लोकतांत्रिक राजनीति कई मायनों में खास है. एक खासियत ये भी है कि काफी वक्त से दबे पर जरूरी सवालों को नागरिक समाज संघर्ष के जरिए उभार सकता है. राजनीति उन सवालों की सुनवाई करती है. और सत्ता में बैठा, वाक्पटु नेता लुभावने जुमलों के जरिए सवालों से बच निकलने की कोशिश करता है. ताकि अगर कोई हल न भी निकाला जा सके तो जनता के पास संतुष्टि के लिये लुभावना जुमला तो रहे ही. बड़ी संख्या में विदर्भ और बुंदेलखंड के किसानों की आत्महत्या के बीच ‘किसानों की आय’ ऐसा ही एक वर्जित सवाल बनी हुई थी.

कारण जाहिर है कि लोग सत्ता में आते ही ये भूलकर की वो लोकतांत्रिक सरकार के प्रतिनिधि हैं, राज करने की मानसिकता ओढ़ लेते हैं तो हर सवाल का जवाब देना भी जरूरी नहीं समझते. पर भारत के संदर्भ में बात करें तो इन सत्तानशीनों पर नागरिक समाज ने संघर्षों की शानदार यात्रा के जरिए पिछले कुछ दिनों में दबाव बनाया था. मझे हुये नेता ने इन सुगबुगाहटों से निपटने के लिये तुरंत ही तिकड़म भिड़ाया. विशेषज्ञों से बात की और एक ब्रह्मास्त्र मांगा जिससे बात भी बन जाये और कुछ करना भी न पड़े. कभी इंदिरा गांधी को ये हथियार ‘गरीबी हटाओ’ के नारे में मिला था. वर्तमान प्रधानमंत्री को ये जवाब ‘किसानों की दोगुनी आय’ के जुमले में मिला.

इसे यहां जुमला संबोधित करने के पीछे कारण हैं. हाल ही में नीति आयोग ने अपनी तीन वर्षीय एक्शन एजेंडा पुस्तक में एक अध्याय बनाया है, जिसका नाम ही ‘किसानों की दोगुनी आय’ है. जिसे पढ़ने पर हमें पता चलता है कि नीति आयोग बस इस अध्याय में शब्दों की जुगाली कर रहा है. इसमें किसी रोडमैप की कोई बात नहीं की गई है.

ये चैप्टर सिविल सेवा के विद्यार्थियों के लिये नोट्स बनाने के काम तो आ सकता है. पर शायद ही कोई महापुरुष ये बता सके कि इन सुंदर छपाई वाले अक्षरों से किसानों की आय कैसे दोगुनी होगी?

इसे पढ़ते हुये हमपर जो गुजरी है, वो सुनिये. जानिये कैसे सरकारी मठाधीशों ने जुमले की शानदार परिकल्पना रची है.

अध्याय की शुरुआत में कहा गया है कि भारत की 46 फीसदी जनसंख्या कृषि पर निर्भर है. हाल के कुछ वर्षों में लगातार दो प्राकृतिक आपदायें झेलने से कृषि की हालत चरमरा गयी है. और प्रधानमंत्री का कहना है कि हम 2015-16 के मुकाबले 2022-23 तक किसानों की आय को दोगुना कर देंगे. प्रधानमंत्री के इस विज़न पर नीति आयोग नतमस्तक है. यहां कोई आलोचनात्मक समीक्षा नहीं कि इसके लिये हम कितने तैयार हैं?

इसलिये इसके लिये नीति आयोग ने किसानी से जुड़े सभी वेरिएबल्स में तेजी से विकास करने की परिकल्पना रिपोर्ट में रची है. जिससे प्रधानमन्त्री के सपने को साकार किया जा सके. बस इतना ही. यहां पर प्रधानमंत्री का सपना खत्म हो जाता है. और इस रिपोर्ट से सिर ऊपर उठाते ही मुझे दिखता है, कृषक असंतोष के सच का वो अपार बंजर विस्तार, उनके बच्चों का कुपोषण और उनकी गरीबी जो दिल दहला देते हैं. नीति आयोग के इन सुंदर शब्दों की ऐसी कहानी में समस्याएं है, समाधान है लेकिन ऐसी कोई भी किरण नहीं है क्योंकि सारे ही समाधान हवाई हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं है. रिपोर्ट में कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे यह एहसास हो कि प्रधानमंत्री की किसानों को दोगुनी आय देने वाली बात वायदा थी, न की जुमला.

