ग्रीक पौराणिक कथाओं का एक किरदार है सिसिफस. जिसका भारत में एक साथ चुनाव कराने से क्या संबंध है वो आपको लेख के आखिरी में पता चलेगा. सबसे पहले समझिये कि दरअसल मामला क्या है? चूंकि भाषणों से पैदा हुए अधिकांश सवालों के जवाब तार्किक दुनिया की परिधि पर आने से पहले ही समाप्त हो जाते हैं. लेकिन कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो भाषणकर्ता की हैसियत का सहारा पाकर तार्किक दुनिया से लेकर हमारे आम जीवन में बहस का मुद्दा बन जाते हैं. ऐसी ही एक बहस का मुद्दा है ‘एक साथ चुनाव करवाना’.

लेकिन यह पान दुकान की जुगाली पर भी ढंग से डिसकस हो ये इस लेख का प्रयास है. अब चूंकि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अभिभाषणों में इस मुद्दे की मौजूदगी ने इसे इस समय राजव्यवस्था से जुड़े सवालों के बीच सबसे अहम बन दिया है. इसकी अहमियत अब प्रधानमन्त्री के ‘मन की बात’ में सुनाई देने लगी है. तो इस लेख के माध्यम से हम इस मुद्दे के तमाम पक्षों के विश्लेषण का प्रयास कर रहे हैं.

आदर्शतः जब हम एक साथ चुनाव करवाने जैसी शब्दावली का उपयोग करते हैं तो इससे आभास होता है कि केंद्र,राज्य और पंचायत के चुनाव एक साथ करवाए जाएँ. परन्तु यह बात केवल आदर्श और शाब्दिक रूप से ही सही लगती है. ऐसा इसलिए है क्योंकि पंचायतें राज्यों की देख-रेख के अधीन आती हैं. राज्य चुनाव आयोग के निर्देशन और नियंत्रण में पंचायतों के चुनाव करवाए जाते हैं.

पंचायतों की संरचना में निहित स्तरों की वजह से इनके सदस्यों की संख्या बहुत अधिक होती है. यह लगभग असंभव है की एक साथ चुनाव करवाने की कोशिश में पंचायतों से सम्बंधित चुनाव भी शामिल किये जा सकेंगे. मतलब पंचायतों की संरचना प्रधानमन्त्री के एक साथ चुनाव के मन की बात खुले तौर पर नाफ़रमानी कर रही है और कोई इन्हें देशद्रोही भी नहीं कह सकता हैं. (व्यंग्य)

भारत में चुनावों का इतिहास

अब जरा भारतीय राज्य में चुनावों के इतिहास की तरफ चलते हैं. आज़ादी के बाद केंद्र और राज्य विधानमंडलों के शुरूआती चुनाव एक साथ हुए. चुनावी आयोजन की यह कोशिश 1951 से लेकर 1967 तक सफल रही. पहले तीन चुनावों में एक ही पार्टी का वर्चस्व रहा. कांग्रेस ने हर जगह अपने झंडे गाड़े. लेकिन 1967 में कुछ राज्यों ने कांग्रेस पर भरोसा जताना कम कर दिया और अस्थिर गठबन्धनों को मत दिया.

1970 में जब चौथी लोकसभा समयपूर्व ही विघटित हो गयी तो एक साथ चुनाव आयोजित होने वाली यह व्यवस्था बाधित हो गयी. एक साथ चुनाव आयोजन में अवरोध अचानक नहीं आया बल्कि इसके पीछे बदलती हुई राजनीतिक पृष्ठभूमियाँ और रणनीतियां ज़िम्मेदार रहीं. केंद्र की सत्ता क्षेत्रीय स्तर के नेताओं की मजबूती से डर रही थी कि कहीं क्षेत्रीय ताकतों की मजबूती उनके एकछत्र राज में सेंध लगाना शुरू न कर दें.

