक कारण कि प्रधानमंत्री का पद, विधायिका और कार्यपालिका का सबसे शीर्ष पद है जबकि विधायिका और कार्यपालिका के सोचने और काम करने के तरीके में कहीं भी कुछ ऐसा नहीं है जिसकी वजह से भारत के किसी भी आम व्यक्ति को आज या आने वाले समय में अपने लिए वह माहौल मिल सके, जहाँ प्रधानमंत्री फिटनेस का खेल-खेल रहें हैं. यह एक ऐसी हकीकत है जिसे हिंदी भाषा में खुल्लम-खुला अश्लीलता का सबसे शानदार उदाहरण कहा जा सकता है. अगर मुझे ‘प्रोपगैंडा ऑफ़ द डिकेड’ के लिए कुछ मुद्दों को चुनने के लिए कहा जाएगा तो मैं प्रधानमंत्री के फिटनेस चैलेंज के इस माहौल को जरुर चुनूँगा.

मौसम बड़ी तेज़ी से भविष्य के भयावह आकलन को रोज़ दर्शा रहा है लेकिन हमारे आलाकमानों को इसकी कोई चिंता नहीं है. आम जनमानस तो बहुत दूर की बात है हमारे मीडिया के विमर्श भी इसे गंभीरता की आवाज़ बनकर उभरने का मौका नहीं देते. सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की डायरेक्टर सुनीता नारायण कहती हैं कि मौसम की सुर्खियाँ अक्सर खबरों की भीड़ में गुम हो जाती हैं. मौसम की खबरों से वंचित रहने के तीन कारण है. पहला है मौसम का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक अपने चारों तरफ की दुनिया से पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं. अनिश्चितता के कारण वे जोखिम नहीं लेना चाहते. हमारे पास उन आवाजों को सुनने का कोई माध्यम नहीं है, जो विज्ञान द्वारा स्थापित नहीं है. इस वजह से परिवर्तन के सबसे बड़े पीड़ित किसानों की अनदेखी हो रही है. यह भी तथ्य है कि जलवायु परिवर्तन जैसे शब्दों से वे अनजान हैं. साधारण शब्दों में कहें तो उनके लिए मौसम बदल रहा है और उनपर इनकी मार पड़ रही है. तीसरा, मौसम की सुर्खियाँ अक्सर इसलिए भी सुनाई नहीं देती क्योंकि इसका इसका शोर तभी मचता है जब मध्यम वर्ग और शहर इससे प्रभावित होते हैं. खबरों में आने के लिए किसानों को या तो मरना पड़ता है या कुछ गंभीर कदम उठाने पड़ते हैं. इस तरह के घटनाक्रम रोज़मर्रा का हिस्सा हैं लेकिन यह खबरें दूरदराज़ के क्षेत्रों या और लोगों से जुड़ी होती हैं इसलिए उनकी खबरें हमारी खबरें नहीं बन पाती है.

इस तरह से अगर सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की बातों पर गौर किया जाए तो प्रधानमन्त्री के फिटनेस चैलेंज का माहौल और उसी दिन दिल्ली की हवाओं की चुभन दोनों को जोड़कर भारत के विकास मॉडल में सततता या सस्टेनबिलिटी का सवाल खड़ा किया जा सकता था? प्रधानमंत्री के फिटनेस चैलेंज वाले हरे घास के मैदान और शहरों से नदारद होती हुई हरियाली के विरोधाभास पर भारतीय डेवलपमेंट मॉडल में शहरीकरण के मॉडल पर एक बार फिर से विचार किया जा सकता था. लेकिन सरकारों ने प्रोपगैंडा और हमने सोशल मीडिया पर मीम्स बनाने के अलावा और कुछ नहीं किया. यह हमारी नागरिक ज़िम्मेदारी की तरफ से बुझती हुई रचनात्मक कारवाई की भी निशानी है, जिसमें हम सही समय पर सही सवाल पूछने के अवसर होते हुए भी उसे गवांते जा रहे हैं.

केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रियल टाइम मोनिटरिंग स्टेशनों से बनी रिपोर्ट पर नज़र डालने से विभिन्न प्रदूषकों के चिंताजनक स्तर को महसूस किया जा सकता है. हवाओं में पार्टिकुलेट मैटर 2.5 और पार्टिकुलेट मैटर 10 में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड के मिलने से गर्मियों की स्थिति भयावह हो जाती है. 13 जून, जिस दिन प्रधानमन्त्री जी फिटनेस चैलेंज के माहौल से सबको पहली नज़र में मंत्र-मुग्ध कर रहे थे, उस दिन दिल्ली की हवाओं में पार्टिकुलेट मैटर 10 का स्तर भयावह स्तर पार कर चूका था. तकरीबन प्रति घन मीटर हवा में 840 माइक्रोग्राम पार्टिकुलेट मैटर. इसका मतलब यह हुआ कि हवाओं में 10 माइक्रोन के व्यास से अधिक धूललकणों की मौजूदगी सबसे अधिक गंभीर स्तर को पार कर चुकी थी. ऐसी स्थिति में सेहतमंद लोग भी साँस की बिमारी का शिकार हो जाते हैं और जो पहले से साँस और ह्रदय की बीमारियों से परेशान है, वे मरने की हालत तक भी पहुँच जाते हैं. हल्का शारीरिक श्रम भी शरीर को गंभीर क्षति पहुंचाकर चला जाता है. दिल्ली के ऐसे माहौल में प्रधानमन्त्री का फिटनेस चैलेंज किसी राज्य की तरफ से अपने नागरिकों की ओर से मुंह मोड़ लेने जैसी अनफिट बात लगती है. बदलते हुए मौसम का आकलन करते समय भारत के डेवलपमेंट मॉडल पर सोचने पहुंची दिमाग की छोटी से भी नश भी प्रधानमंत्री के फिटनेस चैलेंज को अश्लीलता की तरह महसूस करने पर मजबूर हो जाती है.

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