नीति आयोग पहले ही स्वीकार कर लेता है की कृषि राज्य सूची का विषय है. केंद्र केवल किसान संबंधित योजनाओं के सहारे कृषि में सहयोगी बन सकता है. मतलब जो भी करना है केवल राज्य को करना है. यहां हम आम जनों के लिए समझने वाली बात यह है कि जैसे ही नियमों का पुलिंदा खुला राजनीति की लफ़्फ़ज़ियां चरमरा गयीं.

नीति आयोग का मानना है की केवल चार क्षेत्रों कृषि उत्पाद, उनकी मार्केटिंग की नीति, न्यूनतम समर्थन मूल्य, काश्तकारी कानून और लैंड रिकॉर्ड से जुड़े मामलों में ही जल्दी से जल्दी सुधार करने की जरूरत है. हमें समझना ये भी चाहिये कि नीति-निर्माण की दुनिया में जल्दी से जल्दी का मतलब कम से कम 5 साल होता है. कहने का मतलब यह है की किसानी से जुड़े केवल इन 4 क्षेत्रों में सरकार अपना कामकाज तेज़ कर किसानों के लिए दोगुनी आय हासिल करने में कामयाबी का सपना देख रही है. पर वहीं जब कृषि नीतियों के स्तर पर ही किसान की इतनी अनदेखी की गई है, तब दोगुनी आय की बात ‘जुमला’ क्यों न कही जाए.

तस्वीर साभार

इसे यूं समझिये, MSP की बात करते ही केवल किसान की उपज मायने की रह जाती है. काश्तकारी कानून से भूमि का विखंडन और जिला प्रशासन जुड़े हैं. मार्केट कमेटियों से स्थानीय मंडियां जुड़ी हैं और लैंड रिकॉर्ड से स्वामित्व संबधी परेशानियां और बैंकों की बोरियत देने वाली शर्त जुड़ी हैं.

कुल मिला-जुला कर जहां तेज़ी से काम करना है, वहां किसान की बजाए केवल किसान के उत्पाद पर बात हो रही है. यानि सारी बातों के केंद्र में यह बात आ रही है कि किसान की उपज अच्छी है या नहीं? और ‘वो कैसे बढ़े?’ इसपर सरकार की चुप्पी है.

नीति आयोग की बेपरवाह रिपोर्ट में किसान होने की वजह से मिलने वाली परेशानियों का कोई निदान नहीं है. पूरे भारत के किसान केवल ‘किसान’ संबोधन से पुकारे जाते हैं. उनके काम अलग हैं, कामकाज का तरीका अलग है, समस्याएं अलग हैं और उनका समाधान भी अलग है. सबसे बड़ी परेशानी यह है की किसान कैसे मान ले की वह पैदवार कर पाएगा. प्रकृति जो उसकी नियति पर निर्भर करती है, उसके साथ अच्छा बरताव ही करेगी. कौन उसे ये भरोसा दे सकता है कि अन्नदाता होने के चलते वह निसंकोच रह सकता है और उसे अपनी उपज का बेहतर मेहनताना मिलेगा ही. इन सारे प्रश्नों के जवाब में नीति आयोग की चुप्पी है.

हालांकि इसके अलावा किसानों की आय दोगुनी करने के लिए नीति आयोग ने APMC (ऐग्रिकल्चरल प्रोड्यूस मार्केटिंग कमेटी) act, MSP, फसल बीमा योजना आदि में सुधार जैसे कुछ मुद्दों की बात की है. लेकिन इन मुद्दों के सुधार से जुड़ी हर अंतिम लाइन इस बात की ओर इशारा करती हैं की इनके सुधार में अभी दशकों लगेंगे. Msp अभी भी कुल उत्पादित की जा रही फसलों के 10 फीसदी से भी कम फसलों पर मिलता है और इसकी पहुंच अभी भी भारत के बहुत कम हिस्सों में हैं. इसके तहत सरकारी खरीद की अनिवार्यता है मतलब सरकार चाहकर भी फसलों को खरीदने से मना नहीं कर सकती.