राजनीतिक लिहाज से इसका सबसे सरल समाधान यह दिखा की केंद्र और राज्य के चुनाव को अलग-अलग कर दिया जाए. यह राजनीतिक रणनीति काम कर गई. इंदिरा गांधी ने इसी राजनीतिक रणनीति से कांग्रेस के मजबूत नेताओं के पर कतर दिए और दबदबे के साथ उभर कर सामने आयीं. 1970 के बाद बनी अधिकांश सरकारों की चारित्रिक विशेषता गठबंधन वाली हो गयी, सरकारें अपना पूरा कार्यकाल पूरा करने असफल रहनें लगीं.

इसलिए चुनावों के आयोजन की अवधि पांच वर्षों की बजाए प्रत्येक वर्ष में बदलने लगी. भारत का चुनाव आयोग हर वर्ष लगभग 5-7 राज्यों के चुनाव करवाने में व्यस्त रहने लगा.

उस समय की क्षेत्रीय ताकतें आज अपने आप में राजनीतिक मतों के लिहाज से महत्वपूर्ण ताकतें बन चुकी हैं. क्षेत्रवाद भारतीय राजनीति की हकीकत बन चुका है. आज हालत यह है कि केंद्र की कोई भी सत्ता इन ताकतों को अपने साथ समायोजित किये बिना सरकार बनाने में नाकामयाब रहती है.

इस संदर्भ में अब थोडा संविधान के शब्दों को समझने की कोशिश करते हैं. विधानमंडलों का कार्यकाल पूरा होने पर अथवा समय से पहले भंग हो जाने पर नये सदस्यों की बहाली के लिए कब चुनाव करवाए जायेंगे, इसका निर्धारण संविधान में किया गया है. जिसके अनुसार विधानमंडल के कार्यकाल की सामान्य अवधि समाप्त होने के छह महीने पहले से चुनाव आयोग को चुनाव संपन्न करवाने की प्रक्रिया शुरू कर देनी चाहिए. विधानमंडल भंग हो जाने की स्थिति में नये सदस्यों के चुनाव के लिए भी छः महीने की समय सीमा निर्धारित की गयी है.

संविधान के अनुच्छेद 83 में लोकसभा और अनुच्छेद 172(1) में राज्य विधानसभा के लिए कार्यकाल की अवधि निर्धारित की गयी है. जिसके अनुसार अगर समय से पहले विधानमंडल भंग नहीं होता है तो विधानमंडल की कार्यकाल की अवधि पाँच साल निर्धारित की गयी है. संविधान के अनुच्छेद 83(2) में आपातकाल के समय से जुड़े लोकसभा के कार्यकाल को उपबंधित किया गया है. इसके अनुसार लोकसभा के कार्यकाल की अवधि की समाप्ति के समय अगर आपातकाल लागू है तब कार्यकाल को एक वर्ष और बढ़ाया जा सकता है. आपातकाल की घोषण की समाप्ति के छह महीनों के अन्दर लोकसभा चुनाव को संपन्न करा लेना जरूरी है. आपातकाल से सम्बंधित ठीक ऐसा ही प्रावधान राज्यों के विधानमंडल के सम्बन्ध में संविधान के अनुच्छेद 172(1) में उपबंधित किया गया है.

समय से पहले विधानमंडलों के भंग हो जाने के उदाहरण बार-बार सामने आये हैं. संविधान के अनुच्छेद 82(2) के अनुसार राष्ट्रपति के आदेश पर लोकसभा को भंग किया जा सकता है और अनुच्छेद 174(2) के अनुसार राज्य के गवर्नर के आदेश पर राज्य की विधानसभा को भंग किया जा सकता है. समय से पहले राज्यों की विधानसभा भंग हो जाने की व्याख्या में अनुच्छेद 356 अर्थात राष्ट्रपति शासन से जुड़े प्रावधान भी प्रासंगिक हैं.

राष्ट्रपति शासन के समय राष्ट्रपति के आदेश पर समय से पहले भी राज्य की विधानसभा भंग की जा सकती है. जब विधानसभा के सदस्यों और राज्य के राज्यपालों ने राष्ट्रपति की सहमति के सहारे इस प्रावधान का गलत तरीके से फायदा उठाना शुरू कर दिया तो सुप्रीम कोर्ट ने 1985 के बोम्मई बनाम भारत सरकार के मामलें में इस सम्बन्ध में निर्णय दिए.