पर किसानों के प्रति घनघोर अन्याय करते हुये इस रिपोर्ट में MSP की नीति को अन्य फसलों पर भी लागू करने की बजाए नीति आयोग ने price deficiency payment की पद्धति अपनाने की सलाह दी गई है. इस पद्धति के अंतर्गत सरकारी खरीद की अनिवार्यता नहीं हैं केवल यह नियम है की सरकार द्वारा निर्धारित मूल्य से कम मूल्य मिलने पर अंतर का भुगतान सरकार करेगी.

उस समय जब MSP का निर्धारण किसानी की लागत से भी कम मूल्य पर हो रहा है, MSP को पुख्ता ढंग से लागू करने की बजाए किसी दूसरी नीति की तरफ बढ़ना मूर्खता के सिवाए कुछ नहीं है. जो कितनी भी गहराई से विचार कर लेने पर भी यह इशारा नहीं करता कि किसानों की आय आने वाले कुछ सालों में दोगुनी हो जायेगी.

किसानों को अपनी उपज का अधिकांश भाग APMC एक्ट द्वारा नियंत्रित स्थानीय मंडियों में बेचना पड़ता है. इन मंडियों में केवल खरीददारों की चलती है. मध्यस्थों के जरिये उपज के दाम उतारे और चढाये जाते है. ऐसी स्थिति में उत्पादक किसान को अंतिम उपभोक्ता द्वारा मिलने वाले मूल्य का बहुत कम हिस्सा हासिल होता है. जिससे उसकी दयनीय स्थिति और अधिक दयनीय होती जाती है. नीति आयोग के एक्शन एजेंडा का मानना है की APMC act में बदलाव करने की जरूरत है. ऐसा नियम बनाने की जरूरत है की किसान अपनी उपज को जिसको मर्ज़ी उसको बेच सके. ऐसा करने पर किसानों को अपनी उपज का वाजिब मेहनताना मिलेगा.

जबकि असलियत यह यह है की भारत के अधिकांश हिस्से में अभी भी स्थानीय मंडियों जैसी कोई व्यवस्था नहीं है. बिहार के जिस क्षेत्र से मैं आता हूं, वहां अब भी मेरे घरवाले अपनी कृषि उपज को किसी साईकिल सवार व्यापारी को बेचते हैं. ऐसे में नीति आयोग की सलाह हवाई तीर चलाने की एक कोशिश है. एक नई व्यवस्था अपनाने की सलाह दी जा रही है, जिसकी खामियों का अनुमान पहले से लगाया जा सकता है. उदाहरण के तौर पर यूं समझें कि अगर कृषि उपज के खरीददारों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी तो वह केवल उन्हीं कृषि उपजों को तवज़्ज़ो देंगे जिनमें उनके लायक गुणवत्ता होगी. हालत वही होने लगेगी जो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में भारत के कृषि उत्पादों की होती है. गुणवत्ता के हवाई मानकों पर खरा न उतरने के कारण भारतीय उत्पादों को खारिज कर देना.

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फिर चाहे जो भी हो यह व्यवस्था इस तरफ कहां इशारा करती है कि इससे आने वाले समय में किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी. भारत के कृषक समाज के लिए जिसका अधिकांश हिस्सा अभी भी प्राथमिक शिक्षा से दूर है, उसकी उपज को बेचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मंडियों को बढ़ावा देने की बात कही गयी है. नीति निर्माताओं ने उस मनः स्थिति के सम्बन्ध में भी सोचने की कोशिश नहीं की है जिसके तहत किसानी की उपज से जुड़े व्यापारी उपज की ऊपर से जांच-परख कर उपज का व्यापार करने में अधिक यकीन करते हैं.

मतलब आलू के व्यापारी इलेक्ट्रॉनिक मंडियों के सहारे कैसे जान पाएंगे कि आखिरकार आलू की हालत की हकीकत क्या है? इस क्वालिटी के आलू का दाम क्या होना चाहिए ?

लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मंडियों के संदर्भ में नीति आयोग की अंतर्दृष्टि में एक बात काबिले तारीफ़ है की वह मानती है की अभी इस दिशा में काम करने में बहुत समय लग सकता है. बस नीति आयोग के काबिलियत पर शक तभी होता है जब इतनी दीर्घकालीन नीतियों के सहारे वह प्रधानमंत्री के सपने को अगले पांच सालों में साकार कर देने की बात अपनी रिपोर्ट में करता है.

पहले की ऐसी ही अदूरदर्शिता की बात करें तो फसल बीमा योजना की शुरुआत बड़े गाजे-बाजे के साथ हुई थी. नीति आयोग ने भी इसकी अहमियत को स्वीकार किया है. ज़मीनी हकीकत यह है की इस योजना के तहत फसलों का बीमा लागत से भी कम दाम पर किया गया है. लगभग हर फसलों की लागत से 50 प्रतिशत कम मूल्य पर.

सरकार ने प्रीमियम के रूप में जितनी राशि का भुगतान प्राइवेट कंपनियों को दिया है प्राइवेट कम्पनियों ने उसके आधे से भी कम का भुगतान किसानों को नहीं किया है. कई रिपोर्टें तो यह भी कहती हैं कि फसल बीमा योजना केवल प्राइवेट कंपनियों की कमाई का बड़ा जरिया होता जा रहा है. बहुसंख्यक किसान अभी भी बंटाईदार की तरह किसानी करते हैं. बढ़ते हुए मध्यवर्ग और शहरीकरण के कारण बंटाईदारी का चलन बढ़ता जा रहा है. इन किसानों की सबसे बड़ी समस्या यह है की स्वामित्व के अभाव में सरकार से मिलने वाली किसी भी तरह की सहायता इन्हें नहीं मिल पाती है. फसल बीमा योजना के साथ भी बंटाईदार किसान की यही हालत है.

किसान और बीमा योजनाओं की इन विसंगतियों को दूर करने की बाजाए नीति आयोग राजकोषीय खर्चे की चिंता करता है. नीति आयोग की सलाह है जिन किसानों के पास बीमा योजना की भुगतान क्षमता है उन्हें अपनी बीमा की प्रीमियम खुद भुगतान करनी चाहिए. जो सरकार से निर्धारित राशि से अधिक की बीमा योजना की दावा करते हैं, वह सरकारी सहयोग के बिना ऐसी बीमा योजनाएं खरीदें. मतलब अगर फसल की लागत 5000 रुपये है, सरकार ने बीमा के रूप में 2000 रूपये निर्धारित किए हैं और किसान यह कहता है की इसे बढ़ाना चाहिए तो सरकार यह जवाब देती है कि किसान अपनी फसल पर बीमा राशि का निर्धारण खुद कर ले और उसका भुगतान भी खुद कर ले.

नीति आयोग के तीन वर्षीय एक्सन एजेंडा में किसानों की दोगुनी आय से संबधित अध्याय की पूरी कहानी यही है. मुझ हिंदी भाषी इंसान को तीन वर्षीय एक्शन एजेंडा का हिंदी अनुवाद कहीं भी नहीं मिला. मजबूरन अंग्रेजीदां लोगों के अंग्रेजी पन्नों में डबल फार्मिंग इनकम वाला अध्याय पढ़ने का हौसला जुटाना पड़ा. अंग्रेजी की सुंदर बयानबाज़ी पढ़ने के बाद जो समझ सका वह यह है की मुझे एक बड़े रणनीतिकार के इस बयान पर यकीन हो गया जो कहते हैं कि ‘प्रधानमन्त्री तो जनता को अपने पाले में लाने के लिए जुमले बोला करते हैं.’

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