इस निर्णय में राष्ट्रपति शासन के समय राज्य की विधानसभा को भंग करने से सम्बंधित कुछ नियम और दिशानिर्देश भी निर्धारित किये गये. जिसके अनुसार किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की विधानसभा को भंग करने के लिए संसद के दोनों सदनों की सहमति की जरूरत होगी और राष्ट्रपति शासन की मंशा की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है. राष्ट्रपति, विधानसभा को निलंबन की स्थिति में रख सकता है लेकिन विधानसभा को भंग करने के लिए उसे संसद के दोनों सदनों की सहमति लेनी जरूरी है. अगर न्यायिक समीक्षा में राष्ट्रपति की मंशा दुर्भावनापूर्ण पायी गयी तो राष्ट्रपति शासन को खारिज किया जा सकता है और विधानसभा को पुनः स्थापित किया जा सकता है. यह नियम होने के बावजूद कई बार विधानसभा को समय से पहले भंग किया गया.

संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार केन्द्रीय मंत्रिमंडल लोकसभा के सदस्यों के प्रति सामूहिक रूप से उतरदायी होती है. बिल्कुल ऐसा ही प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 164(2) में राज्यों के मंत्रिमंडल के लिए है जहां पर उनकी सामूहिक ज़िम्मेदारी विधानसभा के सदस्यों के प्रति होती है. ऐसी स्थिति में विधानमंडल के सदस्य कभी भी मंत्रिमंडल के सदस्यों के प्रति अविश्वास प्रस्ताव पारित कर विधानमंडल को भंग कर सकते हैं. इस प्रकार हम देख सकते हैं कि विधानमंडलों के पांच साल के कार्यकाल की अवधि के पहले ही उनके भंग हो जाने की कई प्रकार की स्थितियां हैं जिसे संविधान भी स्वीकार करता है. उपरोक्त विमर्श के आधार पर हमें एक तर्क यहीं पर समझ लेना चाहिए जिसके अनुसार एक साथ चुनाव करवाने की कोशिश को अंजाम देना मौजूदा  संवैधानिक प्रावधानों के लिहाज से असंभव लगता है.

मान लीजिये कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव 2019 में हो जाएँ. मान लीजिये की हम कोई रास्ता निकालकर सभी राज्यों की विधानसभा को भंग करवाकर 2019 में एक साथ चुनाव करवा लेते हैं. अब अगला चुनाव पांच साल बाद 2024 में होगा. अब मान लीजिये की 2020 में किसी राज्य की सरकार बहुमत खो बैठती है.ऐसे में क्या होगा? जबकि अगला चुनाव 4 साल दूर है.

चलिए मान लेते है की एक साथ चुनाव करवाने की व्यवस्था है इसलिए विधानसभा भंग नहीं की जाएगी वह चलती रहेगी. फिर क्या होगा? हो सकता है सरकार बनी रहे. लेकिन सरकार बनी रहने से फायदा क्या होगा, जब उसके पास बहुमत नहीं है. वह न कानून पास करवा पाएगी, न ही बजट पास करवा पाएगी. सारा तामझाम होगा लेकिन वही नहीं होगा जिसके लिए विधायन के सदस्यों को चुना जाता है.

कहने का मतलब यह है कि हमारे संविधान की विधायन बनाने की संरचना कुछ ऐसी है जो एक साथ चुनाव करवाने की इजाज़त देने के खिलाफ असम्भव किस्म के अडंगे खड़ी करती है.

एक साथ चुनाव क्यों ?

भारत का चुनाव आयोग लगभग 5-7 राज्यों के चुनाव में हर साल व्यस्त रहता है. चुनाव आयोग के साथ कई स्तर पर केन्द्रीय और राज्य कर्मचारियों को चुनाव आयोजन के अभियान में लगया जाता है. सुरक्षा के लिहाज से एक लम्बी अवधि तक चुनाव आयोजन के स्थलों पर सुरक्षा बलों की तैनाती की जाती है. चुनाव को लेकर हर साल किया गया यह सारा तामझाम सरकारी खर्चे को कई गुना बढ़ा देता है.

चुनाव आयोजान की तिथि के घोषणा के दिन से लेकर पूरी चुनाव प्रक्रिया सम्पन्न हो जाने तक राज्य में कार्यरत कार्यपालिका और विधायिका को आचार संहिता का पालन करना पड़ता है. इन आचार संहिता के तहत कुछ कामों को करने और कुछ कामों को न करने के निर्देश दिए जाते हैं, जिनका पालन करना एक निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया संपन्न करवाने के लिए जरूरी होता है.

आचार संहिता के सम्बन्ध में संसदीय स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट का मानना है की आचार संहिता के लागू हो जाने से केंद्र और राज्यों की पूरी विकास नीतियाँ ठहर जाती है. इससे सामान्य प्रशासन को लकवा मार जाता है. एक लम्बी अवधि तक आचार संहिता के लागू रहने की वजह से प्रशासनिक मुर्दापन जैसी स्थिति पैदा हो जाती है.

इसलिए संसदीय स्थायी समिति का भी मानना है कि एक साथ चुनाव करवाना एक अच्छा विचार है. इससे सार्वजनिक वित्त की बचत होगी, राजनीतिक दलों को भी राहत मिलेगी जो हमेशा चुनावी अभियान की मुद्रा में रहते हैं. यह राजनितिक पार्टियों को अवसर देगा कि वे नीति निर्माण व शासन पर अधिक ध्यान केन्द्रित करें. एक साथ चुनाव करवाने से जुड़े मत इन्हीं तर्कों के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं.

एक साथ चुनाव क्यों नहीं ?

असली सवाल यह नहीं होना चाहिए की हम क्या चाहते हैं बल्कि यह होना चाहिए की हमारे देश की परिस्थिति के मुताबिक़ व्यवहारिक क्या हैं? व्यवहारिक स्तर पर यह कत्तई संभव नहीं है की भारत जैसा विविधता पूर्ण समाज एक साथ चुनाव करवाने की प्रक्रिया अपनाकर अपनी प्रशानिक संरचना की आधारभूत प्रकृति संघवाद को त्याग देने की कोशिश करे.

चुनाव आयोग ने प्रत्येक प्रत्याशी और दल द्वारा खर्च की जाने वाली धन राशि को तय कर देने सम्बंधित नियम बनाये है. इसके बावजूद भी इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि प्रत्याशी, राजनीतिक दल और सरकार द्वारा चुनावों में अकूत धनराशी खर्च की जाती है. अगर एक साथ चुनाव करवाने की वजह से चुनावों की संख्या कम होगी तो इस खर्चे में कमी भी आ सकती है. लेकिन चुनाव लोकतंत्र के जीवन रक्त है.

केवल चुनाव की लागत कम हो जाने की वजह से हम एक साथ चुनाव करवाने को सही मान रहे हैं तो यह बिलकुल गलत है. इसका मतलब यह हुआ की हम अपने संवैधानिक लोकतान्त्रिक सिद्धांतों के ऊपर मौद्रिक लागत को तरजीह दे रहे हैं. और अगर मौद्रिक लागत को ही तरजीह देना है तो पांच साल की समयसीमा क्यों, इसे 10 या 15 साल भी किया जा सकता है. लेकिन इसे इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि इसके केवल बुरे परिणाम ही होंगे.

आचार संहिता के लागू हो जाने की वजह से प्रशासनिक काम और विकास की नीतियाँ रुक जाती है. यह तर्क भी एक हद तक सही है की अमूमन 2 महीने की आचार संहिता की अवधि की वजह से शासन के कामों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. लेकिन इसका समाधान एक साथ चुनाव करवाना नहीं हो सकता. इसके लिए आचार संहिता की अवधि में ही रास्ता निकाला जा सकता है. यह किया जा सकता है की चुनाव की तिथि की घोषण होने के बजाए चुनाव की तिथि को अधिसूचित कर दिए जाने के दिन से आचार संहिता लागू किया जाए. अथवा आचार संहिता की समयसीमा को लेकर कोई अन्य रास्ता निकला जा सकता है.

यह भी नहीं भूलना चाहिए की आचार संहिता में एक प्रावधान है की अगर चुनाव में भाग लेने वाले अन्य दलों की चुनावी दावेदारी किसी विकास की नीति या शासन की कारवाई से प्रभावित नहीं हो सकती है तो चुनाव आयोग की अनुमति के आधार पर कोई विकास की नीति कानून या नियम बनाये जा सकते हैं. असलियत तो यह है की चुनावी आचार संहिता केवल उसी राज्य में लागू होती है जहाँ चुनाव होने वाले हैं इससे पूरे देश अथवा अन्य राज्यों के प्रशासन पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. अभी हाल का ही उदाहरण है की पांच राज्यों के चुनावों से पहले नोटबंदी जैसी बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई की गयी थी.

कभी कभार ‘एक देश के लिए एक चुनाव’ जैसे नारे भी सुनने को मिलते हैं. नारे लगाने वाले यह भूल जाते हैं की भारत 29 राज्यों से मिलकर बने हुए सामाजिक भूगोल का नाम है. जहां हर राज्य की अपनी अलग परेशानियाँ है और उन्हें हल करने की अलग प्राथमिकतायें.

भारत की गहन विविधता की स्थिति को स्वीकार करते हुए भारत का संविधान संघवाद की अवधारण को भारतीय राज्यों को एक-दूसरे के साथ समायोजित करने के लिए आधारभूत मनाता है. इसलिए एक साथ चुनाव करवाने का मतलब यह होगा की चुनाव के नाम पर एक लोकतान्त्रिक प्रक्रिया के सहारे समझदार मत हासिल करने की बजाए हम जनमत संग्रह करवा रहे हैं. चुनावों की ऐसी स्थिति उस लोकतान्त्रिक परिपक्वता का कबाड़ा निकाल देगी जिसे हमने आज़ादी के बाद से लेकर अब तक के दौर में हासिल किया है.

एक साथ चुनाव करवाने में अभी बहुत सारे किन्तु परन्तु शामिल है. मौजूदा संवैधानिक स्थिति संविधान में बिना आधारभूत संशोधन के कहीं से भी यह इ़जाज़त नहीं देती की हम एक साथ चुनाव करवाने की जुमलेनुमा बहसों से हकीकतनुमा जवाब हासिल कर पाए. भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक की जमीनी हकीकत एक दूसरे से बिलकुल अलग है. विविधता में एकता जैसी भावनाओं को संविधान की संघवाद जैसी विशेषताएं मूर्त रूप देती हैं.

राज्य और केंद्र की दार्शनिक समझ भी यह कहती है कि प्रशासन के लिहाज से दोनों की अलग-अलग किस्म की चुनौतियाँ होती हैं जो अलग-अलग भौगोलिक परिदृश्य के आधार पर बदलती रहती हैं. इसलिए शासकों की अपेक्षाकृत सही समूह के चुनाव के लिए यह जरूरी है कि चुनावी प्रक्रियाएं अलग-अलग मुद्दों के साथ अलग-अलग समय पर खुद को अभिव्यक्त करें. इस अभिव्यक्ति के आधार पर आम जनता को अलग-अलग समय पर अपने शासकों को चुनने का मौका मिले. बाकी भविष्य का रुख क्या हो सकता है इसके बारे में कोई नहीं बता सकता.

इस लेख को लिखने के दौरान बार-बार मुझे यूनानी पौराणिक किरदार सिसिफस की याद आती रही. क्योंकि सारे देश में एक साथ चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की हालत भी कमोबेश सिसिफस जैसी हो जायेगी. पौराणिक कथा के अनुसार सिसिफस, सिफायरा नाम के राज्य पर राज करता था, देवताओं ने उसे एक गोल पत्थर को खाई से पहाड़ पर ले जाने की सजा दी. सिसिफस बार-बार उस गोल पत्थर को महीनों की मेहनत से पहाड़ पर चढ़ाता पर वह ऊपर से लुढ़कता हुआ फिर खाई में आ गिरता.

लगता है ऐसे प्रयास में अनंत तक चुनाव आयोग भी अपने इस गोलपत्थर नुमा प्रयास को ‘एक साथ चुनावों’ के पहाड़ पर चढ़ाने का प्रयास करता रहेगा.

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